Tuesday, March 17, 2026

किसी प्रशंसा में काव्य रचना उचित नहीं

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

नानालाल दलपतराम गुजराती साहित्य के इतिहास में बहुचर्चित नाम है। वह रोमांटिक और भक्तिपूर्ण साहित्य रचने के लिए जाने जाते हैं। नानालाल एक उत्कृष्ट गीतकार, कथात्मक काव्य रचने वाले कवि और नाटककार थे। उन्होंने अपने जीवन में 80 से अधिक पुस्तकें लिखीं जिनमें काव्य, नाटक, उपन्यास और जीवनी शामिल हैं। 

उन्होंने संस्कृत साहित्य के महाकवि कालिदास की प्रसिद्ध रचना अभिज्ञानशाकुंतलम और मेघदूत का गुजराती भाषा में अनुवाद किया। गुजराती पाठकों में उनका यह कार्य काफी पसंद किया गया। इसके साथ ही भगवतगीता और कई उपनिषदों का भी गुजराती में अनुवाद किया। नानालाल का जन्म 16 मार्च 1877 को अहमदाबाद में हुआ था। इनके पिता का नाम दलपतराम था। 

उन्होंने अपने पिता की जीवनी कवीश्वर दलपतराम नाम से लिखी थी। इनकी कविताओं में प्रकृति वर्णन, प्रेम और सौंदर्य प्रचुर मात्रा में मिलते हैं। काव्य लेखन में नानालाल की युवावस्था में ही रुचि पैदा हो गई थी। एक बार की बात है। नानालाल को बडौदा रियासत के महाराज ने अपने दरबार में आमंत्रित किया। दरबार में किसी दरबारी ने नानालाल से महाराज की प्रशंसा में कविता सुनाने की मांग रखी। 

दरबारी की मांग सुनते ही पूरे दरबार में सन्नाटा छा गया। तब उन्होंने बड़ी विनम्रता से कहा कि कविता किसी को प्रसन्न करने के लिए नहीं रची जाती है। सत्य और सौंदर्य की अभिव्यक्ति से कविता निखर उठती है। यदि कोई कवि किसी प्रशंसा में काव्य रचना करे, तो उसकी रचना का मू्ल्य क्या रह जाएगा। उन्होंने महाराज की प्रशंसा छोड़कर अन्य कविताएं सुनार्इं और अपने घर लौट गए।

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