Sunday, November 1, 2026

देश में तेजी से घोर गरीबी घटाने में एनएफएसए की बहुत बड़ी भूमिका


अशोक मिश्र

विश्व बैंक की अक्टूबर 2026 की ‘इंडिया पॉवर्टी एंड इक्विटी ब्रीफ’ रिपोर्ट बताती है कि भारत में अत्यधिक गरीबी की दर 2011 से 27.1 प्रतिशत थी, वह अब घटकर 2023 में 2.7 प्रतिशत रह गई है। इसके अनुसार 49.6 करोड़ लोग गरीबी की सीमारेखा से बाहर आए। रिपोर्ट इसे दुनिया में सबसे तेज गरीबी कमी की दरों में से एक बताती है। 2023 में अत्यधिक गरीबी रेखा से नीचे लगभग 7.5 करोड़ और 4.20 डॉलर वाली रेखा से नीचे लगभग 34 करोड़ लोग रह गए थे। बहुआयामी गरीबी (शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास आदि को मिलाकर) भी घटी है। यह कमी मुख्य रूप से घरेलू खपत में मजबूत वृद्धि, रोजगार में बढ़ोतरी (विशेषकर ग्रामीण महिलाओं के बीच) और खाद्य सब्सिडी सहित सामाजिक हस्तांतरणों के विस्तार से जुड़ी बताई गई है। 

2017 से 2023 के बीच रोजगार में लगभग 13.4 करोड़ लोगों की वृद्धि हुई, जो कार्यशील आयु वर्ग की वृद्धि से लगभग दोगुनी थी। ग्रामीण क्षेत्रों में प्रगति तेज रही, जिससे ग्रामीण-शहरी अंतर कुछ कम हुआ। रिपोर्ट भविष्य में भी गरीबी कम होने का अनुमान लगाती है। वास्तविक स्थिति में प्रगति तो हुई है, लेकिन चुनौतियां बाकी हैं। 2023 में ग्रामीण गरीबी (4.20 डॉलर रेखा पर) 19.3 प्रतिशत थी जबकि शहरी 8.6 प्रतिशत। गरीबी उत्तर प्रदेश से पश्चिम बंगाल तक के क्षेत्र में केंद्रित हो गई है, जहां देश के लगभग 57 प्रतिशत गरीब रहते हैं। वेतन असमानता बनी हुई है—शीर्ष 10 प्रतिशत श्रमिकों की औसत कमाई निचले 10 प्रतिशत से लगभग 13 गुना अधिक थी। 

वास्तविक कमाई में खास बढ़ोतरी नहीं हुई और रोजगार वृद्धि अपेक्षाकृत कम उत्पादकता वाले क्षेत्रों में केंद्रित रही। युवा बेरोजगारी में हालिया बढ़ोतरी (खासकर ग्रामीण युवा महिलाओं में) भी दर्ज की गई। गरीबी अब कम शिक्षा, कम संपत्ति, अस्थिर रोजगार और ज्यादा आश्रितों वाले परिवारों में ज्यादा केंद्रित हो गई है। उच्चतर गरीबी रेखा (8.30 डॉलर प्रतिदिन) पर अभी भी बड़ी आबादी नीचे है। इस रिपोर्ट के बाद एक सवाल यह भी उठता है कि जब लगभग 50 करोड़ लोग गरीबी की सीमारेखा से बाहर हो गए हैं, तो फिर केंद्र सरकार देश के अस्सी करोड़ लोगों को प्रतिमाह पांच किलो मुफ्त राशन क्यों दे रही है? 

इस बात को ऐसे समझा जा सकता है कि 80 करोड़ को मुफ्त राशन का आंकड़ा राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून, एनएफएसए से आता है। प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना मूलत: मार्च 2020 में कोविड के दौरान शुरू हुई थी, ताकि एनएफएसए के तहत कवर लगभग 80 करोड़ लाभार्थियों को प्रति व्यक्ति पांच किलो अनाज मुफ्त में अतिरिक्त दिया जा सके। बाद में सरकार ने इसे ही जारी रखते हुए एक साल तक सभी एनएफएसए लाभार्थियों को अनाज मुफ्त देने का फैसला किया। यह 80 करोड़ कोई नई गरीबी गणना नहीं है, यह 2011 की जनगणना और उसके आधार पर बने राज्यों के कवरेज अनुपात का कानूनी हक है। इसमें अंत्योदय परिवार और प्राथमिकता वाले परिवार दोनों आते हैं। इनमें बहुत से लोग ऐसे हैं जो विश्व बैंक की 3 डॉलर या 4.20 डॉलर की रेखा से ऊपर आ चुके हैं, पर भारत की जीवन-यापन लागत, अनियमित रोजगार और स्वास्थ्य-शिक्षा के एक झटके में फिर से नीचे गिरने के जोखिम में हैं।  विश्व बैंक खुद अपनी रिपोर्ट में इस प्रगति का श्रेय बढ़े हुए उपभोग, महिला रोजगार और विस्तारित सामाजिक ट्रांसफर को देता है। यानी मुफ्त राशन गरीबी घटने के बावजूद जारी रहने वाली योजना नहीं, बल्कि गरीबी घटने का एक कारण भी है। 

राशन मिलने से परिवार की भोजन पर होने वाली नकद खर्च बचता है। उसी पैसे से वह शिक्षा, दवा या बेहतर भोजन पर खर्च कर पाता है और उपभोग सर्वेक्षण में वह गरीबी रेखा से ऊपर दिखता है। अगर कल राशन बंद हो जाए तो बहुत सारे परिवारों का वही उपभोग फिर से नीचे आ जाएगा, इसलिए इसे सुरक्षा कवच की तरह देखा जाता है, गरीबी प्रमाणपत्र की तरह नहीं। यहाँ एक और बारीक बात है। भारत में गरीबी केवल आय से नहीं, पोषण सुरक्षा से भी देखी जाती है। 4.20 डॉलर की रेखा पार करने का मतलब यह नहीं कि परिवार रोज संतुलित आहार ले पा रहा है। कुपोषण, एनीमिया, बच्चों में ठिगनापन जैसे संकेत बताते हैं कि अनाज की न्यूनतम उपलब्धता अभी राज्य की जिम्मेदारी है। सरकार के लिए 80 करोड़ को पांच किलो अनाज देना भूख के खिलाफ बीमा है, जबकि विश्व बैंक का आंकड़ा उपभोग के आधार पर आर्थिक गतिशीलता का संकेतक है। 

दोनों के पैमाने अलग हैं। गरीबी से बाहर आना एक निरंतर प्रक्रिया है, जिसमें फिसलन बहुत है। एनएफएसए का दायरा जानबूझकर व्यापक रखा गया है ताकि जो अभी-अभी गरीबी रेखा पार किया है, वह किसी संकट में फिर से उसी में न गिर जाए। विरोधाभास तब बनता है जब हम दोनों आंकड़ों को एक ही तराजू पर तोलते हैं। सच यह है कि एक आंकड़ा बताता है कि सीढ़ी चढ़ी गई है, दूसरा बताता है कि सीढ़ी के नीचे जाल अभी भी लगा हुआ है। पिछले बारह सालों में 50 करोड़ लोगों का गरीबी के दायरे से बाहर आना, वाकई एक उपलब्धि है।


Saturday, October 31, 2026

नैरेटिव बदल पाएगी एक नवंबर को प्रस्तावित इंडिया गठबंधन की रैली?


अशोक मिश्र

इंडिया गठबंधन ने आज ‘सड़क पर संसद’ का आयोजन बरसात की वजह से टाल दिया है। सड़क पर संसद का आयोजन अब 31 अक्टूबर को होगा। एक नवंबर को रामलीला मैदान में इंडिया गठबंधन की रैली प्रस्तावित है। रैली में लगभग दस लाख लोगों के आने का दावा किया जा रहा है। एक नवंबर को प्रस्तावित रैली को लेकर जनमानस में अब यह सवाल उठने लगा है कि क्या प्रस्तावित रैली से देश में सत्ता परिवर्तन हो सकेगा? क्या रैलियां करके या सड़क पर संसद का आयोजन करके लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है? कुछ इसी तरह का सवाल भारतीय लोकतंत्र में हर बड़े आंदोलन के साथ उठता है। 

रैली समर्थकों का तर्क है कि जब संसद के भीतर विपक्ष की आवाज को पर्याप्त जगह नहीं मिलती, कार्यवाही बार-बार बाधित होती है या स्थगित कर दी जाती है, तो सड़क ही एकमात्र मंच बचता है जहां जनता से सीधा संवाद किया जा सके। रैली सिर्फ शक्ति प्रदर्शन नहीं है, वह नैरेटिव बनाने का औजार है। सड़क पर उतरने से कार्यकर्ताओं में ऊर्जा आती है। मीडिया का ध्यान खिंचता है। सरकार पर नैतिक दबाव बनता है कि वह उठाए गए मुद्दों पर जवाब दे। इतिहास में भी कई बार देखा गया है कि संसद में अटके मुद्दों ने सड़क के दबाव से ही गति पकड़ी है, चाहे वह भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन रहा हो या किसान आंदोलन। इस लिहाज से विपक्ष का सड़क पर उतरना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का ही विस्तार है, उसका उल्लंघन नहीं। रैलियाँ जनसमर्थन जुटाने, मुद्दों को उजागर करने और राजनीतिक नैरेटिव बदलने का मजबूत माध्यम साबित होती हैं, लेकिन वे सीधे सत्ता नहीं बदलतीं। सत्ता का असली आधार चुनाव होते हैं जहाँ मतदाता फैसला करते हैं। 

रैलियाँ जनभावना को आकार दे सकती हैं, विपक्ष को एकजुट कर सकती हैं, लेकिन सरकार नहीं बदल सकती हैं। ऐतिहासिक उदाहरणों में जेपी आंदोलन ने आपातकाल के बाद राजनीतिक माहौल बदला, अन्ना हजारे के आंदोलन ने भ्रष्टाचार विरोधी माहौल बनाया और किसान आंदोलन ने कृषि कानूनों को वापस लेने पर मजबूर किया। इससे विपक्ष की विश्वसनीयता बढ़ती है और सत्ता पक्ष को जवाबदेही का सामना करना पड़ता है। दूसरी ओर रैलियों की सीमाएं साफ हैं। वे अस्थायी शोर मचा सकती हैं लेकिन बिना संगठित चुनावी रणनीति और जमीनी स्तर पर काम के असर नहीं डालतीं। भीड़ जुटाना महंगा और चुनौतीपूर्ण होता है। अगर भागीदारी कम रहे या हिंसा हो जाए तो उल्टा असर पड़ता है। सत्ता पक्ष इसे अराजकता बताकर अपनी स्थिति मजबूत कर लेता है। व्यापारियों की शिकायतें, ट्रैफिक जाम या पुलिस कार्रवाई नकारात्मक छवि बना सकती है। 

भारत में संवैधानिक संस्थाओं को हटाने या बदलने की एक तय प्रक्रिया है। एसआईआर यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन हो या मतदाता सूची से जुड़ा कोई भी मुद्दा, वह चुनाव आयोग के प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र में आता है। चुनाव आयोग एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है। मुख्य चुनाव आयुक्त यानी सीईसी को हटाने का प्रावधान भी बहुत स्पष्ट और कठिन रखा गया है। अनुच्छेद 324 और संबंधित कानूनों के तहत सीईसी को उसी तरह और उतनी ही कठिन प्रक्रिया से हटाया जा सकता है जैसे सुप्रीम कोर्ट के जज को, यानी संसद के दोनों सदनों में सिद्ध कदाचार या असमर्थता के आधार पर विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित होना जरूरी है। सिर्फ रैलियां करके, नारेबाजी करके या सड़क पर सांकेतिक संसद लगाकर इस संवैधानिक सुरक्षा कवच को भेदना कानूनी रूप से संभव नहीं है। सरकारें भी इस बात को जानती हैं, इसलिए सड़क के दबाव को वे अक्सर राजनीतिक शोर मानकर अनदेखा कर देती हैं। अक्टूबर 2026 के अंत में कांग्रेस और इंडिया गठबंधन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ वोट चोरी और मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन के आरोपों पर अभियान चला रहे हैं। मांगें मुख्य रूप से सीईसी का इस्तीफा, एसआईआर पर रोक और चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता की हैं। 

कल की सड़क पर संसद या मॉक इम्पीचमेंट (नकली महाभियोग) का कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के आवास पर प्रतीकात्मक कार्यक्रम है जिसमें पूर्व लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार की अध्यक्षता में प्रस्ताव पेश करने और भाषणों की योजना है।  राजनीति में असल बदलाव तब आता है जब रैलियाँ चुनावी नतीजों में तब्दील हों। ये कार्यक्रम विपक्ष के लिए ताकत दिखाने और मुद्दा जीवित रखने का माध्यम हैं। सत्ता परिवर्तन का फैसला अंतत: मतदाता चुनाव के दौरान अपने मतपत्रों से करेंगे। दोनों पक्षों के दावों को आलोचनात्मक नजर से देखना जरूरी है क्योंकि आरोप और जवाब दोनों की जांच होनी चाहिए। कुल मिलाकर रैलियाँ सत्ता परिवर्तन का सहायक औजार हैं न कि मुख्य। वे दबाव और जागरूकता पैदा करती हैं लेकिन स्थायी बदलाव के लिए चुनाव, संगठन और जनविश्वास जरूरी होता है। लंबी अवधि में अगर मुद्दा व्यापक जनसमर्थन पा गया तो चुनावी सुधारों पर दबाव बढ़ेगा लेकिन अगर सीमित रहा तो यह सिर्फ विपक्षी प्रदर्शनों की श्रृंखला का एक और अध्याय रह जाएगा। 

Friday, October 30, 2026

सीजेपी को साथ लेने से पहले इंडिया ब्लाक को करना होगा मंथन


अशोक मिश्र

काकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी ने इंडिया ब्लॉक की एक नवंबर को प्रस्तावित रैली को समर्थन देने के ऐलान कर दिया है। सीजेपी के इस समर्थन को केवल एक औपचारिक समर्थन से आगे की बात कही जा रही है। इसके साथ ही यह चर्चा भी तेज हो गई है कि सीजेपी आने वाले दिनों में औपचारिक रूप से इंडिया ब्लॉक का हिस्सा बन सकती है। हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि सीजेपी एक कैडर आधारित बड़ी पार्टी नहीं है। उसकी पहचान एक व्यंग्यात्मक, व्यवस्था-विरोधी और खुद को सबसे कठोर परिस्थितियों में भी जीवित रहने वाले आम नागरिक की प्रतीक के तौर पर रही है। यही वजह है कि उसके इस कदम के राजनीतिक मायने वोट प्रतिशत से ज्यादा संदेश और नैरेटिव के स्तर पर निकाले जा रहे हैं। 

अगर इंडिया ब्लॉक और कॉकरोच जनता पार्टी एक साथ आ जाएं तो भारतीय राजनीति में एक नई तरह की ऊर्जा और जटिलता दोनों पैदा हो सकती है। सीजेपी युवाओं, खासकर जेन जेड और मध्यम वर्ग के असंतुष्ट युवाओं का दबाव समूह है जो पारंपरिक पार्टी राजनीति से अलग रहकर शिक्षा व्यवस्था की खामियों, परीक्षाओं में लीक, बेरोजगारी और चुनावी प्रक्रियाओं पर सवाल उठाता रहा है। वह खुद को राजनीतिक दल नहीं मानता। सीजेपी नागरिक आंदोलन के रूप में काम करने पर जोर देती है। इंडिया ब्लॉक कांग्रेस समेत क्षेत्रीय दलों का गठबंधन है जो सत्ताधारी दल के खिलाफ संगठित विपक्ष की भूमिका निभाने की कोशिश करता है लेकिन आंतरिक मतभेदों, सीट बंटवारे और नेतृत्व के सवालों से समय समय पर जूझता रहता है। दोनों के एक साथ आने का मतलब होगा कि सड़क की युवा ऊर्जा और संसदीय-संगठनात्मक ताकत का मेल। इससे विपक्ष को एक व्यापक जनआधार मिल सकता है जो सिर्फ चुनावी गणित तक सीमित न रहकर मुद्दों पर लगातार दबाव बनाने में सक्षम हो। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि सीजेपी निकट भविष्य में एक राजनीतिक दल के रूप में सामने आ सकती है जिस तरह अन्ना हजारे आंदोलन के बाद अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी उभरकर सामने आई थी।

 काकरोच जनता पार्टी के आम आदमी पार्टी की तरह एक पूर्ण राजनीतिक संगठन में तब्दील होने की संभावना पर बात करें तो दोनों के बनने की पृष्ठभूमि और मौजूदा स्थिति में जमीन-आसमान का अंतर है। हां, दोनों में कुछ समानताएं भी हैं जिनके कारण यह सवाल उठ रहा है। आम आदमी पार्टी का उदय एक बड़े जन-आंदोलन, इंडिया अगेंस्ट करप्शन से हुआ था। उसके पास शुरू से ही अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया जैसे पहचाने हुए चेहरे थे। एक स्पष्ट मुद्दा था भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकपाल, और दिल्ली जैसे एक केंद्र शासित प्रदेश में केंद्रित होकर काम करने की रणनीति थी। संगठन के तौर पर उसने बहुत जल्दी बूथ स्तर तक कार्यकर्ता बनाए, चंदा मॉडल को पारदर्शी बनाया और एक कल्याणकारी मॉडल बिजली, पानी, शिक्षा को अपना मुख्य चुनावी वादा बनाया। काकरोच जनता पार्टी के पास ऐसी कोई पृष्ठभूमि नहीं है। 

अभी तक उसकी पहचान एक प्रेशर ग्रुप, एक व्यंग्यात्मक आंदोलन और सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने वाले समूह की ज्यादा है। उसके पास न तो कोई बड़ा चेहरा है जो राज्य स्तर पर वोट खींच सके, न ही कोई एक स्पष्ट प्रशासनिक मॉडल जिसे वह जनता के सामने रख सके।  काकरोच जनता पार्टी को भी अगर आम आदमी पार्टी की तरह बनना है तो उसे एक गंभीर सांगठनिक ढांचे में आना होगा। चुनाव आयोग में पंजीकरण, हिसाब-किताब, बूथ कमेटी और एक ऐसा चेहरा जो बहस में खड़ा हो सके। बिना इसके वह एक मीम पार्टी बनकर रह जाएगी, जो रैली में भीड़ तो बढ़ा देगी लेकिन वोट में नहीं बदलेगी। 

इस आधार पर कहा जा सकता है कि सीजेपी के आम आदमी पार्टी बनने की संभावना बहुत ही क्षीण है। एक नवंबर को होने वाली रैली के संदर्भ में सीजेपी और इंडिया ब्लाक के एक साथ आने को लेकर एनडीए में शामिल दल आलोचना भी कर रहे हैं। भाजपा और उसके अन्य सहयोगी दल इंडिया ब्लाक की गंभीरता और विश्वसनीयता को लेकर आलोचना कर रहे हैं। इंडिया ब्लॉक पहले से ही सीट बंटवारे, नेतृत्व और साझा एजेंडा जैसे मुद्दों पर आंतरिक खींचतान से जूझ रहा है। ऐसी स्थिति में एक ऐसी पार्टी जिसका नाम ही काकरोच जनता पार्टी है, को साथ लाने से एनडीए को यह कहने का मौका मिलेगा कि इंडिया ब्लॉक में राजनीतिक गंभीरता कम हो रही है। 

उसे भीड़ जुटाने के लिए ऐसे दलों का सहारा लेना पड़ रहा है जिसका कोई खास जनाधार भी नहीं है। यह भाजपा के उस नैरेटिव को भी बल दे सकता है कि विपक्षी गठबंधन विचारधारा नहीं बल्कि सिर्फ मोदी-विरोध के नाम पर बना एक अस्वाभाविक जमावड़ा है। इंडिया ब्लॉक के अंदर कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के बीच प्रतिस्पर्धा पहले से है और सीजेपी के शामिल होने से नेतृत्व और एजेंडा तय करने को लेकर और मतभेद उभर सकते हैं। कुछ दल सीजेपी को अपने युवा आधार को चुराने वाला मान सकते हैं जबकि कुछ इसे उपयोगी सहयोगी समझेंगे। 

Thursday, October 29, 2026

तूफान अर्नब ने मचाई तबाही, तटीय जैव विविधता को पहुंची भारी क्षति

अशोक मिश्र

बंगाल की खाड़ी से उठे अत्यंत गंभीर चक्रवाती तूफान अर्नब ने बुधवार सुबह आंध्र प्रदेश के तट पर बापटला और विशाखापत्तनम के बीच यानम के दक्षिण-पश्चिम में दस्तक दी है। इससे आंध्र प्रदेश के तटीय जिलों जैसे काकीनाडा, कोनसीमा, पश्चिम गोदावरी, विशाखापत्तनम, अनकापल्ली, विजयनगरम और श्रीकाकुलम में भारी तबाही मची। सैकड़ों पेड़ उखड़ गए, बिजली के खंभे गिरे, सड़कें क्षतिग्रस्त हुईं, संचार व्यवस्था बाधित हुई और कई जगह बिजली आपूर्ति ठप हो गई। तूफान अर्नब में तीन लोगों की मौत हुई, एक पेड़ गिरने और दो करंट लगने से, जबकि 764 गांव प्रभावित हुए हैं।

लगभग 57 हजार लोगों को आंध्र प्रदेश में और कुल मिलाकर 87 हजार से अधिक को ओडिशा सहित राहत शिविरों में पहुंचाया गया है। तेज हवाओं ने सैकड़ों पेड़ उखाड़ दिए। बिजली के खंभे गिरा दिए। सड़कें क्षतिग्रस्त कीं और बिजली तथा संचार व्यवस्था बाधित कर दी जिससे तटीय जिलों जैसे काकीनाडा कोनसीमा विशाखापत्तनम अनकापल्ली विजयनगरम और श्रीकाकुलम में जनजीवन ठप हो गया। इस तूफान का पर्यावरण पर पहला और सबसे प्रत्यक्ष असर तटीय पारिस्थितिकी तंत्र पर दिखता है। काकीनाडा के पास उप्पाडा तटीय सड़क का समुद्री लहरों और तटीय कटाव के कारण बह जाना सिर्फ एक सड़क का टूटना नहीं है। यह बताता है कि कैसे तेज हवाओं के साथ उठी तीन से चार मीटर ऊंची तूफानी लहरों ने समुद्र तल को कई मीटर अंदर तक धकेल दिया है। विशाखापत्तनम, विजयनगरम, अनाकापल्ली और श्रीकाकुलम जैसे जिलों में सैकड़ों पेड़ उखड़ गए हैं। 

इसमें मैंग्रोव के पैच और कैसुरीना के रोपण भी शामिल हैं जो प्राकृतिक रूप से समुद्र के प्रहार को रोकते हैं। इन पेड़ों के गिरने से पक्षियों के घोसले, छोटे स्तनधारियों के आवास और तटीय जैव विविधता को तत्काल क्षति पहुंची है। लंबे समय में हवा के अवरोध के कमजोर होने से अगले मानसून या तूफान में कटाव और तेज होगा। कई जगहों पर 200 मिलीमीटर से अधिक भारी वर्षा ने नदियों में अचानक बाढ़ ला दी है जिससे मीठे पानी के तालाबों, खेतों और भूजल में खारे पानी का प्रवेश हुआ है। इससे आंध्र की उपजाऊ डेल्टा जमीन, विशेषकर गोदावरी-कृष्णा बेसिन में, लवणता बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है जो अगले एक-दो फसली चक्र तक पैदावार को प्रभावित कर सकता है। साथ ही जलभराव से रुके हुए पानी में कचरा, प्लास्टिक और कृषि रसायन घुल कर लैगून और एश्चुरी में पहुंच रहे हैं, जिससे मत्स्य प्रजनन क्षेत्रों में आॅक्सीजन की कमी और यूट्रोफिकेशन का खतरा बनता है। 

दूसरी ओर, अस्थायी रूप से देखें तो इस तरह के चक्रवात बंगाल की खाड़ी के गर्म पानी को ठंडा करते हैं, वायुमंडल की अतिरिक्त गर्मी को बाहर निकालते हैं और सूखे पड़े आंतरिक इलाकों में जलाशयों को भर देते हैं, लेकिन यह लाभ तब अर्थहीन हो जाता है जब बाढ़ का पानी इतनी तेजी से आता है कि जमीन उसे सोख ही नहीं पाती। पर्यावरणीय दृष्टि से पेड़ों के उखड़ने से स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र क्षतिग्रस्त हुआ है जबकि बाढ़ के पानी से मिट्टी का कटाव और जल प्रदूषण का खतरा बढ़ा है। सकारात्मक पक्ष यह है कि समय पर चेतावनी निकासी तथा एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की तैनाती के कारण बड़े पैमाने पर जनहानि नहीं हुई। मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने केंद्रीय मदद मांगकर पुनर्वास की प्रक्रिया तेज कर दी है।

कुल मिलाकर यह तूफान भारत के पूर्वी तटीय क्षेत्रों की आपदा प्रबंधन क्षमताओं को परखता है तथा जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों के बीच तटीय राज्यों की अर्थव्यवस्था कृषि और सामाजिक व्यवस्था पर दीर्घकालिक दबाव डालने की क्षमता रखता है हालांकि तत्काल राहत कार्यों से सामान्य स्थिति बहाल होने की उम्मीद है। आर्थिकी पर इसका असर बहुस्तरीय है। सबसे पहले कृषि और मत्स्य पालन पर दिखता है। उत्तरी आंध्र में इस समय धान की कटाई से ठीक पहले की फसल खड़ी थी, मिर्च, मूंगफली और नारियल के बागान भी तैयार अवस्था में थे। तेज हवा और जलभराव से खड़ी फसल गिर गई है, अनाज में नमी बढ़ गई है और भंडारण में रखे बीज सड़ने लगे हैं, जिससे छोटे किसानों को दोहरी मार पड़ी है, एक तो तत्काल उपज का नुकसान और दूसरा अगले सीजन के लिए कर्ज का बोझ। 

31 मकानों के क्षतिग्रस्त होने का सरकारी आंकड़ा शुरूआती है, जमीनी स्तर पर कच्चे घरों, पोल्ट्री शेड और कोल्ड स्टोरेज को हुए नुकसान को जोड़ें तो आजीविका का नुकसान करोड़ों में पहुंचता है। समुद्र में मछली पकड़ने पर लगी रोक, नावों के टूटने और जेटियों के क्षतिग्रस्त होने से मछुआरा समुदाय, जो पहले ही मानसून के कारण कम दिनों तक समुद्र में जा पाता है, अब कम से कम 15 से 20 दिनों तक बेरोजगार रहेगा। ओडिशा में भी भारी बारिश और तेज हवाओं का असर पड़ा, जहां हजारों लोगों को निकाला गया तथा दक्षिणी जिलों में स्कूल बंद रखे गए। तेलंगाना, छत्तीसगढ़ और पुडुचेरी में भी अलर्ट जारी रहे तथा कुछ क्षेत्रों में भारी बारिश की आशंका बनी रही। आर्थिक प्रभाव मुख्य रूप से कृषि, बुनियादी ढांचे और मत्स्य उद्योग पर पड़े। 

Wednesday, October 28, 2026

देश की दवा कंपनियों की मनमानी मरीजों के जीवन पर पड़ रही भारी

अशोक मिश्र

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को सुनवाई के दौरान दवाओं की कीमतों को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने केंद्र सरकार से पूछा कि पूरा सिस्टम दवा निर्माताओं की मदद क्यों कर रहा है। अदालत ने एमआरपी और रिटेलर को मिलने वाली कीमत यानी प्राइस टू रिटेलर (पीटीआर) के बीच भारी अंतर पर चिंता जताई। सचमुच एमआरपी और पीटीआर के बीच भारी अंतर मरीजों के लिए काफी चिंता का विषय है। कोई भी मरीज या उपभोक्ता जब इन दवाओं को खरीदता है, तो सारा भार उसे ही उठाना पड़ता है। याचिकाकर्ताओं ने बताया कि भारत में कैसे एक ही दवा दो बिल्कुल अलग कीमतों पर बिकती है। 

एक उदाहरण अदालत में दिया गया कि एक इंजेक्शन की रिटेलर कीमत करीब 3,520 रुपये है, लेकिन उसकी एमआरपी 22,437 रुपये तय है। एक और कैंसर की दवा का उदाहरण और भी चौंकाने वाला था, जो रिटेलर को करीब 2,700 रुपये में मिलती है जबकि उसकी एमआरपी करीब 27,000 रुपये रखी गई थी, यानी लगभग दस गुना का अंतर। अदालत ने इस पर हैरानी जताते हुए इसे मरीजों के साथ दिनदहाड़े की गई डकैती कहा है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ड्रग्स प्राइस कंट्रोल आॅर्डर 2013 की कमियों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। 

कोर्ट ने कहा कि लोग इलाज के लिए घर-गहने बेचने को मजबूर हो जाते हैं। भारत में स्वास्थ्य खर्च का बड़ा हिस्सा दवाओं पर जाता है। आंकड़ों के अनुसार घरेलू दवा बाजार का करीब 17 प्रतिशत हिस्सा ही सीधे मूल्य नियंत्रण के दायरे में आता है, जबकि शेष 83 प्रतिशत गैर-अनुसूचित दवाओं पर निर्माता शुरू में अपनी मर्जी से एमआरपी तय कर सकते हैं और बाद में सालाना 10 प्रतिशत तक बढ़ोतरी की अनुमति होती है। अदालत ने नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी को लगभग निष्क्रिय बताया और सवाल किया कि सरकार की नजरों के सामने यह अंतर कैसे बना रहता है। यह अंतर आंकड़ों में नहीं, घर के बजट में दिखता है। भारत में इलाज पर होने वाले कुल खर्च का लगभग 17 प्रतिशत सिर्फ दवाओं पर जाता है। 

यह दुनिया के कई विकसित देशों से कहीं अधिक है जहां बीमा या सरकारी खरीद इस बोझ को सोख लेती है। भारत में आज भी अधिकतर खर्च जेब से होता है। कैंसर, हृदय रोग, या लंबे समय तक चलने वाली बीमारियों में यह बोझ परिवार को कर्ज, संपत्ति बेचने और इलाज छोड़ने तक ले जाता है। सरकारी अस्पतालों में भी जब दवा बाहर से लिखी जाती है या जन औषधि केंद्र पर विकल्प नहीं मिलता, तो वही लूट दोहराई जाती है। रिटेलर का ऊंचा मार्जिन उसे उसी ब्रांड को बेचने के लिए प्रेरित करता है जिसमें उसे ज्यादा लाभ है, सस्ता जेनेरिक नहीं। भारत में दो तरह की दवाएं हैं। शेड्यूल्ड दवाएं, जिनकी लगभग 388 दवाओं की सीलिंग कीमत एनपीपीए तय करता है, और नॉन-शेड्यूल्ड दवाएं, जो बाजार में 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा रखती हैं। नॉन-शेड्यूल्ड पर कंपनियां अपनी एमआरपी खुद तय करती हैं, बस सालाना बढ़ोतरी 10 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए। इस नियम में ही खेल है। कंपनी कम पीटीआर पर दवा देकर रिटेलर और डॉक्टर को भारी मार्जिन का लालच देती है और एमआरपी ऊंची रखकर उस मार्जिन को वैध बना देती है। 

सुप्रीम कोर्ट ने इसी पर केंद्र से पूछा कि पूरा तंत्र दवा निर्माताओं की मदद करने के लिए क्यों काम कर रहा है। केंद्र सरकार ने अदालत में कहा कि नीति के अनुसार पूरे इकोसिस्टम को कड़े नियंत्रण में नहीं लाया जाना चाहिए। भारत में दवाओं की कीमतें विश्व स्तर पर तुलनात्मक रूप से कम मानी जाती हैं। एमआरपी और रिटेलर कीमत के बीच का अंतर केवल निर्माता का मुनाफा नहीं होता। इसमें स्टॉकिस्ट, वितरक, रिटेलर, परिवहन, भंडारण, क्रेडिट सुविधा, एक्सपायरी का जोखिम, कर और मार्केटिंग जैसे कई खर्च शामिल होते हैं। अगर मार्जिन बहुत सख्ती से सीमित कर दिए गए तो छोटी फार्मेसियां और वितरण नेटवर्क प्रभावित हो सकता है। उद्योग का कहना है कि अनुसंधान, नए अणुओं का विकास और गुणवत्ता बनाए रखने के लिए पर्याप्त मार्जिन जरूरी है। 

ज्यादा नियंत्रण से निवेश घट सकता है, आपूर्ति श्रृंखला बाधित हो सकती है और कुछ दवाएं बाजार से गायब भी हो सकती हैं। अब जरूरत है कि सरकार, नियामक एजेंसियां, उद्योग और उपभोक्ता संगठन मिलकर ऐसा ढांचा बनाएं जो अनावश्यक मुनाफाखोरी रोके, पारदर्शिता बढ़ाए और साथ ही दवाओं की उपलब्धता व गुणवत्ता बनाए रखे। केवल अदालती आदेश या सीमित नियंत्रण से समस्या हल नहीं होगी। व्यापक नीति, बेहतर निगरानी और सभी हितधारकों के बीच संवाद से ही स्वास्थ्य सेवाओं को ज्यादा न्यायसंगत बनाया जा सकता है। अदालत का इशारा साफ है कि जरूरी दवाओं को दो श्रेणियों में बांटकर एक को खुला छोड़ देना अब नहीं चलेगा। इलाज का 17 प्रतिशत हिस्सा दवाओं पर खर्च हो रहा है, यह आंकड़ा बताता है कि दवा महंगी नहीं, तो इलाज महंगा हो ही नहीं सकता। 

Tuesday, October 27, 2026

Kumarajiva: The Greatest Propagator of Buddhism


Bodhivriksha

Ashok Mishra

Kumarajiva, who was born in Bihar, made a monumental contribution to the spread of Buddhism. Buddhist literature contains a wealth of information about him. A man of exceptional talent, Kumarajiva eventually went to study at Nalanda University. His insatiable thirst for knowledge led him to Taxila, where he not only pursued his education but also served as a teacher. 

It was during his time teaching at Taxila that he resolved to dedicate his innate, God-given talent to the propagation of the Buddhist faith. He immersed himself in the deep study of Buddhism and began spreading its teachings across the kingdoms and regions surrounding Taxila—a task that required him to master several Asian languages. 

Later, he decided to travel to China to propagate Buddhism. After an arduous and challenging journey, Kumarajiva arrived in China. He learned the Chinese language (Mandarin) and translated numerous Buddhist texts into Chinese. He would engage with the people, explaining the tenets of Buddhism and sharing the life and teachings of Gautama Buddha in their own language. 

Gradually, Buddhism began to take root and spread throughout China. In this endeavor, he secured the support of several influential figures and rulers. However, the path was far from easy; Kumarajiva often had to take significant risks. Even in China, he faced opposition from those who resisted the spread of Buddhism, yet he remained steadfast in his mission. Ultimately, he became the most prominent propagator of Buddhism in China, earning widespread acceptance among the people.

बौद्ध धर्म के सबसे बड़े प्रचारक कुमार जीव


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार में बिहार में जन्मे कुमार जीव का बहुत बड़ा योगदान है। बौद्ध साहित्य में इनके बारे में बहुत सारी जानकारियां दी गई हैं। बिहार में जन्मे कुमार जीव बहुत ही प्रतिभाशाली व्यक्ति थे। समय आने पर वह नालंदा विश्वविद्यालय में पढ़ने गए। ज्ञान हासिल करने की भूख इन्हें तक्षशिला तक ले गई। यहां इन्होंने शिक्षा हासिल की और बाद में अध्यापन कार्य भी यहीं किया। तक्षशिला में अध्यापन के दौरान ही इन्होंने निश्चय किया कि प्रकृति प्रदत्त इस प्रतिभा का उपयोग धर्म के प्रचार-प्रसार में करना चाहिए। 

उन्होंने बौद्ध धर्म का गहन अध्ययन किया और उन्होंने तक्षशिला के आसपास के राज्यों और देशों में बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार किया। इसके लिए इन्हें कई एशियाई भाषा को भी सीखना पड़ा। बाद में इन्होंने तय किया कि उन्हें चीन जाकर बौद्ध धर्म का प्रचार करना चाहिए। एक लंबी और कठिन यात्रा करके कुमार जीव चीन पहुंचे। उन्होंने चीनी भाषा मंदारिन सीखी और अनेक बौद्ध ग्रंथों का चीनी भाषा में अनुवाद भी किया। वह लोगों के बीच जाते और उन्हें उनकी ही भाषा में बौद्ध धर्म के बारे में बताते थे।

 महात्मा बुद्ध के उपदेश और जीवन चरित बताते थे। इससे धीरे-धीरे चीन में बौद्ध धर्म का प्रसार होने लगा। उन्होंने इस काम में चीन के कुछ प्रभावशाली व्यक्तियों और राजाओं का सहयोग भी हासिल किया। लेकिन यह सब कुछ बहुत आसान भी नहीं रहा। कई बार कुमार जीव को बहुत बड़ा जोखिम भी उठाना पड़ा। 

चीन में भी इन्हें बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए विरोधियों का सामना करना पड़ा। लेकिन कुमार जीव अपने लक्ष्य के प्रति अडिग रहे। इसका नतीजा यह हुआ कि कालांतर में यह चीन में बौद्ध धर्म के सबसे बड़े प्रचारक साबित हुए और लोगों ने इन्हें स्वीकार भी कर लिया।

व्यक्तिगत टिप्पणियों से तार-तार होती है लोकतांत्रिक मर्यादा

अशोक मिश्र

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के पटना में दिए गए बयान ने एक बार फिर भारतीय राजनीति के स्वर को गर्मा दिया है। डॉ. श्रीकृष्ण सिंह की 139वीं जयंती के कार्यक्रम में जब खड़गे भाषण दे रहे थे और कथित वोट चोरी तथा एसआईआर प्रक्रिया में गड़बड़ी करने वालों को जेल भेजने की बात कर रहे थे, तभी सभा में मौजूद एक व्यक्ति ने चिल्लाकर कहा कि मोदी कहीं नहीं जाएंगे। इस पर नाराज खड़गे ने जो टिप्पणी की, वह टिप्पणी तुरंत विवाद का विषय बन गई। भाजपा ने इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दिवंगत पिता का अपमान बताया और देशभर में प्रदर्शन का ऐलान कर दिया। गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि खड़गे ने सारी मर्यादाएं तार-तार कर दी हैं। कांग्रेस के पास अब नीति नहीं, सिर्फ गाली-गलौज की राजनीति बची है। 

अन्य भाजपा नेताओं ने भी इसे अश्लील, अभद्र और लोकतांत्रिक मर्यादा के विरुद्ध करार दिया। दूसरी तरफ कांग्रेस ने खड़गे का बचाव करते हुए कहा कि बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया जा रहा है। खड़गे का इशारा प्रधानमंत्री के वैचारिक पिता यानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर था। साथ ही पार्टी का दावा है कि पटना में पहले बीजेपी कार्यकर्ता ने खड़गे के दिवंगत पिता का अपमान किया था। इसके जवाब में यह प्रतिक्रिया आई थी। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने भी इसे एक आम बोलचाल का मुहावरा बताया है, किसी के पिता का व्यक्तिगत अपमान नहीं। जब बहस नीतियों, जैसे एसआईआर में गड़बड़ी, भ्रष्टाचार या चुनाव सुधार जैसे मुद्दों से हटकर व्यक्तिगत और पारिवारिक टिप्पणियों पर आ जाती है, तो जनता का ध्यान असली सवालों से भटक जाता है। लगातार ऐसी भाषा से सार्वजनिक संवाद का स्तर गिरता है। 

राजनीति में शालीनता का मानक कमजोर होता है जिसे युवा पीढ़ी सामान्य मानने लगती है। समर्थक वर्ग में भावनात्मक ध्रुवीकरण बढ़ता है। सोशल मीडिया पर गाली-गलौज और पुतला दहन जैसे प्रतीकात्मक विरोध रोजमर्रा की राजनीति बन जाते हैं, जिससे सामाजिक विश्वास कम होता है। युवा और बच्चे, इन घटनाओं को देखकर यह संदेश ग्रहण करते हैं कि सत्ता के लिए कोई भी सीमा पार की जा सकती है। इससे समाज में असहिष्णुता बढ़ती है, विरोधी विचार रखने वाले लोगों के प्रति घृणा और नफरत की भावना मजबूत होती है। 

सार्वजनिक चर्चा मुद्दों—रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई—से हटकर व्यक्तिगत हमलों और भावनात्मक आरोपों पर केंद्रित हो जाती है। नतीजतन लोकतंत्र कमजोर पड़ता है क्योंकि मतदाता मूल बहस के बजाय शोर और सनसनी से प्रभावित होते हैं। ऐसे विवाद से राजनीतिक दलों को तात्कालिक सुर्खियां तो मिल जाती हैं, लेकिन लोकतंत्र की दीर्घकालिक सेहत के लिए जरूरी विचार-विमर्श और समाधान खोजने की संस्कृति कमजोर पड़ती है। राजनीति का स्तर गिरता है और लोकतंत्र प्रभावित होता है।

Monday, October 26, 2026

How Does Jealousy Take Root in the Mind?


Bodhivriksha

Ashok Mishra

Among the many disciples of Gautama Buddha, Vakkula is a notable figure. While Sariputra was adept at delivering sermons, Vakkula did not possess this skill. It is said that he attained enlightenment just seven days after seeking refuge in the Buddha, and by the eighth day, he had attained the pure state of *Arhatship*. Vakkula Sthavira had a friend named Acela Kashyapa, an ascetic who always remained naked. 

The two met in Rajagriha when they were both eighty years old. Acela Kashyapa initiated a conversation, asking, "Friend Vakkula, how many years have passed since you became an ascetic?" Vakkula replied with ease, "Eighty years, my friend." Acela then asked, "In these eighty years, how many times have you engaged in sexual intercourse?" Vakkula answered, "Not even once. In the last eighty years, the thought of sexual desire has never once crossed my mind. 

To tell you the truth, in all these eighty years, not even a trace of malice toward anyone has ever arisen in my consciousness. I do not even know how thoughts of violence arise in people's minds. I do not know how to wear clothes in the manner of householders; 

I simply wear the robes as the monks do in the *viharas* (monasteries). I do not know what it is like to wear garments stitched with a needle, nor do I know how one is supposed to sit in the homes of householders. I cannot even recall a single instance of being ill over the past eighty years.

" It is said that among all of the Buddha’s disciples, Vakkula Sthavira was the healthiest. He had renounced all the comforts and luxuries of worldly life. Perhaps this is the reason why his age is stated as 160 years in Buddhist texts.

मन में ईर्ष्या कैसे पनपती है, नहीं जानता

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध के अनेक शिष्यों में वक्कुल का नाम भी प्रमुखता से लिया जाता है। जहां सारिपुत्र उपदेश देने में प्रवीण थे, वहीं वक्कुल को यह कला नहीं आती थी। कहते हैं कि महात्मा बुद्ध की शरण में आने के सात दिन बाद ही इन्हें ज्ञान प्राप्त हो गया था। आठवें दिन इन्हें शुद्ध अर्हत्व ज्ञान प्राप्त हुआ था। वक्कुल स्थविर के एक मित्र थे अचेल काश्यप जो सदैव नग्न रहते थे। अस्सी वर्ष की आयु में राजगृह में दोनों की मुलाकात हुई। अचेल काश्यप ने स्थविर वक्कुल से वार्तालाप शुरू किया। अचेल ने वक्कुल से पूछा, तुम्हें संन्यासी हुए कितने वर्ष बीत गए हैं, मित्र वक्कुल। 

वक्कुल ने सहजता से जवाब दिया, अस्सी साल, मित्र। तब अचेल ने पूछा कि इन अस्सी वर्षों में आपने कितनी बार मैथुन किया है? वक्कुल ने जवाब दिया, एक बार भी नहीं। मेरे मन में पिछले अस्सी साल में एक बार भी काम वासना का विचार तक नहीं आया। सच बताऊं। पिछले अस्सी साल में एक बार भी मेरे चित्त में किसी के प्रति द्वेष की भावना तक पैदा नहीं हुई। मैं यह भी नहीं जानता कि लोगों के मन में हिंसा संबंधी विचार कैसे पैदा होते हैं। गृहस्थों के समान मैं वस्त्र पहनना नहीं जानता हूं। 

विहारों में जिस तरह भिक्षु वस्त्र पहनते हैं, वैसा ही मैं भी पहन लेता हूं। सुई से सिए वस्त्र कैसे होते हैं, मैं नहीं जानता हूं। गृहस्थों के घर में किस तरह बैठा जाता है, यह भी मुझे नहीं आता है। पिछले अस्सी साल में मैं बीमार कब पड़ा था, यह भी मुझे याद नहीं है। कहते हैं कि महात्मा बुद्ध के सभी शिष्यों में सबसे स्वस्थ स्थविर वक्कुल ही थे। उन्होंने समाज की सभी तरह की सुख-सुविधाओं को त्याग रखा था। शायद यही वजह है कि बौद्ध ग्रंथों में उनकी आयु 160 वर्ष बताई गई है।

कांग्रेस की प्रस्तावित रैली को लेकर पक्ष-विपक्ष में मची रार


अशोक मिश्र

दिल्ली में एक नवंबर को प्रस्तावित कांग्रेस की रैली को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। इस विवाद के मूल में आयोजन का स्थान, समय और उसके संभावित प्रभाव को लेकर किए जा रेह अलग-अलग दावे हैं। एक तरफ तो इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा बताया जा रहा है। दूसरी तरफ इसे राजधानी के जनजीवन के लिए एक बड़ी असुविधा के तौर पर देखा जा रहा है। रैली के समर्थन में दिया जाने वाला पहला तर्क संवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकार से जुड़ा है। 

वैसे तो यह बात काफी हद तक सही है कि किसी भी राजनीतिक दल को शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने, जनता को जुटाने और सरकार के सामने अपनी मांगें रखने का अधिकार है। दिल्ली देश की राजधानी है। इसके नाते यह स्वाभाविक है कि सामाजिक-राजनीतिक संगठन, स्वयंसेवी संस्थाएं और व्यक्तिगत तौर पर लोग धरना-प्रदर्शन करने दिल्ली ही आते हैं। रैली मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर बुलाई गई है। 

कांग्रेस का आरोप है कि इस प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में लोगों, खासकर पिछड़े, दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक समुदायों के नाम मतदाता सूची से हटाए जा रहे हैं, जिससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया प्रभावित हो रही है। पार्टी इसे वोट चोरी बताते हुए देशभर से लोगों को दिल्ली बुला रही है और दावा कर रही है कि इस महारैली में दस लाख तक लोग जुट सकते हैं। दिल्ली पुलिस ने पहले ही इस आयोजन के लिए अनापत्ति प्रमाणपत्र जारी कर दिया है, जिससे कांग्रेस को वैधता का आधार मिल गया है। 

वहीं रैली के विरोध में भी कई व्यावहारिक और राजनीतिक तर्क दिए जा रहे हैं। प्रशासनिक स्तर पर सबसे बड़ी चिंता यातायात और कानून व्यवस्था को लेकर है। एक नवंबर को त्योहारों के आसपास का समय है, जब दिल्ली में पहले से ही भीड़ और प्रदूषण का दबाव रहता है। दीपावली और धनतेरस जैसे त्यौहार भी नजदीक होंगे, ऐसे में लाखों लोगों के एक जगह जुटने से मध्य दिल्ली और नई दिल्ली के बड़े हिस्से में जाम, मेट्रो पर अतिरिक्त भार और आम लोगों के कामकाज में बाधा आने की आशंका जताई जा रही है। 

इसके अलावा त्योहारी सीजन का मुद्दा भी उठाया जा रहा है। दीपावली, धनतेरस और छठ जैसे त्योहारों के बीच यह रैली दिल्ली के व्यापारियों के कारोबार को भारी नुकसान पहुंचा सकती है। चैंबर आॅफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री जैसे संगठनों ने आशंका जताई है कि यातायात व्यवस्था प्रभावित होने और भीड़ के कारण करीब दस हजार करोड़ रुपये का व्यापार प्रभावित हो सकता है। उन्होंने रैली को भाई दूज के बाद स्थगित करने की अपील की है। इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर याद दिला दिया है कि लोकतंत्र में विरोध का अधिकार और जिम्मेदारी दोनों साथ-साथ चलते हैं।


Sunday, October 25, 2026

Sariputra! Your Presence Is a Blessing

Bodhivriksha

Ashok Mishra

Buddhism attracted many individuals who played a pivotal role in transforming society. Among them was Sariputra, a figure held in high regard within Buddhist literature. He was a contemporary of Gautama Buddha, though he passed away before the Buddha himself. Sariputra was a man of profound humility and wisdom—so humble, in fact, that he would not hesitate to offer an apology even when he had committed no fault. 

Once, upon hearing that a monk named Purna possessed great wisdom, Sariputra felt a deep longing to meet him. Unlike those who resided in cities or monasteries, Purna lived in the forest. Following the accounts he had heard of Purna’s virtues, Sariputra traveled to his hermitage and requested a teaching. Moved deeply by the wisdom shared by Purna, Sariputra was overcome with emotion, and tears began to stream from his eyes. 

"O noble one," he said, "you are truly blessed. Hearing your words has purified me. It is my great fortune to have beheld you; your teachings, nectar-like in their essence, have brought me immense grace." Purna replied, "The praise you offer is a reflection of your own kindness. You have not yet introduced yourself; may I know who you are?" 

Sariputra answered, "Noble one, I am but a humble servant of the Dhamma; people call me Sariputra." Upon hearing this, Purna exclaimed, "Are you Sariputra—the foremost disciple of the Master? You are as truly great as the Master himself! Blessed are those who dwell in your presence. I, too, consider myself fortunate to have beheld you today. That you have graced a humble monk like me with your presence is a supreme blessing."


सारिपुत्र! आपने दर्शन दिया, मेरा सौभाग्य

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

बौद्ध धर्म में बहुत सारे ऐसे लोग शामिल थे जिन्होंने समाज को बदलने में अहम भूमिका अदा की थी। ऐसे लोगों में सारिपुत्र भी गिने जाते हैं। बौद्ध साहित्य में इनका नाम बड़े आदर के साथ लिया गया है। यह महात्मा बुद्ध की ही उम्र के थे, लेकिन इनकी मृत्यु महात्मा बुद्ध से पहले हो गई थी। यह बहुत ही विनम्र और ज्ञानवान व्यक्ति थे। 

यह विनयी इतने थे कि कोई अपराध न करने पर भी क्षमा मांगने में संकोच नहीं करते थे। एक बार की बात है। उन्होंने सुना कि पूर्ण नाम के भिक्षु बहुत ज्ञानी हैं। सारिपुत्र के मन में उनसे मिलने की लालसा पैदा हुई। पूर्ण भिक्षु किसी नगर या आश्रम में निवास करने की जगह जंगल में ही रहते थे। पूर्ण की प्रशंसा सुनने के बाद एक दिन वह उनके आश्रम जा पहुंचे। 

सारिपुत्र ने उनसे उपदेश देने की प्रार्थना की। महात्मा पूर्ण का उपदेश सुनकर सारिपुत्र काफी भावविभोर हो गए। उनकी आंखों से अश्रु बहने लगे। उन्होंने कहा कि महात्मन! आप धन्य हैं। आपकी वाणी सुनकर आज मैं पवित्र हो गया। मेरे बड़े भाग्य हैं कि आपके दर्शन हुए। आपकी अमृत के समान उपदेश सुनकर मैं धन्य हो गया। महात्मा पूर्ण बोले, आप जो प्रशंसा कर रहे हैं, वह आपकी कृपा है। आपने अपना परिचय नहीं दिया। मैं आपके बारे में जानना चाहता हूं। 

सारिपुत्र ने कहा, महात्मन! मैं धम्म का एक तुच्छ सेवक हूं। लोग मुझे सारिपुत्र कहते हैं। यह सुनते ही महात्मा पूर्ण ने कहा, क्या आप सारिपुत्र हैं। महात्मा सारिपुत्र जो गुरु के परम शिष्य हैं। आप तो गुरु के समान ही परम महान हैं। वह सभी लोग धन्य हैं जो आपके सान्निध्य में हमेशा रहते हैं। आज तो मैं भी आपके दर्शन पाकर अपने को धन्य मानता हूं। आप ने मुझ तुच्छ श्रमण को दर्शन दिया, यह मेरे लिए परम सौभाग्य की बात है।

अरुणाचल प्रदेश में चीन की बढ़ती सक्रियता चिंताजनक

अशोक मिश्र

अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न अंग है। भारत की सीमा पर अगर पड़ोसी देश कोई गैर जरूरी हरकत करता है, तो उसका मुंह तोड़ जवाब दिया जाता है। अरुणाचल प्रदेश की सीमा पर भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच जारी टकराहट हाल के महीनों में एक बार फिर भारत-चीन संबंधों के केंद्र में आ गई है। जुलाई 2026 के अंत से ऊपरी सुबनसिरी जिले के तक्सिंग सर्कल के आसपास असाफिला और माजा क्षेत्रों में दोनों पक्षों के जवान आमने-सामने आ गए थे। 

वास्तविक नियंत्रण रेखा के छह-सात किलोमीटर अंदर चीनी सैनिकों द्वारा तंबू लगाने की खबरें आई थीं। इसके बाद भारतीय फौज ने अपनी तैनाती बढ़ाई। इंडो-तिब्बत सीमा पुलिस के महानिदेशक ने दो दिन पहले आधिकारिक रूप से कई स्थानों पर फेस-आॅफ जारी रहने की पुष्टि की है। हालांकि हिंसक झड़प की कोई घटना सामने नहीं आई है। भारतीय फौज और चीनी सेना के बीच जारी टकराव को सिर्फ एक सैनिक झड़प के तौर पर नहीं देखा जा सकता है। 

इसके पीछे इतिहास, भूगोल और भू-राजनीति के कई परतें हैं। इस क्षेत्र में भारत का प्रशासन, चुनाव, विकास कार्य और जनजीवन दशकों से निर्बाध चल रहा है। स्थानीय मोनपा और अन्य जनजातीय समुदाय खुद को भारतीय मानते हैं। इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार की चीनी घुसपैठ या नाम बदलने की कोशिश को भारत की संप्रभुता पर सीधा हमला है। इसे किसी भी हालत में स्वीकार्य नहीं माना जा सकता है। सामरिक दृष्टिकोण से भी भारत का तर्क  है कि अरुणाचल प्रदेश, विशेषकर तवांग, सिलीगुड़ी कॉरिडोर के बेहद करीब है और यदि यहाँ चीन दखलंदाजी करता है, तो पूरे पूर्वोत्तर की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। 

इसीलिए वहाँ बुनियादी ढांचे, सड़कों और सैनिक तैनाती को बढ़ाना उसकी रक्षात्मक मजबूरी है। दूसरी तरफ चीन इस पूरे क्षेत्र को जांगनान या दक्षिणी तिब्बत कहता है। मैकमोहन रेखा को ही सिरे से खारिज करता है। उसका तर्क है कि शिमला समझौते पर तत्कालीन तिब्बती प्रतिनिधि और ब्रिटिश भारत ने हस्ताक्षर किए थे। भारत सरकार ने इस बात को कभी स्वीकार ही नहीं किया। भारत और चीन दोनों एशिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं और आपसी व्यापार तथा क्षेत्रीय स्थिरता उनके हित में है। ब्रिक्स जैसे मंचों पर सहयोग जारी रखने के बावजूद सीमा पर तनाव बढ़ाना दोनों के लिए नुकसानदेह है। 

इसलिए वार्ता, विशेष प्रतिनिधि स्तर की बैठकें और कोर कमांडर स्तर के संवाद जारी रखने चाहिए। सीमा पर बुनियादी ढांचे का विकास जरूरी है, लेकिन आक्रामक रुख अपनाने से पहले सभी शांतिपूर्ण विकल्प आजमाने चाहिए। अरुणाचल प्रदेश की सीमा पर जारी यह टकराहट सिर्फ सैन्य मुद्दा नहीं, बल्कि दोनों देशों की राजनीतिक इच्छाशक्ति, रणनीतिक धैर्य और क्षेत्रीय शांति की परीक्षा है। भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि दोनों पक्ष अपने हितों की रक्षा करते हुए संवाद का रास्ता खुला रख पाते हैं या नहीं।

Saturday, October 24, 2026

Dhamma Senapati has become arrogant

bodhi tree

Ashok Mishra

There was no dearth of Shramanas in Buddhism. Mendicant unions were formed in major cities of the country. Thousands of disciples used to stay in these monasteries and take religious initiation. He tried to purify himself and gained respect in the society. But there were some among them who had not yet matured. He could not even free himself from human vices. 

Such people often committed mistakes which were not forgivable. But Mahatma Buddha provided many opportunities for them to improve. Its just matter of one day. Mahatma Buddha was sitting in Vihar discussing religion. Then a disciple of the ashram came and said to Mahatma Buddha, ever since you have given the title of Dhamma Senapati to Sariputra, he has become as per his wish. 

He has become proud of his position. He keeps torturing the monks. They kill people. They have hit me too. Then Buddha said that even if there was some reason, it is not believed that Mahatma Sariputra would kill anyone. There is no question of beating anyone without any reason. I call Sariputra and ask. After some time, when Sariputra came there, 

Tathagata asked him, this monk says that you have killed him without any reason. Sariputra said that these monks are extremely learned and ascetic people. How can I have the audacity to kill them? I am his servant. How can Sariputra, who begs from door to door, have so much courage? If I have caused any pain, I apologize. 

On hearing this, the monk fell at the feet of Sariputra and asked for forgiveness and said, please forgive me. Out of jealousy, I accused you without any reason. Then Mahatma Buddha said to Sariputra, he has committed an unforgivable crime, but please forgive him.


धम्म सेनापति को हो गया है अहंकार

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

बौद्ध धर्म में श्रमणों की कोई कमी नहीं थी। देश के प्रमुख नगरों में भिक्षुक संघ बने हुए थे। हजारों शिष्य इन विहारों में रहकर धर्म दीक्षा लेते थे। आत्म शुद्धि का प्रयास करते थे और समाज में सम्मान पाते थे। लेकिन उनमें से कुछ ऐसे भी थे जो अभी परिपक्व नहीं हुए थे। वह मानवीय अवगुणों से भी मुक्त नहीं हो पाए थे। ऐसे लोग कई बार ऐसी गलतियां कर बैठते थे जो क्षम्य नहीं थीं। लेकिन महात्मा बुद्ध उन्हें सुधारने के लिए अनेक अवसर उपलब्ध कराते थे। 

एक दिन की बात है। महात्मा बुद्ध विहार में बैठे हुए धर्म चर्चा कर रहे थे। तभी आश्रम का एक शिष्य आया और उसने महात्मा बुद्ध से कहा, आपने जब से सारिपुत्र को धम्म सेनापति की उपाधि दी है, तब से वह अपनी मनमानी पर उतर आए हैं। उन्हें अपनी पदवी पर अहंकार हो गया है। वह भिक्षुओं के साथ अत्याचार करते रहते हैं। वह लोगों को मार बैठते हैं। मुझे भी उन्होंने मारा है। 

तब बुद्ध ने कहा कि कोई कारण होने पर भी महात्मा सारिपुत्र किसी को मारें, ऐसा विश्वास नहीं होता है। अकारण किसी को पीटने की बात ही नहीं है। मैं सारिपुत्र को बुलाकर पूछता हूं। थोड़ी देर बाद  सारिपुत्र वहां आए, तो तथागत ने उनसे पूछा, यह भिक्षु कहता है कि तुमने इसे अकारण मारा है। सारिपुत्र ने कहा कि यह भिक्षु अत्यंत विद्वान और साधना करने वाले लोग हैं। इन्हें मारने की धृष्टता कैसे कर सकता हूं। मैं तो इनका सेवक हूं। घर-घर भिक्षा मांगने वाले सारिपुत्र की इतनी हिम्मत कैसे हो सकती है। यदि कोई कष्ट पहुंचा हो, तो मैं क्षमा मांगता हूं। 

यह सुनते ही भिक्षु सारिपुत्र के पैरों में गिर पड़ा और क्षमा मांगते हुए कहा कि मुझे क्षमा करें। मैंने ईर्ष्यावश आप पर अकारण दोष लगाया था। तब महात्मा बुद्ध ने सारिपुत्र से कहा, इसने तो अक्षम्य अपराध किया है, लेकिन आप इसे क्षमा कर दें।

हरियाणा में बिजली कर्मियों की हड़ताल से नागरिक हुए बेहाल

अशोक मिश्र

गुरुग्राम-नूंह में निजी कंपनी को बिजली सप्लाई का लाइसेंस देने के विरोध में बिजलीकर्मियों की हड़ताल से लोगों की परेशानी बढ़ गई है। हड़ताल के पहले दिन 15 जिलों गुरुग्राम, हिसार, हांसी, कुरुक्षेत्र, महेंद्रगढ़, झज्जर, फरीदाबाद, पानीपत, पंचकूला, रोहतक, जींद, कैथल, करनाल, यमुनानगर और अंबाला में देखने को मिला। जिन इलाकों में फॉल्ट आया, उन्हें बिजली कर्मचारी ठीक करने नहीं पहुंचे। करनाल और फरीदाबाद में परेशान लोगों ने जाम लगा दिया है। हड़ताल का सीधा कारण हरियाणा विद्युत विनियामक आयोग का 19 अक्टूबर 2026 का वह फैसला है जिसमें निजी कंपनी इलेवन पावर प्राइवेट लिमिटेड को गुरुग्राम और नूंह जिलों में बिजली वितरण के लिए 25 साल का समानांतर यानी पैरलल लाइसेंस दिया गया है। 

हड़ताली कर्मचारियों का तर्क है कि गुरुग्राम दोनों सरकारी डिस्कॉम के लिए सबसे ज्यादा कमाई वाला इलाका है। अगर वहां निजी कंपनी आकर मुनाफे वाले इंडस्ट्रियल और कॉमर्शियल उपभोक्ताओं को ले जाएगी तो सरकारी निगमों की कमाई काफी हद तक घट जाएगी। फिर गांव, खेत और गरीब उपभोक्ता को सब्सिडी पर बिजली देना मुश्किल हो जाएगा।  बिजली जैसा सेक्टर सीधे निजीकरण नहीं बल्कि धीरे-धीरे कमजोर करने से निजीकरण की तरफ जाता है, जहां पहले समानांतर लाइसेंस, फिर फ्रेंचाइजी और फिर पूरे निगम को निजी हाथ में देने का रास्ता खुलता है और इससे नियमित भर्तियां रुकती हैं। 

आउटसोर्स कर्मचारियों का भविष्य असुरक्षित होता है। वहीं बिजली कर्मचारियों की हड़ताल से परेशान लोगों का कहना है कि बिजली अति आवश्यक सेवा है। इसके बंद होने से अस्पताल, पानी की सप्लाई, स्कूल, छोटे उद्योग और रोजमर्रा की जिंदगी सीधे रुक जाती है। कुरुक्षेत्र, सिरसा, दादरी और भिवानी में पहले दिन ही फीडर बंद और ब्लैकआउट की खबरें इसी का उदाहरण हैं। 

त्योहारी सीजन में इसका असर आम आदमी पर ज्यादा पड़ता है। वैसे भी समानांतर लाइसेंस देना कोई अवैध निजीकरण नहीं है, बल्कि बिजली अधिनियम 2003 की धारा 14 में ही इसका प्रावधान है और अगर आयोग के फैसले से आपत्ति है तो अपीलीय ट्रिब्यूनल फॉर इलेक्ट्रिसिटी या अदालत में चुनौती दी जा सकती है, हड़ताल से फैसला नहीं बदलेगा। वहीं, सरकार का कहना है कि गुरुग्राम जैसे तेजी से बढ़ते जिले में जहां डेटा सेंटर और बड़ी सोसायटियां हैं, वहां मौजूदा ढांचा अकेले लोड नहीं संभाल पा रहा है। 

निजी निवेश से नई केबल, नए सब-स्टेशन और स्मार्ट सिस्टम आएंगे तो उपभोक्ता को ही फायदा होगा, क्योंकि सरकारी कंपनी भी वहीं रहेगी और उपभोक्ता के पास चुनने का विकल्प होगा। कुल मिलाकर यह टकराव दो अलग-अलग दृष्टिकोणों का है, एक जो बिजली को सार्वजनिक संपत्ति और रोजगार की सुरक्षा के नजरिए से देखता है। दूसरा जो इसे प्रतिस्पर्धा, निवेश और उपभोक्ता विकल्प के नजरिए से देखता है।


Thursday, October 22, 2026

Why are you eating dirty rice, my child?


Bodhivriksha

Ashok Mishra

Critics have noted that one of the greatest strengths of Buddhism is its emphasis on the purification of the self. Once an individual achieves this inner purification, they become free from various afflictions—such as envy, malice, attachment, violence, and lust. They learn to value other human beings. 

Perhaps this is why Buddhism flourished so extensively, both within the country and abroad. It was embraced by kings and commoners alike, as it advocates for equality. There is a story about Sariputra. Once, while he was traveling—as Buddhist monks typically did, on foot—he noticed a fisherman’s child picking up and eating grains of rice scattered on the ground. 

Seeing this caused Sariputra great distress. He was, by nature, exceptionally compassionate and guileless; he would even apologize to others when he had committed no fault. It is for this reason that the Buddhist community bestowed upon him the title of 'Dhamma Senapati' (General of the Dhamma). 

He asked the child, "My child, why are you picking up and eating this dirty rice from the ground?" The boy replied, "Respected one, my father is unable to provide for me; he is extremely poor. That is why I am forced to gather and eat rice found on the path." Sariputra asked, 

"Will you come with me? There, you will have food to eat and also get to hear teachings." The boy exclaimed, "That would make my life truly meaningful!" Sariputra brought the child to the Sangha, where he was bathed and given a meal. The boy remained there and made it his home. In time, through his talent and dedication, he attained the status of an Arihant.

तुम गंदे चावल क्यों खा रहे हो, वत्स?

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

बौद्ध धर्म की सबसे बड़ी खूब समालोचकों ने यह बताई है कि वह आत्म शुद्धि को प्रधान मानता है। जब आदमी की आत्म शुद्धि हो जाती है, तो वह कई प्रकार के विकारों से मुक्त हो जाता है। वह ईर्ष्या, द्वेष, राग-अनुराग, हिंसा और काम वासना जैसे विकारों से मुक्त हो जाता है। वह दूसरे इंसानों की कद्र करना सीख जाता है। शायद यही वजह है कि देश-विदेश में बौद्ध धर्म काफी फला फूला। 

इसे राजाओं के साथ-साथ प्रजा ने भी अपनाया क्योंकि बौद्ध धर्म समानता की बात करता है। सारिपुत्र की एक कथा है। एक बार वह कहीं जा रहे थे। बौद्ध भिक्षु सामान्य अवस्था में पैदल ही यात्रा करते थे। रास्ते में सारिपुत्र ने देखा कि मछुआरे का बच्चा रास्ते में पड़े हुए चावल के दानों को बीन बीन कर खा रहा है। यह दृश्य देखकर सारिपुत्र को बहुत पीड़ा हुई। वैसे भी सारिपुत्र काफी दयालु और निष्कपट थे। वह गलती न होने पर भी लोगों से क्षमा मांग लिया करते थे। यही वजह है कि बौद्ध समाज ने उन्हें धम्म सेनापति की उपाधि दे रखी थी। 

उन्होंने उस बच्चे से पूछा, वत्स! रास्ते में पड़े हुए गंदे चावल को बीन-बीनकर क्यों खा रहे हो। उस बच्चे ने जवाब दिया कि मान्यवर! मेरे पिता मेरा पालन पोषण नहीं कर सकते हैं। वह अत्यंत निर्धन हैं। इस वजह से मुझे रास्ते में पड़े चावल को बीनकर खाना पड़ रहा है। 

सारिपुत्र ने कहा कि क्या तुम मेरे साथ चलोगे। वहां तुम्हें खाना मिलेगा और उपदेश भी सुनने को मिलेगा। वह लड़का बोला, इससे तो मेरा जीवन सफल हो जाएगा। सारिपुत्र उस बच्चे को लेकर संघ में आए और उसको नहलाने धोने के बाद खाना दिया। वह बच्चा वहीं रहने लगा। आगे चलकर उसने अपनी प्रतिभा और तपस्या से अरिहंत की पदवी पर पहुंच गया।

पंजाब-हरियाणा को मिलकर नशे के खिलाफ चलाना होगा अभियान

अशोक मिश्र

इन दिनों पंजाब में नशीले पदार्थों का विरोध करने वाले तीन लोगों की हत्या का मामला काफी गरमाया हुआ है। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने विजयादशमी के दिन कहा कि पंजाब में चिट्टा दहन होगा। ड्रग माफिया को पंजाब में सरकार बनने के बाद खोज निकालेंगे। हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी भी गाहे-बगाहे पंजाब में बिकने वाले नशीले पदार्थों को लेकर मान सरकार पर हमलावर रहते हैं। सच कहा जाए, तो नशीले पदार्थों की वजह से पंजाब और हरियाणा दोनों परेशान हैं। पंजाब और हरियाणा में नशे का कारोबार लंबे समय से एक गंभीर सामाजिक, आर्थिक और सुरक्षा संबंधी समस्या बना हुआ है। 

पंजाब विशेष रूप से समस्या के केंद्र में रहा है। यह पाकिस्तान के साथ लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा साझा करता है। गोल्डन क्रिसेंट रूट से आने वाले हेरोइन के मुख्य प्रवेश मार्गों में से एक है।  राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार पंजाब ड्रग तस्करी के मामलों में देश में सबसे आगे रहा है। अफगानिस्तान में उत्पादित हेरोइन और अफीम का एक बड़ा हिस्सा तस्करी के जरिए पंजाब आता है। यह वही रास्ता है जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गोल्डन क्रिसेंट रूट कहा जाता है। ड्रोन, पाइपलाइन, नदी के रास्ते और सीमा पार सुरंगों जैसे नए तरीकों से पिछले कुछ सालों में तस्करी के तरीके और ज्यादा संगठित हुए हैं। 

एक बार पंजाब में दाखिल होने के बाद नशीले पदार्थों की खेप का एक हिस्सा स्थानीय खपत में चला जाता है। इसका एक बड़ा हिस्सा हरियाणा, दिल्ली, हिमाचल और राजस्थान की तरफ भेज दिया जाता है। हरियाणा इस पूरे नेटवर्क में सिर्फ एक ट्रांजिट रूट नहीं रहा, बल्कि पिछले आठ-दस सालों में खुद एक बड़ा बाजार बन गया है। सिरसा, फतेहाबाद, हिसार, अंबाला, पानीपत, कुरुक्षेत्र और पंचकूला जैसे जिले हेरोइन और अन्य नशीले पदार्थों के हॉटस्पॉट बने हुए हैं। 

हरियाणा राज्य नार्कोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के अध्ययनों से पता चलता है कि यहां विभिन्न राज्यों से गांजा, चरस, अफीम, पोस्ता भूसी और सिंथेटिक ड्रग्स पहुंचते हैं। हाल के वर्षों में हरियाणा में भी एनडीपीएस अधिनियम के तहत हजारों मामले दर्ज हुए हैं। सैकड़ों किलोग्राम नशीले पदार्थ जब्त किए गए हैं। राज्य पुलिस ने दर्जनों ड्रग कारोबारियों की पहचान की है। डार्क वेब तथा क्रिप्टोकरेंसी से जुड़े लेन-देन पर भी नजर रखी जा रही है। दोनों राज्यों में यह समस्या केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं बल्कि युवाओं के भविष्य, परिवारों की बर्बादी और सामाजिक ताने-बाने को प्रभावित करने वाला संकट है। 

बेरोजगारी, सीमा की भौगोलिक स्थिति और संगठित गिरोहों की सक्रियता ने इस कारोबार को बनाए रखा है। पंजाब और हरियाणा दोनों ही इस समस्या से निपटने के लिए केंद्र और पड़ोसी राज्यों के साथ समन्वय बढ़ाने पर जोर दे रहे हैं ताकि आपूर्ति श्रृंखला को तोड़ा जा सके और नशे की लत से प्रभावित लोगों के पुनर्वास पर भी ध्यान दिया जा सके।