Sunday, March 22, 2026

नया शैक्षणिक सत्र शुरू होने से पहले ही चिंता में डूबे अभिभावक


अशोक मिश्र

हरियाणा में इन दिनों परीक्षाएं चल रही हैं। बच्चे अपनी पूरी तैयारी के साथ परीक्षा दे रहे हैं। कुछ कक्षाओं की परीक्षाएं संपन्न हो चुकी हैं। सबका यही प्रयास है कि वह इन परीक्षाओं में अधिक से अधिक मार्क्स हासिल करें। कुछ ही दिनों बाद ज्यादातर बच्चे अगली कक्षा में प्रवेश लेंगे, लेकिन उनके माता-पिता नई कक्षाओं में भर्ती कराने में खर्च होने वाली रकम को लेकर अभी से चिंतित हो उठे हैं। 

नई किताबें, कापियों का खर्चा तो उन्हें झेलना ही है, फीस भी नई कक्षा में बढ़ाकर देनी होगी। एक सामान्य से अंग्रेजी मीडियम स्कूल में बच्चे का प्राइमरी में एडमिशन कराने के लिए कम से कम पंद्रह-बीस हजार रुपये खर्च हो ही जाते हैं। यदि एक से अधिक बच्चे हुए, तो यह बोझ दोगुना हो जाता है। हरियाणा के कई जिलों में शैक्षणिक सत्र शुरू होने से पहले ही ड्रेस बदलने की घोषणा कर दी गई है। 

ऐसे में पुरानी ड्रेस अब किसी काम की नहीं रह गई है। लोगों का तो यहां तक कहना है कि कुछ स्कूल तो हर साल अपनी ड्रेस बदल देते हैं। इन स्कूलों का एक ड्रेस से काम नहीं चलता है। शुक्रवार-शनिवार के लिए अलग ड्रेस, बाकी दिनों के लिए अलग ड्रेस, जिस दिन पीटी यानी शारीरिक शिक्षा का क्लास लगेगा, उस दिन की अलग ड्रेस तय की जाती है। इस तरह बच्चों को अपने स्कूल की कई यूनिफार्म खरीदनी पड़ती है। एक ड्रेस पर सामान्य तौर पर एक हजार रुपये का खर्च आ ही जाता है। 

उस पर कपड़े के दामों में पच्चीस-तीस प्रतिशत बढ़ोतरी हो जाने की खबर है। ऐसी स्थिति में अपने बच्चों के लिए नई ड्रेस खरीदना अभिभावकों के लिए आर्थिक संकट पैदा करने वाला साबित होता है। इतना ही नहीं, गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस और खेल गतिविधियों के लिए स्कूल वाले अलग से ड्रेस दिलवाते हैं। कई स्कूल तो अपने यहां से इन ड्रेसों को खरीदने के लिए माता-पिता को बाध्य करते हैं। एक मामूली सी टीशर्ट के लिए भी ढाई-तीन सौ रुपये वसूले जाते हैं। इन स्कूलों की ऐसी दशा देखकर यही आभास होता है कि यह स्कूल विद्या के मंदिर नहीं, बल्कि मुनाफा कमाने की दुकानें बनकर रह गई हैं। 

यह तो हुई ड्रेस की बात। सिलेबस हर साल बदल दिया जाता है। कई बार तो किसी विषय की किताब में एक या दो चैप्टर बदल दिया जाता है और बच्चों से कहा जाता है कि नई किताब लेना अनिवार्य है। यदि सिलेबस नहीं बदला होता, तो बच्चे पुरानी किताब से पढ़ लेते। ऐसी स्थिति में स्कूल और पुस्तक विक्रेताओं को नुकसान होता। इसी लिए हर साल सिलेबस बदल दिया जाता है ताकि माता-पिता नई किताब खरीदने पर मजबूर हो जाएं। स्कूल वाले या तो नई पुस्तकों  से लेकर कापी, पेंसिल, बैग आदि खुद बेचते हैं या फिर वह ज्यादा कमीशन देने वाले पुस्तक विक्रेता से ही किताब-कापियां लेने को बाध्य करते हैं। निजी स्कूल तो अभिभावकों के लिए शोषण के अड्डे बनकर रह गए हैं।

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