Tuesday, November 3, 2026

राष्ट्रीय जन-स्वास्थ्य आपातकाल का रूप लेता जा रहा प्रदूषण

 अशोक मिश्र

दिल्ली-एनसीआर सहित देश के कई राज्यों में प्रदूषण भयानक रूप अख्तियार करने लगा है। दिल्ली-एनसीआर में तो बीएस-4 वाहनों की इंट्री पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। इसके लिए दिल्ली की सीमाओं पर चेकिंग अभियान चलाया जा रहा है। काफी संख्या में बीएस-4 वाहनों को न केवल वापस किया गया है, बल्कि कुछ वाहनों को जब्त भी कर लिया गया है। अक्टूबर-नवंबर आते ही दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण की समस्या गहरा जाती है। इस बार बीएस-फोर वाहनों पर प्रतिबंध जैसा कदम उसी मौसमी संकट की प्रतिक्रिया है। प्रदूषण का कोई एक कारण नहीं है, यह कई स्रोतों का मिला-जुला परिणाम है। 

सबसे बड़ा हिस्सा वाहनों के धुएं का है। पुराने डीजल वाहन, बिना मेंटेनेंस वाले ट्रक और दोपहिया वाहन जो नाइट्रोजन आॅक्साइड और पीएम 2.5 छोड़ते हैं, प्रदूषण के सबसे बड़े कारण हैं। पराली जलाना भी प्रदूषण का प्रमुख कारण माना जाता है जो पंजाब-हरियाणा में अक्टूबर में चरम पर होता है। पंजाब-हरियाणा सरकार पराली जलाने से रोकने के लिए कई तरह के उपाय कर रही है। पिछले कुछ वर्षों में पराली जलाने की घटनाओं में काफी कमी आई है, लेकिन अभी यह उपाय पर्याप्त नहीं है। पराली का धुआं उत्तर-पश्चिमी हवाओं के साथ दिल्ली की ओर आता है। केवल पुराने डीजल वाहनों और पराली को ही प्रदूषण के लिए जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा। इसके अलावा साल भर चलने वाले स्रोत भी प्रदूषण के लिए जिम्मेदार हैं, जैसे निर्माण कार्यों के दौरान उड़ने वाली धूल जो बिना ढके निर्माण करने के कारण उड़ती है, सड़कों की टूटी सतह से उड़ने वाली धूल, कोयला और बायोमास पर चलने वाले ईंट-भट्ठे और छोटे उद्योग, कचरा जलाना, घरों में लकड़ी-गोबर का ईंधन के रूप में इस्तेमाल और बिजली उत्पादन के लिए जीवाश्म ईंधन का उपयोग। 

मौसम भी इसे बढ़ाता है, सर्दियों में हवा ठंडी और भारी हो जाती है, इनवर्जन के कारण धुंध ऊपर नहीं उठती और प्रदूषक जमीन के पास ही फंस जाते हैं। अब सवाल उठता है कि आखिर प्रदूषण का स्थायी समाधान क्या है? तो हमें इस बात को अच्छी तरह समझना होगा कि केवल एक शहर में कुछ गाड़ियों पर प्रतिबंध लगाने से कोई परिणाम नहीं निकलेगा। जरूरत है समग्र और पूरे साल चलने वाली नीति की, जो प्रदूषण को बिल्कुल खत्म करने में अहम भूमिका निभाए। परिवहन में पब्लिक ट्रांसपोर्ट को मजबूत करना, मेट्रो और ई-बसों की संख्या बढ़ाना, आखिरी मील की कनेक्टिविटी देना और इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर बनाना सबसे पहला कदम होना चाहिए। पराली के लिए किसानों को हैप्पी सीडर, बायो-डिकम्पोजर जैसे विकल्प सस्ते और समय पर उपलब्ध कराना होगा। पराली से बायो-सीएनजी या पैकेजिंग बनाने की सप्लाई चेन बनाना बहुत जरूरी है ताकि पराली जलाना किसानों के लिए आर्थिक रूप से गैर-जरूरी हो जाए। 

निर्माण और सड़कों पर डस्ट कंट्रोल के नियमों का सख्ती से पालन, ग्रीन कवर बढ़ाना, कचरा प्रबंधन में कचरा जलाने पर पूरी रोक और उद्योगों में क्लीनर फ्यूल पर स्विच करना भी स्थायी उपाय हैं। पूरे देश के लिए एक ही एयरशेड के रूप में एनसीआर सहित आसपास के राज्यों की संयुक्त कार्ययोजना ही काम करेगी, क्योंकि हवा राज्य की सीमा नहीं मानती। उसे एक शहर से दूसरे शहर या एक राज्य से दूसरे राज्य में आने-जाने से कोई नहीं रोक सकता है। स्वास्थ्य पर प्रदूषण का असर अब पूरे देश में दिखने लगा है। प्रदूषण अब केवल दिल्ली-एनसीआर, हरियाणा, पंजाब या पश्चिमी उत्तर प्रदेश की समस्या नहीं रही। इसके देश के कई राज्य प्रभावित होने लगे हैं। प्रदूषण के चलते फैलने वाली बीमारियां, केवल खांसी-जुकाम तक सीमित नहीं हैं। प्रदूषित हवा में मौजूद पीएम 2.5 इतना बारीक कण है कि फेफड़ों से होते हुए खून में चला जाता है। इससे अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, सीओपीडी जैसी सांस की बीमारियां बढ़ती हैं। बच्चों में फेफड़ों का विकास धीमा होता है। 

प्रदूषण के चलते बुजुर्गों में हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है। लंबे समय तक उच्च प्रदूषण में रहने से आंखों में जलन, त्वचा एलर्जी, गर्भवती महिलाओं में समय से पहले प्रसव और बच्चों के शारीरिक विकास पर भी असर देखा गया है। डब्ल्यूएचओ और कई भारतीय अध्ययनों के अनुसार प्रदूषण के कारण औसत जीवन प्रत्याशा में भी कमी आ रही है। अब इसे केवल दिल्ली की सर्दियों की समस्या नहीं बल्कि राष्ट्रीय जन-स्वास्थ्य आपातकाल के रूप में देखना होगा। पानी के प्रदूषण से हैजा, टाइफाइड, डायरिया और हेपेटाइटिस जैसी बीमारियां फैलती हैं, जबकि मिट्टी और भोजन में मिले रसायनों से कैंसर, हार्मोनल असंतुलन और किडनी संबंधी समस्याएं हो सकती हैं। शोर प्रदूषण से तनाव, नींद की कमी और रक्तचाप की समस्याएं पैदा होती हैं। कुल मिलाकर प्रदूषण शरीर को अंदर से कमजोर करता है और छोटी-छोटी बीमारियां भी गंभीर रूप ले लेती हैं।  यह सामूहिक समस्या है जिसमें उद्योग, सरकार और आम नागरिक सभी की भूमिका है, इसलिए इसका समाधान भी सामूहिक प्रयासों से ही संभव है।


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