अशोक मिश्र
दिल्ली एनसीआर में वायु प्रदूषण रोकने के लिए जारी दिशा निर्देश का पालन न करने पर वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग ने हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की कार्यप्रणाली पर नाराजगी जाहिर की है। सीएक्यूएम ने इस संबंध में जवाब मांगा है। हरियाणा के जिलों में प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। वायु स्वच्छ न होने की वजह से लोगों की सांसें घुटती जा रही हैं। कई प्रकार की बीमारियों से लोग पीड़ित हो रहे हैं। वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग यानी सीएक्यूएम का हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की कार्यप्रणाली पर नाराजगी जताना और जवाब तलब करना कोई नई बात नहीं है। यह उस पुरानी और सड़ी हुई व्यवस्था का एक और प्रमाण है जहाँ दिशा निर्देश केवल कागजों पर जारी होते हैं और जमीन पर धूल बनकर उड़ जाते हैं।ग्रेड रिस्पांस एक्शन प्लान लागू होता है, बैठकें होती हैं, चेतावनियां दी जाती हैं, लेकिन फरीदाबाद, गुरुग्राम, पानीपत, सोनीपत और बहादुरगढ़ में एक्यूआई मीटर चार सौ पार कर जाता है तो सवाल सिर्फ हवा का नहीं रह जाता, सवाल पूरी प्रशासन प्रणाली की नीयत का बन जाता है। फैक्ट्रियों से निकलने वाले धुएं पर कैमरे लगे हैं पर कैमरे बंद हैं, ईंट भट्ठों को जिगजैग तकनीक पर लाने का आदेश है पर रिश्वत देकर पुराने भट्ठे ही चल रहे हैं, कंस्ट्रक्शन साइट पर पानी का छिड़काव अनिवार्य है पर बिल्डर पानी की टंकी ही गायब कर देते हैं।
यह लापरवाही नहीं, यह मिलीभगत है। सरकार को राजस्व चाहिए, उद्यमी को मुनाफा चाहिए और बीच में बोर्ड एक कमजोर मध्यस्थ बनकर रह गया है जो केवल नोटिस भेजता है और फाइल बंद कर देता है। हरियाणा के कई जिलों में वायु गुणवत्ता लगातार बिगड़ रही है और लोग सांस लेने के लिए जूझ रहे हैं। बच्चे, बुजुर्ग और श्वसन रोगियों की तकलीफ बढ़ रही है, जबकि जिम्मेदार एजेंसियां कागजी कार्रवाई में उलझी नजर आती हैं। राज्य के लोग भी पूरी तरह निर्दोष नहीं हैं।
निजी वाहनों का अत्यधिक उपयोग, कचरा जलाना, खुले में कूड़ा फेंकना और जागरूकता की कमी प्रदूषण में योगदान देती है। जब नागरिक स्वयं नियमों का उल्लंघन करते हैं तो व्यवस्था पर सवाल उठाना एकतरफा हो जाता है। उद्योगों को स्वच्छ ईंधन अपनाने, उत्सर्जन मानकों का पालन करने और आॅनलाइन निगरानी प्रणाली से जोड़ने के लिए समयबद्ध दबाव डालना होगा। सड़कों पर धूल नियंत्रण, मैकेनाइज्ड स्वीपिंग, कचरा प्रबंधन और पराली जलाने पर प्रभावी रोक को मजबूत करना चाहिए।
वायु प्रदूषण कोई प्राकृतिक आपदा नहीं है, यह एक प्रबंधित आपदा है। इसका भुगतान आज दमा के मरीज, स्कूल जाते बच्चे और खेत में काम करने वाले मजदूर अपने फेफड़ों से कर रहे हैं। जब तक सरकार निर्देश जारी करने को ही काम मानती रहेगी, उद्यमी अनुपालन को खर्चा समझता रहेगा और नागरिक को केवल दोषी ठहराया जाता रहेगा, तब तक हर सर्दी में वही घुटन लौटेगी। हवा को साफ करने के लिए पहले नीयत को साफ करना पड़ेगा।
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