अशोक मिश्र
हरियाणा में यमुना नदी की हालत इन दिनों चिंताजनक है। प्राचीनकाल से लेकर चार-पांच दशक पहले तक यह नदी शुद्ध जल का स्रोत मानी जाती थी। अब यमुना नदी कई स्थानों पर मानक से कहीं अधिक प्रदूषित हो चुकी है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने अभी हाल में जो आंकड़े जारी किए हैं, उसके मुताबिक जब हरियाणा में यमुना नदी प्रवेश करती है, तो उसका पानी अपेक्षाकृत साफ होता है। फरीदाबाद और पलवल तक पहुंचने के बाद वह एक गंदे नाले में तब्दील हो जाती है। इन दोनों जिलों में यमुना नदी मानक से 27 गुना ज्यादा प्रदूषित पाई गई है। इसका सबसे बड़ा कारण है सीवेज और औद्योगिक कचरे का बिना उपचार के सीधा नदी में जाना।हरियाणा के पास अपने घरेलू गंदे पानी के लगभग 80 प्रतिशत हिस्से को रिसाइकिल करने की क्षमता है, लेकिन हकीकत में राज्य प्रतिदिन कम से कम 1140 एमएलडी अनुपचारित या आंशिक रूप से उपचारित सीवेज यमुना में छोड़ रहा है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि यमुना में पहुंचने वाले कुल प्रदूषण का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा अकेला गुरुग्राम छोड़ता है। पानीपत और सोनीपत में हर दिन लगभग 42 मिलियन लीटर अनुपचारित सीवेज नदी में जा रहा है। फरीदाबाद की सैकड़ों अवैध डाइंग और टेक्सटाइल इकाइयां रासायनिक और रंगीन कचरा खुलेआम बुढ़िया नाले में बहा रही हैं।
बल्लभगढ़-पलवल से भी बिना शोधन का सीवेज गिरता है, इसलिए वजीराबाद से ओखला के बीच 22 किमी का हिस्सा सबसे अधिक प्रदूषित माना ही जाता है। यमुना नदी को प्रदूषण से बचाने के लिए सरकारी प्रयास कई दशकों से चल रहे हैं, पर कमी कार्यान्वयन में रह गई है। यमुना कार्य योजना के पहले और दूसरे चरण में कुल 1514.42 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं।
तीसरे चरण के लिए 1656 करोड़ रुपये की संशोधित लागत मंजूर की गई है। एनजीटी ने कई बार हरियाणा को एसटीपी अपग्रेड करने की डेडलाइन दी, नालों की निगरानी के लिए विशेष समिति बनवाई और सीपीसीबी को तिमाही आधार पर एसटीपी के प्रदर्शन की निगरानी का निर्देश दिया। 2027 तक नालों के बीओडी स्तर को 10 मिलीग्राम प्रति लीटर से कम करने का लक्ष्य रखा गया है। ड्रोन सर्वेक्षण से नालों की मैपिंग हो रही है, सीवर लाइनें लगभग पूरी बिछाई जा चुकी हैं और अवैध डिस्चार्ज पर कार्रवाई भी हो रही है।
कई जगह क्षमता बढ़ी है और कुछ नालों से उपचारित पानी की मात्रा पहले से ज्यादा हो गई है। फिर भी कमी बनी हुई है। नदियों के प्रदूषण का सामाजिक और आर्थिक प्रभाव गहरा है। यमुना और घग्गर के किनारे की खेती पर असर पड़ रहा है। उच्च टीडीएस और रासायनिक कचरे वाला पानी फसलों और मवेशियों के लिए खतरनाक है, भूजल में भी 30 से 50 प्रतिशत तक गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। पीने के पानी में अमोनिया बढ़ने से क्लोरीन के साथ मिलकर कैंसर तक का खतरा बताया गया है।
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