Wednesday, September 9, 2026

अहिंसक बन गया दस्यु अंगुलिमाल

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

बौद्ध ग्रंथ मज्झिम निकाय 86 में एक कथा कही गई है। कहते हैं कि श्रावस्ती (सावत्थी) में एक प्रतिष्ठित परिवार रहता था। उसका एक मात्र पुत्र था अहिंसक। अहिंसक के बचपन में ही किसी ने भविष्यवाणी की थी कि वह बड़ा होकर दुर्दांत दस्यु बनेगा। पुत्र दस्यु न बने, यही सोचकर उसकी मां ने नाम रखा था अहिंसक। 

समय आने पर उसके माता-पिता ने अपने पुत्र को पढ़ने के लिए तक्षशिला भेजा। वहां पहुंचने पर जब अहिंसक की शिक्षा प्रारंभ हुई, तो वह पढ़ने-लिखने में अपने सहपाठियों से कहीं ज्यादा आगे निकल गया। इसे कुछ विद्यार्थियों को उससे बड़ी ईर्ष्या हुई। उन्होंने कई ग्रुप बनाकर एक आलसी छात्र निंगा के नेतृत्व में आचार्य से अहिंसक की शिकायत की। पहले तो आचार्य ने छात्रों की बात पर ध्यान नहीं दिया क्योंकि वह अहिंसक की तीक्ष्ण बुद्धि और प्रतिभा के कायल थे। 


लेकिन जब उसकी बार-बार शिकायत आने लगी तो वह अहिंसक से नाराज हो उठे। उन्होंने जब शिक्षा पूर्ण होने वाली थी, तो उससे एक हजार लोगों की अंगुलियों को गुरु दक्षिणा में मांगी। अहिंसक ने इसका विरोध किया, लेकिन आचार्य नहीं माने। वह गुरु दक्षिणा पूर्ति के लिए दुर्दांत डाकू बन गया। बौद्ध ग्रंथों से इतर यह भी कहा जाता है कि आचार्य पत्नी अहिंसक के रूप-सौंदर्य के प्रति आकर्षित थीं और प्रणय निवेदन अस्वीकार करने की वजह से उन्होंने अपने पति को उकसाकर ऐसी गुरु दक्षिणा मांगने पर विवश किया था। इस तरह एक निर्दोष युवक अंगुलिमाल दस्यु बन गया।

वहीं कुछ ग्रंथों में यह भी कहा गया है कि तक्षशिला के छात्रों ने अहिंसक और गुरु पत्नी में अवैध संबंधों का आरोप लगाया था जिसकी वजह से आचार्य ने ईर्ष्यावश अहिंसक को दस्यु बनने के लिए मजबूर कर दिया था।

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