Friday, November 6, 2026

अग्निवीरों की स्थायी भर्ती के लिए पात्रता के मूल्यांकन का खुलेगा रास्ता


अशोक मिश्र

4 नवंबर 2026 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने अग्निपथ योजना में एक बड़े बदलाव को मंजूरी दी। इसकी घोषणा चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल एनएस राजा सुब्रमणि ने की। फैसले के तहत अग्निवीरों को अपने शुरुआती चार साल के कार्यकाल के बाद दो साल का वैकल्पिक सेवा विस्तार दिया जाएगा। यानी अब कुल सेवा अवधि चार से बढ़कर छह साल तक हो जाएगी। यह व्यवस्था विशेष रूप से उन 75 प्रतिशत अग्निवीरों के लिए है जो पहले चार साल बाद सेवा से बाहर हो जाने थे। अब उन्हें दो और साल तक वर्दी में रहने का मौका मिलेगा। इसके बाद स्थायी भर्ती के लिए पात्रता के मूल्यांकन का रास्ता भी खुलेगा। 

इस फैसले का भारतीय सेना पर प्रभाव बहुआयामी हो सकता है। जब अग्निपथ योजना 2022 में शुरू हुई थी, तब सबसे बड़ी चिंता यह थी कि चार साल में से करीब छह से आठ महीने बुनियादी और ट्रेड प्रशिक्षण में चले जाते हैं। यूनिट में पूरी तरह घुलने-मिलने और आॅपरेशनल दक्षता हासिल करने में एक साल और लगता है, तो एक जवान मुश्किल से ढाई साल ही पूरी तरह प्रभावी सैनिक के रूप में बटालियन को दे पाता था। इससे पलटन स्तर पर टीम बॉन्डिंग, हथियारों पर महारत और हाई एल्टीट्यूड जैसे कठिन क्षेत्रों में अनुभव की कमी की आशंका जताई जा रही थी। दो साल का विस्तार इस गैप को काफी हद तक भरता है। 

छह साल का कार्यकाल मतलब है कि प्रशिक्षण के बाद लगभग साढ़े चार साल तक एक तैयार सिपाही यूनिट के साथ रहेगा, वह दो बार आॅपरेशनल साइकिल देखेगा, जूनियर लीडर के रूप में विकसित होगा और सेना को उस पर किए गए निवेश का बेहतर रिटर्न मिलेगा। लॉजिस्टिक और मानव संसाधन प्रबंधन के नजरिए से भी यह स्थिरता लाएगा। हर चार साल में 75 प्रतिशत बल को बदलने की जगह अब छह साल का रोटेशन होगा। इससे भर्ती, प्रशिक्षण केंद्रों और यूनिटों पर दबाव थोड़ा कम होगा। हालांकि, यह भी सच है कि सेना का मूल स्वरूप अभी  अल्पकालिक ही रहेगा। छह साल बाद भी अधिकांश अग्निवीरों को बाहर जाना होगा, इसलिए दीर्घकालिक रेजिमेंटल परंपरा और जेसीओ-एनसीओ कैडर की निरंतरता का सवाल पूरी तरह खत्म नहीं होता। युवाओं के मनोबल के लिहाज से यह फैसला निश्चित रूप से एक बड़ी राहत और प्रोत्साहन है। पिछले तीन सालों में अग्निवीरों के बीच सबसे बड़ी असुरक्षा यह थी कि चार साल बाद क्या होगा। 

पच्चीस प्रतिशत के स्थायी चयन का आंकड़ा सुनकर कई युवाओं और उनके परिवारों को लगता था कि यह सिर्फ चार साल की नौकरी है। कई कोचिंग सेंटरों और गांव-देहात में तो यह धारणा बन गई थी कि चार साल बाद वह फिर से बेरोजगार हो जाएंगे। अब जब सरकार ने खुद समीक्षा के बाद यह माना है कि पहले बैच के प्रदर्शन को देखते हुए उन्हें और समय देना उचित है, तो यह युवाओं को यह संदेश देता है कि योजना पत्थर की लकीर नहीं है, इसमें सुधार की गुंजाइश है। अब सवाल आता है कि क्या एक सैनिक को चार या छह साल तक तैयार करने के बाद छोड़ देना उचित है। यह इस योजना का सबसे संवेदनशील पहलू है। एक तरफ सेना का तर्क  है कि आधुनिक युद्ध में युवा प्रोफाइल, तकनीक से लैस और शारीरिक रूप से फिट जवान चाहिए। 

देश की बड़ी युवा आबादी को अनुशासित मानव संसाधन के रूप में समाज में वापस भेजना राष्ट्र निर्माण है। जो अग्निवीर बाहर जाएंगे, वे पुलिस, अर्धसैनिक बलों, कॉर्पोरेट सुरक्षा और आपदा प्रबंधन में एक प्रशिक्षित पूल बनेंगे। दूसरी तरफ, एक फौजी को बनाने की जो प्रक्रिया है, वह सिर्फ शारीरिक कसरत नहीं है। उसे हथियार, युद्धकला, नैतिकता, टीम भावना और विषम परिस्थितियों में निर्णय लेने की जो घुट्टी पिलाई जाती है, वह वर्षों की मेहनत से बनती है। यदि हम छह साल बाद उस तैयार योद्धा को पूरी तरह से छोड़ देते हैं, तो सेना उस अनुभव को खो देती है जिसे दोबारा बनाने में फिर उतना ही समय और पैसा लगेगा। 

कई पूर्व सैन्य अधिकारियों का मानना है कि आदर्श स्थिति यह होती कि कम से कम पचास प्रतिशत अग्निवीरों को स्थायी किया जाता या उन्हें रिजर्व फोर्स के रूप में हमेशा के लिए सेना से जोड़े रखा जाता, ताकि युद्ध की स्थिति में उन्हें तुरंत वापस बुलाया जा सके। पूरी तरह से छोड़ देना सेना के लिए निवेश की हानि है और जवान के लिए भी एक भावनात्मक टूटन है, क्योंकि वह खुद को पूरी तरह फौजी मान चुका होता है। रक्षा मंत्रालय की स्थायी समिति की रिपोर्टों और विभिन्न अनुमानों के आधार पर एक सामान्य सैनिक को तैयार करने में काफी खर्च आता है। 

एक जवान की बुनियादी ट्रेनिंग 36 से 44 हफ्ते चलती है, फिर एडवांस मिलिट्री ट्रेनिंग, ट्रेड ट्रेनिंग, फायरिंग, फील्ड एक्सरसाइज, उसका खाना, वर्दी, आवास, हथियार-गोला-बारूद, प्रशिक्षकों का वेतन और इंफ्रास्ट्रक्चर का खर्च जोड़ लें तो पहले साल में ही लगभग 10 से 12 लाख रुपये तक का अनुमानित खर्च माना जाता है। अंतत: अग्निपथ योजना का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि छह साल वाला यह मॉडल जमीन पर कितना सफल रहता है।

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