Thursday, March 19, 2026

बालक बोला, मैं पढ़ता नहीं, गाय चराता हूं

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

दूसरे विश्व महायुद्ध के बाद जब जापान के नागरिकों और युद्धबंदियों पर संयुक्त राष्ट्र की ओर से मुकदमा चलाया जा रहा था, तब भारत के कानूनविद राधाबिनोद पाल ने दस अन्य देशों वाले न्यायाधीशों की राय के विपरीत अपने विचार रखकर दुनियाभर को चौंका दिया था। 

उन्होंने टोक्यो ट्रायल के संबंध में अपनी बात रखते हुए कहा था कि अमेरिका ने जापान को युद्ध के लिए जानबूझकर उकसाया था, इसलिए जापान के युद्धबंदियों पर मुकदमा चलाकर दंडित करना उचित नहीं है। कहते हैं कि बाद में तीन अन्य न्यायाधीशों ने भी पाल की राय पर सहमति जताई थी। राधाबिनोद पाल का जन्म 27 जनवरी 1886 को नादिया (अब बांग्लादेश में) जिले में एक बंगाली वैष्णव परिवार में हुआ था। 

इनके बारे में कहा जाता है कि पाल एक गरीब परिवार में पैदा हुए थे। जब वह छोटे थे, तो वह पढ़ने-लिखने की जगह गाय चराने जाते थे। उन्होंने बच्चों का स्कूल जाना और पढ़ना लिखना बहुत सुहाता था। वह स्कूल के इर्द-गिर्द ही अपनी गायों को चराते रहते थे और स्कूल में जो पढ़ाया जाता था, वह बड़े गौर से सुनते थे। एक दिन नादिया जिले के कुश्तिया के एक प्राइमरी स्कूल में स्कूल इंस्पेक्ट आए। 

उन्होंने कक्षा में एक कठिन सवाल पूछा। कमरे की खिड़की के पास खड़े पाल ने अंदर जाकर कहा कि इस सवाल का उत्तर मुझे पता है। कक्षा का कोई भी विद्यार्थी इस सवाल का जवाब नहीं दे पाया था। उन्होंने उस सवाल का सही जवाब दे दिया। स्कूल इंस्पेक्टर ने पूछा कि तुम किस क्लास में पढ़ते हो? पाल ने कहा कि मैं पढ़ता नहीं हूं। मैं खिड़की के बाहर जो पढ़ाया जाता है, सुनता रहता हूं। उस स्कूल इंस्पेक्टर ने उनका स्कूल में प्रवेश देने के साथ छात्रवृत्ति भी दिलाई। यही बच्चा आगे चलकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर का वकील बना।

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