Saturday, September 20, 2014

चीन के बहाने अमेरिका को संदेश

समझने होंगे चीन के राष्ट्रपति  की गर्मजोशी से स्वागत के निहितार्थ

अशोक मिश्र
शतरंज और राजनीति..दोनों में सिर्फ एक ही साम्यता होती है। वह है शह और मात की प्रवृत्ति। कोई जरूरी नहीं है कि जो शतरंज खेलने में माहिर हो, वह धुरंधर राजनीतिज्ञ भी हो।
धुरंधर राजनीतिज्ञ, शतरंज का धुरंधर खिलाड़ी हो, यह  भी कतई जरूरी नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शतरंज खेलना जानते हैं या नहीं, नहीं कह सकता, लेकिन राजनीति की शतरंज पर बिसात बिछाने में माहिर अवश्य हैं। माहिर राजनीतिज्ञ हैं, वे इसमें कोई दोराय इसलिए  भी नहीं है क्योंकि चुनाव के दौरान उनके प्रबल विरोधी रहे कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित भी उनके राजनीतिक चालों के मुरीद अवश्य हैं। अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य में देखें, तो पिछले कुछ महीने से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिका और चीन जैसे प्रबल प्रतिद्वंद्वियों को शिकस्त देने के लिए राजनीतिक शतरंज पर बिसात बिछाने में लगे हुए हैं। देश का प्रधानमंत्री बनने के तुरंत बाद उन्होंने नेपाल, भूटान की यात्रा की, फिर ब्रिक्स देशों के सम्मेलन में भाग  लिया।
 उसके बाद वे जापान गए। और अभी जापान की यात्रा को कुछ ही दिन बीते थे कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत आए। कहने को ये सिर्फ एक राजनीतिक गतिविधियां हो सकती हैं। हैं भी। इसमें कोई दो राय भी नहीं है। लेकिन इन गतिविधियों के पीछे का संकेत यदि समझा जाए, तो पता चलता है कि नरेंद्र मोदी राजनीति के कितने बड़े खिलाड़ी हैं। चीन के राष्ट्रध्यक्ष जिनपिंग की गर्मजोशी से किए गए स्वागत के पीछे वर्चस्ववादी अमेरिका को यह संदेश देना भी  है कि यदि उसने भारत के प्रति अपने रवैये में बदलाव नहीं किया, तो वह चीन के साथ हाथ मिला सकता है, जो उसका प्रबल विरोधी है। बौद्ध धर्मावलंबी भूटान और जापान की यात्रा करके प्रधानमंत्री मोदी ने वह कोशिश की है, जिसे करने का साहस पिछले कई दशकों से राजनेता नहीं कर पाए थे। हिंदुस्तान में बौद्ध और सनातन धर्मावलंबियों के बीच एका कायम करने की यह अभी तो कोशिश भर है, लेकिन इसके दूरगामी परिणाम होंगे, इससे इनकार नहीं किया जा सकता है। इन देशों की यात्रा के बाद चीन के ही अभिन्न अंग तिब्बत में रहने वाले लाखों बौद्ध तिब्बतियों को भी एक प्रकार से यह अश्वस्ति मिली है कि भविष्य में यदि जरूरत पड़ी, तो भारत उनके संरक्षक की भूमिका निभा सकता है। चीन और तिब्बत का विवाद बहुत पुराना है और भारत हमेशा से तिब्बत के साथ खड़ा रहा है। तिब्बतियों के धर्म गुरु दलाई लामा तो पिछले कई दशकों से भारत में ही रह रहे हैं। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भारत यात्रा के दौरान नरेंद्र मोदी ने एक तीर से कई शिकार करने की कोशिश की है। एक तो उन्होंने गुजरात और दिल्ली में जिस तरह जिनपिंग का गर्मजोशी से स्वागत किया और उसको मीडिया के माध्यम से प्रचारित-प्रसारित किया गया, उसका जो संदेश अमेरिका जैसे वर्चस्ववादी और अधिनायकवादी देश को जाना था, वह चला गया। 27 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक को संबोधित करेंगे, उसके बाद 28 सितंबर को अमेरिकन इंडियन कम्युनिटी फाउंडेशन के कार्यक्रम में भारतीय मूल के लोगों को संबोधित करेंगे। यह संगठन अमेरिकी कांग्रेस में भारत समर्थक सांसदों और भारतीय मूल के व्यापारियों के सहयोग से बनाया गया है। इसके अगले ही दिन अमेरिकन राष्ट्रपति बराक ओबामा द्वारा आयोजित निजी भोज में मोदी शामिल होंगे। यह वही अमेरिका है, जिसके राष्ट्रध्यक्ष अपने को महामानव समझते थे और दूसरे देशों के राष्ट्रध्यक्षों को कोई भाव नहीं देते थे। वर्ष 2005 में तो अमेरिका ने गुजरात में हुए दंगों के चलते नरेंद्र मोदी का वीजा ही खारिज कर दिया था, वहीं वामपंथी कहे जाने वाले देश चीन ने मोदी की तारीफ ही की थी। आज अमेरिका अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वागत में पलक पांवड़े बिछाए बैठा है, तो सिर्फ इसलिए क्योंकि मोदी ने अंतर्राराष्ट्रय फलक पर कुछ ऐसी बिसात बिछा दी जिसकी अनदेखी करने का मतलब है, एशिया में अमेरिकी प्रभुत्व का खात्मा और अलग-थलग पड़ जाने का अंदेशा। जिस तरह पिछले कुछ सालों से ब्रिक्स देशों (ब्रिटेन, रूस, भारत, चीन और दक्षिणी अफ्रीका) की सहभागिता बढ़ी है, ब्रिक्स बैंक बनाने की पहल हुई है (अभी तो ब्रिक्स मुद्रा की भी बात चल रही है, यूरोपीय संघ की मुद्रा यूरो की तर्ज पर), उससे अमेरिका के होश उड़े हुए हैं। अमेरिका इस बात को अच्छी तरह से समझ रहा है कि जैसे ही ब्रिक्स बैंक अस्तित्व में आएगा, वर्ल्ड बैंक के माध्यम से पूरी दुनिया में अमेरिका की चल रही विस्तारवादी नीतियों पर अंकुश लग जाएगा। भविष्य में एशिया महाद्वीप के छोटे-छोटे देश इन ब्रिक्स देशों के साथ जाने को विवश हो सकते हैं। यदि ऐसा हुआ, तो जिन छोटे-छोटे देशों को आपस में लड़ाकर अमेरिका अपने सैन्य उपकरणों को बेचता है या मानवाधिकारों के नाम पर पूरी दुनिया का चौधरी बनकर वह किसी भी देश पर हमला करता है, उसकी इस प्रवृत्ति पर लगाम लग जाएगी। उसकी मनमानी पर अंकुश लगने का मतलब अमेरिका भलीभांति जानता है।

दोस्ती के साथ सतर्कता भी जरूरी

अशोक मिश्र 
चीन के राष्ट्रपति शी जिनफिंग की भारत यात्रा कई मायने में महत्वपूर्ण रही। भारत और चीन के बीच 12 समझौते हुए हैं। इन समझौतों के बाद यह माना जा रहा है कि दोनों देशों के बीच पिछले कई दशकों से जमी बर्फ पिघलेगी और दोनों एक दूसरे के विकास में सकारात्मक भूमिका निभाएंगे। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की जितनी गर्मजोशी के साथ भारत ने पहले गुजरात में और फिर दिल्ली में स्वागत किया है, उससे तो यही लगता है कि दोनों देश अपने रिश्तों में सकारात्मक बदलाव लाने की दिशा में बहुत गंभीरता से विचार कर रहे हैं। वैश्विक राजनीति के मद्देनजर यह जरूरी भी है। चीन मानसरोवर की यात्रा के लिए सिक्किम के नाथू ला दर्रे से रास्ता देने को तैयार हो गया है। भारत में चलने वाली कुछ रेलगाड़ियों की स्पीड बढ़ाने और उनमें मूलभूत सुधार में भी सहयोग देने को चीन राजी है। उसका सबसे ज्यादा जोर भी  रेल क्षेत्र में सहयोग देने का है। इतना ही नहीं, चीन ने आगामी पांच साल में 20 अरब डॉलर निवेश का आश्वासन दिया है, जिसको चीन के राष्ट्रपति की भारत यात्रा की उपलब्धि बताई जा रही है। इसके बावजूद कुछ बातें ऐसी हैं जिनको लेकर पहले भी शंकाएं थीं और ये शंकाएं तब भी बरकरार हैं, जब चीन के राष्ट्रपति अपने देश जा चुके हैं। सीमा विवाद को हल करने की दिशा में अब तक कोई सार्थक कदम नहीं उठाया जा सका है। यह महज संयोग नहीं हो सकता है कि चीनी राष्ट्रपति के भारत आने से दो हफ्ते पहले चीनी सेना भारत के अभिन्न भूभाग लद्दाख के देमचोक क्षेत्र में खानाबदोशों को घुसा दे और ये खानाबदोश भारत की जमीन पर जारी सिंचाई परियोजना का विरोध करें। भारतीय सैनिकों के विरोध करने पर भी चीनी सैनिक वह भूभाग खाली करने से इंकार कर दें। पिछले साल मई के महीने में  जब चीन के प्रधानमंत्री ली केकियांग भारत आने वाले थे, तो उन्हीं दिनों चीनी सेना भारतीय सीमा में घुस आई थी और भारत के कड़ा विरोध जताने के बाद ही चीनी सैनिक वापस जाने को तैयार हुए थे। चीन ने यही हरकत फिर दोहराई है। इस मामले में चीन के राष्ट्रपति की मंशा पर भी प्रश्न चिह्न खड़ा होता है, जब भारतीय प्रधानमंत्री ने सीमा विवाद का मुद्दा उठाया, तो उन्होंने इसे हलके में लेते हुए कहा कि सीमा पर लकीरें खिंची नहीं हैं, इसलिए ऐसी घटनाएं हो सकती हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सख्त लहजे में सीमा विवाद का मुद्दा उठाए जाने पर लद्दाख के ही चुमार क्षेत्र से चीनी सैनिकों की वापस हुई, लेकिन देमचोक में यह स्थिति ज्यों की त्यों बनी हुई थी। अगर हम भारत और चीन के संबंधों का इतिहास खंगालें, तो पता चलता है कि 28 जून 1954 को भारत आने वाले चीनी प्रधानमंत्री चाऊ एनलाई का तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने ऐसी ही गर्मजोशी के साथ स्वागत किया था और बदले में चीन ने सन् 1962 की सर्दियों में हमारे देश के खिलाफ युद्ध का आगाज कर दिया था। इसका नतीजा यह हुआ कि भारतीय जनमानस को अपने पड़ोसी राष्ट्र चीन पर विश्वास नहीं रह गया। भारतीय जनमानस का यह अविश्वास आज भी कम नहीं हुआ है। पंचशील के सिद्धांतों पर विश्वास रखने वाले तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू इस सदमे को बर्दाश्त नहीं कर पाए थे।
भारत और चीन के बीच आज जिस तरह जरूरतों को ध्यान में रखते हुए समझौते हो रहे हैं, उनका स्वागत किया जाना चाहिए। हमें पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर चीन की तरफ दोस्ती का हाथ जरूर बढ़ाना चाहिए, लेकिन अतीत में हुई भूलों से सबक सीखते हुए चीन से सतर्क भी रहना चाहिए। यह सही है कि वैश्विक परिदृश्य के मद्देनजर भारत का चीन से सहयोगात्मक संबंध समय की मांग है, लेकिन हमें अपने देश की सीमाओं की रक्षा का दायित्व भी याद रखना होगा।

बेतुकी मांग पर बेतुका तर्क

आखिर कब तक पिता के नाम की हुंडी भुनाएंगे अजित सिंह?

-अशोक मिश्र
इसे कहते हैं ‘खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे’ और इस कहावत को किसानों के मसीहा कहे जाने वाले पूर्व प्रधानमंत्री स्व. चौधरी चरण सिंह के पुत्र और पूर्व केंद्रीय मंत्री चौधरी अजित सिंह पूरी तरह से चरितार्थ कर रहे हैं। राष्ट्रीय लोकदल के मुखिया चौधरी अजित सिंह दिल्ली स्थित उस सरकारी बंगले को खाली करने से इनकार कर रहे हैं, जो संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के दौरान उन्हें रहने को दिया गया था। अजित सिंह और उनके समर्थकों की मांग है कि 12 तुगलक रोड जो सरकारी बंगला उनसे खाली करने को कहा जा रहा है, वहां चौधरी चरण सिंह स्मारक बनना चाहिए। इस बंगले को चौधरी चरण सिंह स्मारक बनाने की बेतुकी मांग के पीछे तर्क यह दिया जा रहा है कि चौधरी चरण सिंह 28 जुलाई 1979 को जब देश के प्रधानमंत्री बने थे, तो तब भी उन्होंने यह बंगला खाली नहीं किया था। इस बंगले के साथ उनका (अजित सिंह) का भावनात्मक रिश्ता है।
चौधरी अजित सिंह और उनके समर्थक इस भावनात्मक रिश्ते की आड़ में सरकारी बंगला खाली नहीं करना चाहते हैं, यह पश्चिमी उत्तर प्रदेश की ही नहीं, देश की जनता भी समझ रही है। अगर चौधरी अजित सिंह को उस बंगले से इतना ही लगाव था, तो उन्होंने उस समय यह बात क्यों नहीं उठाई जब वे पूर्ववर्ती केंद्र सरकार में मंत्री थे। पिछले दस सालों में अपने पिता का स्मारक बनाने का ख्याल क्यों नहीं आया? इस बात को मानने से कोई गुरेज नहीं है कि स्व. चौधरी चरण सिंह ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश ही नहीं, पूरे उत्तर प्रदेश के किसानों के लिए काफी कुछ किया। वे जीवन भर किसानों और मजदूरों की समस्याओं के लिए संघर्ष करते रहे। सन् 1979 में केंद्रीय वित्त मंत्री और उप प्रधानमंत्री के रूप में राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) की स्थापना करके किसानों की वित्तीय मदद करने का एक आधार तैयार किया। इसके बावजूद सच यह है कि चौधरी अजित सिंह जीवन भर अपने पिता स्व. चौधरी चरण सिंह की राजनीतिक विरासत को कंधे पर उठाए पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाटों और किसानों का दोहन करते रहे हैं। यही काम अब उनके सुपुत्र चौधरी जयंत सिंह कर रहे हैं।
चौधरी चरण सिंह को किसानों का मसीहा यों ही नहीं कहा जाता है। गाजियाबाद जिले की तहसील हापुड़ के एक गांव नूरपुर में 23 दिसंबर 1902 को जन्मे चौधरी चरण सिंह ने बचपन से ही किसानों की गरीबी, उनकी बेकारी, उनका हो रहा शोषण, दोहन और उत्पीड़न देखा था। वे इसके लिए जिम्मेदार कारकों को जानते और समझते भी थे। सन् 1930 को जब मोहनदास करमचंद गांधी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन के तहत दांडी मार्च निकालकर नमक बनाकर कानून को तोड़ा, तो गाजियाबाद के निकट से बहने वाली हिंडन नदी के किनारे नमक बनाकर कानून तोड़ने वालों में चौधरी चरण सिंह का नाम सबसे प्रमुख था। इस बात में कोई दो राय नहीं है कि देश के सर्वांगीण विकास में चौधरी चरण सिंह के कार्यों को कमतर नहीं आंका जा सकता है, लेकिन इसका यह मतलब तो नहीं है कि उनके पुत्र और पौत्र को अराजक हो जाने की इजाजत मिल गई है। अजित सिंह जी! चौधरी चरण सिंह का पुत्र होने की हुंडी को आप कब तक भुनाते रहेंगे? आप अपने पिता की विरासत को भी तो ठीक से नहीं संभाल पाए। कभी  इस दल से, तो कभी उस दल से अपने पिता की पार्टी ‘लोकदल’ का विलय कराते रहे, मोह भंग होने पर दोबारा कभी लोकदल अजित, तो कभी  राष्ट्रीय लोकदल का निर्माण करते रहे। अजित सिंह कई बार सांसद रहे, कभी जीतकर संसद में पहुंचे, तो भी राज्यसभा के जरिये। लेकिन अजित सिंह ने अपने संसदीय क्षेत्र में जाना और वहां का विकास करना जरूरी नहीं समझा। यदि ऐसा नहीं था, तो फिर पिछले लोकसभा चुनाव में बागपत लोकसभा सीट से उनकी इतनी बुरी तरह पराजय क्यों हुई? 1998 में भी वे भाजपा प्रत्याशी सोमपाल से चुनाव हार चुके थे।
वही अजित सिंह आज चौधरी चरण सिंह के नाम पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश को जंग का मैदान बना देना चाहते हैं। उनके समर्थकों ने दिल्ली का बिजली-पानी बंद करने की धमकी देने से लेकर मुरादनगर और उसके आस-पास के इलाकों में हंगामा खड़ा कर रखा है। सैकड़ों पुलिस कर्मी और बेकसूर आम नागरिक घायल हो चुके हैं। इसके बावजूद रालोद (राष्ट्रीय लोकदल) के कार्यकर्ता शांत नहीं हुए हैं, वे पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सड़कों पर आतंक मचाते हुए घूम रहे हैं।

Friday, September 19, 2014

चीन में होंगे झानझूं त्रिपाठी

-अशोक मिश्र
नथईपुरवा गांव के कुछ बुजुर्ग चाय की दुकान पर बतकूचन कर रहे थे। रामबरन ने चाय का कप उठाकर मुंह से लगाया और सुर्रर्र..की आवाज करते हुए थोड़ी सी चाय अंदर ढकेली और बोले, ‘जिनफिंगवा की बदमाशी तो देखो। खुद तो भारत मा आकर माल-पूड़ी काट रहा है। अगहन के महीने में (आश्विन) सावन की तरह झूला झूल रहा है। हमारे प्रधानमंत्री उसे बड़े प्रेम से झुला भी रहे हैं, लेकिन उस ससुर के नाती ने हमारे यहां आने से पंद्रह दिन पहले ही अपने सैनिकन की आड़ में खानाबदोशों को लेह-लद्दाख में घुसा दिया कि जाओ बेटा! वहां जाकर बखद्दर करो।’ रामबरन यह कहते-कहते आवेश में आ गए और चाय छलक कर उनके कुर्ते पर गिर पड़ी, तो उन्होंने शुद्ध देशी क्लासिकल गाली चाय और कुर्ते के साथ-साथ जिनफिंगवा को भी दी।
‘बाबा! अगर भारत सरकार मेरी बातों पर अमल करे, तो कुछ साल में ही यह सीमा-फीमा विवाद  एकदम से खत्म से खत्म हो जाएगा। हां...यह लंबी योजना है, इसमें कम से कम बीस-बाइस साल तो लगेंगे ही। इसके बाद तो सीमा विवाद का कोई टंटा ही नहीं रहेगा। बीजिंग, शंघाई, मकाऊ, हांगकांग और तिब्बत जैस शहर और प्रांतों में लोग चूना-तंबाकू हथेली पर निकाल कर खुलेआम मलेंगे, होंठों के नीचे दबाएंगे और पिच्च से सामने की दीवार पर ‘पच्चीकारी’ का एक बेहतरीन नमूना पेश करते हुए आगे बढ़ जाएंगे। खुदा न खास्ता, अगर किसी ने उन्हें रोकने-टोकने की कोशिश की, तो उसकी मां-बहन से अंतरंग संबंधों की एक पूरी लिस्ट पेश कर देंगे।’ पच्चीस वर्षीय नकनऊ ने पान की पीक दुकान की दीवार पर दे मारी, मानो उसने चीन की दीवार पर भविष्य में होने वाली ‘पच्चीकारी का एक नमूना अभी से पेश कर दिया हो।’ उसकी बात सुनकर चाय की दुकान पर बैठे लोग चौंक गए। उन्हें उत्सुकता हुई कि जो ननकऊ अपनी पच्चीस साल की जिंदगी में अपने जिले से बाहर न गया हो, वह चीन से सीमा विवाद कैसे दूर कर देगा। वह सीमा विवाद जो पिछले पचास-साठ साल से भारत के लिए सिरदर्द बना हुआ है।
उजागर शुक्ल ने डपटते हुए कहा, ‘क्या रे ननकउवा! सुबह से ही भांग तो नहीं चढ़ा ली है। क्या उलूल-जुलूल बक रहा है। जिस समस्या को नेहरू से लेकर मोदी तक नहीं सुलझा पाए, तू उसे हल कर देगा? तेरा दिमाग तो नहीं खराब हो गया है?’
उजागर शुक्ल की बात सुनते ही ननकउवा तंबाकू से कुछ-कुछ काले हो गए दांत दिखाकर हंसा और बोला, ‘नहीं काका! बूटी (भांग) तो मैं रात में ही लेता हूं। अभी तो मैं जो कह रहा हूं, उस पर गौर करें। आप यह तो मानते ही हैं कि बिहार और उत्तर प्रदेश के लोग जहां जाते हैं, वहां के लोगों को अपना बना लेते हैं।बिहारी,  पुरबिहा और दूब (एक तरह की घास) में कोई अंतर नहीं है। दूब बार-बार सूखती है, लेकिन जैसे ही पानी मिलता है, हरिया जाती है। ऐसे ही बिहार और उत्तर प्रदेश के लोग होते हैं। अब देखिए न! एक बिहारी थे मोहित राम गुलाम। वे जब मारीशस पहुंचे, तो पहले अपना ठीहा जमाया। बाद में उन्होंने अपने बहुत सारे  भाई-बंधुओं को वहां बुला लिया। बस, फिर क्या था? बिहारी बढ़ते गए, मारीशसवासी मिट्टी के तेल होते गए। इसके बाद तो मारिशस में •ोजपुरी ही बोली जाने लगी। मारीशस आजाद हुआ, तो उनका लड़का शिवसागर राम गुलाम मारीशस का प्रधानमंत्री बना, अब उनका पौत्र नवीनचंद्र रामगुलाम वहां शासन कर रहा है कि नहीं! बस..इसी तरह कोई जुगाड़ करके दस-पंद्रह बिहारियों या उत्तर प्रदेश वालों को चीन के किसी प्रांत में घुसा दीजिए। पांच-दस साल बाद चीन में पैदा होने वाले लड़के-लड़कियों के नाम होंगे झानझूं तित्राठी, पींग-पांग झा, चेमपां यादव, शूफूत्यांग पासवान।’ ननकऊ की योजना सुनते ही चाय की दुकान में मौजूद सारे लोग आश्चर्यचकित रह गए। सुना है, ग्रामपंचायत ने ननकऊ की इस योजना को लागू करने का प्रस्ताव प्रधानमंत्री कार्यालय को •ोजा है, प्रधानमंत्री कार्यालय तक प्रस्ताव पहुंचा या नहीं, इस संबंध में कोई सूचना नहीं है।

Tuesday, August 12, 2014

पति की जासूसी

-अशोक मिश्र 
जैसे ही मैं घर में घुसा, बेटा मुझे देखकर मुस्कुराया। उसकी मुस्कान से ही मैं समझ गया कि कुछ न कुछ गड़बड़ तो है , लेकिन क्या? इसका अंदाजा लगा ही रहा था कि घरैतिन ने गुर्राते हुए कहा, 'मिल आये कलमुँही से? करवा आये शॉपिंग? ऑफिस में काम ज्यादा बताकर गुलछर्रे उड़ाया जा रहा है।' पत्नी की बात सुनते ही मैं किसी बम की तरह फट पड़ा, 'क्या बकती हो? अपने पति पर ऐसे घटिया आरोप लगाते शर्म नहीं आती है। मैं तुम्हारा पति हूँ, नेता नहीं कि जिसका चरित्र ही कहीं गुम हो गया हो। मैंने जब एक बार तुमसे गठबंधन कर लिया तो कर लिया। यह नहीं कि आज इनसे और कल उनसे कुर्सी हथियाने के लिए गठबंधन करता फिरूँ। तुम चाहो तो अपनी सखी-सहेलियों में इस बात की सगर्व घोषणा कर सकती हो कि मैं इस दुनिया का अकेला एक पत्नीव्रतधारी पति हूँ।' 
मेरे इतना कहते ही घरैतिन चिल्लाईं, 'आप फालतू बातें करके मुझे बरगलाने की कोशिश मत कीजिये। पिछले तीन साल में आपने मेरे लिए लोहे का एक छल्ला तक नहीं ख़रीदा और उस कलमुंही को साठ हजार का नेकलेस खरीदकर दिया जा रहा है। उसको मॉल्स में घुमाया जा रहा है। उसके बच्चों को शॉपिंग कराई जा रही है। मेरे साथ सब्जी मंडी तक जाने में आपको शर्म आती है।' इतना कहकर घरैतिन बुक्का फाड़कर रोने लगीं। उन्हें रोता देखकर मैं हक्का-बक्का रह गया। मैंने चीखते हुए कहा, 'तुम यह आरोप कैसे लगा सकती हो? है तुम्हारे पास कोई सुबूत? जरूर तुम किसी के बहकावे में आकर यह सब कह रही हो। मैंने पहले भी कहा, अब भी कह रहा हूँ, मैंने ऐसा कुछ नहीं किया है। अब मेरा पिंड छोडो और आराम करने दो।' इतना सुनते ही पत्नी विपक्षी दल के नेताओं की तरह हल्ला मचाने लगी। इसमें बेटे ने भी साथ दिया। एकदम संसद जैसा दृश्य मेरे घर में  उपस्थित हो गया।  मैं 'शांत हो जाइए...शांत हो जाइए' चिल्लाता रहा। बेटा और पत्नी वेल में घुस आये सांसदों की तरह चीखते-चिल्लाते रहे। जब शोर बर्दाश्त से बाहर हो गया तो मैंने कहा, 'आप लोगों को सिर्फ़ हंगामा करना है या फिर मेरी बात भी सुननी है ?' 
इतना कहकर मई जैसे ही कमरे में जाने लगा, मेरे बेटे ने मुस्कुराते हुए कहा, 'पापा! झूठ बोलने से कोई फायदा नहीं है। आपकी शर्ट का ऊपरी बटन दरअसल बटन नहीं, माइक्रोफोन है। पिछले तीन दिन से आपकी सारी बातें घर बैठे मम्मी सुन रही हैं।' यह सुनते अब भड़कने की बारी मेरी थी, 'तुम लोगों ने मुझे गडकरी, चिदंबरम या कोई मंत्री समझ रखा है क्या, जो  जासूसी कराई जा रही है।' मेरी बीवी यह सुनते ही हंसने लगी और बोली, 'पतिदेव जी, नाराज मत होइए। आप पिछले कुछ दिनों से ऑफिस का काम बता कर घर से गायब हो रहे थे। मुझे लगा, जरूर कोई गड़बड़ है, पता लगाने के लिए पड़ोसन से माइक्रोफोन मांग लाई। शुक्र है कि आप वैसे नहीं निकले,जैसा मैंने सोचा था। जब प्रधानमंत्री अपने मंत्रियों की कारगुजारी जानने के लिए उनकी जासूसी करा सकते हैं , तो एक बीवी अपने पति की जासूसी क्यों नहीं करा सकती है। मैं तो कहती हूँ कि हर पत्नी को अपने पति की जासूसी करने का संवैधानिक अधिकार है। उसे हर हालत में यह मालुम होना चाहिए कि घर के बाहर उसका पति क्या-क्या करता फिर रहा है। जब देश चलाने वाले को अपने मंत्रियों पर विश्वास नहीं है, तो फिर मुझे अपने दिलफेंक पति पर विश्वास कैसे हो सकता है। ' इतना कहकर पत्नी चाय बनाने के लिए किचन में घुस गईं। मैं किसी भकुए की तरह उन्हें जाता देखता रहा। 
(12 अगस्त 2014 को चर्चित समाचार पत्र कल्पतरु एक्सप्रेस में प्रकाशित व्यंग्य। ) 

Wednesday, August 6, 2014

सड़े टमाटर और उस्ताद गुनहगार

 -अशोक मिश्र 
मैं जैसे ही थैला लेकर गली के मोड़ पर पहुंचा, उस्ताद गुनहगार खड़े नजर आये। मैंने प्रणाम करते हुए कहा, 'उस्ताद ! आज आपके हाथ में थैले की जगह बोरी है। क्या आज भंडारा करने जा रहे हैं ? लगता है आज पूरी मंडी में कोई भी सब्जी नहीं बचेगी।' गुनहगार ने मुझे घूरते हुए कहा , 'बरखुरदार अपनी चोंच बंद रखो और चुपचाप मेरे साथ चलते रहो।' मैं गुनहगार के साथ किसी बच्चे की तरह पीछे-पीछे चलता रहा। बीच में एकाध बार मुंह खोलने की सोची लेकिन फिर चुप्पी साध गया।   
बाजार में पहुँचते ही उस्ताद गुनहगार टमाटर खोजने में व्यस्त हो गए। घर से चलते समय घरैतिन ने बीस-पच्चीस ग्राम टमाटर लाने को कहा था, सो मैंने सोचा जब उस्ताद ले ही रहे हैं, तो उन्ही से एक टमाटर मांग लूंगा। एक सब्जी दुकान पर पहुंचकर गृहनगर ने कहा, 'भैया...सड़े टमाटर हैं क्या ?' गुनहगार की बात सुनते ही पता नहीं मुझे क्या मज़ाक सूझी, मैंने भी दुकानदार से पूछ लिया, 'भैया ...मीठे वाले देवा पहाड़ी आलू है क्या?' मेरे इतना पूछते ही बगल में खड़े होकर आलू छांट रही महिला के हाथ रुक गए। तभी दुकानदार ने हँसते हुए कहा, ' भाई साहब! ले लीजिये बहुत मीठे हैं आलू।' यह सुनते ही आलू छांट रही महिला ने पाली बैग में छांट कर रखा गया आलू ढेर में उलट दिया और चलती बनी। दुकानदार लाख चिल्लाता रहा, 'बहन जी ..अरे सुनिए। साहब तो मज़ाक कर रहे थे।  आलू मीठे नहीं हैं।' लेकिन उस महिला ने पलट कर भी नहीं देखा। सब्जी वाले ने मुझे इस तरह घूरकर देखा मानो कच्चा ही चबाकर खा जायेगा। मैंने भी सिटपिटा कर निगाहें फेर ली। उस्ताद गुनहगार ने पहले तो मुझे घूरा और फिर बेतहाशा हंस पड़े। बोले, 'बेटा ...नक़ल के लिए भी अकल की जरुरत होती है। तुम्हें जो सब्जी चाहिए खरीद लो, तब तक मैं भी अपनी जररूत के हिसाब से मार्केटिंग करता हूँ। ' 
मैंने उस्ताद से कहा, 'आप चिंता न करें। पहले आप खरीददारी कर लें, मैं उसमें आपकी सहायता करता हूँ। फिर मैं भी कुछ ख़रीद लूंगा। मुझे कुछ ज्यादा नहीं खरीदना है।' गुनहगार ने सकारात्मक भाव से अपनी मुंडी हिलाई बोले, 'तो चलो सबसे पहले टमाटर खरीदते हैं। मुझे किलो-दो किलो टमाटर नहीं खरीदना है। मुझे लगभग आधा क्विंटल टमाटर खरीदना है। इसमें थोड़ा समय लग सकता है क्योँकि मुझे अच्छे नहीं, सड़े टमाटर चाहिए।' गुनहगार की बात सुनकर मैं भौंचक्का रह गया। मैंने आश्चर्य व्यक्त  कहा, 'उस्ताद जब सारी दुनिया सड़े टमाटर या अंडे खरीदने से परहेज करती है, तब आपको सड़े टमाटर खरीदने की यह खब्त क्योँ सवार है। मामला क्या है आखिर मैं भी जानूँ।' मेरी सुनकर गुनहगार मुस्कुराये और सिर्फ इतना ही कहा, 'समय आने पर तुम्हें सब कुछ पता चल जाएगा। फिलहाल मुझे खरीददारी करने दो।' इतना कह कर उस्ताद अपने काम में जुट गए। करीब ढाई घंटे के अथक परिश्रम के बाद पच्चास किलो सड़ा टमाटर, आधा किलो आलू, पाव भर प्याज, दस ग्राम लहसुन खरीदकर गाते-गुनगुनाते उस्ताद गुनहगार घर लौट आए। मैंने कुछ नहीं ख़रीदा। रास्ते में मैंने लाख पूछा, लेकिन गुनहगार ने नहीं बताया। 
शाम को जब पेट में गुड़गुड़ ज्यादा हुई तो गुनहगार की नजर बचाकर भाभी से मिला और माजरा पूछा। भाभी ने बड़बड़ाते हुए कहा, 'पता नहीं क्यों, पिछले कुछ दिनों से अच्छे दिन और रैली-रैली बड़बड़ा रहे हैं।' भाभी की बातों से जो मैं समझ पाया, वह यह है कि अच्छे दिन न आने से निराश गुनहगार को नेताओं की रैलियों का इंतजार है। वे तब तक सड़े टमाटरों में से अच्छे छांट-बीन कर सलाद खा रहे हैं और बाकि बचे हुए को सहेजकर रैलियों के लिए रखे हुए हैं।  
(6 अगस्त 2914 को कल्पतरु एक्सप्रेस में प्रकाशित )

Thursday, July 31, 2014

स्कूल बैग में हथियार

-अशोक मिश्र
मैं भागा-भागा अपने सपूत के स्कूल में पहुंचा और हांफते हुए प्रिंसिपल से मैंने कहा, जी, मैं ही सोनू का पापा हूं। आपने मुझे तुरंत स्कूल आने को कहा था। फरमाइए, क्या कोई खास बात है? प्रिंसिपल ने मुझे ऐसे घूरा, जैसे मैंने उनकी भैंस खोल ली हो। फिर वह बोले, आप अपने बच्चे के साथ कल से एक गार्ड भेजिए। अगर बच्चे के साथ कुछ ऊंच-नीच हो गई, तो स्कूल प्रशासन कतई जिम्मेदार नहीं होगा। मैंने उनसे पूछा, स्कूल पर कोई आतंकी हमला होने वाला है? क्या किसी आतंकी या नक्सली संगठन ने रंगदारी मांगी है? अगर ऐसा है, तो भी लख्ते जिगर के साथ सुरक्षाकर्मी भेज पाने की हैसियत मेरी नहीं है।
इतना कहकर मैं उन्हें प्रश्नसूचक निगाहों से घूरने लगा। इस पर वह थोड़ा अचकचाए, फिर संभलते हुए बोले, देखिए, आजकल जिस तरह हादसे होने लगे हैं, उसमें जरूरी हो गया है कि छात्र-छात्राओं की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। स्कूल में कुछ हुआ नहीं कि मां-बाप दौड़ते हुए चले आते हैं। ऐसे में हम क्या करें? अगर आप अपने बच्चे के साथ गार्ड नहीं भेज सकते, तो उसके बैग में कोई हथियार ही रख दें, ताकि झगड़ा-फसाद के वक्त बच्चा अपना बचाव कर पाए। इतनी तो औकात आपकी है ही या इसमें भी आप असमर्थ हैं?
प्रिंसिपल की बात सुन मेरे होश उड़ गए। मैं घबराए स्वर में कहा, क्या कह रहे हैं आप? मैं अपने बच्चे को सभ्य और जिम्मेदार नागरिक बनने के लिए स्कूल भेजता हूं या गुंडा बनाने के लिए? आप कैसी शिक्षा देना चाहते हैं बच्चों को, यह मेरी समझ से बाहर है।
प्रिंसिपल ने जैसे फैसला सुनाते हुए कहा, ऐसे में तो यही विकल्प बचता है कि आप अपने नौनिहाल को स्कूल से निकाल लें या फिर स्कूल प्रशासन को लिखकर दें कि भविष्य में बच्चे के साथ कोई दुर्घटना होती है, तो उसकी जिम्मेदारी स्कूल की नहीं होगी।

मैंने बेटे को उस स्कूल से निकाल लिया है और एक ऐसे स्कूल की तलाश में हूं, जहां शिक्षा के साथ सुरक्षा की भी गारंटी हो। आपकी नजर में ऐसा कोई स्कूल हो, तो बताएं।  

(31 जुलाई 2014 को अमर उजाला के सम्पादकीय पेज पर प्रकाशित)

Saturday, July 26, 2014

बगदादी से मुलाकात

अशोक मिश्र

Meet with Bagdadi

उस्ताद गुनहगार घबराए हुए से मेरे घर में घुसे और मेरे प्रणाम को नजरंदाज करते हुए बोले, यह बताओ, सीआईए वाले जब किसी को पकड़ते हैं, तो क्या बहुत मारते हैं? पहले टॉर्चर करते हैं, उसके बाद गोली मारते हैं या फिर सीधे गोली मार देते हैं? मारने से पहले कुछ खिलाते-पिलाते हैं या खाली पेट ही इस दुनिया-ए-फानी से विदा कर देते हैं?

मैंने कहा, उस्ताद! सीआईए वाले मारते कम और घसीटते ज्यादा हैं। वैसे बात क्या है? दुआ न सलाम, आते ही बंदूक तान दी।
उस्ताद गुनहगार ने इधर-उधर देखते हुए कहा, क्या बताएं, मेरी मति ही मारी गई थी, जो दुनिया के मोस्ट वांटेड अबू बकर अल बगदादी से यों ही टहलते हुए मुलाकात करने जा पहुंचा। खुदा झूठ न बुलवाए, उसने खातिरदारी भी बहुत की। उसके एक चेले ने तो बड़े अदब से हम दोनों की एक तस्वीर भी खींची। लेकिन जब से मालूम हुआ है कि उसे अमेरिका वाले खोज रहे हैं, तब से मुझे दस्त आ रहे हैं। कई तरह की आशंकाएं घेरे हुए हैं। मेरी पत्नी तो अपनी सहेलियों और मोहल्ले की औरतों को भी मुलाकात गाथा सुना आई हैं। अब समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करूं? जब सीआईए पूरी दुनिया में बगदादी को खोजते घूम रहे हैं, तो फिर वे मुझे भी खोज सकते हैं।


उस्ताद की बात सुनते ही मेरे दिमाग का एंटीना खड़ा हो गया। मैंने तुरंत कहा, उस्ताद! आप भी न, बैठे-बिठाए मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डाल देते हैं। आपको क्या पड़ी थी बगदादी से मिलने की? अब जो किया है, भुगतिए। मैं आपको कोई सलाह नहीं दे सकता, बल्कि आपसे अपना रिश्ता अभी से खत्म करने की घोषणा करता हूं। मुझे अपने बाल-बच्चों को अनाथ नहीं करना है।
इतना कहकर मैं बाहर आया और मोहल्ले वालों को सुनाकर उन्हें जोर से कहने लगा, मैं आपको जब जानता नहीं, पहचानता नहीं, तो आप क्यों खामख्वाह बेटा-बेटा कहकर घर में घुसे आ रहे हैं?

मेरे इतना कहने पर उस्ताद पहले तो अकबकाए, फिर लड़खड़ाते कदमों से अपने घर की ओर चले गए
।

Wednesday, July 23, 2014

संतुलन साधना ही शिवत्व

मित्रो ! दैनिक जागरण के सप्तरंग परिशिष्ट में आज 23 जुलाई 2014 को प्रकाशित शिवत्व को पारिभाषित करने का प्रयास करता मेरा एक लेख। आपकी स्नेहिल प्रतिक्रिया की अपेक्षा है। विवेक भाई को आभार
http://epaper.jagran.com/ePaperArticle/23-jul-2014-edition-Delhi-City-page_24-189-4190-4.html

Tuesday, July 22, 2014

पुलिसवालों के "अच्छे दिन"

-अशोक मिश्र
चौराहे के एक किनारे खड़े सिपाही राम मूर्ति ने तम्बाकू रगड़ने के बाद "फट्ट...फट्ट" की आवाज करते हुए चूना झाड़ा। इसके बाद उसने संतुष्टि के भाव से तम्बाकू को निहारा और जैसे ही मुंह में डालने को हथेली उठाई, तभी पता नहीं किस ओर से हवलदार भदौरिया प्रकट हो गया। उसने मुस्कुराते हुए राम मूर्ति से कहा, ''क्यों राम मूर्ति ? मेरा हिस्सा भूल गए थे क्या ?' हवलदार की बात सुनते ही राम मूर्ति की फैली हुई बायीं हथेली मुट्ठी में तब्दील हुई और दायां हाथ  सैल्यूट की मुद्रा में माथे पर गया।  उसने हड़बड़ाए हुए स्वर में कहा, ''जय हिन्द साब! आपने तो डरवा ही दिया था अचानक सामने आकर।  मैंने समझा सीओ साहब आ गए हैं। भदौरिया साब ! आप भी हिस्से की क्या बात करते है। आपका हिस्सा कभी मारा है ? आप ही बताइए, कभी आपको हिस्सा देने से चूका होऊं, तो ? यह तो मुई तम्बाकू है, जब हज़ारों-लाखों की बात थी, तब भी आप मेरी नज़रों से ओझल नहीं हुए। आपको याद है, जब तीन महीने पहले  एसपी साहब के साथ '' संस एंड संस'' ज्वैलर्स की दुकान पर छापा मारने गया था। साहब ! तस्करी करके लाया गया सवा पांच किलो सोना बरामद हुआ था। जानते हैं साब, अगले दिन अख़बारों में सिर्फ चार किलो सोना बरामद होने की खबर छपी। सवा किलो सोना साहब और बड़का साहब डकार गए और किसी को भनक तक नहीं लगने दी। वो तो साब सोने के बिस्कुट गिनते समय मौका पाकर 50 ग्राम के सोने का एक बिस्कुट मैंने पार कर दिया था जूते में छिपाकर। उसमें से एक तोला सोना मैंने आपको दिया था या नहीं ? इतना ही नही, दिन भर में जितनी भी कमाई होती है, उसमें से आपका हिस्सा आपको मिलता है या नहीं ?''
भदौरिया ने तम्बाकू होठों के बीच दबाने के बाद जमीन पर पिच्च से थूक दिया। उसने उचटती सी निगाह पूरे चौराहे पर डाली और राम मूर्ति से कहा, 'छोड़ यार, दो पैसे की तम्बाकू खिलाकर चौराहे पर क्यों पैंट उतरने पर तुला हुआ है ? तुम अपनी कमाई में हिस्सा देकर कोई एहसान नहीं करते हो। मैं भी अपनी कमाई में से बड़े साहब को हिस्सा देता हूँ। पुलिस महकमे में तो हर कोई हिस्सा लेता है और देता है। ठीक दूसरे महकमे की तरह। अब अगर मैं तुम्हारी पोल-पट्टी खोलने लगूं, तो पूरा पोथन्ना भर जाए, फिर भी तुम्हारी करतूत पूरी नहीं लिखी जा सकेगी।'
भदौरिया के पलटवार करने से खिसियाए राम मूर्ति ने 'हें.……हें'  करते हुए दांत निपोर दिया और कहा, ' अरे साब ! आप तो नाराज हो गए। छोड़िये यह सब और यह बताइये, हम लोगों के अच्छे दिन कब आएंगे? इस बार तो बजट में भी तीन हज़ार करोड़ रुपये सरकार ने दिए हैं हम पुलिस वालों के अच्छे दिन लाने को। साब मैं तो जब भी तीन हज़ार करोड़ रुपये के बारे में सोचता हूँ, मेरे रोयें खड़े हो जाते हैं। मन तो बादलों के ठेंगा दिखने के बाद भी मयूर की तरह नाच उठता है। 'आय-हाय' कब आएंगे मुए तीन हज़ार करोड़ रुपये। हवलदार साहब, लगता है मैं इन रुपयों के बारे में सोच-सोच कर पागल हो जाऊंगा। मैंने तो यहाँ तक जोड़-घटा लिया है साब कि मेरे हिस्से में कितने आएंगे। मेरी घरवाली तो मोहल्ले के सुनार की दुकान पर जाकर 'लेटेस्ट डिज़ाइन' का नेकलेस तक पसंद कर आई है।  वह तो रात में भी कई बार जगाकर पूछती है कि कब मिलेंगे पैसे? सोते समय भी कुछ ना कुछ बड़बड़ाती रहती है। बेटा तो बहुत दिनों से पिकनिक मानाने के लिए गोवा जाने की जिद कर रहा है। सोचता हूँ इस बार बेटे की यह इच्छा पूरी ही कर दूँ। बेटा जवान-जहान अभी घूमे-फिरेगा नहीं तो क्या बुढ़ापे में गोवा जाएगा। चार-पांच महीने पहले एक तगड़ा हाथ मारा था तो बेटी को उसकी सहेलियों के साथ सिंगापुर पांच दिन के टूर पर भेज दिया था। बेटी जब लौट कर आई थी, तो मोहल्ले भर में उसकी धाक जम गई थी। बेटा तभी से मुंह फुलाये घूम रहा है। साब ! बच्चों की इच्छाएं पूरी न हों तो वे जीवन भर एहसास-ऐ-कमतरी (माइनॉरिटी काम्प्लेक्स) के शिकार रहते हैं।'
राम मूर्ति की बात सुनकर हवलदार भदौरिया ठहाका लगाकर हंस पड़ा। उसने हँसते हुए कहा, 'धत्त बुड़बक! उस पैसे के बारे में तो सोचना भी मत। तीन हज़ार करोड़ रुपये सरकार ने तुम्हारी घरवाली के नेकलेस और बेटे के गोवा जाने के लिए नहीं दे रही है। इस पैसे से पुलिसवालों की दशा और दिशा बदली जाएगी।' भदौरिया ने एक बार फिर पिच्च से तम्बाकू की पीच थूक दी, मानो पूरे पुलिस तंत्र पर ही थूक दिया हो। फिर पता नहीं क्या हुआ कि भदौरिया एकाएक गंभीर हो गया।  उसने आकाश की ओर देखते हुए कहा, 'कहते हैं कि इस पैसे से पुलिस तंत्र को मजबूत किया जायेगा, लेकिन इस तंत्र का कौन सा हिस्सा मजबूत होगा कोई मुझसे पूछे। तुमने भी अच्छे दिनों की बात खूब चलाईे। सुना है, बड़का ने अपना हिस्सा बढ़ा दिया है। बड़का साहब के भी बड़के साहब ने अपना हिस्सा जो बढ़ा दिया है। इन साहबों के अच्छे दिन तो आने वाले हैं। रह गए हम लोग तो पहले जिस तरह से जीते थे , वैसे ही अब भी जिएंगे। इस महंगाई के ज़माने में हम मामूली पुलिसवाले कैसे जीते हैं, इसके बारे में ना तो सरकार सोचती है और ना ही आम आदमी।'  
राम मूर्ति ने रुआंसे स्वर में कहा, 'तो क्या हमारे अच्छे दिन कभी नहीं आएंगे?' इस बीच राम मूर्ति ने दोबारा तम्बाकू निकालकर बनाने लगा था।  वह अभी चूना निकल  था कि चौराहे से क्रॉस करने वाली एक कार ने एक बाइक सवार को इतनी जोर की टक्कर मारी कि बाइक सवार काफी दूर तक घिसटता चला गया। इस घटना को देखकर भदौरिया के साथ-साथ राम मूर्ति की आँखें चमक उठीं। भदौरिया मुंह में रखी तम्बाकू को थूकने के साथ यह कहते हुए घटनास्थल की ओर बढ़ गया, 'राम मूर्ति! जिस अच्छे दिन का रोना अभी तुम रो रहे थे, वह आ गया।  तुम बाइक सवार को सम्भालो।  मैं कार वाले को पकड़ता हूँ।  अगर बाइक वाले को ज्यादा चोट न आई हो, उसे भी हलाल किए बिना जाने मत देना। ' और दोनों अपने अच्छे दिन लेन को बड़ी शिद्दत के साथ जुट गए।