Saturday, November 7, 2026

मकानों को गिरने से बचाने के लिए सतर्कता के साथ सख्ती जरूरी


अशोक मिश्र

दिल्ली में गुरुवार की सुबह पुरानी दिल्ली के चावड़ी बाजार इलाके में एक और इमारत भरभराकर गिर गई। निर्माणाधीन तीन मंजिला इमारत के ढहने से दो मजदूरों की मौत हो गई। कई लोग मलबे में दब गए। इसके बाद पुलिस, दमकल, एनडीआरएफ और नगर निगम की टीमें घंटों तक राहत और बचाव कार्य में जुटी रहीं। शुरुआती जांच में सामने आया कि यह इमारत बिना स्वीकृत नक्शे के बन रही थी। करीब 50 वर्ग मीटर के छोटे भूखंड पर तीसरी मंजिल का काम चल रहा था। छत का स्लैब डालते समय इमारत गिर गई। 

नगर निगम के अनुसार मरम्मत की आड़ में दूसरी और तीसरी मंजिल पर नया निर्माण कराया जा रहा था। निर्माण सामग्री निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं थी जिससे वह ठीक से जमी भी नहीं थी। दिल्ली पुलिस ने करीब पाँच महीने पहले जून में ही इस अवैध निर्माण की सूचना नगर निगम को पत्र लिखकर दी थी, लेकिन कार्रवाई इतनी धीमी और अधूरी रही कि निर्माण चलता रहा। अंत में दो मजदूरों की जान चली गई। हादसे के बाद तीन ठेकेदारों को गिरफ्तार किया गया। नगर निगम के दो इंजीनियरों को निलंबित किया गया। 

दिल्ली सरकार ने जांच के आदेश दिए, मगर यह वही पुराना क्रम है जो हर हादसे के बाद दोहराया जाता है। पहले शोक, फिर गिरफ्तारी और निलंबन, फिर जांच और कुछ समय बाद सब कुछ पहले जैसा चलने लगता है। इन हादसों के पीछे केवल एक व्यक्ति या एक विभाग की लापरवाही नहीं है। पूरी व्यवस्था की सामूहिक विफलता है। सबसे पहली जिम्मेदारी भवन मालिक और ठेकेदार की है, जो मुनाफे, किराये या अधिक कमरे बनाने की लालच में नियमों को ताक पर रख देते हैं। वे नक्शा तक पास नहीं कराते, स्ट्रक्चरल इंजीनियर से सलाह नहीं लेते हैं। सस्ती और घटिया सामग्री इस्तेमाल करते हैं। जिम्मेदारी उन इंजीनियरों, आर्किटेक्टों और सुपरवाइजरों की भी है जिनका काम निर्माण की गुणवत्ता पर नजर रखना है, मगर कई जगहों पर वे कागजों पर ही मौजूद रहते हैं। सबसे बड़ी जिम्मेदारी नगर निगम, स्थानीय प्रशासन और प्रवर्तन तंत्र की है जिसके पास अवैध निर्माण रोकने, नोटिस देने, निर्माण सील करने और उसे गिराने का अधिकार है, लेकिन अक्सर शिकायत या पुलिस के पत्र के बाद भी समय पर कार्रवाई नहीं करते हैं। जब अवैध निर्माण की सूचना पाँच महीने पहले मिल चुकी थी, फिर भी तीसरी मंजिल तक काम पहुँच जाए, तो यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि व्यवस्था में भ्रष्टाचार, मिलीभगत, स्टाफ की कमी और जवाबदेही के अभाव का संकेत है। 

कई बार स्थानीय स्तर पर रिश्वत, राजनीतिक दबाव और कुछ दिन बाद देख लेंगे वाली मानसिकता अवैध निर्माण को संरक्षण दे देती है। जिम्मेदारी समाज की भी है, जहां किराएदार या पड़ोसी दीवारों में दरार, इमारत का झुकना, आवाज आना या कंपन जैसे खतरे के संकेतों को देखकर भी चुप रहते हैं। उन्हें डर होता है कि शिकायत करने पर उन्हें घर खाली करना पड़ जाएगा या मालिक से झगड़ा हो जाएगा। दिल्ली जैसी ही कहानी देश के दूसरे शहरों में भी दोहराई जा रही है। इससे साफ होता है कि यह समस्या किसी एक शहर की नहीं, बल्कि शहरीकरण, गरीबी और कमजोर नियमन की राष्ट्रीय समस्या है। जुलाई 2026 में मुंबई के मानखुर्द में एक अवैध चार मंजिला इमारत गिरने से छह लोगों की मौत हो गई थी। इनमें पाँच बच्चे थे। वह इमारत बिना अनुमति बनी थी। उसमें अतिरिक्त मंजिलें जोड़ दी गई थीं। हादसे से कुछ घंटे पहले इमारत झुकने लगी थी। 

फिर भी पास की झोपड़ियों में रहने वाले लोग नहीं बच पाए। लखनऊ के ट्रांसपोर्ट नगर में तीन मंजिला इमारत गिरने से आठ लोगों की मौत हुई थी। जांच में पता चला कि अनुमति केवल दो मंजिलों की थी, लेकिन तीसरी मंजिल अवैध रूप से बना दी गई थी। ये घटनाएँ अलग-अलग शहरों की लग सकती हैं, मगर इनकी जड़ एक ही है। बिना अनुमति निर्माण, भार से अधिक मंजिलें, घटिया सामग्री, सुरक्षा की अनदेखी और समय पर रोक न लगना। ऐसे हादसों को रोकना असंभव नहीं है, लेकिन इसके लिए हादसे के बाद की कार्रवाई से आगे बढ़कर हादसे से पहले की रोकथाम की व्यवस्था बनानी होगी।  सबसे पहले शहर की हर पुरानी, जर्जर और खतरनाक इमारत का सर्वेक्षण होना चाहिए और उसे रंग, श्रेणी या जोखिम के आधार पर चिह्नित किया जाना चाहिए। 

अवैध निर्माण पर शिकायत मिलते ही 24 से 72 घंटे के भीतर कार्रवाई की समय-सीमा तय होनी चाहिए। निर्माण सामग्री और निर्माण प्रक्रिया की गुणवत्ता पर सख्त नियंत्रण होना चाहिए। मजदूरों की सुरक्षा और प्रशिक्षण को भी हादसों की रोकथाम का हिस्सा माना जाना चाहिए, क्योंकि इमारत गिरने पर सबसे पहले वे ही दबते हैं जो उसमें काम कर रहे होते हैं। अंत में यह समझना होगा कि इमारतें अचानक नहीं गिरतीं, वे धीरे-धीरे गिरती हैं, पहले नियम टूटते हैं, फिर नींव कमजोर होती है, फिर दीवारों में दरारें आती हैं, फिर अधिकारी आँखें मूँद लेते हैं और फिर एक सुबह पूरी इमारत मलबे में बदल जाती है। ऐसी घटनाओं को रोकना है, तो सतर्कता के साथ सख्ती बरतनी होगी।

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