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Saturday, April 5, 2025

लोगों की मदद करने वाला ही सच्चा इंसान

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

इस दुनिया में बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जो दूसरों का दुख-दर्द समझते हैं और उसकी मदद करने को तैयार होते हैं। ज्यादातर लोग दूसरों को दुखी देखकर भले ही मुंह से कुछ न कहें, लेकिन मन ही मन आनंदित होते हैं। दूसरों का दुख समझने और उसकी सहायता करने वाला ही महान कहलाता है। 

जापान में एक कवि हैं नोबारू इगुची। वह जापान में अत्यंत लोकप्रिय हैं। लोग उन्हें बुद्धिजीवी और दार्शनिक मानते हैं। वह स्वभाव से अत्यंत फक्कड़ और मनमौजी आदमी हैं। वह हमेशा प्रसन्न रहने में ही विश्वास करते हैं। कहा जाता है कि वह लोगों की मदद करने में भी बहुत आगे रहते हैं। एक बार की बात है। एक व्यक्ति आत्महत्या करने जा रहा था। वह अपनी परेशानियों से काफी तंग आ चुका था। 

तीन दिन से उसके परिवार में खाना नहीं बना था। अपनी गरीबी से तंग आकर उसने आत्महत्या करने की सोची। तभी उसकी मुलाकात इगुची से हो गई। मनमौजी स्वभाव के इगुची ने उसको समझाते हुए कहा कि मानव जीवन आत्महत्या के लिए नहीं मिला है। आत्महत्या तो कायर लोग किया करते हैं। यदि जीवन में कोई परेशानी है, तो उसे दूर करने का प्रयास करो। 

उस व्यक्ति ने अश्रुपूर्ण नेत्रों से इगुची को बताया कि उसके घर में तीन दिन से खाना नहीं बना है। उसका पूरा परिवार भूख से छटपटा रहा है। ऐसी हालत में मेरे पास आत्महत्या करने के अलावा  कोई विकल्प नहीं है। यह सुनकर कवि इगुची की आंखों में आंसू आ गए। 

उन्होंने रास्ते में एक गुप्तदान की पेटी लगवाकर लिख दिया कि जो भी जरूरतमंद हो, वह यहां से पैसे निकालकर अपना काम चला सकता है। इगुची ने उस व्यक्ति की भी मदद की। जब जापान के लोगों को इगुची के इस काम की चर्चा हुई तो वह बहुत प्रसन्न हुए।





Tuesday, March 18, 2025

नेताजी को मिली सिंगापुर में भारी मदद

 बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

आजाद हिंद फौज का गठन सन 1942 को जापान की राजधानी टोक्यो में हुई थी। उन दिनों द्वितीय विश्व युद्ध चल रहा था। जापान अधिकृत सिंगापुर में आजाद हिंद फौज के गठन का विचार सबसे पहले मोहन सिंह के मन में आया था। बस फिर क्या था? कैप्टन मोहन सिंह, रासबिहारी बोस और निरंजन सिंह गिल ने आजाद हिंद फौज का गठन किया।

फौज का गठन होने के बाद सबसे बड़ा संकट इतनी बड़ी फौज के नेतृत्व करने की थी। नतीजा यह हुआ कि आजाद हिंद फौज कुछ ही समय बाद निष्क्रिय हो गई। 4 जुलाई 1943 को नेताजी सुभाष चंद्र बोस को इसका नेतृत्व रासबिहारी बोस ने सौंप दिया और उसके अगले दिन नेताजी ने दिल्ली चलो का नारा दिया।

उन दिनों जापान और अन्य देशों से आजाद हिंद फौज को भारी मात्रा में सहायता मिल रही थी। सिंगापुर में आजाद हिंद फौज के लिए मदद देने वालों की एक बहुत बड़ी भीड़ इकट्ठी हुई थी। एक बुजुर्ग महिला नेताजी सुभाष चंद्र बोस के पास पहुंची और उसने कहा कि यह हार ही मेरी सबसे बड़ी संपत्ति है। इसे आप ग्रहण करें। हार का मूल्य उन दिनों 25-30 रुपये ही था।

बुजुर्ग महिला का त्याग देखकर नेताजी भावविभोर हो गए। उन्होंने उस हार की नीलामी करवाई। पहली बोली एक हजार रुपये रखी गई। देखते ही देखते उस हार की बोली आठ लाख रुपये तक पहुंच गई। तभी एक व्यक्ति आगे आया और उसने कहा कि मैं अपने आप सहित अपनी पूरी संपत्ति इस हार के लिए देता हूं। इसके बाद वह आदमी आजाद हिंद फौज में शामिल हो गया। उसकी संपत्ति की कीमत आठ लाख रुपये से अधिक थी। 

इस तरह विदेश में रह रहे भारतीयों और विदेशी नागरिकों की मदद से आजाद हिंद फौज आगे बढ़ती हुई बर्मा के साथ कोहिमा और इंफाल तक पहुंच गई थी। इससे अंग्रेजी शासन की चूलें हिल गई थीं।