Sunday, March 22, 2026

सोने की मुहर ले लो, बस आटा मत छीनना

प्रतीकात्मक चित्र
बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

संकट काल में सबसे बड़ा साथी व्यक्ति का धैर्य होता है। यदि धैर्यपूर्वक संकट का मुकाबला किया जाए, तो संकट से छुटकारा अवश्य मिलता है। यही वजह है कि महापुरुष और विद्वान लोग संकट के समय में घबराते नहीं हैं। वह बड़े धैर्य और साहस के साथ संकट का सामना करते हैं और अंतत: अपना मार्ग प्रशस्त करते हैं। एक बार की बात है। एक गांव में भिक्षुक रहता था। 

वह दिन भर गांव-गांव घूमकर भिक्षा मांगता था। जो कुछ मिल जाता था, उसी से अपने परिवार का पालन-पोषण करता था। एक दिन वह भिक्षा मांगने के लिए पास के शहर में चला गया। संयोग से वह एक समृद्ध व्यापारी के घर पर भिक्षा मांगने पहुंच गया। उस समय व्यापारी बहुत खुश था क्योंकि कई साल बाद उसके यहां बेटा पैदा हुआ था। दरवाजे पर उसे भिक्षुक दिखाई पड़ा, तो उसने बड़े आदर के साथ भिक्षुक को अंदर बुलाया और उसे एक सोने की मुहर दान दी। 

भिक्षुक ने व्यापारी से प्रसन्नता का कारण पूछा, तो उसने कहा कि कई वर्ष के बाद उसके यहां संतान जन्मी है। मैं अत्यंत खुश हूं। भिक्षुक ने उस बच्चे को ढेर सारा आशीर्वाद दिया। उसने दूसरे घरों में भी भिक्षा मांगी। कहीं आटा मिला, तो कहीं चावल। 

कहीं दूसरी वस्तु। जब वह भिक्षा मांगकर वापस लौट रहा था तो रास्ते में जंगल पड़ा। उसने मुहर आटे की थैली में छिपा ली। संयोग से उसी समय डाकुओं ने उसे घेर लिया और कहा कि जो कुछ भी है, वह दे दो। भिक्षुक ने सोने की मुहर देते हुए कहा कि बस, मेरा यह आटा मत छीनना। डाकुओं ने पूछा क्यों? तब भिक्षुक ने कहा कि यह आटा चमत्कारी है। रोज एक सोने की मुहर पैदा करता है। डाकुओं ने मुहर फेंक दी और आटा छीन लिया। और वहां से चले गए। अपने धैर्य और चतुराई से भिक्षुक ने सोने की मुहर बचा ली।

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