अशोक मिश्र
अरावली का प्राकृतिक पारिस्थितिक संतुलन खतरे में है। इसका कारण अरावली क्षेत्र में बड़ी संख्या में उगने वाली विलायती कीकर को माना जा रहा है। विलायती कीकर ने पूरे अरावली क्षेत्र में देसी प्रजाति के पौधों खेजड़ी, करीर और ढाक जैसे पौधों को पनपने और विकसित होने से रोक दिया है। देसी प्रजाति के पौधे धीरे-धीरे अरावली क्षेत्र से गायब होते जा रहे हैं। इसका प्रभाव वन्यजीवों पर भी दिखाई देने लगा है।जो वन्यजीव देसी प्रजाति के पेड़-पौधों पर निर्भर रहते हैं, उन्हें पर्याप्त भोजन नहीं मिल रहा है जिसकी वजह से कई बार वह भोजन की खोज में अपने निवास क्षेत्र से निकलकर मानव बस्तियों में पहुंच जा रहे हैं। अरावली क्षेत्र में विलायती कीकर के लगातार फैलने का कारण पूर्व सरकारों का गलत फैसला था। हरियाणा में सन 1990 से लेकर 1999 तक इन दस वर्षों में अरावली पहाड़ियों और उसके आसपास के क्षेत्र में हेलिकाप्टर से जगह-जगह विलायती कीकर यानी बबूल के बीज गिराए गए थे।
नतीजा यह हुआ कि अरावली क्षेत्र की अधिकतर जमीनों पर विलायती कीकर उग आए। इन विलायती बबूलों ने अपना कुनबा बढ़ाना जब शुरू किया, तो स्थानीय वनस्पतियां सिकुड़ने लगीं। यह विलायती कीकर राजस्थान की ओर से आने वाली धूल भरी आंधियों को रोकने में नाकामयाब रहे। पहले से रोपे गए या अपने आप उगी स्थानीय वनस्पतियां पहले एक सीमा के बाद धूल को आगे बढ़ने से रोक देती थीं। इससेहरियाणा, दिल्ली और गुजरात के कुछ क्षेत्र रेगिस्तान बनने से बचे रहे। अब राजस्थान से उठने वाले धूल के बवंडर हरियाणा और दिल्ली तक पहुंचने लगे हैं। यदि राजस्थान से आने वाली धूल को रोका नहीं गया, तो दिल्ली और हरियाणा की हरी-भरी जमीनें रेगिस्तान में बदल जाएंगी।
ऐसी आशंका पर्यावरणविद व्यक्त करने लगे हैं। लेकिन विलायती बबूल ने सारे इकोसिस्टम को बिगाड़कर रख दिया। पर्यावरण को शुद्ध रखने में सक्षम स्थानीय वनस्पतियां अब तो नब्बे फीसदी कम हो गई हैं। सन 2000 से 2004 के बीच अरावली क्षेत्र में अवैध खनन भी बहुत हुए। खनन और वन माफियाओं ने पूरे अरावली क्षेत्र को बरबाद करके रख दिया। वैसे यह बात सही है कि पिछले कुछ वर्षों में अरावली क्षेत्र में वन क्षेत्र का दायरा बढ़ा है।
वन विभाग का सर्वे बताता है कि वर्ष 2025 में वन क्षेत्र 6948.44 हेक्टेयर से बढ़कर 7530.23 हेक्टेयर हो गया है। इस विस्तार का श्रेय बड़े पैमाने पर अरावली क्षेत्र में किए गए पौधरोपण को जाता है। लेकिन इस पौधरोपण का फायदा तब मिलेगा, जब पूरे अरावली क्षेत्र से विलायती कीकर की बढ़त को रोक दिया जाए। विलायती कीकर की बढ़त को लेकर जिला वन अधिकारी भी चिंतित हैं। उनका कहना है कि अरावली क्षेत्र से विलायती कीकर को नियंत्रित करना हमारी प्राथमिकता है।

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