अशोक मिश्ररिश्ते नातों की डोर धीरे-धीरे कमजोर होती जा रही है। हम भाई-बहन, माता-पिता, मामा-मामी, चाचा-चाची जैसे रिश्तों को भूलते जा रहे हैं। जिस आंगन में बचपन बीता, अच्छे-बुरे दिन देखे, सहे और उससे उबर कर जीवन की पगडंडी पर आगे बढ़े। उसी आंगन के किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाए और भाई, बहन या अन्य निकट संबंधी दाह संस्कार तक रुकने से इनकार कर दें, तो इन रिश्तों की निरर्थकता समझ में आ जाती है। कुरुक्षेत्र के पिहोवा में सरस्वती तीर्थ के पास पिछले दस साल से अकेला जीवन गुजार रहे 71 वर्षीय जुगल किशोर की 4 सितंबर को मौत हो गई।
दिल्ली के उत्तम नगर का रहने वाला यह अविवाहित वृद्ध बीमार पड़ा तो बाबा फरीद अनाथ आश्रम ने उसे अस्पताल पहुंचाया। अंतिम सांस लेने के बाद इकलौती बहन पुष्पा रानी अस्पताल पहुंचीं। भाई का शव देखा, फिर हाथ जोड़कर बोलीं—मेरे पास टाइम नहीं है, तबीयत खराब है, तुसी ही संस्कार कर दो, अस्थियां भी तुसी ले जाओ। और वह चली गईं। पुष्पा रानी उसी आंगन की बेटी हैं जिसने राखी पर रोना और भैया दूज पर भाई की लंबी उम्र की दुआएं करना सीखा था। फिर ऐसा क्या बदला कि वही आंखें जो भाई की एक खरोंच पर बरस पड़ती थीं, आज अंतिम विदाई पर भी सूखी रह गईं?
यह सवाल नहीं बल्कि उस समाज के मुंह पर एक करारा तमाचा है जो बात-बात में संस्कारों की दुहाई देता है। ऐसी घटनाओं के पीछे गहरी सांस्कृतिक और मानसिक सड़ांध भी है। व्यक्तिगत स्वार्थ, सुविधा का मोह और ‘मैं’ की संस्कृति ने ‘हम’ को पीछे धकेल दिया। मृत्यु के समय भी समय निकालना कठिन लगने लगा है। कुछ महीने पहले सोनीपत में बच्चों ने पिता के अंतिम संस्कार में हिस्सा नहीं लिया। करनाल में एक बहन की मौत पर भाई ने फोन पर कहा—अंतिम संस्कार कर देना, मैं नहीं आ सकता और मोबाइल बंद कर दिया।
रोहतक में पिता के शव को लेकर भाई-बहन झगड़ पड़े। ये अलग-अलग घटनाएं नहीं, एक पैटर्न हैं। इनसे पता चलता है कि रिश्ते मर रहे हैं। यदि ऐसा ही चलता रहा, तो आने वाली पीढ़ियां रिश्तों से विश्वास ही खो देंगी। मौत के समय कोई नहीं आएगा, बीमार पड़ने पर कोई नहीं पूछेगा। जीवन अकेला और ठंडा हो जाएगा। जुगल किशोर तो अपना जीवन पूरा करके चले गए, पर उनकी बहन एक दिन जरूर पछताएगी।
जब रात में अकेले में बचपन की कोई याद कौंधेगी। जब राखी का वो धागा याद आएगा जो कभी भाई की कलाई पर बांधा था। पछतावे से बेहतर है, समय रहते संभल जाना। रिश्ते बोझ नहीं हैं, रिश्ते ही तो वो छत हैं जो तेज धूप में हमें जलने से बचाते हैं। अगर ये छत ही गिर गई, तो हम सब खुले आसमान के नीचे अकेले खड़े रह जाएंगे, सफल, व्यस्त, पर बिल्कुल अकेले। आइए, इस टूटती डोर को फिर से बुनें, एक फोन कॉल से, एक गले लगने से, एक माफी से।
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