बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
बुरा कर्म करने वाले को यदि अपराध बोध से मुक्ति पानी है, तो उसे अपने बुरे कर्म के लिए प्रायश्चित करना होता है। प्रायश्चित ही उसके मन निर्मल बना सकती है। जिस व्यक्ति के लिए उसका कर्म नुकसानदायक साबित हुआ है, उससे क्षमा मांगने से पाप का प्रायश्चित हो जाता है।बुरे कामों के लिए किसी से क्षमा मांगना और अपने पापों का प्रायश्चित करना वही व्यक्ति कर सकता है जिसे अपने पापों का ज्ञान हो गया हो। एक बार की बात है। एक संत किसी जगह प्रवचन कर रहे थे। उनका प्रवचन सुनने के लिए भारी भीड़ जुटी हुई थी।
संत की मधुर वाणी में ज्ञान का अजस्र प्रवाह हो रहा था। वह कह रहे थे कि यदि किसी व्यक्ति से अनजाने में कोई गलती हो जाए, पाप हो जाए, तो उसे आभास नहीं होता है। ऐसी स्थिति में हर व्यक्ति को जाने-अनजाने हुए पाप या बुरे कर्म के लिए प्रायश्चित करना चाहिए। इतना ही नहीं, भविष्य में कोई बुरा कर्म या पाप न हो जाए, इसके लिए संकल्प लेना चाहिए।
वहां मौजूद लोग मौन होकर संत का प्रवचन सुन रहे थे। प्रवचन खत्म हुआ तो सारे लोग चले गए, लेकिन एक व्यक्ति वहां मौजूद रहा। जब सब चले गए तो उसने संत से कहा कि महाराज! मेरे मन में एक जिज्ञासा है। प्रायश्चित करने से पापों से कैसे छुटकारा पाया जा सकता है।
संत ने कहा कि आप कल आइएगा, मैं समझाऊंगा। दूसरे दिन उस व्यक्ति को लेकर संत नदी किनारे पहुंचे। वहां एक गड्ढे में पानी सड़ गया था, कीड़े पड़ गए थे। संत ने पूछा कि यह पानी क्यों सड़ गया? उस व्यक्ति ने कहा कि प्रवाह न होने से पानी सड़ गया। संत ने कहा कि ऐसे ही सड़े हुए पानी की तरह पाप होते हैं जिन्हें प्रायश्चित का पानी सड़े हुए पानी को बहा देता है।

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