Saturday, February 15, 2014

भ्रष्ट मीडिया का कच्चा-चिट्ठा

-सुभाष चंद्र
लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है मीडिया। चमक-दमक से भरपूर। मीडिया से बाहर रहने वालों को बहुत लुभाता है यह पेशा। मीडिया में एक ऊर्जा हमेशा प्रवाहमान रहती है। पत्रकारिता मिशन है या व्यवसाय? इस पर पिछले कुछ दशक से बहस तेज हो गई है। आज हालात यह है कि पत्रकारिता न विशुद्ध रूप से मिशन रह गया है, न व्यवसाय। एक अजीब सा घालमेल मीडिया में पैदा हो गया है। कुछ लोग मीडिया को मिशन मानकर आते हैं, कुछ साल मिशनरी जज्बे से काम भी करते हैं, लेकिन अंतत: व्यावसायिक हितों के आगे हथियार रख देते हैं। वे न पूरी तरह से विशुद्ध मिशनरी रह पाते हैं, न व्यवसायी। एक पत्रकार की जीजीविषा, उसके मानवीय और सामाजिक सरोकार, घुटन, मजबूरी और उससे उत्पन्न कुंठा आदि को शब्द प्रदान करता है उपन्यास ‘सच अभी जिंदा है’। उपन्यास का मुख्य किरदार है शिवाकांत।  मिशनरी जज्बे से लैस होकर जब इस पेशे में आता है, तो उसे कदम-दर-कदम ऐसे लोगों से जूझना पड़ता है, जो पत्रकारिता को सिर्फ व्यवसाय समझकर आए हैं। दैनिक प्रहरी में वह महसूस करता है कि संपादक से लेकर संवाददाता और उप संपादक तक एक दूसरे की टांग खींचने, चुगली करने, डग्गा वसूलने और अखबार मालिक की नजर में बने रहने के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं। वह इन स्थितियों के खिलाफ उठकर खड़ा होता है, तो उस पर एक रिसॉर्ट मालिक से वसूली का झूठा आरोप लगाया जाता है। वह मजबूरन इस्तीफा देकर चला आता है।
नौकरी की तलाश उसे लखनऊ से दिल्ली लेकर आती है। एक दिन वह आठ वर्षीय सोनिया से हुए सामूहिक बलात्कार खबर कवर करने क्या जाता है मानो मुसीबत ही मोल ले लेता है। अस्पताल में सोनिया की मौत हो जाती है। वह अखबार में मुख्य खबर के साथ-साथ कई साइड स्टोरियां भेजता है, लेकिन अगले दिन जब वह अखबार देखता है, तो वह आश्चर्यचकित रह जाता है। उसकी खबरें तोड़-मरोड़कर छापी गई थीं। साइड स्टोरियों के तथ्य बदल दिए गए थे। विरोध करने पर उसे टाल दिया जाता है। बात में छानबीन करने पर उसे पता चलता है कि दिल्ली के एक बहुत बड़े बिल्डर ने सभी अखबारों को मैनेज कर लिया था। सात दिन में उसके अखबार को ही पैंतीस लाख रुपये का विज्ञापन दिया गया था। वह इसके विरोध में अपने समाचार संपादक के सामने विरोध प्रकट करता है, तो उसे पत्रकारिता और व्यवसाय की मजबूरियां बताकर चुप करने का प्रयास किया जाता है। उधर, अस्पताल में दम तोड़ती हुई सोनिया की सुनी गई चीखें उसे मजबूरन इस स्थिति के खिलाफ खड़ा होने को बाध्य करती हैं। वह अपने एक मित्र के साथ लिव इन रिलेशन में रह रही पत्रकार शालिनी की मदद से दिल्ली के कुछ स्वयंसेवी संगठनों को इसके खिलाफ खड़ा करता है। शिवाकांत के अखबार का संपादक और समाचार संपादक सोनिया के साथ हुए गैंगरेप की घटना के विरोध में जंतर-मंतर पर होने वाले प्रदर्शन में भाग लेने पर नौकरी से निकालने की धमकी देता है, तो वह नौकरी छोड़ना बेहतर समझता है। प्रदर्शन के दौरान कुछ अराजक तत्वों के पथराव करने पर शालिनी और शिवाकांत घायल हो जाते हैं। तीन दिन बाद शालिनी की मौत हो जाती है। एक बार फिर शिवाकांत बेरोजगारी का दंश झेलने के लिए मजबूर हो जाता है।
डेढ़ महीने की बेरोजगारी के बाद उसके लिए आगरा की एक चिटफंड कंपनी के निकलने जा रहे अखबार पृथ्वी एक्सप्रेस में नौकरी प्रस्ताव मिलता है। वह नौकरी ज्वाइन करता है। चिटफंड कंपनी में नौकरी के दौरान उसे महसूस होता है कि यह एक अलग ही दुनिया है। चिटफंड कंपनी पत्रकारों और पत्रकारिता से जुड़े लोगों को अपने ही हिसाब से हांकती है। कंपनी का सीएमडी आश्वासन किसी को देता है, नियुक्त किसी और को करता है। पृथ्वी एक्सप्रेस में कई गुट सक्रिय हैं। प्रधान संपादक का एक गुट अलग, संपादक का गुट अलग। इन दोनों गुटों में पिसता शिवाकांत और उसके जैसे कई पत्रकार। स्वार्थ और गुटबाजी का बोलबाला इस कदर व्याप्त है पृथ्वी एक्सप्रेस में कि शिवाकांत की आत्मा कराह उठती है। एक दिन शराब पार्टी में वह संपादक को उसकी कुछ गलतियों की ओर इशारा करके शिवाकांत मानो सांप के बिल में हाथ डाल बैठता है। चिटफंड कंपनी का अपना चरित्र, उस पर पत्रकारिता के मूल्यों का होता ह्रास, जनता से वसूले गए पैसों की बंदरबाट, संस्थान में चल रही गुटीय राजनीति एक दिन शिवाकांत को इतना उत्तेजित कर देती है कि वह संपादक और प्रधान संपादक से बहस कर बैठता है। काफी दिनों से उसे निकालने की फिराक में लगे दोनों गुटों को मौका भी मिलता है, चिटफंड कंपनी द्वारा खरीदे गए एक होटल के उद्घाटन समारोह में। चिटफंड कंपनी का एक टीवी चैनल भी चलता है। वह उद्घाटन समारोह के दौरान थोड़ी देर सीएमडी के पास खड़ा रह जाता है और इसी बात को प्रधान संपादक और संपादक आपसी वैरभाव भूलकर इतना तूल देते हैं कि मजबूरन एक बार फिर शिवाकांत को इस्तीफा देना पड़ता है। पत्रकारिता जगत में व्याप्त विसंगतियों, आपसी खींचतान, उठापटक के साथ-साथ देश में चल रही चिटफंड कंपनियों का चरित्र भी इस उपन्यास में उभर कर सामने आया है।

उपन्यास : सच अभी जिंदा है
उपन्यासकार : अशोक मिश्र
प्रकाशक : भावना प्रकाशन,
            108 ए, पटपड़गंज,   दिल्ली
मूल्य : 650 रुपये     पृष्ठ : 346

Friday, February 14, 2014

उल्लू की दुम होता है व्यंग्यकार

-अशोक मिश्र
जी हां! मैंने यही कहा था, ‘उल्लू की दुम होता है व्यंग्यकार।’ बात यह हुई थी कि मैं सुबह उठकर अखबार पढ़ते हुए एक कप चाय का इंतजार कर रहा था। घरैतिन किचन में पता नहीं क्या कर रही थीं। चाय की तलब  काफी तेज लगी हुई थी कि तभी घरैतिन ने चाय का कप थमाते हुए पूछ लिया, ‘सुनो जी! यह व्यंग्यकार क्या होता है?’ काफी देर से चाय के इंतजार में भीतर ही भीतर उबल रहा मैं सचमुच उबल पड़ा, ‘उल्लू की दुम होता है व्यंग्यकार। खब्तुलहवास होता है व्यंग्यकार। उस पर चौबीस घंटे एक अजीब सी खब्त सवार होती है। माघ-पूस में वह फाल्गुनी मादकता से ओतप्रोत रहता है, तो जेठ की दुपहरिया में वह कंबल ओढ़कर वर्षागीत गाता है। कहने का मतलब यह है कि व्यंग्यकार वह जीव होता है, जो उल्टा सोचता है, उल्टा चलता है, बेचैन आत्मा होता है।’ मेरी बात सुनते ही घरैतिन घबरा उठीं। चाय रखकर अपना पिटा सा मुंह लेकर वह दोबारा किचन रूपी कोपभवन में जाने लगीं, तो मुझे लगा कि मैंने कुछ ज्यादा ही व्याख्या कर दी है। अगर घरैतिन को मनाकर डैमेज कंट्रोल नहीं किया गया, तो अपनी बैंड बजनी तय है। सो, लपककर बड़े प्रेम से घरैतिन का हाथ पकड़कर अपने पास बिठाते हुए कहा, ‘ओह प्रियतमे! तुम कहीं मेरी बात का बुरा तो नहीं मान गईं? मेरे अंतस्थल के मरुथल में अपनी संपूर्ण मादकता और प्रीत के साथ बहने वाली बासंती बयार! तुम अगर रूठ गईं, तो मेरे जीवन की पुष्पित-पल्लवित बगिया में असमय पतझड़ का समावेश हो जाएगा।’ मेरी बात सुनते ही घरैतिन ने हाथ झटकते हुए कहा, ‘मैंने आपसे सीधा-सा सवाल किया था, आपने टेढ़ा मेढ़ा जवाब दिया। अब लंतरानी हांकने की बजाय सीधे-सीधे बताइए कि आप कहना क्या चाहते हैं?’
घरैतिन के कर्कश शब्दों को सुनकर मुझे लग गया कि डैमेज कंट्रोल का मेरा प्रयास निरर्थक ही जाएगा। मैंने घरैतिन को पुचकारने वाले अंदाज में कहा, ‘तुमने कोई गलत सवाल नहीं किया था। मैंने भी गलत जवाब नहीं दिया था। बात दरअसल यह है कि सचमुच उल्लू की दुम होते हैं हम। तुम कह सकती हो कि रात में जलाए गए अलाव को दो दिन बाद कुरेद-कुरेदकर क्रांति की चिंगारियां तलाशते हैं। जब सारी दुनिया चैन से सोती है, हम पूरी दुनिया की चिंता में दुबले होते रहते हैं। जब सारी दुनिया किसी नेता, अधिकारी, सांसद या विधायक की प्रशंसा में कसीदे काढ़ती है, तो व्यंग्यकार उसकी धोती खोलने के जुगाड़ में लगा होता है। व्यंग्यकार की रडार पर आया हुआ व्यक्ति उसका दुश्मन ही हो, ऐसा कोई जरूरी नहीं है। जाति, धर्म, संप्रदाय, राष्ट्र की सीमा से परे होता है व्यंग्यकार। तुम यों समझो कि दुधारी तलवार की तरह होता है वह। जो तलवार चलाता है, वह भी घायल होता है, जिस पर चलती है, वह भी घायल होता है।’ इतना कहकर मैंने घरैतिन को अनुराग पूर्ण नेत्रों से देखा और कहा, ‘जानती हो, जब-जब तुम कोई लजीज व्यंजन पकाती हो या मेरा ध्यान रखने लगती हो, तो मैं सतर्क हो जाता हूं। मुझे लगता है कि जरूर इसमें तुम्हारा कोई न कोई स्वार्थ है। इसमें मेरा कोई दोष नहीं है, दरअसल यह व्यंग्यकारों की प्रवृत्ति का ही दोष है। अगर वह सीधा सोचने-समझने लगे, तो व्यंग्य लिख ही नहीं सकता।’
घरैतिन ने टालने  वाले अंदाज में कहा, ‘तुमने अभी बेचैन आत्मा की बात की थी। उसका क्या मतलब है?’ मैंने उसे समझाने वाले लहजे में कहा, ‘बात दरअसल यह है कि इस दुनिया में सारी आत्माएं या तो पुण्यात्मा होती हैं या फिर पापात्मा। कुछ आत्माएं ऐसी भी होती हैं, जो न तो पुण्यात्मा होती हैं, न ही पापात्मा। ये बेचैन आत्माएं होती हैं। हालांकि इस पूरी दुनिया में ऐसी बेचैन आत्माएं रेयरेस्ट आॅफ द रेयरेस्ट ही होती हैं, लेकिन होती तो हैं। इन बेचैन आत्माओं को जब देह धारण करने का मौका मिलता है, तो ऐसी आत्माएं पैदा होने के बाद बड़ी होकर व्यंग्यकार हो जाती हैं। इन आत्माओं को जीवन भर चैन नहीं मिलता। ये बेचैन आत्माएं यानी व्यंग्यकार हर काम, हर भावना, हर बात में कोई न कोई नुक्स जरूर ढूंढता है। व्यंग्यकार कभी सीधा चल ही नहीं सकता है। अगर चला, तो बेमौत मारा जाएगा। मरने पर उसे मोझ नहीं मिलने वाला। वह फिर बेचैन आत्मा हो जाएगा। ‘जो कुछ था, सोई भया’ की तरह। लेकिन एक बात बताऊं। सच्चा व्यंग्यकार अपना भला भले ही न कर पाए, लेकिन पूरी दुनिया का बहुत भला करता है। वह जिस पर व्यंग्य लिखता है, वह तो तिलमिलाता ही है, पढ़ने वाले भी मुंह बना देते हैं। वह व्यक्तिपरक नहीं लिखता, सीधा प्रवृत्ति या व्यवस्था पर चोट करता है। इस दुनिया में बहुत सारे लोग सीधे रास्ते चलते और गलत रास्ते पर पहुंच जाते हैं, लेकिन व्यंग्यकार गलत रास्ते से शुरुआत करके सीधे रास्ते पर आ जाता है। नकार (नकारात्मक) से चलकर सकार (सकारात्मक) तक आने वाला सिर्फ व्यंग्यकार ही होता है।’ मेरी बात सुनकर घरैतिन ने असमंजस पूर्ण ढंग से ऐसे सिर हिलाया, मानो आधी बात समझ में आई हो, आधी नहीं। वह उठते हुए बोलीं, ‘आपकी बाकी व्याख्या बाद में सुनुंगी, चलूं चुन्नू को नाश्ता दे दूं।’ मैं भी अखबार पढ़ने के साथ-साथ ठंडी हो चुकी चाय पीने में लग गया।

Wednesday, February 12, 2014

तोहार कवन बान राजा...

अशोक मिश्र 
संपादक जी मुझे हौंक रहे थे, ‘यार! कभी तो कोई अच्छी स्टोरी कर लिया करो। हर बार तुम अपनी स्टोरी में कोई न कोई ऐसा नुक्स छोड़ ही देते हैं जिसके चलते अगली सुबह मुझे मालिक की सुननी पड़ती है। सुनो! कल वेलेंटाइन डे पर अगर कोई अच्छी स्टोरी नहीं मिली, तो तुम्हारा भगवान ही मालिक है। अच्छी स्टोरी मतलब...कोई धड़कती सी, फड़कती सी, कड़कती सी स्टोरी। और अब..दफा हो जाओ मेरी नजरों के सामने से। जिस दिन तुम्हारा सुबह-सुबह मुंह देख लेता हूं, उस दिन जरूर अखबार में कोई ब्लंडर छप जाता है।’ हौंके जाने पर किसी नाक बहाते, थूक चुवाते बच्चे की तरह रिरियाता हुआ उनकी केबिन से बाहर आया। अगर कुछ बोलता, तो नौकरी जाने का भी खतरा था। सोचने लगा, वेलेंटाइन डे पर कौन सी स्टोरी करूं कि धमाका हो जाए? कि जिसको पढ़कर संपादक जी धड़क जाएं, फड़क जाएं और भड़क जाएं। काफी देर तक मगजमारी करने के बाद भी कुछ नहीं सूझा, तो अपने साथियों से भी कोई नया आइडिया सुझाने की विनती की। कुछ ने तो मौके का फायदा उठाते हुए चाय-समोसे के साथ-साथ चौदह रुपये वाला गुटखा भी गटक लिया और यह कहते हुए सरक लिए कि सोचता हूं तुम्हारे लिए कोई धांसू आइडिया। मैं हवन्नकों की तरह टुकुर-टुकुर उन्हें जाता हुआ देखता रहा।
जब कुछ नहीं सूझा, तो शहर घूमने निकल पड़ा। घूमता-घामता दिल्ली के बाहरी इलाके में पहुंच गया। सड़क से थोड़ा हटकर स्थित एक खेत में के किनारे वाले हिस्से में लगे ट्यूबवेल से पानी निकलता देख प्यास लग गई, तो सोचा दो चुल्लू पानी ही पी लूं। थोड़ी देर यहीं बैठूंगा और अगर कोई अच्छी स्टोरी का आइडिया नहीं सूझा, तो चुल्लू भर पानी में डूब मरूंगा। पानी पीकर खेत की हरियाली को निहार ही रहा था कि मुझे आवाज सुनाई दी। कोई कह रहा था,‘आज तो एकदम पटाखा लग रही हो, मितवा की अम्मा!’ मैं दबे पांव खेत की दूसरी ओर बढ़ा, तो खेत की मेड़ पर एक युगल बैठा दिखाई दिया। दोनों शायद पति-पत्नी थे। पति ने पत्नी को छेड़ते हुए कहा, ‘सुबह छोटा भाई कह रहा था कि आज वेलेंनटाइन डे है। जानती हो, वेलेंनटाइन क्या होता है? चलो, हम लोग भी वेलेंनटाइन डे मनाएं।’ पत्नी ने घास का तिनका तोड़ते हुए कहा, ‘हमें क्या मालूम कि वेलेंनटाइन डे क्या होता है? यह कोई नया त्योहार है क्या?’ पति ने अपनी बायीं कोहनी से टोहका मारते हुए कहा, ‘धत बुड़बक! यह त्योहार नहीं है। इस दिन प्रेमी-प्रेमिका, पति-पत्नी एक दूसरे को उपहार देते हैं, अपने प्यार का इजहार करते हैं। एक बात बताएं। तुम्हारी चमक-दमक देखकर लगता है कि आज तुम वेलेंनटाइन डे के चक्कर में ही दशहरे की हाथी की तरह सज-धजकर आई हो। वैसे, आज तुम बहुत अच्छी लग रही हो।’ पत्नी ने अपनी प्रशंसा सुनकर थोड़ा शरमाते हुए कहा, ‘चापलूसी तो आप कीजिए ही नहीं। इतनी ही अच्छी लगती हूं, तो कल बुधिया को आंख फाड़-फाड़ क्यों देख रहे थे।’ पत्नी की बात सुनकर पति ठहाका लगाकर हंस पड़ा। उसने पत्नी को बाहों में भरते हुए कहा, ‘अच्छा..तो तुम कल से इसी वजह से नाराज हो। अरे बुधिया..एक तो मेरी भौजी लगती है, दूसरी तरफ, वह तुम्हारी बहिन भी लगती है। दोनों तरफ से हमारा मजाक का रिश्ता है। अब अगर बुधिया भौजी से मैंने थोड़ा सा मजाक कर ही लिया, तो कोई पाप नहीं कर दिया है। ’‘अच्छा..यह सब छोड़ो। मुझको यह बताओ कि तुमने आज अपने बालों में महकऊवा तेल क्यों नहीं लगाया? जब सुबह मैं घर से खेत आने लगा था, तो तुमसे कहा भी था कि खेत में रोटी लेकर अते समय थोड़ा-सा सज-धजकर आना।’ पति ने पत्नी को एक बार फिर छेड़ते हुए कहा। पत्नी ने कहा, ‘वह तेल तो कब का खत्म हो गया है। आपसे कई बार कहा भी कि बाजार जाइएगा, तो लेते आइएगा। लेकिन आप कहां लाए आज तक।’ पति ने गहरी सांस लेते हुए कहा, ‘क्या करें। जब भी बाजार में महकउवा तेल लेने के बारे में सोचा, तब पैसा पास नहीं रहा। मुझको तो लगता है कि इस संसार में गरीबों के प्यार करने पर बंदिश लगी है। गरीब नहीं होते, तो मेरी बीवी भला गरीबी का ताना देती। वैसे भी वेलेंनटाइन डे उन्हीं के लिए है जिनके पेट भरे हैं। खाली पेट वालों के लिए वेलेंनटाइन-फेलेंनटाइन का क्या मतलब है?’ पति की बात सुनकर पत्नी भड़क उठी, ‘अरे गरीबी है, तो सिर्फ हमारे लिए है? चार दिन पहले सुमित्रा दीदी ने कहा, तो उनके लिए उसी दिन काजल, टिकुली, बिंदी लाकर दे दिया था। उस मुंहझौसी से पैसा भी नहीं लिया आपने। हमारी खातिर तेल लेते समय पैसा खत्म हो जाता है।’ इस बार तुनकने की बारी पति की थी। उसने तीखे स्वर में कहा, ‘वेलेंनटाइन डे के दिन झगड़ा करना हो, तो ऐसा बताओ। सुमित्रा भौजी से मैं कभी पैसा नहीं मांगूंगा। चाहे जो हो जएा।’ इतना कहकर पति झटके से उठा और मुंह उठाकर एक ओर चल दिया। पत्नी ने लपककर पति की हाथ पकड़ते हुए कहा, ‘तोहार कवन बान (आदत) राजा..रोज रिसियाला।’ पत्नी की बात सुनते ही पति हंस पड़ा। मैं सड़क पर आ गया और सोचने लगा। संपादक जी मुझसे रोज खफा रहते हैं। संपादक जी से अखबार के मालिक किसी न किसी बात को लेकर रोज नाराजगी जाहिर करते हैं। बरबस ही मेरे मुंह से निकल गया, ‘तोहार कवन बान राजा...रोज रिसियाला।’

Monday, February 3, 2014

धरने पर कलंदरपुर की भैंस

-अशोक मिश्र
एक दिन थोड़ा देर से आफिस पहुंचा, तो संपादक जी का हरकारा बाहर ही मिल गया। मुझे देखते ही वह पहले तो मुस्कुराया और बोला, ‘पिछले बीस-बाइस मिनट में संपादक जी सवा तेरह बार आपको पूछ चुके हैं।’ मैंने उसे घूरते हुए कहा, ‘तेरह बार तो समझ में आया, लेकिन यह सवा तेरह बार का क्या मतलब है तेरा?’ हरकारे ने बत्तीस इंची मुस्कान बिखेरते हुए कहा, ‘बात यह है गुरु! तेरह बार तो उन्होंने मुझसे पूछा कि आप आए हैं या नहीं? उसके बाद एक बार वे पूछते-पूछते रह गए। उन्होंने सिर्फ इतना ही कहा, अरे..वो आया..। इस तरह हुआ न सवा तेरह बार पूछना।’ मैं सीधा संपादक जी के पास पहुंचा, तो वे मुझे देखते ही गुर्राए, ‘कितनी देर से आते हो? खैर..सुनो, तुम्हें अभी दिल्ली के एक गांव कलंदरपुर जाना होगा। सभी चैनलों पर बार-बार एक फ्लैश आ रहा है कि धरने पर कलंदरपुर की भैंस। तुम ऐसा करो, अभी निकल लो। मुझे पूरी स्टोरी शाम तक चाहिए। पूरी..मुकम्मल, हर एंगल के साथ। समझे।’ मैंने गहरी सांस लेते हुए कहा, ‘सर जी! थोड़ी सांस ले लूं, फिर निकलता हूं।’ संपादक जी फट पड़े, ‘रास्ते में सांस लेते रहना। आज सांस नहीं भी लोगे, तो भी चलेगा। शाम तक स्टोरी नहीं मिली, तो समझ लेना कि आज के बाद सांस लेने के काबिल भी नहीं रहोगे। और सुनो..दिल्ली में आजकल बात-बात पर दिए जा रहे धरने का इसे प्रभाव भी कह सकते हो। एकाध नेताओं से भी इस पर बाइट (बयान) ले लेना। जिन दिनों गांधी जी सत्याग्रह आंदोलन कर रहे थे, केरल के किसी गाय-बछड़े या भैंस के भी सत्याग्रह करने की खबर उन दिन उड़ी थी। कोई पुराना कांग्रेसी या अस्सी-नब्बे साल का कोई बुर्जुग मिल जाए, तो उसका भी इंटरव्यू कर लेना। और बाकी..कुछ अपनी अकल भी काम में लाना। अगर थोड़ी बहुत हो, तो..।’
मन ही मन भैंस को कोसता हुआ कैमरामैन के साथ लस्त-पस्त हालत में कलंदरपुर पहुंचा। देखा, हाल में हुई बारिश की वजह से सड़क पर जमा हुए पानी में भैंस मडिया मारे (कहने का मतलब है कि चारों पैर फैलाए) बैठी है। कई चैनलों के रिपोर्टर और कैमरामैन लाइव टेलीकास्ट कर रहे थे। काफी दूर-दराज से लोग धरने पर बैठी उस भैंस को देखने आए हुए थे। कुछ पुलिस वाले बार-बार बेकाबू हो रही भीड़ को काबू में करने का अथक प्रयास कर रहे थे। एक टीवी चैनल का रिपोर्टर अपने दर्शकों को बता रहा था, ‘जैसा कि आप देख ही रहे हैं, यह काले रंग की भैंस जो पानी में लेटी हुई जलपरी जैसी लग रही है। पिछले ढाई घंटे से वह न तो कुछ बोल रही है, न ही कुछ खा-पी रही है। ऐसी जानकारी भी मिली है कि इसी भैंस की पड़नानी ने महात्मा गांधी के टाइम में केरल में सत्याग्रह आंदोलन से प्रेरित होकर बाइस दिन तक सत्याग्रह किया था। तो आइए..कलंदरपुर गांव की भैंस के मालिक राम बरन जी से पूछते हैं कि उन्हें भैंस के धरने पर बैठने का पता कब चला?’ इसके बाद कैमरा पैन होता हुआ एक मुच्छड़ पर टिक जाता है।
कैमरे का फोकस अपनी ओर होता देखकर भैंस के मालिक ने पहले तो अपनी मूंछों पर ताव दिया और फिर अभिमान के साथ बोले, ‘सुबह दूध दुहने के बाद जब मेरा बेटा शर्मीली को रोटी देने आया, तो उसने रोटी खाने से मना कर दिया।’ रिपोर्टर ने बीच में बोलते हुए कहा, ‘शर्मीली मतलब..?’
भैंस के मालिक राम बरन ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘शर्मीली मतलब..यह हमारी भैंस। इसे हम बड़े प्यार से शर्मीली बोलते हैं। मेरा बेटा इसे इतना प्यार करता है कि वह स्कूल जाने से पहले अपना नाश्ता पहले इसे खिलाता है, फिर खुद खाता है। शर्मीली को बहुत प्यार करता है मेरा बेटा। हां, मैं बता रहा था कि सुबह जब मेरा बेटा रोटी खिलाने आया, तो शर्मीली ने रोटी नहीं खाई। मेरे बेटे ने पूछा, बप्पा ने कल दूध कम देने पर तुम्हें दो डंडे लगाए थे, उसके विरोध में क्या धरने पर बैठी हो? बस..भइया! बेटे के पूछते ही शर्मीली ने ‘हां’ में गर्दन हिला दी और सड़क पर बने इस गड़हे में आकर बैठ गई। तब से यह यहीं बैठी हुई है। मेरे बेटे और शर्मीली के बीच यह वार्तालाप चल रहा था, तो सामने से एक रिपोर्टर गुजर रहा था। उसने अपने मोबाइल पर यह सब कुछ रिकार्ड किया और अपने चैनल पर चला दिया। तब से लोगों का सैलाब उमड़ा पड़ रहा है।’
लोगों की बात सुनकर मैंने सोचा, जब इतनी दूर तक आया हूं, तो मैं भी एक छोटा-सा इंटरव्यू कर ही लेता हूं। मैंने मधुर स्वर में शर्मीली को संबोधित करते हुए कहा, ‘राजमहिषी जी! पानी से बाहर निकल आइए, आपको ठंड लग जाएगी। बाहर आकर धरने पर बैठने का कारण बताइए।’ भैंस ने मेरे सवाल पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। वह बैठी दायें-बायें, तो कभी ऊपर-नीचे अपना मुंह हिलाती रही। तभी भीड़ को हटाकर एक व्यक्ति ने मामले में दखल दिया।
‘आप लोग पीछे हटिए, मुझे देखने दीजिए’ कहते हुए उसने भैंस का मुंह पकड़कर मुआयना किया और कैमरे के सामने आकर बोला, ‘मैं पशु चिकित्सक हूं। मैं गारंटी से कह सकता हूं कि भैंस धरने-वरने पर नहीं बैठी है। इसे मुंहपका रोग हो गया है जिसकी वजह से यह खा नहीं पा रही है।’ उसके इतना कहते ही चैनलों के रिपोर्टरों और कैमरामैनों ने शरमाकर अपना तामझाम समेट लिया।

Tuesday, January 28, 2014

पापा! ‘फेंकू’ सर से पढूंगा ट्यूशन

-अशोक मिश्र
मैं पिछले चौबीस घंटे से एक अजीब से तनाव से गुजर रहा हूं। कई बार समझा चुका हूं। थोक में समझाया, फुटकर समझाया। अब तो बुद्धि ही काम नहीं करती कि मैं उसे कैसे समझाऊं। मानता ही नहीं है। कई बार मैं समझा चुका हूं, उसकी मां समझा चुकी है। थक-हारकर मोहल्ले वालों की भी मदद ली, लेकिन वह हिमालय पर्वत की तरह अटल है। कहता है, ट्यूशन पढूंगा, तो फेंकू सर से, नहीं तो किसी से भी नहीं पढूंगा। दरअसल, बात मेरे बेटे की हो रही है। कल पता नहीं कब और कैसे उसने गोरखपुर वाली रैली का सजीव प्रसारण देख लिया था। वह अपने फेंकू से इतना प्रभावित हुआ कि जैसे ही प्रसारण खत्म हुआ, वह मेरे पास आया और बोला, ‘पापा! मैं फेंकू सर से ट्यूशन पढ़ूंगा।’ पहले तो मैं समझ नहीं पाया। यही बात उसने जब दूसरी बार दोहराई, तो मैंने समझा, बच्चा है। किसी ने उससे मजाक किया होगा और वह अब मुझसे मजाक कर रहा है। मैंने बात को टाल दी। शाम को घरैतिन ने उससे खाने को कहा, तो वह यह कहते हुए अपने कमरे में चला गया, ‘जब तक फेंकू सर से ट्यूशन पढ़ाने को पापा तैयार नहीं होते, तब तक मैं न खाना खाऊंगा, न स्कूल जाऊंगा। न नहाऊंगा, न धोऊंगा।’  घरैतिन ने मेरे पास आकर कहा, ‘अरे देखो..यह किससे ट्यूशन पढ़ने की बात कर रहा है।’ घरैतिन की बात सुनते ही मैं बमक उठा, ‘दिमाग खराब हो गया है उसका और तुम्हारा भी। जानती हो, वह किससे ट्यूशन पढ़ने की बात कर रहा है?’ मैंने जब घरैतिन को समझाया, तो उसने खिखियाते हुए कहा, ‘तो बात कर लीजिए न! अगर एकौ-दुई घंटा पढ़ा देंगे, तो सपूत का बेड़ा पार हो जाएगा।’
मैंने घरैतिन को डपटते हुए कहा, ‘कमाल करती हो तुम भी। वह ट्यूशन पढ़ाएंगे? उनके जिम्मे इतने काम हैं कि उसे छोड़कर तुम्हारे सपूत को पढ़ाने बैठेंगे? अरे अभी उन्हें पाकिस्तान को मजा चखाना है। भारत की सीमा को ईरान-इराक तक पहुंचा है।’ मैंने अपने बेटे को बुलाया, ‘बेटा, तुम जिससे ट्यूशन पढ़ने की बात कर रहे हो, पहली बात तो यह संभव नहीं है। अगर थोड़ी देर के लिए मान लिया जाए कि वह पढ़ा भी देंगे, तो तुम्हारा बेड़ा गर्क हुआ ही समझो। एक तो उनको इतिहास, भूगोल और अर्थशास्त्र की जितनी जानकारी है, उसका लोहा तो पूरी दुनिया मानती है। तुमने भले ही पढ़ा हो कि सिकंदर झेलम तक आने के बाद लौट गया था, लेकिन तुम्हारे ये फेंकू सर सिकंदर को लखनऊ, इलाहाबाद, पटना के रास्ते गुजरात पहुंचने और गुजरातियों द्वारा कुश्ती लड़ने की बात को सिद्ध कर देंगे। उनके पास ऐसे-ऐसे इतिहासकारों की फौज है, जो विलियम शेक्सपीयर को भारतीय बता देंगे। कह देंगे कि अंग्रेज चूंकि भारतीय शब्दों का उच्चारण ठीक ढंग से नहीं कर पाते थे, इसलिए विली मियां शेख पियारे को विलियम शेक्सपीयर बना दिया। बाद में लोगों ने अंग्रेजों के इस झूठ को सही मान लिया।’ इतना कहकर मैं थोड़ी देर सांस लेने के लिए रुका।
मेरी बात सुनकर बेटा थोड़ा सा कन्विंस होता दिखा, तो मैं उत्साह से भर गया। मैंने उसे समझाया, ‘देखो बेटा! यह तो हुई उनके इतिहास ज्ञान की बातें, उनकी दूसरी बातें सुनोगे, तो तुम्हें ताज्जुब होगा कि एक व्यक्ति इतना डींग हांक सकता है। और फिर..वे बड़े आदमी हैं, इतने महत्वपूर्ण पद पर हैं, इससे भी महत्वपूर्ण पद पर उनके जाने की संभावना है। फिर वे मुझ जैसे गुमनाम व्यक्ति के बेटे को इतना समय दे पाएंगे, मुझे नहीं लगता है। इतना ही नहीं, मेरे पास इतना बूता भी तो हो कि मैं तुम्हें उनके प्रदेश ट्यूशन पढ़ने भेज सकूं। तुम्हारा नाम वहीं के किसी स्कूल में लिखवा सकूं।’
मेरी बात सुनकर बेटा शातिराना तरीके से मुस्कुराया और बोला, ‘पापा! आप भी लंतरानी हांकने में काफी चतुर हैं। जहां तक रहने की बात है, तो मैं अहमदाबाद वाली मौसी के पास रहकर भी पढ़ सकता हूं। मैं आपकी यह बात भी मानता हूं कि फेंकू सर का सामान्य ज्ञान थोड़ा विलक्षण है। हमारे सामान्य ज्ञान से उनका सामान्य ज्ञान मैच नहीं करता। यह भी सच है कि वे इस देश के सबसे बड़े फेंकू हैं। जब वे फेंकते हैं, तो फिर यह नहीं देखते कि उनका फेंका गया तीर कहां गिरेगा। फेंकने की कला के वे महारथी ही नहीं, अतिरथी हैं। लेकिन एक बात आपने या शायद पूरे भारत ने महसूस नहीं की है। वे फेंकते कितने आत्मविश्वास के साथ हैं। उनका यही आत्मविश्वास तो काबिलेतारीफ है। वे झूठ भी बोलते हैं, तो कितनी सफाई और दमदारी के साथ। वे जब कहते हैं कि गुजरात को गुजरात बनाने के लिए छप्पन इंच का सीना चाहिए, तो वे यह नहीं सोचते कि छप्पन इंच कितने फीट के बराबर होता है। पापा! मुझे फेंकू सर से यही आत्म विश्वास सीखने जाना है। उनसे यह सीखना है कि झूठ कितनी सफाई से बोला जा सकता है। पापा! एक बात बताऊं। मैंने अपनी पाकेटमनी को बचाकर एक विजिटिंग कार्ड छपवाया है, जिसमें लिखवाया है, श्री चपरकनाती मिश्र, फ्यूचर प्राइम मिनिस्टर आॅफ इंडिया। पापा देखना, अगर फेंकू सर जैसा आत्म विश्वास मुझमें भी आ जाए, तो एक दिन भारत का प्रधानमंत्री बनकर रहूंगा।’ बेटे की बात सुनकर अब मेरी बोलती बंद थी।

Tuesday, January 21, 2014

ससुर के नातियों की महाभारत

-अशोक मिश्र
अवधी भाषी क्षेत्र के किसी गांव के किसी घर के सामने जल रहे कौरे (अलाव) के इर्द-गिर्द बैठे चार व्यक्ति आपस में बतकूचन कर रहे थे। इन लोगों के बीच में कुछ किशोर भी थे, जो इनकी बातों को बड़ी गौर से सुन और गुन रहे थे। वैसे इन किशोरों को बीच में बोलने की इजाजत नहीं थी, लेकिन बीच-बीच में ये अपनी जिज्ञासा किसी न किसी बहाने शांत कर ही लेते थे। कभी मिडिलची (आठवीं कक्षा पास) रह चुके ग्यानू काका ने खैनी फांकते हुए कहा, ‘अरे! तुम लोगों को नहीं मालूम, हमारे देश में ऐसे-ऐसे हवाई जहाज होते थे कि अब क्या बताएं। बच्चे जिद करते थे, महतारियां (माएं) अपने बच्चों को उन हवाई जहाजों पर बिठाने के बाद हाथ में मस्का-रोटी देकर कहती थी कि बच्चा..जाओ, थोड़ी देर सूरज पर कबड्डी खेल आओ, तब तक मैं घर का काम निबटा लूं। गांव भर के बच्चे हवाई जहाज पर बैठे और जहाज यह जा..वह जा..की गति से दो-तीन मिनट में सूरज पर पहुंच जाता। लड़के कबड्डी खेलते और जब यहां घर पर खाना तैयार हो जाता, तो महतारियां मुंह ऊपर करके आवाज देतीं, परमेसरा! आ जा, खाना तैयार है। थोड़ी देर में ‘सूं..ऊं.’ की आवाज होती और जहाज किसी के भी खाली खेत में उतर जाता।’
ग्यानू काका की बात सुनकर कंधई ने अपना सिर हिलाया, ‘हां..काका! हमने तो कहीं पढ़ा है कि राजा भगीरथ के पास तो ऐसा घोड़ा था, जो राजा भगीरथ के मन की बात जान लेता था। उन्हें कहां जाना है, वह बिना बताए जान जाता था। वह तो एक ही पल में सुरलोक, तो दूसरे पल ब्रह्मलोक, तो तीसरे पल ब्रह्मांड का चक्कर लगाकर अपने महल में लौट आते थे। उनको इतने दूर की बातें सुनाई देती थीं कि अब क्या कहें काका! एक बार का प्रसंग है कि धतींगरासुर ने देवलोक पर आक्रमण किया। देवराज बेचारे लड़ते-लड़ते हार गए, लेकिन धतींगरासुर हार ही न माने। भागे-भागे देवता राजा भगीरथ के पास पहुंचे। उन्होंने बड़ी जोर की हांक लगाई, वहीं देवलोक में रुक, ससुर के नाती। अभी मैं वहीं पहुंचता हूं। उनकी यह आवाज पूरे ब्रह्मांड में इतनी तेज गूंजी कि उसी आवाज की धमक से धतींगरासुर के कान के पर्दे फट गए और वह वहीं मर गया।’ वहीं कौरा (अलाव) ताप रहे लोगों के बीच दबे हुए से ग्यानू काका ने कंधई की बात का अनुमोदन करते हुए कहा, ‘कंधई भाई! सुना है कि जब मोदी की सरकार आ जाएगी, तो फिर से देश में ऐसे ही हवाई जहाज चलने लगेंगे, गांव-गांव में राजा भगीरथ वाले घोड़े मिलने लगेंगे। मेरा लड़का एक दिन मोदी की पार्टी का घोषनापत्तर पढ़ रहा था। उसमें एक जगह लिख था कि पुराने समय में हमारे देश में एक बीघा खेत में सौ-सवा सौ कुंटल अनाज होता था। भाज्जपा वालों के पास वह तकनीक आज भी सुरक्षित है। जैसे ही उनकी सरकार बनी, हम लोगों की तो भइया..बस मौज ही मौज हो जाएगी।’
कौरा ताप रहे बुधई पंडित से रहा नहीं गया, ‘घंटा..मौज हो जाएगी। जो काम गान्हीं बाबा नहीं कर पाए, जवाहर लाल नहरू, इंदिरा गान्हीं नहीं कर पाईं, वह तुम्हारी भाज्जपा कैसे कर लेगी? गान्हीं से बड़ा कोई तपस्वी हुआ है इस देश में? तुम ससुर के नाती खाली झूठ कै देह धरे हो। जिंनगी भर झूठै बोले, पाटी भी झुट्ठन के जुवाइन किहे हौ? तुम्हरे ई भाज्जपा वाले खाली झूठ बोलै के अलावा कोई दूसर बात करते हैं का?’ बुधई पंड़ित ठेठ अवधी में बोल पड़े। बुधई की बात सुनते ही ग्यानू काका तमक उठे, ‘देखो पंडित! खबरदार जो भाज्जपा को झुट्ठों की पार्टी कहा। कांग्रेस वाले तो देश को लूट के घर भर लिए हैं, पिछले साठ साल से एकदम लूट मचाए हैं। बुधई पंडित, बस..चार महीना रुको.. नरसिंह भगवान का अवतार हो चुका है। दो-चार महीने में कांग्रेसी असुरन की राजनीति का नाश नरसिंह भगवान करने वाले हैं। कांग्रेसी चोट्टन की राजनीति का खात्मा नहीं होगा, तब तक इस देश में रामराज्य नहीं आ सकता।’ इतना सुनते ही बुधई पंडित ने घर-परिवार के लोगों को आवाज देते हुए कहा, ‘अरे रामेंद्रा! जरा उठाय लाव तौ लट्ठ। अबहीं इनका बताइत है कि कौन किसका नाश करेगा। ई ग्यानवा जिंदगी भर झूठ की फसल बोता रहा, अब झूठ-झूठ बात कहकर हम सबका भरमावत है। इसका जब तक दिमाग हम ठिकाने नहीं लगा देंगे, तब तक पानी भी पीना हमारे लिए हराम है।’ बुधई पंडित के घर से दोनों बेटे हाथों में लाठी लिए निकल आए और ग्यानू के साथ-साथ कंधई की मां-बहन से नजदीकी रिश्ता कायम करते हुए जमीन पर लट्ठ पटकने लगे। देखते ही देखते दोनों पक्ष के लोग लाठी, भाला, बल्लम लेकर जमा होने लगे।
और फिर वही हुआ, जिसकी आप सभी लोग इस समय कल्पना कर रहे हैं। इस आधुनिक महाभारत में मरा तो कोई नहीं, लेकिन सिर सिर्फ दो लोगों के फूटे, सिर्फ तीन लोगों के हाथों और पैरों की हड्Þडी टूटी, सात लोगों को अस्पताल में उन चोटों के लिए भर्ती कराना पड़ा, जो बाहर से तो नहीं दिखते थे, लेकिन भीतर ही भीतर चोटहिल थे। दोनों पक्ष के बारह लोग थाने की हवालात में जमा हैं। उन्नीस लोग अपना घर-बार छोड़कर फरार हैं। पुलिस इनके नाते-रिश्तेदारों के घरों में छापे मार रही है, दबिश दे रही है। इस मार-पीट में बसपा और सपा के समर्थक भी कूद पड़े हैं क्योंकि बतकूचन के दौरान हुए महाभारत में दो यादव और पांच दलित जातियों के लोग भी घायल हुए थे। ये सभी कुछ ज्यादा नहीं, बीचबचाव करने आए थे। गांव की सियासत में अभी फिलहाल गर्मी है।

Tuesday, January 14, 2014

नेताजी का ‘कुर्सी’ चिंतन

-अशोक मिश्र
नेता जी पिछले पांच घंटे से चिंतन कर रहे थे। बाहर पत्रकारों की भीड़ चिंतन खत्म होने की प्रतीक्षा में आकुल-व्याकुल नजर आ रही थी। इलेक्ट्रानिक मीडिया से जुड़े पत्रकार बार-बार अपने दर्शकों को मकान, गेट और खिड़कियों को दिखा-दिखाकर उन्हें आश्वासन दे रहे थे कि बस नेता जी का चिंतन खत्म होने वाला है। इसके बाद हम अपने दर्शकों को बताएंगे कि उनका चिंतन किस विषय पर था और उसका क्या परिणाम निकलने वाला है? तभी मेरी निगाह नेताजी के एक खास चमचे पर पड़ी।
उसने बड़े ही एहतियात से भीड़ से अलग होने का इशारा किया, तो मैं अपनी बिरादरी का साथ छोड़कर घर के पिछवाड़े की ओर जा पहुंचा। नेता जी का चमचा खड़ा बीड़ी सूत रहा था। मैंने कहा, ‘गुरु..माजरा क्या है? नेता जी किस चिंतन में हैं? और अगर चिंतन ही करना था, तो चुपचाप कर लेते, इतना शोर-शराबा करने की क्या जरूरत थी?’ चमचे ने काफी जोर का सुट्टा मारने के बाद बीड़ी फेंकते हुए कहा, ‘यह तुम नेताजी से ही पूछ लेना। तुमसे वे अकेले में मिलना चाहते हैं।’ चमचे की बात सुनकर मैं इतना खुश हुआ, मानो कारू का खजाना मिल गया हो। मैं चमचे के पीछे चल पड़ा।
घर के पिछवाड़े से ही नेता जी के कमरे में घुसा। सोफे पर पलथी मारकर बैठे नेता जी आंखें मूंदे गहन चिंतन में थे। उनके सामने की टेबिल पर अंग्रेजी शराब की आधी खाली बोतल और आधा भरा पैग रखा हुआ था। उन्होंने आंखें बद किए ही दायां हाथ बढ़ाया और पैग उठाकर एक घूंट भरा। नेताजी का चमचा ध्यानाकर्षण के लिए खंखारा, तो उन्होंने पट से आंखें खोल दीं। मुझे देखते ही नेताजी के चेहरे का तनाव दूर हो गया। मुझे सामने के सोफे पर बैठने का इशारा करते हुए कहा, ‘आओ..तुम्हारा ही इंतजार कर रहा था।’ मैंने सकुचाये हुए अंदाज में कहा, ‘नेताजी..सब खैरियत तो है न!’ नेताजी ने चमचे को बाहर जाने का इशारा करते हुए कहा, ‘तुम देख ही रहे हो। देश की दशा बहुत खराब है। देश भर के गरीबों का जीवन दुश्वार होता जा रहा है। क्या करूं, कुछ समझ में नहीं आता। मैं अपने देश की जनता के लिए करना बहुत कुछ चाहता हूं, लेकिन क्या करूं? पिछले पांच-छह घंटों से बस यही सोच रहा हूं, बार-बार चिंतन कर रहा हूं, लेकिन हर बार सारा चिंतन प्रधानमंत्री पद पर जाकर अटक जाता है। चिंतन में पीएम की कुर्सी ही छाई रहती है। चिंतन में कुर्सी का कोई गूढ़ रहस्य है। तुम ज्योतिष विद्या में पारंगत हो, सामुद्रिक शास्त्र के महारथी हो।  चिंतन और कुर्सी का निहितार्थ तो बताओ।’ इतना कहने के बाद नेताजी ने इशारे से मुझे शराब पीने का इशारा किया, जिसे मैंने विनम्रता से इंकार कर दिया। मैंने विनम्रता से कहा, ‘नेताजी..इसका तो बस एक ही मतलब है कि आप निकट भविष्य में प्रधानमंत्री की कुर्सी को सुशोभित करने वाले हैं। अच्छा एक बात बताइए। चिंतन के दौरान कुर्सी बार-बार हिलती तो नहीं दिखाई दे रही थी?’ मेरी बात सुनकर खाली पैमाने को भरने जा रहे नेताजी उछल पड़े, ‘बस..बस..यही बात तो मुझे खाए जा रही थी। चिंतन में कुर्सी का होना तो ठीक है, ठीक क्या...बहुत ठीक है, लेकिन यह मुई कुर्सी क्यों बार-बार हिल रही है?’ मैंने झट से गंभीरता ओढ़ ली, ‘बात यह है नेताजी...आपको प्रधानमंत्री की कुर्सी मिलने के पूरे आसार हैं, लेकिन आपकी पार्टी के कुछ बड़े नेता विरोधी दलों के साथ ‘कुर्सी-कुर्सी’ खेलने में लगे हुए हैं। ये रहते तो आपके साथ हैं, लेकिन भला विरोधियों का सोचते हैं। रुपया-पैसा, पद-प्रतिष्ठा तो आपकी बदौलत हथियाते हैं, लेकिन गुण पंजा वालों के गाते हैं, कमल वालों की स्तुति करते हैं और झाडू वालों की प्रशंसा में कसीदाकारी करते हैं। आपकी बढ़ोत्तरी में यही राहु-केतु का काम कर रहे हैं। अगर आप इन पर विजय पा गए, तो समझिए कि प्रधानमंत्री की कुर्साी आपके ही घर में रखी हुई है। कहीं नहीं गई है प्रधानमंत्री पद की कुर्सी। आप तो जानते ही हैं कि मेरी ज्योतिष शास्त्र पर कितनी पकड़ है। मेरी गणना में तिल मात्र भी फर्क नहीं आ सकता है।’ मेरे इतना कहते ही नेताजी तमतमा उठे, ‘तुम कहते हो, तो अभी इन सबको निकाल बाहर करता हूं। मैं अकेला ही पार्टी चला सकता हूं।’ मैंने नेताजी को बीच में ही टोकते हुए कहा, ‘ऐसा कतई मत कीजिएगा। इन सबको इतनी सफाई से ‘ढक्कन’ कीजिए कि ये किसी बोतल में लगने लायक ही नहीं रह जाएं। अभी तो आप सिर्फ इतना कीजिए, चुपचाप तमाशा देखिए।’ मेरी बात सुनकर नेताजी उठे और बोले, ‘बाहर तुम्हारी बिरादरी के काफी लोग मौजूद हैं। तुम भी घर के पिछवाड़े से निकल कर आगे आओ। मीडिया से रू-ब-रू होना है।’ मैंने हाथ जोड़े और बाहर निकल गया। सामने पहुंचा, तो नेताजी मीडिया के सामने पहुंचे और बोले, ‘राष्ट्र और राष्ट्र के करोड़ों जनों के हित में काफी चिंतन के बाद मैं थक गया हूं। इसलिए आज शाम को मेरे गांव में एक तमाशे का आयोजन किया गया। इस देश की गरीब जनता उस नाच-गाने के आयोजन में भाग लेकर राष्ट्र के विकास में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करे। बस..आज मुझे इतना ही कहना है।’ इतना कहकर नेताजी फिर कमरे में जाकर चिंतन करने लगे।

Thursday, January 9, 2014

न खाऊंगा, न खाने दूंगा

अशोक मिश्र 
उस्ताद मुजरिम के घर पहुंचा, तो पूरे मकान में सन्नाटा पसरा हुआ था। मैं उस्ताद मुजरिम को खोजता हुआ, आगे बढ़ा, तो देखा कि उस्ताद मुजरिम अपने आराध्य हनुमान जी के सामने हाथ जोड़े प्रार्थना कर रहे हैं। मैं दरवाजे पर खड़ा हो गया। वे हनुमान जी से विनती कर रहे थे, ‘हे भगवन! इन मतिमंदों, कूढ़मगजों, अक्ल के अंधों और बेवकूफों को समझाइए। इन्हें अक्ल दीजिए मारुतिनंदन। भला बताओ, आज जब कमाने-खाने का मौका आया, तो इनके सिर पर एक अजीब सी खब्त सवार हो गई है। एकदम खब्तुलहवासों की तरह व्यवहार कर रहे हैं। कहते हैं, न खाऊंगा, न खाने दूंगा। अंजनिपुत्र! भला यह भी कोई बात हुई। इनकी बचकानी बातों पर विरोधी मुंह छिपाकर हंसते हैं। वे सामने आकर कहते हैं, ऐसा करो, तो जानूं। वैसा करो, तो मानूं। हमारे नेता जब ऐसा और वैसा कर देते हैं, तो विरोधी मीडिया और आम जनता के सामने आकर चिल्लाने लगते हैं कि देखा..देखा..इसने ऐसा कर दिया, वैसा कर दिया। भगवन! अब आपसे कुछ छिपा तो है नहीं। इस संसार में ऐसी कौन सी बात है, जो आपसे छिपी हुई हो। इन मंदअक्लों को विश्वास ही नहीं था कि वे इतनी भारी संख्या में जीतकर चले आएंगे। जीत क्या गए, बौरा ही गए। एक तो पहले से ही ये लोग भारतीय राजनीति के लिए टेढ़े थे, जीतने के बाद तो और भी टेढ़े हो गए। पहले तो सिर्फ टेढ़े थे, लेकिन चलते सीधा थे। अब तो जीतने के बाद टेढ़े-टेढ़े चलने भी लगे। इनके टेढ़े चलने से भारतीय राजनीति की पूरी व्यवस्था ही डगमगा गई। आप तो जानते ही हैं भगवन! इनके टेढ़े चलने से भ्रष्टाचार के समुद्र में ज्वार-भाटा आने लगा है। भ्रष्ट व्यवस्था के देवराजों (इंद्र आदि देवगणों) के सिंहासन हिलने लगे हैं। अब आप ही इनकी रक्षा कर सकते हैं। भगवन! आपसे विनती है कि या तो सचमुच भ्रष्टाचार का इस देश से खात्मा कर दो या फिर इन बेवकूफों की मति फेर दो।’
इतना कहकर उस्ताद मुजरिम ने हनुमान जी के माथे पर सिंदूर का लेप लगाते हुए कहा, ‘हे पवनसुत! आप तो जानते हैं कि मैं जिंदगी भर पाकेटमार रहा। देश के नामी गिरामी शख्सियत से लेकर कल्लू पनवाड़ी तक की जेब पर हाथ साफ किया है। अंगुलियों में फंसे ब्लेड के सहारे मैंने जिंदगी भर अपनी आजीविका चलाई। खुद खाया और दूसरों का भी पेट भरा। बुढ़ापे में सोचा था कि चुनाव ही लड़ लूं। सो, दिल्ली आ गया। किसी तरह जुगाड़ करके टिकट हथियाया। कुछ तिकड़म, कुछ चालबाजी और कुछ भाग्य ने साथ दिया, तो जीत भी गया। मेरे चुनाव क्षेत्र के जितने भी पाकेटमार, चोर-उचक्के, ठग, अपराधी थे, उन्होंने मेरा खूब जमकर प्रचार किया। ज्यादातर आपराधिक प्रवृत्ति के लोग या तो मेरे चेले निकले या फिर मेरे गुरु भाइयों के चेले-चपाटे। सो, कुछ आपकी कृपा से, कुछ चेले-चपाटों की दया से और कुछ नासमझ जनता की दया-भावना के चलते काफी समर्थन मिला। अपना एक चेला तो हारने या जीतने पर गोली-बम की फुलझड़ियां छोड़ने पर भी आमादा था, लेकिन मैंने उससे कह दिया, खबरदार... जो हल्ला-गुल्ला किया तो। मैं इस देश का आम आदमी हूं, भले ही पाकेटमार हूं तो क्या हुआ। लेकिन भगवन! ऐसा चुनाव जीतने से क्या फायदा हुआ। सारा गुड़ गोबर कर दिया। भला आप ही बताइए, इस देश से भ्रष्टाचार खत्म हो सकता है क्या? गरीबी, बेकारी, भुखमरी और शोषण-दोहन की अकाल मौत हो सकती है क्या?
नहीं हो सकती..कम से कम इस पूंजीवादी व्यवस्था में तो नहीं हो सकती। यह आप भी जानते हैं, मैं भी जानता हूं और हमारे देश के वे सभी नेता जानते हैं, जो गरीबी, बेकारी, भुखमरी आदि दूर करने का वायदा करते हैं। इस बात को अगर कोई नहीं समझता है, तो वह है इस देश का आम आदमी। इस देश की कूढ़मगज जनता।’
‘भगवन! चुनाव लड़ते समय सोचा था, बुढ़ापे में विधायक बनकर कुछ कमा-खा लूंगा। भ्रष्ट व्यवस्था के सहारे बेटियों की किसी अच्छे खासे भ्रष्ट और कमाऊ लड़कों से शादी व्याह करके अपना बोझ हलका कर लूंगा। लड़कों को भी किसी कायदे का धंधा पकड़ा दूंगा। अनाप-शनाप घूस-घास लेकर कुछ पैसा जमा कर लूंगा, ताकि बुढ़ापा चैन से कट सके। लेकिन इन खब्ती लोगों ने मेरे उन सपनों पर पानी फेर दिया। पता नहीं कैसे इन सबके दिमाग में भ्रष्टाचार विरोधी कीड़ा पैदा हो गया और लगे सबको गरियाने। देखते ही देखते देश के हातिमताई बन गए। इनके हातिमताईपने की आड़ में मैंने भी सोचा कि नफा उठा लूंगा। अब जीतने के बाद इनका सादगी भरा रवैया देखकर तो ऐसा लग रहा है कि छप्पन व्यंजन से भरी थाली में किसी ने एक मुट्ठी धूल डाल दी हो।
भगवान! आपसे मेरी यह करबद्ध प्रार्थना है कि इनकी मति ही फेर दो। इनके दिमाग में घुसे भ्रष्टाचार विरोधी कीड़े को किसी भी तरह मार दो, मरवा दो या फिर आप कहें, तो यमराज जी से कुछ निवेदन करूं। बस, इन सबके दिमाग में घुसा वह कीड़ा मरना चाहिए। ऐसा होते ही अपनी तो बल्ले-बल्ले हो जाएगी।’ इतना कहकर उस्ताद मुजरिम ने हनुमान जी के चरण स्पर्श किए और पूजागृह से बाहर आ गए। मैंने आगे बढ़कर उस्ताद के चरण स्पर्श करके आशीर्वाद ग्रहण किया और बिना कुछ कहे-सुने घर लौट आया।

Friday, January 3, 2014

तुम क्या करोगे..बाबा जी का ठुल्लू?

अशोक मिश्र 
चुनावी महासंग्राम चल रहा था। ‘राष्ट्रीय लूट-खसोट पार्टी’ के स्टार प्रचारक भकोसानंद अपनी पार्टी के पीएम पद के दावेदार गुनहगार की जनसभा को संबोधित कर रहे थे, ‘भाइयो और बहनो! आजादी के चालीस साल तक इस देश पर शासन करने वाली पार्टी कहती है कि उसने देश की जनता को मनरेगा दिया, सूचना का अधिकार दिया, फूड सिक्योरिटी बिल का तोहफा दिया। मैं कहता हूं, इस देश की जनता को तुमने क्या समझ रखा है, भिखारी? तुमने दिया और जनता ने ले लिया। चालीस साल तक जनता को लूटने वाली पार्टी कहती है कि उसने देश के गरीबों को तीन रुपये किलो चावल, दो रुपये किलो गेहूं और एक रुपये में मोटा अनाज दिया। भाइयो और बहनो!  इस देश का गरीब कोई गाय-बैल है क्या? जिस अनाज को गाय-बैल खाने से भी इंकार कर दें, उस अनाज को बांटकर गरीबों को गाय-बैल से भी बदतर बना दिया है। मेरे प्यारे भाइयो और बहनो! इसी देश में एक भगवा पार्टी है। उसने देखा कि उसके प्रतिद्वंद्वी सस्ता अनाज बांटकर बाजी मार ले जा रहे हैं, तो उस पार्टी की राज्य सरकारों ने गाय-बैलों का चारा गरीबों को खिलाने के नाम पर और सस्ता कर दिया। भगवा पार्टी की राज्य सरकारों ने गरीब जनता रूपी गाय-बैलों को एक रुपये में उनका चारा देने की घोषणा की है। भाइयो और बहनो! मैं इन दोनों पार्टियों से पूछना चाहता हूं कि उन्होंने देश की आम जनता को समझ क्या रखा है? वह इनकी भीख पर जिंदा रहेगी?’
इतना कहकर भकोसानंद जी ने रुमाल से अपना मुंह पोछा और फिर कहा, ‘मेरे प्यारे भाइयो और बहनो! आपने आजादी के 66-67 साल में कभी सांपनाथ को दिल्ली की कुर्सी पर बिठाया, तो कभी नागनाथ को। आप बस एक बार...सिर्फ एक बार हमारी ‘राष्ट्रीय लूट-खसोट पार्टी’ पर भरोसा करके देखिए, हमारी पार्टी के उम्मीदवार गुनहगार जी को प्रधानमंत्री बनाकर देखिए, इस देश में वह सब कुछ होगा, जो आप चाहते हैं। हमारी पार्टी का दावा है कि गाय-बैलों का चारा तीन रुपये या एक रुपये में क्यों? मुफ्त में क्यों नहीं बांटा जा सकता है। हमारी पार्टी की सरकार बनी, तो देश की सत्तर फीसदी आबादी को गेहूं, चावल, सब्जी, तेल ही नहीं, बल्कि खाना बनाने के लिए लकड़ी, उपले और गैस तक मुफ्त दिए जाएंगे। आप अपने घरों में जितनी भी चाहें बिजली-पानी खर्च कर सकते हैं। आप अगर नहाने धोने में बीस लीटर पानी खर्च करते हैं, तो आप म्लेच्छ हैं, आपको नहाने-धोने की आदत नहीं है। आप सौ लीटर पानी खर्च कीजिए, दो सौ लीटर खर्च कीजिए, आपसे इसका शुल्क  नहीं लिया जाएगा। आापके घरों में पानी बिल्कुल फ्री आएगा। आप कमरे में एक बल्ब जलाएं, हीटर जलाएं, गर्मी के दिनों में भी आप हीटर जलाकर अपना कच्छा-बनियान सुखाइए, सरकार को कोई परेशानी नहीं होगी। अगर आपके घर में कोई सरकारी आदमी बिल लेकर आता है, तो उसको पीटिए। हां, हत्या मत कीजिए। किसी सरकारी आदमी को ठोकने-पीटने का हक तो आपके पास है, लेकिन हत्या करने का नहीं। आपके घर रोज पुलिस वाला आकर पूछेगा, ‘भाई साहब! आपको  कोई दिक्कत तो नहीं है?’ ऐसी होगी पुलिस और पुलिसिया व्यवस्था। बस.. हमारी पार्टी की सरकार बनने दीजिए।’
इतना कहकर भकोसानंद जी थोड़ी देर के लिए रुके। फिर बोले, ‘आप चिंता मत कीजिए। अरष्टाचार-भ्रष्टाचार नहीं रुकने वाला इस देश से। हमारी पार्टी की सरकार आई, तो संसद और विधानसभाओं में विधेयक पारित करवाकर भ्रष्टाचार को कानूनी तौर पर मान्यता दिलाई जाएगी। अरे वह भी कोई देश है, जहां किसी तरह का भ्रष्टाचार न होता हो, लूट-खसोट न होती हो। भाइयो और बहनो! मैं आप सब लोगों से एक बात पूछना चाहता हूं। अगर पूरे देश में रामराज्य आ जाए, इस देश के सारे लोग सद्चरित्र, ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ हो जाएंगे। तो क्या अच्छा लगेगा? दुनिया एकदम बेरंग नहीं हो जाएगी? देश की सभी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियां भ्रष्टाचार मिटाने के नाम पर आपको पिछले छह-सात दशक से बेवकूफ बना रही हैं। हमारी पार्टी ‘राष्ट्रीय लूट-खसोट पार्टी’ खुलेआम घोषणा करती है कि इस देश का अगर विकास हो सकता है, तो सिर्फ और सिर्फ भ्रष्टाचार से। अगर आपके मोहल्ले की सड़क बननी है, तो भ्रष्ट अधिकारी कुछ ले-देकर दो हफ्ते में बनवा देगा। नहीं तो, बैठे रहिए दस-पांच साल तक ईमानदारी का राग अलापते। अपके मोहल्ले की सड़क बनाने के नाम पर एक तसला गिट्टी तक नहीं गिरेगी।’ तभी हाईस्कूल के एक छात्र ने भकोसानंद जी से पूछा, ‘नेता जी! मेरे मम्मी-पापा मुझे रोज पॉकेट मनी नहीं देते हैं। तो क्या आपकी सरकार छात्र-छात्राओं को पॉकेटमनी भी दिलाएगी?’ बीच में टोके जाने से खफा भकोसानंद जी ने गरजते हुए कहा, ‘जिसका भी यह बच्चा है, वह और ऐसे तमाम लोग एक बात अच्छी तरह से समझ लें। जब सब कुछ हमारी ही सरकार कर देगी, तो आप लोग क्या करेंगे..बाबा जी का ठुल्लू? अरे! जब लूटने की, खसोटने की, भ्रष्टाचार करने की पूरी छूट दे दी, तो अब गोदामों से माल लूटकर आपके घर भी पहुंचाया जाए क्या? अरे..इतनी मेहनत तो आप लोगों को करनी ही पडेÞगी?’ इतना कहकर भकोसानंद जी ने अपना भाषण खत्म किया और दूसरी सभा में शामिल होने चले गए।

Tuesday, December 24, 2013

घरेलू लोकपाल के शिकंजे में

अशोक मिश्र 
अपने दोस्तों के साथ मटरगश्ती करने के बाद रात नौ बजे घर पहुंचते ही दरवाजे पर से ही मैंने हांक लगाई, ‘अरे घरैतिन! यार जरा एक गिलास गुनगुना पानी दे जाना।’ एक ही हांक पर दौड़ी चली आने वाली घरैतिन की जब आवाज ही नहीं सुनाई दी, मैं चौंक गया। कमरे में जाकर देखा कि एक बड़ी-सी मेज के सामने रखी कुर्सी पर घरैतिन बैठी हुई हैं। उनके दाईं ओर बेटी एक काला कोट पहने बैठी हुई है। इकलौते पुत्र ने पुलिसिया बेंत (रूल) की ही तरह बेलन थाम रखा था। मेज पर कुछ कागज-पत्तर रखे हुए थे। मैंने हंसने का प्रयास करते हुए कहा, ‘यार! यह सब क्या है? किसी नाटक का रिहर्सल कर रहे हो तुम लोग?’ घरैतिन गंभीर आवाज में बोलीं, ‘मिस्टर अशोक! इस समय मैं ‘घरेलू लोकपाल’ के अध्यक्ष की भूमिका में हूं। वैसे तो अब तक इस घर में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री, गृहमंत्री और विदेश मंत्री की सारी शक्तियां मुझमें ही निहित रही हैं। आज से लोकपाल की भी समस्त शक्तियां मुझे हासिल हो गई हैं। मिस्टर मिश्रा! आप पर आर्थिक भ्रष्टाचार का आरोप लगाया गया है। आप पर आरोप है कि आप आपनी तनख्वाह का एक हिस्सा कहीं और खर्च कर रहे हैं। आपको इस आरोप के बारे में कुछ कहना हो, तो आप थोड़ी देर बाद चार्ज शीट पेश होने के बाद रख सकते हैं।’घरैतिन, बेटी और बेटे के तेवर बता रहे थे कि मामला गंभीर है। किसी ने या तो इनके कान भरे हैं या फिर ये कूढ़मगज लोग फालतू मुझ जैसे शरीफ व्यक्ति पर शक कर रहे हैं। मैं कुछ कहता कि इससे पहले घरैतिन एक बार फिर बोल पड़ीं, ‘मिस्टर मिश्रा! एक बात आपको बता दूं, बेटा इस समय सीबीआई की भूमिका में है। वही आपके खिलाफ लगाए गए आरोपों की सूची मुझे अभी थोड़ी देर में सौंपेगा। उसके बाद आप पर जो भी आरोप आयद होंगे, उन पर बेटी लोकपाल की ओर से  आपके से जिरह करेगी। जब तक घरेलू लोकपाल अस्तित्व में रहेगा, आप इस समयावधि में बेटे, बेटी और मुझ पर धौंस नहीं जमा सकेंगे। आपको प्यास या चाय की तलब लगने पर दस मिनट की छूट दी जाएगी, ताकि आप चाय बना सकें। अगर आप दूसरों को भी चाय, पानी या दूसरी खाने-पीने की वस्तुएं आॅफर करते हैं, तो वह उत्कोच (रिश्वत) नहीं माना जाएगा। दूसरी बात यह है कि लोकपाल की कार्रवाई के दौरान आपको सिर्फ लगाए गए आरोपों का जवाब देना है। संबंधों की दुहाई देकर आप बचने का प्रयास नहीं कर सकते हैं।’ इतना कहकर घरैतिन ने फुंकनी से मेज को तीन बार ठकठकाया और फिर बेटे को कार्रवाई आगे बढ़ाने का इशारा किया। मैंने झल्लाते हुए कहा, ‘अरे यार! तब तक मैं बैठ भी सकता हूं या नहीं। इसी तरह कब तक खड़ा रहूंगा।’ घरैतिन ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘जब तक आपके मामले का निस्तारण नहीं हो जाता आपको इस तरह काल्पनिक कठघरे में खड़ा रहना पड़ेगा। पांव दुखने पर घोड़े की तरह इधर-उधर झटकने की छूट आपको रहेगी।’
बेटे ने हाथ में पकड़े बेलन को अपनी बायीं हथेली पर धीरे-धीरे मारते हुए कहा, ‘पापा..ओह सॉरी! मिस्टर मिश्रा, आप पर आरोप है कि आप अपनी पूरी तनख्वाह घर पर नहीं देते हैं। पिछले तीन साल से आप एक निश्चित रकम ही घरेलू खर्च के लिए देते हैं। आपको यह मालूम होना चाहिए कि पिछले तीन साल में महंगाई कहां से कहां पहुंच गई है। लोकपाल को पक्का पता है कि आपकी तनख्वाह तीन साल में कम से कम बीस फीसदी बढ़ी है। ऐसे में यह रकम आप घर में जमा न करके किसी महिला/पुरुष पर खर्च करते रहे हैं।’ बेटे की बात सुनते ही मैं चीख पड़ा, ‘तुम सब लोग प्रकारांतर से मुझे चरित्रहीन साबित करना चाहते हो? मैं एक बात इस लोकपाल के समक्ष साफ कर दूं। मैं चरित्रहीन नहीं हूं। हां, ‘चरित्ररिक्त’हो सकता हूं।’ मेरी बात सुनते ही मेरे दायी ओर खड़ी बेटी जोर से चिल्लाई, ‘लोकपाल मैम! आरोपी शब्दजाल में फंसाकर हमें गुमराह करना चाहता है। यह हिंदी के कठिन शब्दों का उपयोग कर लोकपाल के शिकंजे से बचना चाहता है। आरोपी को यह आदेश दिया जाए कि वह पहले ‘चरित्ररिक्त’ शब्द की व्याख्या करे।’ मैंने लोकपाल बनी घरैतिन के सामने सिर झुकाते हुए कहा, ‘देखिए, चरित्रहीन शब्द का अर्थ है कि जो चरित्र से हीन हो, दूसरी स्त्रियों या पुरुषों से विवाहेत्तर संबंध रखता हो। किसी भी समाज में चरित्रहीन होना शर्मनाक है। घृणास्पद है, लेकिन ‘चरित्ररिक्त’ होने का तात्पर्य यह है कि ऐसा व्यक्ति जिसका कोई चरित्र ही न हो। न अच्छा, न बुरा। एकदम चरित्र से शून्य। इस देश की बहुसंख्यक आबादी चरित्ररिक्त है।
न अच्छी है, न बुरी। सिर्फ जिए जा रही है। पूछो क्यों, तो इसका कोई जवाब उसके पास नहीं है। जहां तक आर्थिक भ्रष्टाचार का सवाल है, मैं यह साबित कर सकता हूं कि पिछले तीन साल से मेरी तनख्वाह ही नहीं बढ़ी है। ऐसे में मैं क्या कर सकता हूं। अगर घरेलू लोकपाल मेरे संस्थान के मुखिया को तनख्वाह बढ़ाने का आदेश दे, तो संभव है कि इस आर्थिक तंगी का कोई नतीजा निकले। मैं अपनी बात तो साबित कर सकता हूं।’ इसके बाद मैंने घरैतिन को तीन साल की सैलरी स्लिप लाकर दी। कुछ देर तक उन्होंने उसका गहन अध्ययन किया और बोलीं, ‘आरोपी पर आर्थिक भ्रष्टाचार का आरोप साबित नहीं हुआ। इसलिए मुन्नू के पापा को बाइज्जत बरी किया जाता है।’ यह सुनने के बाद मैंने इस भयंकर ठंडक में भी   माथे पर चुहचुहा आए पसीने को पोंछते हुए सोचा, ‘जब घरेलू लोकपाल इतना खतरनाक है, तो फिर वास्तविक लोकपाल कैसा होगा? खुदा बचाए ऐसे लोकपाल से।’