अशोक मिश्रदिल्ली के रामलीला मैदान में एक नवंबर को इंडिया गठबंधन की महारैली तो खत्म हो गई, लेकिन उसकी अनुगूंज अभी तक सुनाई दे रही है। इंडिया गठबंधन, सत्ताधारी एनडीए और कुछ व्यापारिक संगठन इस मुद्दे को लेकर आपस में उलझे हुए हैं। सीटीआई यानी दिल्ली के व्यापारियों के संगठन चैंबर ऑफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री ने दावा किया है कि महारैली की वजह से करीब ग्यारह हजार करोड़ रुपये का व्यापारियों को नुकसान हुआ है। रामलीला मैदान में हुआ एक दिवसीय प्रदर्शन अक्सर अखबारों की सुर्खियों में तो भारी लगता है, पर उसका असर उस दिन शहर के बाजार पर कितना और कैसा पड़ा, इसकी वास्तविकता कई परतों में बंटी हुई है। पहली नजर में यह मान लिया जाता है कि प्रदर्शन वाले दिन सारा बाजार बंद हो गया और व्यापारियों को करोड़ों का नुकसान हो गया। जमीन पर तस्वीर इतनी एकतरफा नहीं होती।
रामलीला मैदान के आसपास का व्यापार दो हिस्सों में बंटा है। एक तो वह जो मैदान से सटे हुए इलाकों जैसे दरियागंज, जामा मस्जिद, चांदनी चौक, कमला मार्केट और अजमेरी गेट के स्थायी व्यापारी हैं। और दूसरा वह जो प्रदर्शन में आने वाली भीड़ पर निर्भर अस्थायी कारोबार है। स्थायी दुकानों के लिए नुकसान का सबसे बड़ा कारण प्रदर्शन नहीं, बल्कि प्रशासनिक बंदोबस्त होता है। पुलिस बैरिकेडिंग, रास्तों का डायवर्जन और वाहनों की नो-एंट्री के चलते ग्राहकों की आवाजाही लगभग थम जाती है। जो ग्राहक रोजमर्रा का सामान खरीदने आता है, वह उस दिन भीड़ और जाम के डर से बाजार का रुख ही नहीं करता। कपड़ा, इलेक्ट्रॉनिक्स, किताबें और बर्तन जैसी गैर-जरूरी वस्तुओं की बिक्री पर इसका सीधा असर पड़ता है, क्योंकि लोग टाल सकते हैं।
इसके उलट, खाने-पीने, पानी, चाय, फल और परिवहन से जुड़े छोटे व्यापारियों के लिए वह दिन कभी-कभी सामान्य दिन से बेहतर भी निकल जाता है, क्योंकि हजारों की संख्या में आए प्रदर्शनकारियों को इन्हीं की जरूरत पड़ती है। इसलिए एक दिन के प्रदर्शन से हर व्यापारी को नुकसान होता है, यह कहना पूरी सच्चाई नहीं है। वहीं रामलीला मैदान में 1 नवंबर 2026 को इंडिया ब्लॉक की महारैली के बाद दिल्ली के व्यापारियों के संगठन चैंबर आॅफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री (सीटीआई) ने दावा किया है कि आसपास के 20-25 प्रमुख बाजारों जैसे चांदनी चौक, सदर बाजार, खारी बावली, चावड़ी बाजार, कनॉट प्लेस, करोल बाग आदि में करीब तीन लाख दुकानों में से लगभग ढाई लाख यानी 80 प्रतिशत दुकानें बंद रहीं। उनके मुताबिक इस एक दिन में खुदरा और थोक व्यापार को करीब 8800 करोड़, ट्रांसपोर्ट-लॉजिस्टिक्स को 1500 करोड़, होटल-रेस्टोरेंट-टूरिज्म को 500 करोड़ और असंगठित क्षेत्र-दिहाड़ी मजदूरों को 200 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ, यानी कुल अनुमानित नुकसान 10 से 11 हजार करोड़ रुपये का। दिवाली के पीक सीजन में ये बाजार रोजाना 10-12 हजार करोड़ का कारोबार करते हैं, लेकिन रैली के कारण यातायात प्रतिबंध, भीड़ का डर और आसपास के शहरों से आने वाले तीन-चार लाख ग्राहक-व्यापारियों के न पहुंचने से बाजार सूने पड़ गए।
सामान लाने-ले जाने वाले करीब पांच हजार वाहन भी नहीं चल सके। ये आंकड़े सीटीआई के अपने आकलन और व्यापारियों के व्हाट्सऐप ग्रुप्स से आए हैं। स्वतंत्र सर्वे या सरकारी आंकड़ों से इनकी पुष्टि अभी नहीं हुई है, इसलिए सटीक नुकसान कितना हुआ यह कहना मुश्किल है। कुछ आलोचनाओं में यह भी कहा गया कि दिल्ली के पूरे दैनिक जीडीपी योगदान या थोक बाजारों के सामान्य कारोबार के मुकाबले यह आंकड़ा बहुत बड़ा और अवास्तविक लगता है। विपक्षी पक्ष ने भी इन दावों को खारिज किया है और सीटीआई पर राजनीतिक पक्षपात का आरोप लगाया है। वास्तविकता यह है कि रैली के दिन कई बाजार प्रभावित हुए, दुकानें बंद रहीं, यातायात रुका और ग्राहक कम आए—यह असर तो हुआ। असली और सबसे गंभीर नुकसान उन व्यापारियों का होता है जिनका काम रोज के हिसाब से चलता है।
जैसे सब्जी-फल के ठेले वाले, दिहाड़ी पर माल ढोने वाले मजदूर, आॅटो-रिक्शा चालक और वे छोटे दुकानदार जो सुबह माल लाकर शाम तक बेचकर ही घर का खर्च निकालते हैं। उनके लिए एक दिन की बिक्री रुकना मतलब सीधे घर के चूल्हे पर असर पड़ना है। वहीं बड़ी दुकानों के लिए नुकसान बिक्री रुकने से ज्यादा सप्लाई चेन टूटने का होता है। ट्रक नहीं आ पाते, माल गोदाम में अटका रह जाता है और अगर वह माल फल, फूल या डेयरी जैसा खराब होने वाला है तो नुकसान दोगुना हो जाता है। इस तरह एक दिन का प्रदर्शन दो से तीन दिन के व्यापार को धीमा कर देता है। दूसरी ओर, व्यापारी संगठनों द्वारा बताए जाने वाले नुकसान के आंकड़े अक्सर बढ़ा-चढ़ा कर पेश किए जाते हैं, ताकि प्रशासन पर दबाव बनाकर मुआवजे या भविष्य में ऐसी आयोजनों पर रोक की मांग की जा सके। चैंबर आॅफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री ने तो अब आगे और प्रदर्शन न होने देने की मांग करनी शुरू कर दी है, ताकि बाकी त्योहारी कारोबार बच सके।

