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Thursday, November 5, 2026

किसानों के लिए बहुत फायदेमंद है सैनी सरकार की लैंड पूलिंग नीति


अशोक मिश्र

हरियाणा सरकार ने 3 नवंबर को हुई मंत्रिमंडल की बैठक में लैंड पूलिंग पॉलिसी-2026 को मंजूरी दी है। यह पॉलिसी 2022 की पुरानी नीति की जगह लेगी। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी की अध्यक्षता में लिए गए फैसले का मकसद जबरन भूमि अधिग्रहण की पुरानी व्यवस्था को खत्म करके किसानों को विकास में सीधा भागीदार बनाना है। हरियाणा की नई लैंड पूलिंग पॉलिसी में लैंड माफिया को अलग रखने के लिए कई ऐसे प्रावधान जोड़े गए हैं जो 2022 की पुरानी नीति में या तो नहीं थे या कमजोर थे। असल में लैंड माफिया का खेल तब शुरू होता है, जब सरकार किसी इलाके को विकसित करने की घोषणा करती है। माफिया या उसके दलाल किसानों के पास जाकर डराते हैं कि तुम्हारी जमीन तो सरकार सस्ते में ले लेगी, हमें अभी बेच दो। किसान घबराकर औने-पौने दाम पर जमीन बेनामी लोगों या शेल कंपनियों को बेच देता है। फिर वही जमीन सरकारी रिकॉर्ड में महंगे मुआवजे या विकसित प्लॉट के रूप में माफिया के पास चली जाती है। दूसरा तरीका बिचौलियों का भारी कमीशन और कागजों में हेराफेरी का होता है। 

नई नीति लैंड माफिया को कई स्तर पर रोकती है। पहली बात तो यह है कि यह पूरी तरह स्वैच्छिक है, जबरन अधिग्रहण नहीं। जब सरकार जबरदस्ती नहीं ले रही तो किसान को घबराकर सस्ते में बेचने की जरूरत ही नहीं है। इसमें लेन-देन सीधा सेल डीड यानी बिक्री विलेख के पंजीकरण से होता है। अंतरिम सहायता का एक लाख रुपये प्रति एकड़ हर साल सीधे भू-मालिक के खाते में जाता है। यदि 15 दिन में पैसा नहीं आया तो नौ प्रतिशत सालाना ब्याज देने का नियम है, ताकि पैसा बीच में कोई खा न जाए। लैंड एग्रीगेटर यानी जमीन जुटाने वाले व्यक्ति के कमीशन को फिक्स कर दिया गया है, उसे संबंधित रेवेन्यू एस्टेट के कलेक्टर रेट का सिर्फ 0.5 प्रतिशत ही मिलेगा और वह भी विकास एजेंसी देगी, किसान नहीं। अब लैंड पूलिंग को इस तरह समझा जा सकता है। सरकार किसान की जमीन एक तय मुआवजा देकर हमेशा के लिए नहीं लेती, बल्कि किसान अपनी जमीन स्वेच्छा से एक बड़े प्रोजेक्ट के लिए पूल में देता है। 

सरकार या उसकी विकास एजेंसी उस पूरी जमीन पर सड़क, बिजली, पानी, सीवरेज जैसी सुविधाएँ बनाकर उसे विकसित करती है। फिर उस विकसित जमीन में से एक हिस्सा किसान को वापस कर देती है। यह जबरन अधिग्रहण नहीं, साझेदारी है। नई नीति में इसी साझेदारी का फॉर्मूला तय किया गया है कि स्वीकृत लेआउट प्लान के कुल बिक्री योग्य क्षेत्र का 50 प्रतिशत हिस्सा जमीन देने वाले भू-मालिकों को और 50 प्रतिशत हिस्सा विकास एजेंसी के पास रहेगा। पहले इस 50 प्रतिशत को बाजार मूल्य से जोड़ने का जटिल प्रावधान था, जिसे अब हटाकर सीधा बिक्री योग्य क्षेत्र के आधार पर कर दिया गया है ताकि पारदर्शिता रहे।  इस नीति से सबसे बड़ा फायदा किसान और छोटे-बड़े भू-मालिकों को है। 

उन्हें न सिर्फ विकसित प्लॉट मिलता है जिसका बाजार मूल्य उनकी कच्ची जमीन से कई गुना अधिक होता है, बल्कि चार साल तक हर साल प्रति एकड़ एक लाख रुपये की अंतरिम वित्तीय सहायता भी मिलती है यानी चार साल में कुल चार लाख रुपये। साथ ही छोटे मालिकों का भी ध्यान रखा गया है। जिनका योगदान 999 वर्ग मीटर से कम है, उन्हें विकसित प्लॉट की जगह भूमि अधिग्रहण कानून 2013 या आरक्षित मूल्य में से जो अधिक हो, उसके आधार पर मुआवजा मिलेगा। जिनका योगदान 2000 वर्ग मीटर से अधिक है, उन्हें आवासीय या औद्योगिक प्लॉट के साथ-साथ कियोस्क या बूथ के रूप में वाणिज्यिक भूखंड भी मिलेगा। न्यूनतम प्लॉट का आकार भी तय है, आवासीय के लिए 100 वर्ग मीटर, औद्योगिक के लिए 250 वर्ग मीटर और संस्थागत के लिए 500 वर्ग मीटर। दूसरा फायदा सरकार और विकास प्राधिकरणों को है। 

उन्हें भूमि अधिग्रहण के लिए किसानों के विरोध, अदालतों में सालों चलने वाले मुकदमों और भारी मुआवजा राशि के बोझ से मुक्ति मिलती है और जमीन बिना विवाद के उपलब्ध होती है। तीसरा फायदा आम जनता और प्रदेश के विकास को है, क्योंकि जब जमीन आसानी से मिलेगी तो परियोजनाएँ समय पर पूरी होंगी। इसी को सुनिश्चित करने के लिए नई नीति में परियोजना पूरी करने की समय-सीमा को पांच साल से घटाकर चार साल कर दिया गया है। यदि एजेंसी समय पर काम पूरा नहीं करती तो जमीन मालिक को उसकी जमीन वापस कर दी जाएगी। 

यदि लैंड पूलिंग की इजाजत न होती तो नुकसान कई स्तर पर होता। सरकार को फिर से जबरन भूमि अधिग्रहण अधिनियम का सहारा लेना पड़ता, जिसमें अक्सर किसान और सरकार के बीच मुआवजे को लेकर टकराव होता, आंदोलन होते और मामले वर्षों तक कोर्ट में अटके रहते। इससे गुरुग्राम, फरीदाबाद, सोनीपत जैसे तेजी से बढ़ते शहरों में आवासीय और औद्योगिक परियोजनाएँ ठप पड़ जातीं। किसान को केवल एक बार का तय मुआवजा मिलता, जो अक्सर बाजार दर से कम होता और जमीन विकसित होने के बाद उसकी कीमत में जो भारी वृद्धि होती है, उसका कोई लाभ उसे नहीं मिलता, इससे उसकी आर्थिक सुरक्षा खत्म हो जाती।