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Sunday, November 16, 2025

सूरज और चंद्रमा का अपना अपना सौंदर्य है

प्रतीकात्मक चित्र
 बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

इतिहास में रुद्रसेन प्रथम और द्वितीय की चर्चा होती है। इन्हें वाकाटक वंश का माना जाता है। वैसे रुद्रसेन के बारे में बहुत ज्यादा जानकारी तो नहीं मिलती है, लेकिन विभिन्न ग्रंथों और शिलालेखों से यह ज्ञात होता है कि उनके पिता राजकुमार गौतमीपुत्र थे और उनकी माता संभवत: भारशिव
राजा भवनाग की पुत्री थीं। बाद के वाकाटक शिलालेखों में रुद्रसेन को भवनाग का पौत्र बताया गया है। 

रुद्रसेन का जन्म 335-360 ईस्वी में माना जाता है। रुद्रसेन ने कभी अपने आपको सम्राट नहीं घोषित किया था। वह अपने को महाराजा ही कहलाते रहे। एक बार की बात है। वह एक संत के पास गए। उस समय संत प्रार्थना में लीन थे। रुद्रसेन ने एक तरफ बैठकर संत की प्रार्थना खत्म होने का इंतजार किया। 

काफी देर बाद संत की प्रार्थना खत्म हुई तो रुद्रसेन ने संत को प्रणाम करते हुए कहा कि प्रभु! मैं अपने को बहुत दीन-हीन महसूस करता हूं। कई बार ऐसा भी हुआ है कि मैंने अपनी मृत्यु को बहुत निकट से महसूस किया है। मैंने न जाने कितनी बार निर्बलों की रक्षा की है, लेकिन आज मुझे महसूस हुआ कि मेरे होने या न होने का कोई मतलब नहीं है। संत ने कहा कि मैं आपके सवाल का जवाब थोड़ी देर बाद दूंगा। 

जब सब लोग विदा हो गए, तो संत रुद्रसेन को लेकर बगीचे में गए। उस समय चांदनी छिटकी हुई थी। संत ने कहा कि चांद बहुत सुंदर लग रहा है। लेकिन जब सुबह होती है, सूर्य निकल आता है, तो चंद्रमा निस्तेज हो जाता है। लेकिन चंद्रमा ने कभी इस बात की शिकायत नहीं की। रुद्रसेन ने कहा कि हां, यह बात सही है। सूर्य और चंद्रमा का अपना अपना सौंदर्य है। तब संत ने कहा कि यही आपके सवालों का जवाब है।