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Sunday, November 30, 2025

पीरियड के दौरान नारी की निजता भंग करने वालों पर हो कार्रवाई

 अशोक मिश्र

हरियाणा के एक विश्वविद्यालय में चार महिला कर्मचारियों के साथ जो व्यवहार किया गया, वह सचमुच महिलाओं की गरिमा और गोपनीयता के साथ किया गया खिलवाड़ था। यह महिला जाति के साथ किया गया अभद्र व्यवहार था। जिस अधिकारी ने महिलाओं से पीरियड मांगे थे, उसने इन महिलाओं का ही नहीं, एक तरह से अपनी मां, बहन, बीवी और बेटी का भी अपमान किया था। 

क्या घर में कोई काम न होने पर उसने अपनी मां, बहन, बीवी और बेटी से पीरियड का सबूत मांगा होगा, कतई नहीं। चूंकि सफाई कर्मी महिलाएं उसके घर की नहीं थी, तभी उसने पीरियड का सबूत मांगने की गुस्ताखी की थी। हर महीने महिलाओं को मासिक धर्म आना, कोई नई बात नहीं है। यह लाखों से साल से महिलाओं को आ रहा है। प्रकृति ने महिलाओं को गर्भधारण करने की जिम्मेदारी दी है। प्रकृति ने हर महीने अंडाणु के बनने और बिगड़ने की व्यवस्था की है। 

मानव समाज पूरी दुनिया की महिलाओं का सबसे ज्यादा ऋणी है। एक महिला गर्भधारण करने के बाद जितनी तकलीफें झेलती है, नौ माह तक गर्भ को धारण करके शारीरिक और मानसिक पीड़ा झेलती है, लेकिन उसके चेहरे पर शिकन तक नहीं आती है। लेकिन जब उसी मातृत्व के कारणों पर कोई आक्षेप करता है, पीरियड का सबूत मांगता है, तो वह नारी जाति के प्रति अक्षम्य अपराध करता है। शुक्रवार को सुप्रीमकोर्ट ने चार महिला सफाईकर्मियों से पीरियड का सबूत मांगने के मामले सुनवाई के दौरान साफ तौर पर कहा कि महिलाओं की गरिमा और गोपनीयता हर हालत में बरकरार रहनी चाहिए। 

इस मामले को लेकर बार एसोसिएशन ने सुप्रीमकोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका पर सुनवाई के दौरान बार एसोशिएशन ने मांग की कि कर्मस्थलों और शैक्षणिक संस्थानों में महिलाओं के मासिक धर्म या उससे संबंधित मामलों में उनकी गरिमा, गोपनीयता, शारीरिक स्वायत्तता और स्वास्थ्य का उल्लंघन नहीं होना चाहिए। देश में आए दिन महिलाओं या स्कूली छात्राओं की निजता का उल्लंघन करने वाली घटनाएं देश में सामने आती रहती हैं। 

कहीं स्कूल में मासिक धर्म का खून सीट पर लग जाने से क्लास की सभी छात्राओं की जांच की जाती है, तो कहीं शौचालय में सैनेटरी पैड मिलने पर छात्राओं के कपड़े उतरवाकर जांच की जाती है कि किस बच्ची ने शौचालय में सैनेटरी पैड फेंका है। ऐसी घटनाएं मानव समाज के मुंह पर करारा तमाचा हैं। अफसोस की बात है कि इस तरह की जांच ज्यादातर महिलाएं ही करती हैं, जैसे वे कभी मासि
क धर्म की पीड़ा से नहीं गुजरी हैं। वैसे भी मासिक धर्म के दौरान लड़कियां स्कूल-कालेज जाने से कतराती हैं। यदि वे किसी तरह हिम्मत जुटाकर स्कूल-कालेज जाती भी हैं, तो उनके साथ ऐसा व्यवहार किया जाता है।