Tuesday, March 17, 2026

तपेदिक मुक्त हरियाणा के लक्ष्य की ओर मजबूती से बढ़ते कदम

अशोक मिश्र

यदि समय पर इलाज न किया जाए, तो तपेदिक यानी टीबी जानलेवा साबित होती है। आज से चार-पांच दशक पहले तक तपेदिक रोग होने पर मरीज की मौत निश्चित मान ली जाती थी क्योंकि उन दिनों तपेदिक रोग का मुकम्मल इलाज उपलब्ध नहीं था। लोग रोग को लेकर इतने जागरूक भी नहीं थे। लेकिन अब हालात बदल गए हैं। केंद्र और प्रदेश सरकारों ने जहां देश-प्रदेश से टीबी को जड़ से खत्म करने के लिए मुहिम चला रखी है, वहीं लोग भी अब धीरे-धीरे जागरूक होने लगे हैं। 

केंद्र सरकार ने  राष्ट्रीय प्रधानमंत्री टीबी मुक्त भारत अभियान चलाकर भारत को तपेदिक मुक्त करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। हरियाणा सरकार भी अपने इस गुरुत्तर दायित्व को पूरा करने का हर संभव प्रयास कर रही है। हरियाणा में टीबी उन्मूलन के लक्ष्य के साथ सक्रिय मामले खोजे जा रहे हैं। फरवरी 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में 88,689 टीबी के मामले दर्ज किए गए हैं जिसमें 74,483 मरीजों का सफलतापूर्वक उपचार किया गया। 

फरीदाबाद जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में मरीजों की संख्या अधिक है, जहाँ अकेले लगभग पांच हजार मामले पहचाने गए थे। हरियाणा में साल 2025 में 12.52 लाख थूक परीक्षण किए गए थे और 'निक्षय मित्र' पहल के तहत 10 लाख से अधिक लोगों की जांच की गई थी। राज्य सरकार की सक्रियता की वजह से हरियाणा में तपेदिक रोगियों की संख्या में लगातार कमी आती जा रही है। पंचायत स्तर पर चलाए गए अभियान के सार्थक परिणाम आने लगे हैं। टीबी मुक्त भारत अभियान की कड़ी में हरियाणा की 2157 ग्राम पंचायतों को टीबी मुक्त घोषित कर दिया गया है।

 इनमें से 211 पंचायतों को स्वर्ण, 646 पंचायतों को रजत तथा 1300 पंचायतों को कांस्य श्रेणी में प्रमाणपत्र मिला है। राज्य में कुल 6237 पंचायतें हैं। इस तरह लगभग 35 प्रतिशत पंचायतें टीबी मुक्त हो गई हैं। अंबाला टीबी मुक्त 191 पंचायतों के साथ अभियान में सबसे आगे है। पिछले तीन वर्षों में टीबी-मुक्त पंचायतों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जो इस कार्यक्रम के जमीनी स्तर पर मजबूत क्रियान्वयन को दर्शाती है। 

वर्ष 2023 में राज्य की 574 पंचायतों को टीबी मुक्त होने का प्रमाणपत्र मिला था और सभी पंचायतें कांस्य श्रेणी में थीं, जो कुल पंचायतों का लगभग नौ प्रतिशत था। इसके बावजूद अभी टीबी मुक्त हरियाणा का लक्ष्य हासिल करना बाकी है। आमतौर पर देखा यह जा रहा है कि कुछ मरीज अपने इलाज को लेकर गंभीर नहीं होते हैं। थोड़ा सा आराम मिलने के बाद वह नियमित रूप से दवा लेना बंद कर देते हैं। जिसकी वजह से बाद में तपेदिक रोग बड़ी तेजी से फैलने लगता है और हालात बेकाबू हो जाते हैं। जब तक टीबी के इलाज का कोर्स पूरा नहीं किया जाता है, तब तक यह रोग पूरी तरह ठीक नहीं होता है।

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