Wednesday, March 16, 2011

होली का त्योहार और कर्ज

-अशोक मिश्र

उस्ताद गुनाहगार कह रहे थे, ‘यार...वर्ल्ड बैंक के ग्लोबल डेवलेपमेंट फाइनेंस की रिपोर्ट कहती है कि हम दुनिया के पांचवें बड़े कर्जदार देश हैं। यह बात हमारे वित्त मंत्री प्रणव दादा बड़े गर्व से लोकसभा में बताते हैं। वैसे तो कर्ज लेने के मामले में अपने दिल्ली वाले मिर्जा गालिब ही बदनाम थे। लेकिन लगता है कि अपने दादा तो उनसे भी चार जूता आगे निकले। मिर्जा गालिब तो कर्ज की दारू पीने के बाद अपनी फाकामस्ती के रंग लाने का इंतजार करते थे। लेकिन हमारी सरकार वर्ल्ड बैंक से भारी भरकम कर्ज लेने के बाद मरभुक्खे मंत्रियों और सांसदों की समिति गठित करके तरह-तरह के आयोजन कराती है, ताकि उनकी फाकामस्ती दूर की जा सके।’

मैंने जमुहाई रोकते की कोशिश करते हुए कहा, ‘सच? आपकी बात पर विश्वा स नहीं होता है।’

गुनाहगार ने मुझे झिड़कते हुए कहा, ‘जब प्राइमरी वाले गुरु जी कहते थे, इतिहास पढ़ लो, काम आयेगा। तब आपको कुछ दूसरा ही सूझता था। यदि आपने ठीक से इतिहास पढ़ा होता, तो आपको पता होता कि हम सदियों तक कर्ज मांगने के मामले में विश्व शिरोमणि रहे हैं। हमारे यहां का राष्ट्रीय कर्म कर्ज मांगना था। यदि कर्ज न मिले, तो भीख मांगो। पहले पूरा देश एक दूसरे से भीख या कर्ज मांगता था, लेकिन बाद में यह काम कुछ वर्ण के लोगों को ठेके पर दे दिया गया। बाद में इस ठेके के खिलाफ आवाज उठी, तो यह हक देश के उन निकम्मे और कामचोरों को सौप दिया गया जिसे साधु कहते हैं। चार्वाक महोदय ने तो बाकायदा एक सूत्र पूरे देश को थमा दिया था, ‘ऋणम कृत्व घृतम पिबेत।’ चार्वाक तो कहते थे कि इस शरीर के भस्म हो जाने पर कौन किससे कर्ज की रकम वसूलने आयेगा।’

मैंने आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा, ‘क्या...कभी ऐसा भी होता था। लोगों को भीख या कर्ज मांगने में लज्जा भी नहीं आती थी?’

गुनाहगार ने कहा, ‘काहे की लज्जा। लज्जा और भिक्षा में वैसा ही बैर होता है जैसे सौतों में होता है। अरबों-खरबों का कर्ज लेने वाली सरकार कहीं शर्माती है क्या? रूस और चीन कभी शर्म से पानी-पानी हुए? ऐसी कोई खबर अखबारों में छपी क्या?’ इसके बाद गुनाहगार का स्वर एकाएक अत्यंत मधुर हो उठा। वे बोले, ‘यार तुम्हें तो मालूम है कि अगले कुछ ही दिनों में होली आने वाली है। पिछले कई दिनों से लोगों की पाकेट मार रहा हूं, लेकिन कोई खास रकम मिली नहीं। किसी के पर्स से दो सौ से ज्यादा की रकम निकली नहीं। और तुम जानते ही हो कि इस महंगाई के जमाने में इतनी रकम से होली नहीं मनाई जा सकता है। यदि तुम कुछ मदद कर सको, तो....’

गुनाहगार ने पलभर मेरे चेहरे को निहारा, फिर बोले, ‘क्या बताऊं यार, अपने घर का बजट भी बिल्कुल आम बजट की तरह है। होली हो या दीवाली, हमेशा गड़बड़ाया ही रहता है। कभी बच्चे त्योहार के अवसर पर कम बजट का रोना रोते हैं, तो कभी घरैतिन राशन, कपड़े, हारी-बीमारी के मद में कम पैसे को लेकर अपना माथा पीटती है। हर महीने कुछ न कुछ रुपये तो उधारी चुकाने में चला जाता है। अगर तुम कुछ मदद कर सको, तो थोड़े-थोड़े रुपये तुम्हें भी हर महीने वापस करता रहूंगा। वैसे होली पर जब लोग रंग खेलने में मशगूल होंगे, तब मैं अपने ब्लेड का भरपूर उपयोग करूंगा और हो सकता है कि तुम्हारी रकम होली की शाम तक ही वापस हो जाए।’

इसके बाद गुनाहगार ने कर्ज मांगने के वे तमाम लटके झटके अपनाए, जो आम तौर पर सरकारें वर्ल्ड बैंक से कर्ज लेते समय अपनाती हैं। मैं भी दस-बारह हजार रुपये का चूना लगवाकर घर लौट आया।

Tuesday, March 15, 2011

हाय राम...लोकतंत्र मर गया

-अशोक मिश्र

(पर्दा उठता है। दो आदमी दिल्ली की सड़कों पर पैदल जाते दिखाई देते हैं। उनके पीछे-पीछे सूत्रधार आता है और जनता की ओर मुंह करके खड़ा हो जाता है।)

सूत्रधार : यह दिल्ली है। वह दिल्ली जो कई बार उजड़ी और बसी। उजड़ने के दौरान दिल्ली और उसके आस-पास रहने वालों का खून बहा, तो बसने के दौरान श्रमिकों का पसीना। इसी दिल्ली में 15 अगस्त 1947 को पैदा हुई थी लूली-लंगड़ी स्वतंत्रता जिसका अपहरण पैदा होते ही काले बनियों के दलालों ने कर लिया। इसी के कुछ दिन बाद पैदा हुआ लोकतंत्र जिसके सीने पर घोटालों का बदनुमा जन्मजात दाग था। यह लोकतंत्र मर गया, पर कैसे? यह आज तक रहस्य है। तो आइए, आपको रू-ब-रू कराते हैं उस्ताद मुजरिम और टुटपुंजिया पत्रकार से।

(इतना कहकर सूत्रधार पर्दे के पीछे चला जाता है। दिल्ली की सड़कों पर उस्ताद मुजरिम और पत्रकार बुद्धिबेचू प्रसाद घूमते दिखाई देते हैं।)

पत्रकार बुद्धिबेचू प्रसाद :
हाय...हाय...सुबह से दिल्ली की गलियों की खाक छानते-छानते पैर और दिमाग का कचूमर निकल गया। उस्ताद! अगर इन दिनों बेरोजगार न होता, तो आपके चंगुल में कतई नहीं आता। (दर्शकों की ओर मुंह करके) भाइयों, आप तो जानते ही होंगे, बेरोजगार आदमी किसी काम का नहीं होता। बेरोजगारी का एक मच्छर आदमी को नपुंसक बना देती है। अभी कुछ ही दिन पहले तो दैनिक ‘बमबम टाइम्स’ की नौकरी से इस्तीफा दिया है।

उस्ताद मुजरिम :
बेटा बुद्धिबेचू प्रसाद वल्द कलम खसीटू प्रसाद! सड़कों की खाक छानने के फायदे से अभी तुम वाकिफ नहीं हो। इसी से ऐसी बातें करते हो। अगर सुबह से शाम तक खाली पेट सड़कों की खाक छानी जाए, तो दिमाग रूपी गटर से ढेर सारे नए-नए विचार निकलते हैं। ये विचार किसी भी आदमी की तकदीर बदल देते हैं।

बुद्धिबेचू प्रसाद : उस्ताद! सुबह की एक चाय की बदौलत आधी दिल्ली की खाक छान आए हैं। दिमाग के गटर से आइडिये के बगूले तो अब तक नहीं फूटे। हां, इतना जरूर हुआ कि पांच घंटे पैदल चलते-चलते टांगों की कचूमर जरूर निकल गई। मुझे तो लग रहा है कि अगर अब दो कदम भी चलना पड़ा, तो गश खाकर गिर पड़ूंगा। वहीं आप हैं कि किसी जिराफ की तरह लंबे डग भरे चले जा रहे हैं।

(तभी मंच के एक कोने में खड़ी भीड़ नजर पड़ते ही दोनों ठिठक जाते हैं।)

मुजरिम : या इलाही ये माजरा क्या है? यहां इतनी भीड़ क्यों लगी हुई है। बेटा बुद्धिबेचू, आओ चलते हैं, देखते हैं कि मामला क्या है? ’

(दोनों लपककर भीड़ के पास पहुंचते हैं। सड़क के बीचोबीच एक लाश पड़ी है और पुलिस के कुछ सिपाही उसके पास खड़े हैं। भीड़ में शामिल एक आदमी फुसफुसाता है।)

आदमी : साले, पिछले आधे घंटे से खड़े अपने बाप का इंतजार कर रहे हैं। यह नहीं होता कि इसे हटाकर रास्ता साफ करायें।

मुजरिम : अरे! यहां तो कोई मरा पड़ा है, लगता है कि कोई एक्सीडेंट हुआ है। इस देश में कोई भरोसा नहीं कब एक्सीडेंट हो जाए। (उस आदमी से) ‘शिनाख्त हुई? किसकी लाश है यह? पुलिस कुछ करती क्यों नहीं?’

आदमी : (मुस्कुराते हुए) अभी तक तो नहीं हो पाई है। आप भी देख लें, क्या पता आपका ही कोई परिचित निकल आए। वैसे आपको बता दें, पुलिस अपना काम कर रही है।
मुजरिम : मुझे तो पुलिस कोई काम करती नहीं दिखाई दे रही है। हां, सनातनी काम करती जरूर दिख रही है पुलिस। चुपचाप खड़ी मक्खियां मार रही है।

आदमी : (विरोध करते हुए) जी नहीं, पुलिस अपने काम में बड़ी मुस्तैदी से जुटी हुई है। पुलिस को भीड़ में से एक ऐसे आदमी की तलाश है जिसको बलि का बकरा बनाया जा सके। वह आदमी आप भी हो सकते हैं, मैं भी हो सकता हूं। इस भीड़ में शामिल हर व्यक्ति पुलिसवालों की निगाह में सिर्फ बकरा है जिसे जब चाहे, जहां चाहे हलाल किया जा सकता है।

(तब तक मुजरिम भीड़ को चीरकर लाश के पास पहुंच चुके थे।

मुजरिम : (लाश पर नजर पड़ते ही चिल्लाते हैं) अरे! यह तो लोकतंत्र है! हाय राम...यह क्या हो गया?...लोकतंत्र मर गया?’

(मुजरिम की बात सुनते ही ऐं...कहता हुआ एक पुलिस वाला चौंकता है।)

सिपाही : (पिच्च से तंबाकू थूकता हुआ) अबे! तू जानता है इसे? (एक दूसरे पुलिस वाले की तरफ घूमता हुआ)चौबे जी, एक प्रॉब्लम तो इस ससुरे ने साल्व कर दी।’

(सिपाही चौबे जी को पास आने का इशारा करता है।)

मुजरिम: (रुआंसा होकर) ‘हां साब! मैं शिनाख्त कर सकता हूं इसकी। यह लोकतंत्र है...भारतीय लोकतंत्र...दुनिया का सबसे बड़ा किंतु किसी कोढ़ के रोगी की तरह सड़ांध मारता हमारा प्यारा लोकतंत्र। घपलों और घोटालों का मारा लोकतंत्र। विपक्षी दलों द्वारा पंगु बना दिया गया बेचारा लोकतंत्र।’

सिपाही : (मुजरिम का कालर पकड़ते हुए) : ‘क्या बकता है बे! जिस लोकतंत्र की सुरक्षा का भार ‘चार कंधों’ पर हो, वह इस तरह लावारिस मर जाए, यह हमारे लिए शर्म की बात है। तू कहीं नशे में तो नहीं है?’

मुजरिम : (अपना कॉलर छुड़ाते हुए) आप चारों की वजह से ही तो परेशान था यह! आप में से जिसे भी जब मौका मिलता था, दबोच लेते थे और वह सब कुछ कर डालते थे, जो नहीं करना चाहिए। बेचारा साठ-बासठ साल में ही सात सौ साल का लगने लगा था। इधर कुछ दिनों से तो बहुत परेशान था।

सिपाही : (जमीन पर डंडा फटकारता है) साफ-साफ बता, बात क्या है? पहेलियां बूझने की न तो अपनी आदत है और न ही यह भाषा अपने पल्ले पड़ती है। डंडे की भाषा जानता हूं और यह समझाना जानता हूं। कहे तो समझाऊं? तेरे जैसों से रोज पाला पड़ता है।

मुजरिम : (पुलिस वाले के तेवर देखकर खुशामदी लहजा अख्तियार करते हुए) साब! जब से यह टू-जी, राडिया-राजा प्रकरण और आदर्श घोटाला हुआ है, तब से कुछ ज्यादा ही बेचैन था। कुछ साल पहले जब कुछ सांसदों ने सवाल पूछने के नाम पर रोकड़ा मांगा था, तब तो एकदम पागल हो गया था लोकतंत्र। अपनी करतूतों से जितनी बार लोकतंत्र के ये चारों स्तंभ दुनिया के सामने नंगे होते थे, जितनी बार भारतीय राजनीति दागदार होती थी, उतने दाग इसके शरीर पर उभर आते थे। साब, आपको विश्वास न हो, तो इसकी कमीज उलटकर देख लें। इसकी पीठ और पेट पर घोटालों और शर्मनाक कांडों के निशान आपको मिल जाएंगे।’

(मुजरिम की बात पूरी नहीं हो पाती है कि पुलिस की एक जीप आकर भीड़ के पास रुकती है। उसमें से एसएचओ और कुछ सिपाही उतर कर भीड़ को लाश के आसपास से हटाने लगते हैं। पहले से मौजूद सिपाही एसएचओ को जोरदार सल्यूट मारता है।)

सिपाही : ‘मृतक की शिनाख्त हो चुकी है सर। यह आदमी इसे लोकतंत्र बताता है। बाकी आप दरियाफ्त कर लें, हुजूर।

थानेदार : (मुजरिम को पहले ऊपर से नीचे तक निहारता है। फिर कड़क स्वर में पूछता है।) तू क्या बेचता है और कैसे कह सकता है कि यह लोकतंत्र है? जिस लोकतंत्र की रक्षा में देश-प्रदेशों के सांसद, विधायक, सत्तारूढ़ और गैर सत्तारूढ़ पार्टियों के नेता, अफसर लगे हुए हों। पूरा का पूरा पुलिस महकमा लगा हुआ हो, वह लोकतंत्र इस तरह सड़क पर लावारिस मरा हुआ पाया जाए, यह कैसे हो सकता है? अगर सचमुच लोकतंत्र मर गया, तो सबके भूसा भर दूंगा।

मुजरिम : (थूक निगलते हुए) हुजूर! मैं कुछ बेचता नहीं, एक मामूली पाकेटमार हूं। मेरा और आपका पेशा लगभग एक जैसा है। जिस काम को आप बड़े पैमाने पर सामूहिक रूप से करते हैं, वही काम मैं छोटे स्तर पर व्यक्तिगत रूप से करता हूं। आप इस काम की पगार लेते हैं, जबकि मैं अगर यह करता पकड़ा जाऊं, तो पब्लिक से लेकर पुलिसवालों तक के जूते खाता हूं। अब तो आप जान ही गए होंगे कि मेरा नाम मुजरिम है।

मुजरिम : (सांस लेने के लिए पल भर को रुकता है।) इस लोकतंत्र से मेरी पुरानी यारी रही है। हम दोनों एक दूसरे के लंगोटिया यार थे। मजे की बात तो यह है कि हम दोनों की पैदाइश भी एक ही दिन की है। मेरी मां ‘व्यवस्था’ बताती हैं कि जिस समय मैं यानी मुजरिम पैदा हुआ था, खूब हट्टा-कट्टा था, लेकिन यह तो जन्म से ही लंगड़ा था। कहते हैं कि अंग्रेजों और देसी पूंजीपतियों से इसके ‘बापू’ बड़ी सहानुभूति रखते थे। वे नहीं चाहते थे कि विद्रोहिणी क्रांति यानी मेरी मौसी कोई ऐसा बच्चा जने, जो इन दोनों यानी बापू और लोकतंत्र के लिए खतरनाक साबित हो। इसलिए ‘बापू’ ने गर्भवती ‘क्रांति’ के पेट पर लात मारकर गर्भ गिरा दिया था। बाद में पता नहीं कैसे क्रांति की सौतेली बहन व्यवस्था के गर्भ से यह लंगड़ा लोकतंत्र पैदा हो गया। अंग्रेज पूंजीपतियों ने हम जैसों का खून चूसकर इसको पाला-पोसा। काले बनियों ने बैसाखी के सहारे चलना सिखाया। इसीलिए यह काले बनियों का मुरीद बनकर रह गया। काले बनियों पर जब भी कोई मुसीबत आती थी, यह डेढ़ टांग पर खड़ा होकर अपनी साजिशी तान देने लगता था। साब! मजाल है, कोई मुसीबत इसकी जानकारी में इन काले बनियों का कुछ बिगाड़ सके। यह तो बातचीत के दौरान अक्सर कहा करता था। बनिये इस देश के भाग्यविधाता हैं। भाग्य विधाता का हित सुरक्षित रहे, इसके लिए जरूरी है कि जनता के हित असुरक्षित रहें। उनका भरपूर शोषण होता रहे।

एसएचओ: (आंख पर चढ़ा काला चश्मा उतार कर लाश का मुआयना करता है। कमीज उलटकर लाश के पास बने एक पैदायशी निशान को गौर से देखता है।) हवलदार रामधनी, नोट करो। मृतक की कमर से दो इंच नीचे एक पैदायशी निशान है।

मुजरिम : (एसएचओ की बात काटते हुए) हां साब, यह निशान जीप घोटाले का है। हुजूर! आप तो जानते ही होंगे, देश का सबसे पहला घोटाला ही जीप घोटाला था। तब यह पैदा नहीं हुआ था। हां, व्यवस्था के गर्भ में भ्रूण रूप में जरूर आ चुका था। उस समय देश पर अंग्रेजों का शासन था। लेकिन उस घोटाले के पैदायशी निशान इसकी कमर पर उभर आए थे। इसके बाद देश आजाद हो गया। कुछ दिन तक सत्ताधीशों ने चना-चबैना खाकर दिन काटे, लेकिन एक मंत्री से बर्दाश्त नहीं हुआ। उसने आजाद भारत का पहला घोटाला किया। इस घोटाले का निशान आपको लोकतंत्र के ठीक दिल के पास दिख गया होगा। इसके बाद मंत्री, सांसद, विधायक और अधिकारी मरभुक्खों की तरह लोकतंत्र पर टूट पड़े और लूट-लूट कर खाने लगे। फिर क्या था। जैसे-जैसे घोटाले बढ़ते गए। लोकतंत्र के शरीर पर दाग बढ़ते गए। जितना बड़ा घोटाला, उतने बड़े दाग। लोकतंत्र का चेहरा ही बदरंग हो गया। साब, एक बात बताऊं! हर घोटाले पर इसकी आत्मा कराह उठती थी। कई बार तो मैंने इसे बिलख-बिलखकर रोते देखा था।

एसएचओ : (रोब झाड़ता हुआ) अबे! तू फालतू की राम कहानी छोड़। सबसे पहले तो तू यह बता, यह मरा कैसे?’

मुजरिम: (एसएचओ की बात सुनकर सिटपिटा जाता है।) साब! मैं यह कैसे बता सकता हूं। मैं कोई डॉक्टर तो नहीं हूं। आप लाश का पंचनामा बनाइए, पोस्टमार्टम के लिए भेजिए। कल तक आपको सब पता चल जाएगा। हां, इतना बता सकता हूं...कल रात यह मेरे पास आया था। कुछ बोल नहीं पा रहा था। बीच-बीच में आदर्श..आदर्श...कामनवेल्थ-कामनवेल्थ, राडिया-राजा जैसा कुछ बड़बड़ा रहा था। फिर बोला कि मैं किसी को मुंह दिखाने के लायक नहीं रहा। इतना कहकर लोकतंत्र कहीं चला गया था। मैंने समझा कि घर गया होगा। आज सुबह यहां इसकी लाश देखी। मेरा ख्याल है कि यह शर्म से मर गया है।’

सिपाही : (एसएचओ के कान में फुसफुसाता है।) ‘साब! मुझे तो यही कातिल लगता है।’

एसएचओ : पकड़ लो साले को, यही हत्यारा है। पकड़कर थाने ले चलो और चार्जशीट तैयार करो।
(लोकतंत्र की हत्या के जुर्म में मुजरिम पकड़ लिया जाता है। पत्रकार बुद्धिबेचू प्रसाद चुपचाप वहां से खिसक लेता है।)

(इस नुक्कड़ नाटक को संस्थाओं को इस शर्त पर मंचन की अनुमति प्रदान की जाती है कि वे रचियता के रूप में मेरा नाम देंगे। यदि वे कोई संशोधन या सुधार करते हैं, तो इसके बारे में भी जानकारी देंगे।)

Friday, March 4, 2011

विकीलीक्स के फंदे में गुनाहगार

-अशोक मिश्र

कल उस्ताद गुनाहगार घर आए, तो बहुत घबड़ाए हुए थे। मैंने उन्हें ठंडा पानी पिलाया और पूछा, 'क्या बात है उस्ताद! काफी घबराए हुए से हैं। भाभी जी ने तलाक तो नहीं दिया है न!'

उस्ताद ने बसंत ऋतु में ही माथे पर चुहचुहा आए पसीने को पोछते हुए कहा, 'तुम्हारी भाभी गयीं मिट्टी का तेल लेने। तुम्हें इसके अलावा कुछ सूझता भी है? यहां विकीलीक् स वालों द्वारा नाक में दम कर देने का अंदेशा है और तुम हो कि भरी दोपहरिया में राग विहान गा रहे हो। पहले तो मुझे यह बताओ कि ये विकीलिक्स क्या बला है। क्या विकीलीक्स की पहुंच हर कहीं है? अमेरिका राष्ट्रपति के बेडरूम से लेकर अमीनाबाद के मदर चेंज...मेरा मतलब है कि माता बदल पंसारी के गोदाम तक...।'

उस्ताद की बात सुनकर मैं चौंक गया। उस्ताद और विकीलीक्स के बीच किसी कनेक्शन की बात मैं सोच भी नहीं पा रहा था। काफी दिमाग खपाने के बाद भी जब नहीं सूझा, तो उस्ताद से ही पूछ लिया, 'उस्ताद, विकीलीक्स का आपसे क्या लेना देना। कहां आप और कहां विकीलीक्स। भारत के ख्यातिप्राप्त पाकेटमार का विकीलीक्स जैसे टुटपुंजियां नेकवर्क से क्या वास्ता?'

उस्ताद ने गहरी सांस लेते हुए कहा, 'अमां यार! कुछ भी कहो, विकीलीक्स ने तो अमेरिका और भारत जैसे देशों की आंख में अपनी अंगुली घुसेड़ रखी है। पट्ठे ने कैसी-कैसी बातें उजागर की है। अमेरिका के राष्ट्रपति विदेशी राष्ट्राध्यक्षों को यह कहते हैं, वह कहते हैं, जैसी बातें भी खोल कर रख दी है। तभी तो अमेरिका वाले तिलमिलाए घूम रहे हैं। गुरु कहो चाहे कुछ भी, लेकिन ये विकीलीक्स वाले हैं बडेÞ शातिर।'

'लेकिन आप यह बताएं कि आप विकीलीक्स के मामले में कहां फिट होते हैं। आपकी टांग उसमें कैसे फंसी हुई है।'

मेरी बात सुनते ही उस्ताद एक बार फिर उदास हो गए। उन्होंने कहा,'कोई जुगाड़ हो, तो विकीलीक्स वालों से मेरी बात कराओ। अगर विकीलीक्स वालों के पास मेरे बारे में कोई जानकारी हो, तो मैं उसे किसी भी कीमत पर खरीद या वह सूचना लीक करने से रोकना चाहता हूं।'

उस्ताद की बात सुनकर मुझे कोफ्त हुई। बात क्या है, यह बताने की बजाय लंतरानी हांके चले जा रहे हैं। मैंने थोड़ा तल्ख लहजे में कहा, 'जब तक मामले की पूंछ मेरी पकड़ में नहीं आएगी, तब तक मैं आपकी समस्या का हल नहीं सुझा सकता। आप कम से कम मुझे तो साफ-साफ बताएं कि माजरा क्या है। विकीलीक्स वालों ने आपकी कौन-सी भैंस खोल दी है। या आपके घर से भेली (गुड़) चुरा ली है।'

उस्ताद ने 'सूं...' करके गहरी सांस ली और बोले, 'बात यह है कि तुम्हारी भाभी को शक है कि मैं बाजू वाली मिसेज सक्सेना को लाइन मारता हूं। बात दरअसल यह है कि कुछ दिन पहले घर से निकलते वक्त मिसेज सक्सेना से थोड़ी बात हो गई। उसके अगले दिन मिसेज सक्सेना बाजार में मिल गईं। ऐसा ही संयोग तब बना, जब मैं तुम्हारी भाभी जी के साथ मल्टीप्लैक्स में 'आन मिलो सजना' देखने गया। वहां मिसेज सक्सेना को देखते ही बेगम के कान खड़े हो गए। पता नहीं किस नामुराद ने तुम्हारी भाभी को पिछली दो मुलाकातों के बारे में बता दिया। तब से मैं उसको खोज रहा हूं। अगर वह मिल जाए, तो उसके कान के नीचे गरम कर दूं। इस मामले में तो वही कहावत चरितार्थ हो रही है कि सूत न कपास, जुलाहे से लट्ठमलट्ठा। अभी कल ही अखबारों में पढ़ा है कि विकीलीक्स वालों की इतनी तगड़ी पहुंच है कि वे पूरी दुनिया के बारे में राई-रत्ती खबर रखते हैं। सोचता हूं कि कहीं विकीलीक्स वालों ने तो तुम्हारी भाभी के कान नहीं भरे हैं। अगर उनके पास मेरी और मिसेज सक्सेना की बात करते हुए फोटो-सोटो हो और वह बेगम के हाथ लग गए, तो अपनी लंका लग जाएगी। यदि कोई सुबूत वगैरह हो, तो पैसा ले-देकर मामला सुलट जाए, तो अच्छा है।'

उस्ताद गुनाहगार की बात सुनकर मुझे काफी हंसी आई। मैंने ठहाका लगाते हुए कहा, 'उस्ताद! काली भेड़ को खोजना है, तो अपने इर्द-गिर्द रहने वालों में तलाशिए। विकीलीक्स वालों के पास आपके खिलाफ कोई सुबूत नहीं होगा, इसकी मैं गारंटी लेता हूं।'

मेरी बात सुनकर उस्ताद गुनाहगार झटके से उठे और बोले, 'तुमसे कोई सलाह मांगना ही बेकार है। जब मैं कहता हूं कि विकीलीक्स वालों की यह करतूत हो सकती है, तो आप उसे क्लीन चिट देने पर तुले हुए हैं। लगता है कि तुम विकीलीक्स वालों से पैसा खा गए हो।!' इतना कहकर वे चलते बने।

छबीली, मुसद्दीलाल और सेंसर

-अशोक मिश्र

मुसद्दी लाल इन दिनों बहुत परेशान हैं। उनकी परेशानी का कारण दिनोंदिन दैनिक जीवन में उपयोगी साबित होने वाली तकनीकी वस्तुएं हैं। कल सुबह होते ही वे मेरे घर में नमूदार हुए। उनके चेहरे की भावभंगिमा बता रही थी कि वे इन दिनों संकट में हैं। उनके प्रति मुझे प्रतिद्वंद्वीभाव वाली सहानुभूति हुई। दरअसल प्रतिद्वंद्वी भाव इसलिए क्योंकि जब मैं भी परेशान या बीवी से पिटा हुआ उनके पास पहुंचता हूं, तो वे भी सहानुभूति जताते हुए मंद मुस्कान बिखेरते रहते हैं। मैंने पूछा,' भाई साहब! क्या आजकल कुछ गड़बड़ चल रही है। घर या आफिस में सब कुछ ठीक-ठाक तो है।' मुसद्दीलाल ने गहरी सांस लेते हुए कहा, 'यार! यह बताओ, क्या टेक्नोलॉजी का इतना महत्व हो सकता है कि वह किसी का जीना हराम कर दे। इन दिनों मैं आधुनिक तकनीक और प्यार के साइड इफेक्ट का मारा कुत्ते की तरह कभी इस घाट तो कभी उस घाट फिर रहा हूं।'

यह कहते-कहते मुझे लगा कि मुसद्दीलाल अभी रो पड़ेंगे। मैंने लपककर उनकी पीठ पर सांत्वना से थपकी देते हुए कहा, 'भाई साहब! आपकी बात मेरे पल्ले नहीं पड़ रही है। दरअसल आपके साथ दिक्कत यह है कि आप मुझे अक्लमंद समझ रहे हैं, लेकिन हूं मैं मंदअक्ल। जब तक आप मुझे सारी बातें खुलकर नहीं बताएंगे, तब तक मेरे तो पल्ले आपकी बात पड़ने से रही।'

'अब तुमसे क्या कहूं। छोटे भाई हो, तुमसे कहते हुए शर्म आती है। अच्छा एक बात बताओ...अगर तुम किसी के घर गए और उसके घर में ऐसा ताला लगा है या उस घर की दीवारें सेंसर्ड हों..मेरा कहने का मतलब यह है कि अगर तुम उस घर के ताले या दीवार को छुओ और वह जोर-जोर से बजने लगे, तो क्या तुम चोर हो जाओगे।' मुसद्दीलाल मेरे सामने थोड़ा सा खुले।

'नहीं, आप तो उस घर के मालिक से मिलने गए होंगे...तो चोर क्यों हुए। लेकिन फिर भी बात मेरी समझ में नहीं आई।' मैंने नादान बन जाने में ही भलाई समझी। मुसद्दी लाल की बातों में अकसर इतने पेंच रहते हैं कि सामने वाले को पेंच ही पेंच दिखाई देते हैं और असली बात गायब होती है। 'बात दरअसल यह है कि परसों बीवी के साथ मैं बाजार गया था। वहां एक मोटरसाइकिल खड़ी थी। अनायास मेरी बीवी का हाथ उस मोटरसाइकिल की गद्दी से छू गया, तो वह मोटरसाइकिल 'टीं...टीं...' करती हुई तब तक चिल्लाती रही, जब तक तुम्हारी भाभी ने अपना हाथ गद्दी से नहीं हटा लिया। बस, इसी घटना ने तुम्हारी भाभी के दिमाग में एक खुराफात को जन्म दिया। उस खुराफात के चलते मैं डमरू बना घूम रहा हूं।'

'भाई जी! अब भी बात मेरी समझ में नहीं आई?' मैंने गहरी सांस लेते हुए कहा।

'बात यह है बेवकूफ! कि तुम्हारी भाभी ने पता नहीं कहां से वह सेंसर खरीद लिया और रात में सोते समय मेरी बांह में एक छोटा-सा चीरा लगाकर उसे रखवा दिया।' अब मुसद्दीलाल मायूस हो चले थे। उनकी मायूसी मुझसे देखी नहीं जा रही थी, लेकिन इस मामले में मैं कुछ कर पाने में अपने को असमर्थ पा रहा था। मैंने कहा, 'तो इससे क्या हुआ! आप किसी मोटरसाइकिल को छूते होंगे, तो वह 'टीं..टीं...पीं...पीं...' जैसी आवाज निकालने लगती होगी।

'नहीं बेवकूफानंद! किसी मोटरसाइकिल को नहीं, किसी महिला को छूते ही घर में रखे रिसीवर से आवाज आने लगती है। इससे मेरी बीवी जान जाती है कि आज में इतनी बार किसी महिला के संपर्क में आया हूं। अब अगर राह चलते किसी महिला या लड़की से भूलवश भी टकरा जाऊं, तो घर में महाभारत शुरू हो जाती है। हर बार आवाज आने की कैफियत देनी पड़ती हैै।'

मैंने तपाक से कहा, 'तो आप आपरेशन कराकर यह चिप निकलवा क्यों नहीं देते?' मैंने उन्हें ज्ञान दिया।

मुसद्दीलाल ने कहा, 'अजीब अहमक हो तुम! इधर मैंने चिप निकलवाया, उधर घरैतिन मायके चल देगी। अब इस उम्र में आधा दर्जन से ज्यादा बच्चों की देखभाल मेरे से नहीं हो पाएगी।'

'तो फिर मर्यादा पुरुषोत्तम राम की तरह एक पत्नी व्रत का पालन कीजिए।' मैंने फिर उन्हें ज्ञान देने का कर्तव्य पूरा किया।

'अबे लल्लू! राम केवल इसलिए एक पत्नी व्रतधारी रहे क्योंकि उन्हें दूसरी कोई मिली नहीं।' इतना कहते हुए मुसद्दी लाल भड़क उठे, 'पिछले चौबीस घंटे से छबीली से नहीं मिल पाया हूं और तुम हो कि थोथा ज्ञान दे रहे हो मुझे। आज बेटा मेरे सितारे गर्दिश में हैं। कल तुम इस सेंसर की गिरफ्त नहीं आओगे, इसकी क्या गारंटी है! तब बेटा मैं भी इसी तरह ज्ञान दूंगा।' इतना कहकर वे अपने घर चले गए।

Monday, February 28, 2011

सांसद जी, प्लीज लाइन में आइए

अशोक मिश्र
मेरे दफ्तर में घुसते ही टाइम आफिस के पास उपस्थिति रजिस्टर रखा हुआ है। इस रजिस्टर में आते और जाते समय हम जैसे मजदूरों को दस्तखत करना पड़ता है। आने और जाने के समय में थोड़ा सा भी हेरफेर हुआ, तो समझो कि मजदूरी कट। उस दिन काम करने के बावजूद वेतन बट्टे-खाते में गया। यही वजह है कि जिस दिन कोई घर जाने की जल्दी में अगर ड्यूटी खत्म करने का समय डालना भूल गया, तो वह घर पहुंचने के बाद फोन करता है, 'अरे सुरेश! यार मैं आते समय टाइम डालना भूल गया था, जरा बारह पीएम का टाइम डाल देना। रजिस्टर पर पेज नंबर 420 है।' कोई किसी को फोन करता है, तो कोई किसी को। सभी अपने-अपने खासुलखास को फोन करते हैं।
यह हाल जब मुझे देश की संसद में देखने को मिला, तो मैं समझ गया कि दफ्तर और संसद में कोई फर्क नहीं है। हुआ क्या कि एक दिन मैं अपने एक परिचित सांसद की पहुंच की बदौलत संसद में प्रवेश का पास पा गया। पहली बार संसद भवन में घुसने का रोमांच और गर्व कुछ खास किस्म का होता है। इस बात को वही समझ सकता है, जिसने पहली बार संसद भवन में प्रवेश करने का हक बड़ी आसानी से प्राप्त किया हो। मैंने अपना कॉलर ऊंचा किया और सोचा, 'अब मोहल्ले और दफ्तरवालों को बड़े गर्व से बताऊंगा कि बेटा! मैं भी संसद भवन रिटर्न हूं।'
मुझे संसद भवन में प्रवेश दिलाने वाले सांसद महोदय तो मेरे चकित होकर चकरबकर देखने के दौरान ही कहां गुम हो गए, मुझे नहीं मालूम। पास हाथ में पकड़े मैं इधर-उधर भटकने लगा। एक जगह देखा कि रिसेप्शन पर रजिस्टर रखा हुआ है और सांसद-मंत्री लाइन में लगे हुए हैं। तब तक पीछे वाले एक मुरहे सांसद ने आगे वालों को ठेल दिया। लाइन बिगड़ गई। पीछे वाले आगे हो गए और आगे वाले पीछे। आगे से पीछे हो जाने वाले एक सांसद ने आगे हो गए विरोधी दल के नेता सांसद का कुरता पकड़कर खींचा, तो कुरता 'चर्र...चर्र' की आवाज करता हुआ फट गया। इस पर दोनों सांसद गुत्थमगुत्था हो गए। मार्शल ने आकर उन्हें छुड़ाया। यह देखकर मुझे रेलवे स्टेशन पर टिकट खिड़की पर लगने वाली लाइन याद आ गई। संसद भवन में मार्शल ठीक उसी तरह बार-बार लाइन लगवा रहा था जिस तरह डंडे के बल पर रेलवे स्टेशन पर जीआरपी, होमगार्ड्स या रेलवे पुलिस का सिपाही लाइन सही करवाता है। मार्शल बार-बार टेढ़ी लाइन को सीधी करवाने के बाद कहता जाता था, 'सांसद जी, प्लीज लाइन में आइए। दस्तखत कीजिए। यह भत्ता रजिस्टर शाम तक रखा रहेगा।' यह देखकर मेरी समझ में आ गया कि रेलवे स्टेशन की टिकट खिड़की, मेरे कार्यालय में रखा वेतन एवं हाजिरी रजिस्टर, हम कर्मचारियों और सांसदों, मार्शल और होमगार्ड्स के जवान में बेसिक फर्क कुछ नहीं है।
(28 फरवरी 2011 को अमर उजाला के संपादकीय पेज पर प्रकाशित)

Sunday, February 27, 2011

गंधाती, बजबजाती पत्रकारिता को आईना

-अशोक मिश्र
सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक ही नहीं, जीवन के सभी क्षेत्रों में स्थापित मूल्यों में ह्रास आया है। पत्रकारिता इससे अछूती कैसे रह सकती है। पिछले दो दशकों में राजनीति और पत्रकारिता का बड़ी तेजी से पतन हुआ है। पैसा, चमक-दमक, रुतबा और दलाली का पर्याय बनती पत्रकारिता का खूबसूरत चेहरा ही बदरंग होता नजर आ रहा है। पत्रकारिता जगत में चल रही उठापटक, खींचतान, अखबार के दफ्तरों में चलने वाली राजनीति का चित्र उकेरता दयानंद पांडेय का उपन्यास ‘हारमोनियम के हजार टुकड़े’ अपने उद्देश्य में काफी हद तक सफल रहा है। लखनऊ से प्रकाशित होने वाले एक अखबार ‘आजाद भारत’ के माध्यम से लखनऊ और दिल्ली की पत्रकारिता की कलई खोलकर उपन्यासकार दयानंद पांडेय ने रख दी है। इस उपन्यास को पढ़ने का आनंद तब द्विगुणित हो जाता है, जब उन पात्रों से आप किसी न किसी रूप में जुड़े रहे हों। उपन्यास ‘हारमोनियम के हजार टुकड़े’ के कई पात्र ऐसे हैं जिन्हें मैं व्यक्तिगत रूप से जानता हूं, उनके साथ काम किया है या लखनऊ की पत्रकारिता में कुछ वर्ष सक्रिय रहने की वजह से उन तमाम पात्रों को जानता-पहचानता हूं। उपन्यास में उकेरी गई स्थितियां कमोबेश आज लगभग हर अखबार के दफ्तर में दिखाई देती हैं। अखबार के दफ्तरों में वरिष्ठ पदों पर बैठे लोगों के बीच चलने वाली घृणित राजनीति से मीडिया जगत से जुड़ा हर व्यक्ति वाकिफ होगा। उपन्यासकार एक स्थान पर मीडिया जगत की कलई खोलते हुए लिखता है कि दलाली करना, दुम हिलाना और बात है, अखबार चलाना और बात। उन दिनों अखबारों में क्या था कि अस्सी परसेंट पत्रकार काम करने वाले होते थे और बीस परसेंट दलाली करने वाले। और यह अनुपात रिपोर्टरों के बीच का ही होता था। डेस्क का कोई इक्का-दुक्का ही दलाल पत्रकार होता। तो यह दलाल पत्रकारिता के नाम पर अखबार मालिकों से लेकर मंत्रियों, अधिकारियों, दारोगाओं तक के आगे जी-हुजूरी और दुम हिलाने में एक्सपर्ट। एक स्थान पर उपन्यासकार जातीय और सिफारिश के बल पर कुर्सी हथिया लेने वाले अक्षम संपादकों पर टिप्पणी करते हुए कहता है, ‘मुकुट जी जिला संवाददाता होने की योग्यता नहीं रखते, लेकिन उनकी किस्मत देखिए कि वह वर्षों से विशेष संवाददाता हैं और विधानसभा कवर करते हैं। और अब यही मुकुट जी कार्यकारी संपादक बनने जा रहे हैं।
उपन्यास की कथा वस्तु एक हारमोनियम के माध्यम से पिरोई गई है। वस्तुत: हारमोनियम प्रतीक है पत्रकारिता जगत की पेशेगत पवित्रता का, उसकी साफगोई और जन पक्षधरता का, जो वक्त-बेवक्त बजता ही रहता है। लेकिन अफसोस है कि जब संपादक नामधारी गुंडा इसे तोड़ देता है, तो पेशेगत पवित्रता, जनपक्षधरता और साफगोई विपरीत समय जानकर चुप हो जाती है। सुनील कथा का नायक है, उसके माध्यम से कथा आगे बढ़ती है। आजाद भारत में कभी एक ट्रेडयूनियन होती थी। हालांकि अपने जन्म काल में ट्रेड यूनियन भले ही इस व्यवस्था के खिलाफ रही हो, लेकिन कालांतर में इसका स्वरूप बदला और मिल, कारखानों से लेकर अखबार के दफ्तरों में सक्रिय ट्रेड यूनियनें मालिकों की दलाली ही इनका पेशा बन गया। उपन्यास में ट्रेड यूनियन की कलई पर्त-दर-पर्त प्याज के छिलके की तरह खोली गई है। इस उपन्यास में संपादक और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के बीच चलने वाली उठापटक, भितरघात और आपसी खींचतान का प्रामाणिक खाका खींचा गया है। उपन्यास ‘हारमोनियम के हजार टुकड़े’ में मालिक या संपादक बदल जाने पर अखबार आजाद भारत के मुलाजिमों को होने वाली परेशानी, जुझारू और चमचागिरी न कर पाने वाले रिपोर्टरों और डेस्क पर काम करने वालों को क्या-क्या और किस तरह की दिक्कत होती है, उसका खाका नायक सुनील के माध्यम से खींचा गया है। उपन्यास पत्रकारिता के बदलते चरित्र का एक खूबसूरत कोलाज रचता हुआ अपनी यात्रा पूरी करता है।
इस उपन्यास में अखबार के मालिक और संपादक के बदलते संबंधों को अच्छी तरह से रेखांकित किया गया है। आजाद भारत के मालिकान की पहली पीढ़ी अपने ही अखबार के संपादक को फोन करके पूछते थे कि आपके पास समय हो, तो बताइए। हम आपसे मिलना चाहते हैं, एक बहुत जरूरी काम है। लेकिन बाद की पीढ़ी के मालिक संपादक को हुक्म देते हुए कहते कि जरा कोठी पर जल्दी आ जाइए। हमें आपसे कुछ बातें करनीहै। अगर कहीं संपादक का अहम जागा और वह कह बैठा कि अभी तो मैं व्यस्त हूं। अखबार के काम से फुरसत पाकर आपके पास हाजिर हो जाऊंगा। तो मालिकान झिड़क देते कि बाद में मेरे पास फुरसत नहीं है। आजाद भारत में दूसरी पीढ़ी के मालिकों का वर्चस्व कायम होने पर जब ऐसा ही कुछ शुरू हुआ तो पैंतीस साल से दैनिक आजाद भारत में नौकरी करने के बाद अपनी मेहनत और योग्यता के बल पर बने संपादक को लग गया कि अब नौकरी के दिन पूरे हो गए हैं। वह किसी की सिफारिश या चापलूसी करके तो संपादक बने नहीं थे। कोई लालच या कोई दबाव उनके आगे बेमानी था। वे कभी झुकते नहीं थे। सिद्धातों और पत्रकारिता के मूल्यों को सर्वोपरि समझने वाले संपादक ने जब इस्तीफा दिया, तो आफिस से घर जाते और अपने निजी सामान ले जाते समय उनकी तलाशी ली गयी। उन्हें निजी सामान और किताबें ले जाने की अनुमति नहीं दी गई। संपादक के इस अपमान के विरोध में न तो यूनियन का कोई नेता बोला, न ही पत्रकार और मैनेजमेंट से जुड़े कर्मचारी। यह पत्रकारिता के पतन की शायद पहली सीढ़ी थी। इतना ही नहीं, इस अखबार के साथ-साथ निकल रहे अंग्रेजी अखबार के एडीटर इन चीफ मेहता को भी अखबार मालिकों और राजनीतिज्ञों के तलवे सहलाना या तलवे चाटना पसंद नहीं था। नतीजा यह हुआ कि उनकी अखबार प्रबंधन से आए दिन ठनी रहती। अखबार में जब प्रबंधन और मालिकों का हस्तक्षेप कुछ ज्यादा बढ़ गया, तो उन्होंने भी इस्तीफा दे दिया। वैसे भी मेहता जी किसी अखबार में दो-तीन साल से ज्यादा टिक नहीं पाते थे। वे अखबार के मामले में किसी का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं कर पाते, तो मालिक उन्हें बर्दाश्त नहीं कर पाता।
संपादक के त्यागपत्र देने के बाद कार्यकारी संपादक बनाए गए मुकुट जी। मुकुट जी का सपना अखबार का संपादक बनना, विधानपरिषद में जाना और पद्मश्री हासिल करना था। लेकिन उनके ये तीनों सपने पूरे नहीं हुए। नया संपादक मुख्यमंत्री की सिफारिश से नियुक्त किया गया। मुख्यमंत्री ने लाखों रुपये के विज्ञापन एडवांस दिलाये। इस संपादक ने सबको साध लिया, मुख्यमंत्री, सरकारी अधिकारियों, अखबार के एमडी और चेयरमैन सबको। नए संपादक ने आजाद भारत के सहयोगी प्र्रकाशन की 125वीं जयंती पर तत्कालीन प्रधाानमंत्री स्व. राजीव गांधी से अखबार के मालिकों की मुलाकात करवाई, तो मालिकों ने इस मौके का फायदा उठाया और दो केमिकल फैक्ट्रियों का लाइसेंस ले लिया। यह वही समय था, जब अखबार के मालिकों में अपने संपादक या रिपोर्टरों की बदौलत फायदा उठाने की प्रवृत्ति सिर उठा रही थी।
इसके बाद बिहार के मुंगेर निवासी मनमोहन कमल दैनिक आजाद भारत के प्रधान संपादक नियुक्त किए गए। एक कांग्रेसी राज्यपाल की सिफारिश और कांग्रेस के कोषाध्यक्ष केशरी की बदौलत प्रधान संपादक बने मनमोहन कमल का स्त्री प्रेम विख्यात था। पढ़ाई के दौरान वैश्य परिवार की लड़की से प्रेम विवाह करने मनमोहन कमल की शोहरत महिला प्रेम के लिए कम नहीं थी। वे चाहे समाचार एजेंसी में रहे हों, किसी साप्ताहिक या दैनिक में, उनके अपनी पी.ए. से लेकर कई तरह की महिलाओ से संबंधों के चर्चे खूब चटखारे लेकर किए जाते रहे। लखनऊ में एक सूचना अधिकारी की पत्नी से उनके संबंधों की कथा अभी पूरी तरह से विस्मृत भी नहीं हुई थी कि एक दिन उसी सूचना अधिकारी की बेटी से संबंधों की कहानी आम हो गई। लोग पीठ पीछे रस ले-लेकर अवैध संबंधों का यह पुराण बाचने लगे। लेकिन मनमोहन कमल सूचना अधिकारी की बेटी को भोग कर अन्य औरतों की तरह किनारे नहीं कर पाए। उन्हें उससे विवाह करना ही पड़ा। जैसे-जैसे उनका कैरियर उछाल पाता जा रहा था, औरतों के प्रति उनकी आशक्ति बढ़ती जा रही थी। उनको कोई कुछ बिगाड़ भी नहीं पा रहा था। उनके कार्यकाल के दौरान ब्यूरो में भी यह बात प्रचलित हो गई थी कि लगभग हर यूनिट या ब्यूरो में किसी सुदर्शना का होना जरूरी था। ताकि जब कभी मनमोहन कमल वहां जाएं, तो उनका सौंदर्यबोध तृप्त हो और उन्हें काम करने में भी आसानी हो। आजाद भारत के लखनऊ यूनिट के पुरुष पत्रकार महिला साथियों की दिनोंदिन होती प्रगति को लेकर चिढ़ते थे। वे आपस में बातचीत करते हुए कहा करते थे कि यार हम लोग भी आपरेशन करवाकर अपना जेंडर चेंज करवा लें। सफलता, प्रमोशन और पैसा तभी मिलेगा। मनमोहन कमल के बारे में एक बात और मशहूर थी कि वे जिस अखबार में जाते हैं, वह अखबार या तो बिक जाता है या फिर बंद हो जाता है। अखबारों को बंद कराने का लांछन उनके आगे आगे चलता था।
मनमोहन कमल थे तो हिंदी भाषा के पत्रकार, पर रहते बड़े ठाठ से थे। बिल्कुल किसी करोड़पति-अरबपति सेठ की तरह। हरदम सफारी सूट में लकदक, सेंट से गमकते हुए। गले में सोने की मोटी सी चेन, हाथों की अंगुलियों में भारी-भरकम हीरे की अंगूठियां। महंगी घड़ी, महंगे कपड़े पहने हुए मनमोहन कमल पत्रकार तो एकदम नहीं लगते थे। हां, वे किसी कारपोरेट सेक्टर के सीईओ की तरह जरूर नजर आते थे। मनमोहन कमल के भीतर मानो चार-पांच किस्म के आदमी निवास करते थे। अपने चैंबर के भीतर का मनमोहन कमल अपने अखबार के मुलाजिमों के लिए झक्की, निर्दयी और तानाशाह होता था। चैंबर से बाहर निकलते ही उसका पूरा व्यक्तित्व बदल जाता था। तब मनमोहन कमल निहायत उदार, प्रजातांत्रिक और भाई चारे वाला चेहरे पर मुस्कान बिखेरता इंसान नजर आता थ। किसी बहते निर्मल पानी की तरह। पुरुषों से और, महिलओं से और। महिलाएं जब उसके चैंबर में जातीं, तो बाहर का लाल बल्ब जल जाता था। इसका मतलब यह था कि कोई भीतर नहीं आए।
इस उपन्यास में एक अंतरकथा और चलती है। भइया जी नामक एक दबंग संपादक की। यह भइया जी वास्तव में कौन है, इसे लखनऊ की पत्रकारिता से जुड़ा लगभग हर व्यक्ति बाखूबी समझता और जानता है। मनमोहन कमल जहां सब कुछ चैंबर के भीतर करते थे, वहीं भइया जी अखबार के दफ्तर में ही सब कुछ कर लेते। वह एक साथ दो-दो औरतों को गोद में बिठा लेते। सबके सामने गालों में चिकोटी काट लेते, किसी के भी आगे-पीछे, जहां कहीं भी मन होता हाथ फेर लेते। लेकिन मजाल है कि कोई इसके खिलाफ बोल सके। मनमोहन कमल भइया जी से इस मायने में पीछे थे कि वे गुंडे नहीं थे। भइया जी की गुंडई की चहुं ओर स्वीकृति पर सुनील जैसे पत्रकार शर्मसार तो थे, लेकिन बंद कमरों में। खुलेआम प्रतिरोध करने का साहस न तो तब किसी पत्रकार में था, अब तो खैर भइया जी और मनमोहन कमल दोनों इस असार संसार को विदा कह चुके हैं। भइयाजी ने अखबार का सरकुलेशन बढ़ाने के लिए हाकरों में शराब बंटवाई, उन्हें विभिन्न तरह के गिफ्ट दिए। लेकिन इस पर भी जो हाकर नहीं मानता, अपने गुंडों से पिटाई करवा देता। नतीजा यह हुआ कि भइया जी का अखबार लखनऊ में सबसे ज्यादा बिकने लगा। अपने संपादकीय विभाग में भी उसकी गुंडई खूब चलती थी।
उपन्यास में बेरोजगार पत्रकारों की बेबसी, उनकी पीड़ा और टूट कर समझौता करने या समझौता न कर पाने की वजह से टूटकर बिखर जाने की अंतरकथा भी साथ-साथ चलती रहती है। इस उपन्यास में एक पात्र है सूर्य प्रताप। वह अपनी लेखनी और खबरों के जरिये आगे बढ़ रहा था। उस समय मुख्यमंत्री से लेकर छुटभैये नेताओं का वह प्रिय रहा। मस्ती और स्वाभिमान से लवरेज पत्रकार सूर्य प्रताप की एक दलित महिला नेता से ठन गई। वह भी समाजवादी मुख्यमंत्री के लिए। जब वही दलित महिला प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी, तो उसका सबसे पहला हमला सूर्य प्रताप पर ही हुआ। मालिकों ने दबाव में आकर उसको इस्तीफा देने पर मजबूर कर दिया। बेरोजगारी के दौर में उसने क्या-क्या झेल, इसकी विशद गाथा उपन्यास ‘हारमोनियम के हजार टुकड़े’ में। कभी ब्यूरो चीफ रहे सूर्य प्रताप को आजीविका चलाने के लिए स्ट्रिंगर की नौकरी तक करनी पड़ी। यह वह दौर था जब उसके अंदर से टूट-फूट चल रही थी। वह अकेले में बैठकर रोता, लेकिन अपने दुख-दर्द किसी को नहीं बताता। आजाद भारत एक बार फिर बिका, तो सबकी तनख्वाह में भारी कटौती की गई। विरोध प्रदर्शन हुआ। धरने पर बैठे कर्मचारियों की संपादक ने अपने गुंडों से पिटाई करवा दी। उनके तंबू कनात उखाड़ दिये। यह नया संपादक आपराधिक प्रवृत्ति का था। हत्या के चार मुकदमे लंबित थे। यह पत्रकारिता के पतन का चरम था, जब कोई हत्या का आरोपी संपादक बना हो। मैनेजमेंट ने उसे संपादक भी इसी लिए बनाया था ताकि वह पुराने कर्मचारियों को डरा-धमका कर बाहर कर दे। यह हिंदी पत्रकारिता के पतन और पराभव की गाथा रुकी नहीं है। किसी न किसी रूप में आज भी प्रवाहमान है। किसी बदबूदार नाली की तरह बजबजाती, गंधाती पत्रकारिता का सम्यक चत्रिण उपन्यास ‘हारमोनियम के हजार टुकड़े’ में है। अट्ठासी पेज के इस उपन्यास की भाषा और शैली कन्टेंट के हिसाब से बिल्कुल फिट बैठती है। एक बार पढ़ना शुरू करने पर उपन्यास को छोड़ पाना कठिन है। पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय रहे पराजित लोगों की कथा बड़ी शिद्दत से महसूस की जा सकती है। उपन्यास की छपाई और कागज अच्छा है। इसका मूल्य भी महंगाई के इस दौर में उचित ही प्रतीत होता है।
उपन्यास : हारमोनियम के हजार टुकड़े
उपन्यासकार : दयानंद पांडेय
प्रकाशक : जनवाणी प्रकाशन प्रा. लि.
30/35-36, गली नंबर-9, विश्वास नगर, दिल्ली- 32

Thursday, February 24, 2011

विक्रम-बेताल की लोकतांत्रिक कथा

-अशोक मिश्र

हमेशा की तरह विक्रम ने पीपल के पेड़ से बेताल को उतारा और पीठ पर लादकर श्मशान घाट की ओर चल पड़ा। कुछ दूर चलने के बाद पीठ पर लदे बेताल ने कहा, ‘राजन! आपका श्रम भुलाने के लिए कलियुग की एक कथा बताता हूं। भारत के किसी गांव में छह-सात लड़कों ने मिलकर एक सीधे-सादे गधे को मार डाला। गधे की मौत पर लड़कों के पिता गांव में रहने वाले एक पंडित जी के पास पहुंचे और इस पाप से मुक्ति का उपाय पूछा। गधे की मौत की बात सुनते ही पंडित जी को लगा कि इनसे कुछ कमाई की जा सकती है। सो, उन्होंने गंभीरता का स्वांग भरते हुए कहा,‘ बेटा!...गधा जैसे सीधे-सादे और उपयोगी पशु की हत्या अतिपातक की श्रेणी में आती है। इस पाप से मोझ के लिए सभी बच्चों के पिता को एक-एक तोले भार का सोने का गधा बनाकर किसी विद्वान पंडित को दान करना होगा।’

इतने में वहां खड़े एक लड़के ने कहा, ‘पंडित जी! गधा मारने में आपका पुत्र संतोषी भी शामिल था।’ यह सुनते ही पंडित जी को लगा कि यहां तो मामला उल्टे बांस बरेली लदने वाले हो गए हैं। उन्होंने झट से एक दोहा रचकर अतिपातक के आरोपी बच्चों के पिता को सुनाते हुए कहा, ‘अरे! जहां पूत संतोषी, वहां गधा मारे कौन दोषी? जब तुम लोगों के साथ मेरा पुत्र संतोषी था, तो सभी बच्चे अतिपातक से अपने आप ही मुक्त हो गए।’

यह कथा सुनाकर बेताल ने विक्रम से कहा, ‘राजन यह बताइए कि भारतीय लोकतंत्र में गधा किसका प्रतीक है? पंडित जी, संतोषी, बाकी बच्चे और उनके पिता की भारतीय लोकतंत्र में क्या भूमिका है। अगर इन प्रश्नों का उत्तर जानते हुए भी नहीं दोगे, तो तुम्हारा सिर टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर जाएगा।’

विक्रम समझ गया कि बेताल ने उसे प्रश्नों के जाल में फंसा लिया है और यह फिर पीठ से उतरकर फरार होने की फिराक में है। उसने गहरी सांस लेते हुए कहा, ‘तुम्हारी कथा में आया हुआ गधा भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में आम जनता है। कथा में आए हुए उद्दण्ड लड़कों की तरह देश के मंत्री, सांसद, विधायक और राजनेता पूंजीपतियों के साथ मिलकर जब चाहते हैं, महंगाई बढ़ाकर जनता रूपी गधे को भूखों मरने को मजबूर कर देते हैं। घोटाले, घपले करके कमाया गया काला धन विदेशी बैंको में रखते हैं और जनता के सामने विकास परियोजनाओं के लिए धन न होने का स्वांग रचते हैं। इस देश के मंत्री खेलों के लिए करोड़ों करोड़ रुपये तो फूंक सकते हैं, उसमें घोटाला करते हैं, लेकिन अस्पताल बनवाने, स्कूल खुलवाने और सड़कें बनवाने की बात आते ही हाथ खड़े कर देते हैं।’

इतना कहकर विक्रम सांस लेने के लिए रुका और फिर कहने लगा, ‘तुम्हारी कथा में पंडित की भूमिका में प्रधानमंत्री और विभिन्न दलों के राजनेता हैं। वे जब सत्ता में नहीं रहते हैं, तो उन्हें सत्तारूढ़ दल के हर कामों में गलत ही नजर आता है। घोटाले, भ्रष्टाचार की बात पर संसद नहीं चलने देते, लेकिन जब उनकी सरकार बनती है, या गंदगी के छींटे उनकी ओर उछलते दिखाई देते हैं, तो अपना दामन पाक साफ दिखाने के लिए सरकार को क्लीन चिट देने से भी परहेज नहीं करते। तब इनके चश्मे का नंबर बदल जाता है। उन्हें देश की तब कराहती-भूख से बिलबिलाती जनता नजर नहीं आती है। इनकी आंखों को मोतियाबिंद हो जाता है। जब विपक्ष में बैठे नेताओं को सत्ता सुंदरी का भोग करने को मिलता है, तो वे उन घोटालों, घपलों या विदेशों में जमा काला धन वापस लाने और इन मामलों की जांच कराने की बात भूल जाते हैं। वैसे एक बात बताऊं। उद्दण्ड लड़कों के पिता सरीखे तो मुझे इस देश के बड़े-बड़े दलाल और पूंजीपति नजर आते हैं। वे भ्रष्ट सांसदों, मंत्रियों और अफसरों की दलाली करते हैं, उनके लिए एक माहौल तैयार करते हैं। कई बार पूंजीपति, मंत्री और पूंजीपति मिलकर देश को चूना लगाते हैं, तो कई बार पूंजीपति, मंत्री, अफसर और पत्रकार दलालों की भूमिका में होते हैं। राडिया, राजा मामला भारतीय लोकतंत्र में घटित होने वाला ऐसा ही एक मामला है।’

विक्रम के इतना कहते ही बेताल खुशी से चिल्लाया, ‘राजन! तुमने बिलकुल सही फरमाया है। लेकिन चूंकि तुमने अपना मौन तोड़ा है, इसलिए मैं तो चला।’ इतना कहकर बेताल विक्रम की पीठ से उतरकर गायब हो गया। विक्रम एक बार फिर पीपल की पेड़ की ओर चल पड़ा।

Monday, February 21, 2011

तुम्हारे बाप का है राज यह मैं जानता हूं

-अशोक मिश्र
तुम्हारे बाप का है राज यह मैं जानता हूं
कटेगा शीश मेरा आज, यह मैं जानता हूं।

शांति का पाठ पढ़ाने नगर में आ गए हिजड़े
बजेंगे फिर वही सुरसाज, यह मैं जानता हूं।

मंदिर-मस्जिद की बातें सुनके सुखिया रो पड़ी
लुटेगी फिर उसी की लाज, यह मैं जानता हूं।

महल में शांति छायी है, नगर के लोग सहमे हैं
गिरेगी झोपड़ी पर गाज, यह मैं जानता हूं।

प्रेम के किस्से किताबों में पढ़ा जब भी पढ़ा है
तुम्हारे प्रेम का क्या राज, यह मैं जानता हूं।

फूल खुशियों के खिले होंगे तुम्हारे गांव में
पर नहीं दोगे मुझे आवाज, यह मैं जानता हूं।

Saturday, February 19, 2011

हाय राम...लोकतंत्र मर गया

अशोक मिश्र

उस्ताद मुजरिम के साथ मैं राजधानी दिल्ली की खाक छान रहा था। इन दिनों मैं बेकार जो था। कुछ दिन पहले ही दैनिक ‘दमदम टाइम्स’ की नौकरी से इस्तीफा दिया था। मुजरिम की सलाह थी कि सड़कों की खाक छानने से नए-नए विचार दिमाग रूपी गटर से निकलते हैं और किसी भी आदमी की तकदीर बदल देते हैं। सो, हम दोनों सुबह की एक चाय की बदौलत आधी दिल्ली की खाक छान आए थे। दिमाग के गटर से आइडिये के बगूले तो नहीं फूटे, लेकिन पांच घंटे पैदल चलते-चलते टांगों की कचूमर जरूर निकल गई। मुझे तो लग रहा था कि अगर अब दो कदम भी चलना पड़ा, तो गश खाकर गिर पड़ूंगा। वहीं उस्ताद मुजरिम थे कि किसी जिराफ की तरह लंबे डग भरे चले जा रहे थे। एक चौराहे पर भीड़ देखकर ‘या इलाही ये माजरा क्या है?’ की तर्ज पर हम दोनों उधर ही लपके। मैंने देखा कि सड़क के बीचोबीच एक लाश पड़ी है और पुलिस के कुछ सिपाही उसके पास खड़े अपने बाप...सॉरी...अपने अधिकारी का इंतजार कर रहे हैं। वहां खड़ी भीड़ अपना सनातन धर्म निभा रही थी यानी कानाफूसी कर रही थी।
मैंने एक आदमी से पूछा, ‘शिनाख्त हुई? किसकी लाश है यह? पुलिस कुछ करती क्यों नहीं?’

उस आदमी ने परमहंसी मुद्रा में जवाब दिया, ‘अभी तक तो नहीं हो पाई है। आप भी देख लें, क्या पता आपका ही कोई परिचित निकल आए। वैसे आपको बता दें, पुलिस अपना काम कर रही है। भीड़ में से एक ऐसे आदमी की तलाश जारी है जिसको बलि का बकरा बनाया जा सके। वह आदमी आप भी हो सकते हैं, मैं भी हो सकता हूं। इस भीड़ में शामिल हर व्यक्ति पुलिसवालों की निगाह में सिर्फ बकरा है जिसे जब चाहे, जहां चाहे हलाल किया जा सकता है।’ वह आदमी रौ में बकता जा रहा था।

तब तक मुजरिम भीड़ को चीरकर लाश के पास पहुंच चुके थे। लाश पर नजर पड़ते ही वह चिल्लाए, ‘अरे! यह तो लोकतंत्र है! हाय राम...यह क्या हो गया?...लोकतंत्र मर गया?’

मुजरिम की बात सुनते ही पुलिस वाले चौंके। एक सिपाही ने तंबाकू थूकते हुए पूछा, ‘अबे! तू जानता है इसे? चौबे जी, एक प्रॉब्लम तो इस ससुरे ने साल्व कर दी।’ पुलिस वाले ने चौबे जी को पास आने का इशारा किया।
मुजरिम रुआंसे हो गए, ‘हां साब! मैं शिनाख्त कर सकता हूं इसकी। यह लोकतंत्र है...भारतीय लोकतंत्र...दुनिया का सबसे बड़ा किंतु किसी कोढ़ के रोगी की तरह सड़ांध मारता हमारा प्यारा लोकतंत्र।’

‘क्या बकते हो’ कहकर पुलिस वाले ने मुजरिम का कॉलर पकड़ लिया, ‘जिस लोकतंत्र की सुरक्षा का भार ‘चार कंधों’ पर हो, वह इस तरह लावारिस मर जाए, यह हमारे लिए शर्म की बात है।’

मुजरिम ने अपना कॉलर छुड़ाते हुए कहा, ‘आप चारों की वजह से ही तो परेशान था यह! आप में से जिसे भी जब मौका मिलता था, दबोच लेते थे और वह सब कुछ कर डालते थे, जो नहीं करना चाहिए। बेचारा साठ साल में ही सात सौ साल का लगने लगा था। इधर कुछ दिनों से तो बहुत परेशान था।’

पुलिस वाले ने जमीन पर डंडा फटकारते हुए कहा, ‘साफ-साफ बता, बात क्या है? पहेलियां बूझने की न तो अपनी आदत है और न ही यह भाषा अपने पल्ले पड़ती है। डंडे की भाषा जानता हूं और यह समझाना जानता हूं। कहे तो समझाऊं?’

पुलिस वाले के तेवर देखकर मुजरिम के होश उड़ गए। उन्होंने खुशामदी लहजा अख्तियार करते हुए कहा, ‘साब! जब से कुछ सांसदों ने सवाल पूछने के नाम पर रोकड़ा मांगा था, तब से लोकतंत्र परेशान था। अपनी करतूतों से जितनी बार लोकतंत्र के चारों स्तंभ दुनिया के सामने नंगे हो जाते थे, जितनी बार भारतीय राजनीति दागदार होती थी, उतने दाग इसके शरीर पर उभर आते थे। साब, आपको विश्वास न हो, तो इसकी कमीज उलटकर देख लें। इसकी पीठ और पेट पर घोटालों और शर्मनाक कांडों के निशान मिल जाएंगे।’

मुजरिम अपनी बात कह ही रहे थे कि पुलिस की एक जीप आकर भीड़ के पास रुकी। उसमें से एसएचओ और कुछ सिपाही उतर कर भीड़ को लाश के आसपास से हटाने लगे। पहले से मौजूद एक सिपाही ने एसएचओ को जोरदार सल्यूट मारते हुए कहा, ‘मृतक की शिनाख्त हो चुकी है। यह आदमी इसे लोकतंत्र बताता है। बाकी आप दरियाफ्त कर लें, हुजूर।’

थानेदार ने पहले तो ऊपर से नीचे तक पुलिस को निहारा और फिर कड़क कर कहा, ‘तू क्या बेचता है और कैसे कह सकता है कि यह लोकतंत्र है? जिस लोकतंत्र की रक्षा में देश-प्रदेशों के सांसद, विधायक, सत्तारूढ़ और गैर सत्तारूढ़ पार्टियों के नेता, अफसर लगे हुए हों। पूरा का पूरा पुलिस महकमा लगा हुआ हो, वह लोकतंत्र इस तरह सड़क पर लावारिस मरा हुआ पाया जाए, यह कैसे हो सकता है?’

मुजरिम ने थूक निगलते हुए कहा, ‘हुजूर! मैं कुछ बेचता नहीं, एक मामूली पाकेटमार हूं। मेरा और आपका पेशा लगभग एक जैसा है। जिस काम को आप बड़े पैमाने पर सामूहिक रूप से करते हैं, वही काम मैं छोटे स्तर पर व्यक्तिगत रूप से करता हूं। आप इस काम की पगार लेते हैं, जबकि मैं अगर यह करता पकड़ा जाऊं, तो पब्लिक से लेकर पुलिसवालों तक के जूते खाता हूं। अब तो आप जान ही गए होंगे कि मेरा नाम मुजरिम है।’
इतना कहकर मुजरिम सांस लेने के लिए पल भर को रुके। फिर बोले, ‘इस लोकतंत्र से मेरी पुरानी यारी रही है। हम दोनों एक दूसरे के लंगोटिया यार थे। मजे की बात तो यह है कि हम दोनों की पैदाइश भी एक ही दिन की है। मेरी मां ‘व्यवस्था’ बताती हैं कि जिस समय मैं पैदा हुआ था, खूब हट्टा-कट्टा था, लेकिन यह तो जन्म से ही लंगड़ा था। कहते हैं कि अंग्रेजों और देसी पूंजीपतियों से इसके ‘बापू’ बड़ी सहानुभूति रखते थे। वे नहीं चाहते थे कि विद्रोहिणी क्रांति कोई ऐसा बच्चा जने, जो इन दोनों यानी बापू और लोकतंत्र के लिए खतरनाक साबित हो। इसलिए ‘बापू’ ने गर्भवती ‘क्रांति’ के पेट पर लात मारकर गर्भ गिरा दिया था। बाद में पता नहीं कैसे क्रांति की सौतेली बहन व्यवस्था के गर्भ से यह लंगड़ा लोकतंत्र पैदा हो गया। अंग्रेज पूंजीपतियों ने हम जैसों का खून चूसकर इसको पाला-पोसा। काले बनियों ने बैसाखी के सहारे चलना सिखाया। इसीलिए यह काले बनियों का मुरीद बनकर रह गया। काले बनियों पर जब भी कोई मुसीबत आती, यह डेढ़ टांग पर खड़ा होकर अपनी साजिशी तान देने लगता था। साब! मजाल है, कोई मुसीबत इसकी जानकारी में बनियों का कुछ बिगाड़ सके। यह तो बातचीत के दौरान अक्सर कहा करता था। बनिये इस देश के भाग्यविधाता हैं। भाग्य विधाता का हित सुरक्षित रहे, इसके लिए जरूरी है कि जनता के हित असुरक्षित रहें। उनका भरपूर शोषण होता रहे।

तभी एसएचओ ने अपनी आंख पर चढ़ा काला चश्मा उतार कर लाश का मुआयना करना शुरू किया। कमीज उलटकर लाश के पास बने एक पैदायशी निशान को गौर से देखते हुए कहा, ‘हवलदार रामधनी, नोट करो। मृतक की कमर से दो इंच नीचे एक पैदायशी निशान है।’

‘हां साब, यह निशान जीप घोटाले का है।’ मुजरिम ने एसएचओ की बात काटते हुए कहा, ‘हुजूर! आप तो जानते ही होंगे, देश का सबसे पहला घोटाला ही जीप घोटाला था। तब यह पैदा नहीं हुआ था। हां, व्यवस्था के गर्भ में भ्रूण रूप में जरूर आ चुका था। उस समय तब देश पर अंग्रेजों का शासन था। लेकिन उस घोटाले के पैदायशी निशान इसकी कमर पर उभर आए थे। इसके बाद देश आजाद हो गया। कुछ दिन तक सत्ताधीशों ने चना-चबैना खाकर दिन काटे, लेकिन एक मंत्री से बर्दाश्त नहीं हुआ। उसने आजाद भारत का पहला घोटाला किया। इस घोटाले का निशान आपको लोकतंत्र के ठीक दिल के पास दिख ही गया होगा। इसके बाद मंत्री, सांसद, विधायक और अधिकारी मरभुक्खों की तरह लोकतंत्र पर टूट पड़े और लूट-लूट कर खाने लगे। फिर क्या था। जैसे-जैसे घोटाले बढ़ते गए। लोकतंत्र के शरीर पर दाग बढ़ते गए। जितना बड़ा घोटाला, उतने बड़े दाग। लोकतंत्र का चेहरा ही बदरंग हो गया। साब, एक बात बताऊं! हर घोटाले पर इसकी आत्मा कराह उठती थी। कई बार तो मैंने इसे बिलख-बिलखकर रोते देखा था।’
एसएचओ ने रोब झाड़ते हुए कहा, ‘अबे! तू फालतू की राम कहानी छोड़। सबसे पहले तो तू यह बता, यह मरा कैसे?’

मुजरिम एसएचओ की बात सुनकर सिटपिटा गए, ‘साब! मैं यह कैसे बता सकता हूं। म ैं कोई डॉक्टर तो नहीं हूं। आप लाश का पंचनामा बनाइए, पोस्टमार्टम के लिए भेजिए। कल तक आपको सब पता चल जाएगा। हां, इतना बता सकता हूं...कल रात य मेरे पास आया था। कुछ बोल नहीं पा रहा था। बीच-बीच में आदर्श..आदर्श... कामनवेल्थ, राडिया-राजा जैसा कुछ बड़बड़ा रहा था। फिर बोला कि मैं किसी को मुंह दिखाने के लायक नहीं रहा। इतना कहकर लोकतंत्र कहीं चला गया था। मैंने समझा कि घर गया होगा। आज सुबह यहां इसकी लाश देखी। मेरा ख्याल है कि यह शर्म से मर गया है।’

पास खड़ा एक सिपाही अपने एसएचओ के कान में फुसफुसाया, ‘साब! मुझे तो यही कातिल लगता है।’ और फिर मुजरिम लोकतंत्र की हत्या के जुर्म में धर लिए गए। मैंने चुपचाप वहां से खिसक लेने में ही भलाई समझी।

Tuesday, February 1, 2011

कोहिनूर जैसा प्याज

-अशोक मिश्र

सन 2019 में भारत के किसी मोहल्ले का एक दृश्य। एक घर में मोहल्ले की चार-पांच महिलाएं बैठी पारंपरिक ढंग से गपिया रही हैं। उनके बीच शीशे के एक केस में रखा लगभग एक सौ पचहत्तर ग्राम का लाल सुर्ख प्याज अपने भाग्य पर इतरा रहा है। एक महिला ने प्याज को प्यार से निहारते हुए कहा, ‘बहन! कितने में पड़ा यह कोहिनूर जैसा प्याज?’

प्याज की मालकिन ने इतराते हुए कहा, ‘दीपो की मम्मी...दो सौ तीस रुपये पाव बिक रहा है इन दिनों प्याज। पौने दो सौ ग्राम प्याज का दाम हिसाब लगाकर देख लो। दुकानदार तो हमें लूट ही लेता...वह तो कहो, मेरी चतुराई काम आ गई। मैंने दुकानदार को डपट दिया। हमें कोई नंगा भूखा समझ रखा है क्या? हफ्ते में एकाध दिन हम भी पचास ग्राम प्याज खाते है। ठीक..ठीक बताओ। तब जाकर सही दाम लगाए। सल्लू के पापा तो बस बिटर-बिटर खड़े मेरा मुंह देखते रहे।’ यह कहकर महिला सांस लेने के लिए रुकी।

दीपो की मम्मी कुछ बोलने का प्रयास करें, उससे पहले ही मिसेज गुप्ता बोल बैठीं, ‘प्याज भी तो देखो...कितना सुर्ख है! लगता है, नासिक वाला है। एक बात कहूं, नासिक वाले प्याजों में एक अजीब-सी गंध आती है। मुझे तो उत्तर प्रदेश वाले प्याज ही अच्छे लगते हैं। मैं तो दो महीने पहले दो सौ पंद्रह ग्राम प्याज लाई थी। नासपीटे दुकानदार ने उत्तर प्रदेश वाला बताकर नासिक का प्याज थमा दिया।’ मिसेज गुप्ता की बात पूरी हो पाती इससे पहले ही मिसेज चौहान बोल उठीं, ‘चल झूठी कहीं की...साल में दो बार ही दीपावली और होली पर तेरे घर में प्याज आता है। कहती है कि दो महीने पहले प्याज लाई थी। यह तो हम लोग हैं, जो हर हफ्ते प्याज खाना अफोर्ड कर सकते हैं।’ दरअसल मिसेज गुप्ता और मिसेज चौहान में दो दिन पहले ही बच्चों को लेकर खूब झगड़ा हुआ था। ऐसे में मिसेज गुप्ता को नीचा दिखाने का अवसर भला मिसेज चौहान कैसे चूक जातीं।

‘हां...हां, तू ही तो मोहल्ले में सबसे बड़ी धन्ना सेठ है। बाकी सब भिखारी बसे हैं। दो महीने पहले ही तो दीपावली थी। मैंने इसमें गलत क्या कहा था। अरे, भूल गई जब तेरा बड़ा दामाद आया था, तो प्याज की पहली परत तुझे उधार दी थी। तब से आज तक उधार तो वापस कर नहीं सकी। बड़ी आई है हर हफ्ते प्याज खाने वाली।’ इतना कहकर मिसेज गुप्ता उठी और अपने घर चली गईं।

तभी अंदर से मर्दाना आवाज आई, ‘तुम्हारी यह प्याज प्रदर्शनी कब तक चलेगी? इतनी देर से प्याज खुले में रखा है। कहीं सड़ गया, तो समझ लेना। तलाक देकर ही छोड़ूंगा।’ प्याज की मालकिन ने शो केस सहित प्याज उठाया और यह कहते हुए अंदर रख दिया,‘बहन! अब आप लोग चलें, मुझे काफी काम करना है।’ इसी के साथ वह महिला संगोष्ठी खत्म हो गई।