Wednesday, September 2, 2026

इस जैसा प्रेमी आदमी कभी नहीं देखा

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

किसी गांव में जूता सिलने वाला व्यक्ति रहता था। गरीब था। दो जून की रोटी का ठिकाना भी बड़ी मुश्किल से हो पाता था। उस गांव में महात्मा बुद्ध का प्रवचन होना था। लेकिन उसे इन बातों से मतलब भी नहीं था रोजी-रोटी कमाने के चक्कर में। एक दिन वह सुबह सोकर उठा और पास के तालाब में गया, तो उसे एक सुंदर फूल दिखाई दिया। उसने कीचड़ में घुसकर उस फूल को तोड़ा और उसे बेचने के लिए शहर की ओर चल दिया। 

सोचा, आठ आने, एक रुपया मिल जाएगा, तो दो दिन का खर्च चल जाएगा। जैसे ही वह गांव के बाहर पहुंचा, रास्ते में नगर सेठ ने उसके हाथ में फूल देखा, तो कहा कि इस फूल के मैं दो रुपये दूंगा। यह फूल मुझे दे दो। गरीब आदमी खुश हो गया। तभी राजा के एक मंत्री वहां आ पहुंचे और उन्होंने कहा कि मैं इस फूल के पांच रुपये दूंगा। यह फूल मेरा हुआ। 

नगर सेठ और मंत्री में हो रहा विवाद निपटा भी नहीं था कि वहां राजा की सवारी आ पहुंची। राजा ने उस फूल को देखते ही कहा कि यह फूल मेरा हुआ। मैं तुम्हें राजकोष से इतना धन दूंगा कि तुम्हें जीवन भर मेहनत करने की जरूरत नहीं होगी। देखते ही देखते उस फूल की कीमत हजारों रुपये हो गई। अब गरीब व्यक्ति ने राजा से पूछा कि आखिर इस फूल में ऐसी क्या खासियत है जो इतना महंगा हो गया। 

राजा ने सारी बात बताई कि इस गांव में महात्मा बुद्ध का आगमन होने वाला है। हम इसे बुद्ध को भेंट करना चाहते हैं। यह सुनकर उस व्यक्ति ने फूल बेचने से मना कर दिया। शाम को जब बुद्ध गांव में पहुंचे, तो उस व्यक्ति ने बुद्ध को प्रणाम करते हुए उस फूल को अर्पित कर दिया और एक कोने में जाकर खड़ा हो गया। बुद्ध के कानों तक फूल की कथा पहुंच चुकी थी। उन्होंने कहा कि जिस आदमी के पास खाने के पैसे नहीं हैं। वह आदमी इतना बड़ा त्याग कर रहा है। मैं वर्षों से भ्रमण कर रहा हूं, इस जैसा प्रेमी आदमी कभी नहीं मिला।

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