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Monday, April 21, 2025

गोखले ने रानाडे को अंदर जाने नहीं दिया

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

गोपाल कृष्ण गोखले का जन्म 9 मई 1866 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी में मराठी परिवार में हुआ था। गोखले कांग्रेस के नरमदल के नेता थे। वह कांग्रेस के वरिष्ठ नेता होने के साथ-साथ सर्वेंट आॅफ इंडिया सोसायटी के संस्थापक भी थे। वह जीवन भर किसी भी तरह के भेदभाव के खिलाफ रहे। इनके युवावस्था की एक बहुत प्रसिद्ध कथा है। कहते हैं कि पुणे में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था। 

उस कार्यक्रम में महादेव गोविंद रानाडे को भी भाग लेना था। महादेव गोविंद रानाडे उस समय बाम्बे उच्च न्यायालय के न्यायाधीश थे। उस कार्यक्रम में न्यायाधीश महादेव गोविंद रानाडे को सम्मिलित होना था। कार्यक्रम के आयोजकों ने गोखले को पंडाल के गेट पर खड़ा करते हुए कहा कि जिसके पास निमंत्रण पत्र हो उसी को पंडाल के अंदर आने देना। गोखले अपने काम में जुट गए। जो निमंत्रण पत्र दिखाता था, उसको वह उसको अंदर जाने देते थे। 

संयोग से उसी दौरान कार्यक्रम के मुख्य अतिथि महादेव गोविंद रानाडे वहां पहुंचे। उनके पास निमंत्रण पत्र नहीं था। गोखले ने उनको अंदर जाने से रोक दिया। रानाडे वहीं खड़े हो गए। थोड़ी देर बाद स्वागत समिति का अध्यक्ष वहां पहुंचा और उसने रानाडे को वहां खड़ा देखा, तो गोखले से पूछा कि आपने इन्हें अंदर क्यों नहीं जाने दिया? गोखले ने कहा कि इनके पास निमंत्रण पत्र नहीं था, तो इनको अंदर नहीं जाने दिया जा सकता है। तब अध्यक्ष ने कहा कि यही तो कार्यक्रम के मुख्य अतिथि हैं। तुम्हें इन्हें अंदर आने देना चाहिए था। 

गोखले ने कहा कि मैं तो अपने कर्तव्य का पालन कर रहा था। इसके कुछ समय बाद गोखले न्यायाधीश रानाडे की विद्वता से प्रभावित होकर उनके काफी करीब होते चले गए और गोखले ने उन्हें अपना गुरु मान लिया। 



Wednesday, March 5, 2025

सत्संगति दिखाती है जीवन की राह

बोधिवृक्ष 

अशोक मिश्र

नामदेव महाराष्ट्र के प्रसिद्ध संत थे। उनके गुरु बिनोबा खेचर उम्र में उनसे सिर्फ पांच साल बड़े थे। दक्षिण के प्रसिद्ध संत ज्ञानेश्वर उनके समकालीन थे। नामदेव के समय में महाराष्ट्र में नाथ और महानुभाव पंथ का बोलबाला था। कहा जाता है कि संत नामदेव ने लगभग पंद्रह साल तक पंजाब में भगवान्नाम का प्रचार किया था। इनकी कुछ रचनाएं गुरु ग्रंथसाहिब में संग्रहीत की गई हैं।एक बार की बात है। 

इनके पास श्यामनाथ नाम का व्यक्ति अपने पुत्र तात्या को लेकर पहुंचा। श्यामनाथ ने संत नामदेव से कहा कि मेरा पुत्र तात्या न तो साधु-संतों की संगति में रहना पसंद करता है, न ही पूजा पाठ करता है। सारा दिन आवारागर्दी करता रहता है।

इसे कुछ भी काम करना भी नहीं सुहाता है। इसका क्या किया जाए, कुछ समझ में नहीं आता है। यह सुनकर संत नामदेव कुछ देर तक सोचते रहे। फिर पिता-पुत्र से बोले कि मेरे साथ आओ। 

वह उन दोनों को लेकर मंदिर के लंबे-चौड़े दालान में लेकर गए। पिता-पुत्र ने देखा कि एक जगह लालटेन जल रही थी।

उस समय अंधेरा हो चुका था।  वे उन दोनों को लेकर आगे बढ़ चले। कुछ दूर जाने पर संत नामदेव खड़े हो गए, तो तात्या  ने कहा कि आप हम लोगों को अंधेरे में लेकर क्यों आए हैं। इससे अच्छा था कि वहां खड़े होते जहां लालटेन जल रही है। 

इस पर नामदेव बोले कि यही तो मैं तुम्हें समझाना चाहता हूं। साधु-संत और उनकी संगति लालटेन का काम करती है। तुम अंधेरे में जब हाथ पैर मार रहे होते हो, तो पूजा, प्रार्थना, भजन और साधु संगति की तुम्हें रास्ता दिखाते हैं। यही कुमार्ग से सत्मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं। अच्छा होगा कि तुम भी अभी से सन्मार्ग पर चलना सीख लो। 

यह सुनकर तात्या को अपने ऊपर बड़ा पछतावा हुआ और उस दिन से पिता के बताए मार्ग पर चलने लगा।