Thursday, May 31, 2012

गधों की रेव पार्टी

-अशोक मिश्र
जियामऊ गांव में एक गधा चरने के साथ-साथ ‘ढेंचू-ढेंचू’ करके गर्दभ राग में गाता जा रहा था, ‘तू कहे तो मैं बता दूं, मेरे दिल में आज क्या है?’ वह काफी देर से चर रहा था, इसलिए उसका पेट लगभग भर गया था। पेट भर जाने की वजह से उसे भी इंसानों की तरह मस्ती सूझने लगी थी। यही वजह से वह पहले एक गफ्फा घास का मुंह में भरता और पेट में घास ढकेलने के बाद गाने लगता। तभी कालिदास मार्ग की तरफ से दूसरा गधा लंगड़ाता हुआ आया और पहले वाले गधे के पास ही जल्दी-जल्दी चरने लगा। उसके चरने की स्टाइल बता रही थी कि उसने हरी घास काफी दिनों बाद देखी है।
पहले से चर रहा गधा उसके पास गया और बोला, ‘काफी दिनों बाद हरी घास चरने का मौका मिला है क्या?’ कालिदास मार्ग की तरफ से आए गधे ने एक हल्की-सी दुलत्ती झाड़ते हुए अभिवादन किया और बोला, ‘ऐसी बात नहीं है, लेकिन यह घास कुछ ज्यादा मुलायम है, इसलिए अच्छी लग रही है।’ पहले वाले ने पूछा, ‘तुम लंगड़ा क्यों रहे हो? तुम्हारे मालिक ने पीटा है क्या?’ दूसरे ने जवाब दिया, ‘नहीं, रेव पार्टी में गया था? वहीं चोट लग गई।’
‘यह रेव पार्टी क्या होती है?’ पहले वाले गधे चरना बंद कर दिया था। ‘रेव पार्टी...इसका आनंद तो शब्दों से बता पाना काफी मुश्किल है।’ दूसरा गधा पिछली रात में हुई रेव पार्टी के आनंद में खो गया। उसने कहा, ‘रेव पार्टी में सभी जवान गधे-गधी इकट्ठे होकर नाचते-गाते हैं, खाते-पीते हैं। खूब मौज-मस्ती करते हैं और अपने-अपने बाड़े में जाकर सो जाते हैं।’
‘लेकिन तुम्हें चोट कैसे लग गई?’ पहले वाले ने पूछा। दूसरे ने एक बार तो पहले वाले गधे को घूरा और फिर बोला, ‘सुरैया के बाड़े में कल रात हम लोग इकट्ठे हुए थे। सुरैया का बाड़ा काफी बड़ा है। उसके मालिक ने एक जमीन को चारों ओर से लकड़ी और बांस से घेर कर बाड़े का रूप दे दिया है। उस रेव पार्टी में मैं था, रामधनी की गधी सुरैया थी, बाचू का गधा पतिंगा था। अब तुम यह बात इस तरह समझो कि मैं यानी धनधूसर, सुरैया, पतिंगा, रमरतिया, गॉटर, रेखा, श्यामा, हलकट जैसे लगभग बीस-पच्चीस गधे-गधी इस रेव पार्टी में थे। कोई अपने घर से हरी घास लाया था, तो कोई चूनी, कोई भूसी। रमरतिया अपने मालिक के घर से कच्ची दारू की बोतल ही मुंह में दबाकर ले आई थी। पहले तो रामधनी के घर में बज रहे फिल्मी गीतों पर हम सब डांस करते रहे। रात बारह बजे के बाद हम लोगों ने घरों से कुछ चोरी, कुछ मांग कर लाई गई घास, भूसी-चूनी को भर पेट खाया। खाने के बाद हमने रमरतिया द्वारा लाई गई शराब का सेवन किया। कसम गर्दभ राग की, क्या मस्त वाइन थी! मजा आ गया।’
इतना कहकर धनधूसर पार्टी की रंगीनियों में खो-सा गया। काफी देर तक जब वह नहीं बोला, तो पहले वाले ने पूछा, ‘धनधूसर भाई! फिर क्या हुआ? बताओ न, काफी अच्छा लग रहा है तुम्हारी बात। अब तो मुझे भी किसी रेव पार्टी में शामिल होने की इच्छा हो रही है। सुना है कि इंसान भी रेव पार्टी आयोजित करते हैं।’
धनधूसर ने बताना शुरू किया, ‘वाइन चढ़ते ही हम गधों पर मस्ती छा गई। हमने रमरतिया से थोड़ी दारू और लाने को कहा। वह चुपके से अपने मालिक की दूसरी बोतल उठा लाई। दूसरी बोतल की दारू पीने के बाद हमने फिर नाचना शूरू किया। इसी बीच पतिंगा ने गॉटर की प्रेमिका सुरैया को छेड़ दिया। बस फिर क्या था। ‘बातन-बातन बत बढ़ होइ गई औ बातन में बढ़ गई रार’ वाली स्टाइल में पतिंगा और गॉटर एक दूसरे से भिड़ गए। दोनों एक दूसरे पर दुलत्तियां झाड़ने लगे। पहले तो हम सबने एक दूसरे को छुड़ाने की कोशिश की, लेकिन बाद में हम सभी किसी न किसी की तरफ से लड़ने लगे। हम सभी लड़ ही रहे थे कि छापा पड़ गया।’
‘छापा पड़ गया? मतलब?’ पहले वाले ने उत्सुकता से पूछा। धनधूसर ने कहा, ‘छापा पड़ गया मतलब...छापा पड़ गया। हम लोगों के दुलत्तियां झाड़ने और लड़ने-भिड़ने के चलते बाड़े के टूटने से पैदा हुई आवाज सुनकर सुरैया का मालिक रामधनी एक मोटा डंडा लेकर निकला और लगा हम लोगों पर बरसाने। सारे लोग तो भागने में सफल हो गए। सबसे पहले मैं मिला, सो सबसे ज्यादा उसकी कृपा मुझ पर ही बरसी। इसके बाद कृपा पाने वालों में सुरैया का नंबर दूसरा था। वह बेचारी भाग कर कहां जाती! उसे तो वहीं रहना था।’ इतना कहकर धनधूसर चरने लगा।

Tuesday, May 22, 2012

लल्लन टॉप चैनल

अशोक मिश्र
शाम को थका-मांदा घर पहुंचकर टीवी आॅन किया। चैनल ‘लल्लन टॉप’ पर खबरें प्रसारित हो रही थीं। न्यूज एंकर भानुमती की सुरीली आवाज गूंज रही थी, ‘लल्लन टॉप न्यूज चैनल की खास पेशकश...अभी हम आपको दिखाएंगे थोड़े से ब्रेक के बाद।’ इसके बाद सिरदर्द से लेकर गोरे होने की क्रीम तक के विज्ञापनों को देखते-देखते माथा और भन्ना गया। चैनल बदलने की सोच ही रहा था कि न्यूज एंकर भानुमती अपने लटके-झटके के साथ एक बार फिर नमूदार हुई, ‘हम आपको बता दें कि इस समय आप देख रहे हैं ‘लल्लन टॉप’ चैनल।
अब हम आपको ले चलते हैं, दौलतपुर जिले के एक गांव नथईपुरवा में। इस गांव की धरती पर पैदा हुए हैं तीन बछड़े एक साथ। हम आपको बता दें कि दौलतपुर जिले के नथईपुरवा गांव में पैदा हुए तीन जुड़वा बछड़ों की एक्सक्लूसिव स्टोरी सबसे पहले आप तक लाया है लल्लन टॉप चैनल। तो दोस्तो! हम आपको बता दें कि दौलतपुर की धरती ने आज उस समय इतिहास रच दिया, जब दौलतपुर जिले के नथईपुरवा गांव में एक गाय ने तीन बछड़ों को एक साथ जन्म दिया। तीनों बछड़े स्वस्थ हैं। इन बछड़ों की देखभाल जिला मुख्यालय से आई एक टीम कर रही है। कैमरामैन प्रदीप के साथ हमारे संवाददाता चंद्रबख्श जी इस समय नथईपुरवा गांव में हैं। आइए, हम अपने संवाददाता चंद्रबख्श जी से पूछते हैं कि वहां का क्या माहौल है?
स्क्रीन पर माइक संभाले चंद्रबख्श नजर आते हैं। न्यूज एंकर पूछती है, ‘चंद्रबख्श जी, आप हमारी बात सुन पा रहे हैं? आप हमारे दर्शकों को बताइए कि वहां का माहौल कैसा है? लोग इस संबंध में क्या बातें कर रहे हैं। तीन बछड़ों को जन्म देने के बाद गाय कैसा महसूस कर रही है?’ चंद्रबख्श की आवाज आती है, ‘हां, भानुमती, मैं आपकी बात अच्छी तरह से सुन रहा हूं। जहां तक माहौल की बात है, नथईपुरवा के लोग सुबह से ही पटाखे फोड़ रहे हैं। गाय भी काफी खुश है। आप देख सकती हैं कि गाय इस समय हरा-चारा खा रही है। उसके चेहरे पर गर्व और प्रसन्नता की झलक साफ देखी जा सकती है। उसने दौलतपुर के इतिहास में एक सुनहरा अध्याय जोड़ दिया है, इसकी सबसे ज्यादा खुशी गाय को है। आइए, हम बात करते हैं गाय के मालिक बलिराम जी से।’ स्क्रीन पर झक्कास कुर्ता-पायजामा पहने बलिराम जी के साथ चंद्रबख्श प्रकट होते हैं। चंद्रबख्श पूछते हैं, ‘बलिराम जी! क्या आपको पहले से उम्मीद थी कि आपकी गाय तीन बछड़ों को जन्म देगी? क्या आपने पहले कोई जांच कराई थी? मेरा मतलब कोई अल्ट्रा साउंड वगैरह...?’  बलिराम मूंछों पर ताव देते हुए बताते हैं, ‘नहीं कोई जांच तो नहीं कराई थी, लेकिन हमें पूरा विश्वास था कि हमारी गाय कबरी कोई न कोई कारनामा जरूर करेगी। तीस साल पहले कबरी की दादी ने भी एक साथ तीन बछियों को जन्म दिया था। इसकी मां भूरी ने भी चार साल पहले दो बछड़ों को एक साथ जन्म दिया था।’इसके बाद कैमरा बलिराम के चेहरे से पैन होता हुआ कबरी तक जाता है। कुछ देर तक चारा खाती कबरी और गांव में नाचती-गाती  और पटाखे फोड़ती भीड़ को दिखाते हैं, फिर नाचती हुई एक महिला से पूछते हैं, ‘आपको इस उपलब्धि पर कैसा महसूस हो रहा है?’ महिला के पीछे कुछ लड़के और लड़कियां अपना चेहरा दिखाने की नीयत से धक्का-मुक्की करते हैं, इसी बीच वह महिला कहती है, ‘हमका खुसी है कि कबरी माता हमरे गांव की लाज रख लिहिन। देश मा इतना नाम हुआ, यहके लिए हम सभी बहुत खुस हैं।’ इसके बाद चंद्रबख्श विदा हो जाते हैं। स्क्रीन पर एंकर का चेहरा नमूदार होता है। वह कहती है, ‘अब हम अपने दर्शकों को ले चलते हैं दिल्ली स्टूडियो, जहां हमारे साथ मौजूद हैं देश के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री एमएनए सुब्रह्मण्यम राधास्वामी जी। चलिए, उनसे पूछते हैं कि इससे देश और प्रदेश की अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ेगा?’ राधा स्वामी जी पहले गला खंखारकर साफ करते हैं, फिर बोलते हैं, ‘मैं समझता हूं कि इससे प्रदेश की अर्थव्यवस्था पर कोई बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा। हां, बलिराम की विकास दर देश या प्रदेश की विकास दर से थोड़ा ज्यादा रहेगी।’
 इसके बाद एंकर की आवाज आती है, ‘अब समय हो चला है एक छोटे से ब्रेक का। दर्शकों, ब्रेक के बाद हम अपने दर्शकों के सामने फिर हाजिर होंगे। हमारे साथ होंगे सत्ताधारी दल के एक नेता, एक वरिष्ठ पत्रकार और नेता प्रतिपक्ष धमकैया सिंह, जिनके साथ हम चर्चा करेंगे कबरी के अर्थव्यवस्था में योगदान की। तब तक के लिए हम आपसे विदा लेते हैं।’ इसके बाद न्यूज एंकर गायब हो जाती है। मैं चादर ओढ़कर सो जाता हूं।

Sunday, May 20, 2012

कार्टूनिस्टों को फांसी दो

-अशोक मिश्र
जब मैं कॉफी हाउस में घुसा, तो कुछ चोंचवादी निठल्ले चिंतन कर रहे थे। एक व्यक्ति कह रहा था,‘कुछ भी हो। कार्टून मुद्दे को संसद में नहीं उठाना चाहिए। भला यह भी कोई तुक हुई कि जिस व्यक्ति को लेकर कार्टून बनाया गया, उसने जीते-जी कभी विरोध नहीं किया। अब उनकी औलादें खामख्वाह कटाजुज्झ मचा रही हैं।’
दूसरे निठलले चिंतक ने कॉफी का घूंट भरते हुए कहा, ‘नहीं, जो हो रहा है, वह अच्छा हो रहा है। मैं तो कहता हूं कि इस देश के व्यंग्यकारों, कलाकारों, कार्टूनिस्टों, कवियों और लेखकों के साथ वही होना चाहिए, जो मुगलिया सल्तनत के शंहशाह शाहजहां ने किया था। ताजमहल बनाने वाले वास्तुविदों के हाथ काटकर उन्होंने पूरी दुनिया के सामने एक मिसाल कायम की थी। देखो, व्यवस्था और युग भले ही बदल जाए, लेकिन शासकों का चरित्र कभी नहीं बदलता है। कलाकार, चित्रकार और भी जितने ‘कार’ इस दुनिया में पाए जाते हैं, वे सिर्फ और सिर्फ देश और समाज पर बोझ होते हैं। उनकी समाज में कोई उपयोगिता नहीं है। इनके ‘होने या न होने’ पर समाज पर कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता।’ पहले चोंचवादी ने कहा, ‘भइए! इस देश में लोकतंत्र नाम की कोई चिड़िया बसती भी है कि नहीं। सबको अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। जिसकी जो मर्जी होगी, वह लिखेगा, पढ़ेगा। जरूरत पड़ी, तो कार्टून भी बनाएगा। तुम कौन होते हो, उन्हें रोकने या उनके हाथ काटने वाले।’
दूसरे व्यक्ति ने पहले गहरी सांस भरी और फिर बाकी बची कॉफी हलक में उतारने के बाद गुर्राया, ‘इसका क्या मतलब हुआ? आप जो चाहेंगे, वही लिख देंगे। जिस किसी का चाहेंगे, कार्टून बना देंगे। गांधी, नेहरू, अंबेडकर, जिन्ना, गुरु गोलवकर, लोहिया, कांशीराम के विचारों का विरोध करने लग जाएंगे। यह तो नाफरमानी है। हुकुम उदूली है। व्यवस्था का विरोध है। मेरी समझ में एक बात नहीं आती है कि ये तथाकथित बुद्धिजीवी लोग इस व्यवस्था के विरोध में सोचने की हिम्मत कैसे जुटा लेते हैं। कैसे ये कल्पना की उड़ान भर लेते हैं? उन्हें ममतावादियों, अंबेडकरवादियों, कांग्रेसियों, भाजपाइयों, बसपाइयों, सपाइयों, वामपंथियों सहित इस देश के गली-कूंचे के छुटभये नेताओं का जरा भी भय नहीं लगता?’
पहला व्यक्ति व्यंग्यात्मक लहजे में हंसा, ‘अगर इन्हें डर ही लगता, तो ये चिंतन ही क्यों करते? व्यवस्था के खिलाफ कोई रचना कैसे करते?’ दूसरे व्यक्ति ने समझाने की कोशिश की, ‘बंधु! सच पूछो, तो इस देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसी कोई चीज ही नहीं है। बस, ‘दिल बहलाने को गालिब ख्याल अच्छा है’ जैसी हालत है इसकी। ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि कार्टून, व्यंग्य, लेख या कविता लिखने या बनाने से पहले रचनाकार अपनी थीम को लिखकर शहर के किसी चर्चित चौराहे पर टांग दें। अगर उस थीम में अंबेडकरवादियों, ममतावादियों, मनुवादियों, भाववादियों जैसे तमाम वादियों को आपत्तिजनक नहीं लगता है, तो वे उसका सृजन करें और सृजन के बाद भी यही प्रक्रिया अपनाएं। जो व्यंग्यकार, कार्टूनिस्ट, कवि या लेखक को ऐसा नहीं करता है, उसे इस देश में रहने का अधिकार जब्त कर लेना चाहिए। उसे किसी निर्जन कुछ भी रचने का अधिकार नहीं होना चाहिए।’
यह कहकर वह व्यक्ति थोड़ी देर सांस लेने के लिए रुका। फिर बोला, ‘मेरी तो राय है कि इस देश में जितने भी कार्टूनिस्ट, व्यंग्यकार, लेखक और कवि अपने को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पहरुआ मानते हों, उन्हें या तो फांसी पर लटका देना चाहिए या फिर उन्हें कालेपानी की सजा देकर किसी निर्जन द्वीप पर यह कहते हुए छोड़ देना चाहिए कि अब इस निर्जन द्वीप पर तुम मन चाहे जितने कार्टून बनाओ, व्यंग्य लिखो, या कल्पना उड़ान भरो। तुम्हें रोकने वाला कोई नहीं है। लेकिन खबरदार! तुम्हारी कल्पना की उड़ान सभ्य समाज की ओर से होकर नहीं गुजरनी चाहिए। वरना कोई ममता, कोई माया, कोई सिब्बल तुम्हारा सिर कलम करने को स्वतंत्र होगा। फिर लोकतंत्र की दुहाई देते हुए मत घूमना।’ इतना कहकर दोनों निठल्ले उठे और कॉफी का बिल पेमेंट कर चलते बने। मैं कॉफी देर तक उनके निठल्ले चिंतन पर बेतुका चिंतन करता रहा और अपने दरबे में आकर सो गया।

Wednesday, May 9, 2012

...नौ दिन चले अढ़ाई कोस

अशोक मिश्र
अभी कुछ दिन पहले मैं घर के खर्च का हिसाब-किताब जोड़ता-घटाता चला जा रहा था कि कूड़े के ढेर पर मुझे कागज के कुछ टुकड़े दिखाई पड़े। वे पीले पड़ गए थे। मुझे लगा कि कहीं कोई पुरानी पुस्तक की पांडुलिपि न हो? एक अजीब-सा कश्मकश मन में चलने लगा। यदि कहीं सिर्फ रद्दी हुई, तो लोग मुझे कूड़े के ढेर से रद्दी चुनते देखकर मजाक उड़ाएंगे। और खुदा न खास्ता, अगर कहीं किसी पुराने ग्रंथ की पांडुलिपि हुई, तो मैं उसे खोज निकालने की वाहवाही लूटने से वंचित हो जाऊंगा। कुछ मिनट की ऊहापोह के बाद दिल ने चंदबरदाई की तरह कहा, 'कूड़ा-करकट की सोच मत, न कर जगहंसाई का ध्यान, कूड़े पर पांडुलिपि है, मत चूको चौहान।Ó मैं उस पांडुलिपि पर एेसा झपटा, जैसे चील मांस के टुकड़े पर झपटती है।
उस पांडुलिपि को सीने से लगाकर घर लाया और सीधा अपने कमरे में गया। खिड़की-दरवाजा बंद करने के बाद उत्तेजित हृदय और कंपकंपाते हाथ के साथ मैंने उस पांडुलिपि का अवलोकन करना शुरू किया। मित्रो! एक पैराग्राफ पढऩे के बाद मुझे अपने पर कोफ्त हुई कि मैंने उस रद्दी के टुकड़े को किसी ग्रंथ की पांडुलिपि समझने की भूल कैसे की? जानते हैं, वह क्या था? वह आज से दस-बारह साल पहले दसवीं कक्षा के छात्र की हिंदी विषय के तृतीय प्रश्नपत्र की उत्तर पुस्तिका थी। बीच में एक पन्ना पता नहीं कैसे खराब होने से बच गया था। उसमें प्रश्न लिखा था कि 'पोस्ती ने ली पोस्त, नौ दिन चले अढ़ाई कोसÓ कहावत का उदाहरण सहित व्याख्या कीजिए। उस छात्र ने भी जो जवाब लिखा था, वह भी कम रोचक नहीं था। पाठकों के ज्ञानवर्धन के लिए छात्र का उत्तर ज्यों का त्यों प्रकाशित किया जा रहा है।
छात्र ने लिखा था, इस कहावत में रचियता कवि का पोस्ती से तात्पर्य अफीमची नहीं, सत्ता लोलुपों और पोस्त का अफीम से नहीं, सत्ता से है। यानी सत्ता के लोलुप जब तक सत्ता से बाहर रहते हैं, तो वे पोस्त और पोस्तियों (सत्ता और सत्ताधीशों यानी सरकार) की कमियां गिनाते रहते हैं। सरकार अगर आम जनता की ओर मुंह करके छींक दे, तो गैर पोस्ती (अर्थात विपक्षी) सरकार की नाक में दम कर देते हैं। उन्हें अपनी पार्टी के अध्यक्ष, महामंत्री, राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर के नेताओं के पहाड़ जैसे भ्रष्टाचार, लूट-खसोट, जनविरोधी कार्य नहीं दिखते हैं, लेकिन सरकार की राई जैसी गलतियां पहाड़ जैसी दिखती हैं। वे आवाम को जनसभाओं, मीडिया और सोशल साइट्स पर विश्वास दिलाने लगते हैं कि हे भाग्य विधाता रूपी मतदाताओं! अगर इस बार आपने मेरी पार्टी की सरकार बनवा दी, तो आज लूट-खसोटकर अपना घर भरने वाले मंत्रियों, सांसदों या विधायकों के आलीशान बंगलों और कोठियों को खोदकर खलिहान बनवा दूंगा। लेकिन जब यही गैरपोस्ती पोस्ती हो जाते हैं, यानी विपक्ष से सत्तापक्ष में बैठने लगते हैं, तो ये भी पूर्ववर्तियों की तरह सत्ता की पोस्त चाट लेते हैं, यानी इन पर भी सत्ता का नशा चढ़ जाता है। पूर्ववर्ती सरकार द्वारा किए गए घोटालों और भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार बनने के दूसरे दिन गठित होने वाले इन्क्वायरी कमीशन हवा हो जाते हैं। जिस तरह खूब खाया पिया और मोटा हो गया अजगर बहुत जरूरी होने पर ही रेंगता है, काफी जोर लगाने और आत्मबल बटोरने के बाद नौ दिन में सिर्फ अढ़ाई कोस चल पाता है। वैसे ही सरकार भी रेंगने लगती है। अपने देश में रेंगने का दायित्व आजादी के बाद सबसे पहले और सबसे ज्यादा कांग्रेस पार्टी ने निभाया। इसके बाद कुछ राजनीतिक पार्टियां मिल-जुलकर रेंगी, लेकिन वे इस बात पर लड़ पड़ीं कि तुम ज्यादा रेंगे कि मैं। फिर कांग्रेस और भाजपा जैसे राष्ट्रीय स्तर के सरीसृप, बसपा, सपा, जनता दल, राष्ट्रीय जनता, तृणमूल कांग्रेस, द्रुमुक और अन्ना द्रुमुक जैसे छोटे या मंझोले सरीसृपों को साथ लेकर रेंगे। तब से कभी ये, तो कभी वे पारी अदल-बदलकर रेंग रहे हैं। ऐसी संभावना है कि ये भविष्य में भी इसी तरह रेंगते रहेंगे, लेकिन आम आवाम के हित में बनने वाली योजनाएं और परियोजनाएं भी इनके साथ रेंगती रहेंगी।
विशेष : इससे एक बात और जाहिर होती है कि कवि न केवल सभी तरह के नशीले पदार्थों का विशेषज्ञ है, बल्कि उसे जीव विज्ञान के बारे में महारत हासिल है।

Tuesday, May 1, 2012

आओ ‘सीडी-सीडी’ खेलें

अशोक मिश्र
कुछ बच्चे मोहल्ले के पार्क में तीन-चार मीटर लंबी और एक मीटर चौड़ी साफ-सुथरी जगह पर दस-बारह चौकोर खाने खींचकर खेल रहे थे। बच्चों को खेलता और धूप से हलकान होकर थोड़ी देर सुस्ताने की नीयत से पास ही उगे पेड़ की छाया में बनी सीमेंटेड बेंच पर बैठकर उनका खेल देखने लगा। सबसे बड़ा बच्चा सात साल का था और सबसे छोटी बच्ची चार साल की। एक बच्चे के हाथ में एक ‘सीडी’ थी। उनसे से एक बच्चा पहले चौकोर खाने के पास खड़ा होकर बोला, ‘अब मेरी बारी।’
बड़े बच्चे ने उसे सीडी थमाई। चौकोर खाने की ओर पीठ करके वह बच्चा खड़ा हो गया और उसने सीडी को चूमकर पीछे की ओर उछाली, ‘पापा की सीडी।’ उस बच्चे की बात सुनकर मैं उछल पड़ा। मानो, किसी ने बिजली का नंगा तार मेरी पीठ पर छुआ दिया हो। मेरी जगह कोई भी होता, तो चौंक गया होता, बशर्ते उसने सीडियों का ‘कमाल’ देखा होता। इन मुई सीडियों ने बड़े-बड़े महारथियों को पैदल कर दिया है। मैं दिल्ली के एक नेता जी को जानता हूं। बेचारे पार्टी के लिए उन्होंने पूरी जिंदगी खपा दी। उनका बाप पार्टी में बड़ा नेता था, तो उत्तराधिकार में उन्हें चल-अचल संपत्ति के साथ ही नेतागीरी भी मिली। पार्टी ने उनके बाप की सेवाओं को ध्यान में रखते हुए उन्हें सिर-आंखों पर बिठाया। वे पार्टी की ओर से मीडिया में नैतिकता और सच्चरित्रता का प्रवचन देने लगे। वे विरोधियों की राई भर की गलती को पहाड़ बनाकर वाहवाही लूटते। उनकी वाक्पटुता के पार्टी वाले ही नहीं, विरोधी भी कायल थे, लेकिन एक दिन पता नहीं, किस नामाकूल ने मीडिया को एक सीडी जारी कर दी। सीडी क्या जारी हुई, कल तक सिर-माथे पर बिठाया जाने वाला यह नेता अछूत हो गया। पार्टी के विभिन्न पदों से इस्तीफा देकर राजनीतिक वनवास भोगने को मजूबर होना पड़ा।
इस करमजली सीडी ने नेताओं की ही भट्ठी नहीं बुझाई है, आम लोगों के भी जीवन में जहर घोला है। मेरे पड़ोस में रहते है परसद्दी लाल। कोई बड़े आदमी नहीं हैं। एक दम खांटी आम जनता हैं। बेचारे सीधे इतने कि मोहल्ले के लोग उन्हें गऊ बोलते हैं। महीने भर पहले वे किसी काम से अपने आठ वर्षीय बेटे गॉटर प्रसाद के साथ अपनी ससुराल गए। उन दिनों परसद्दी लाल की साली भी अपने मायके आई हुई थी। दो दिन ससुराल में रहकर परसद्दी लाल लौट आए थे। एक दिन उनके बेटे गॉटर ने बहुत खुश होकर बताया, ‘अम्मा! बप्पा ने मौसी के साथ एक सीडी बनाई है। बप्पा उस सीडी को अपने झोले में लेकर आए हैं।’
दरअसल, परसद्दी लाल की ससुराल में भागवत कथा का आयोजन किया गया था, जिसमें भाग लेने वह गए थे। इस पूरे आयोजन की वीडियो रिकॉर्डिंग की गई थी, जिसमें वह अपनी साली के साथ बैठे प्रवचन सुन रहे थे। परसद्दीलाल के मजदूरी करके घर लौटने पर उनकी बीवी ने पहले तो बातों-बातों में मायके में बनी सीडी की चर्चा की। साली को लेकर मजाक की नीयत से पहले तो वह खूब इठला-इठलाकर पत्नी को चिढ़ाते रहे। फिर यह मजाक धीरे-धीरे रंग लाता गया और फिर मियां-बीवी में तकरार शुरू हो गई। बात मारपीट तक पहुंची और गुस्से में आकर मोहल्ले में गऊ कहे जाने वाले परसद्दी लाल ने बीवी को बाहर निकालकर अंदर से घर का दरवाजा बंद कर लिया। गुस्सा शांत होने पर उन्होंने बीवी को अंदर बुलाना चाहा, तब तक उनकी बीवी बेटे को लेकर मायके जा चुकी थी। हालांकि, मायके पहुंचने पर परसद्दी लाल की बीवी को सीडी की असलियत मालूम हुई, लेकिन तब तक मामला हाथ से निकल चुका था। अब वह हेठी के भय से नहीं ससुराल जा रही है और न ही परसद्दी लाल उसे लिवाने जा पा रहे हैं।
मैंने बच्चों को बुलाकर कहा, ‘बच्चों! तुम्हें यह खेल किसने सिखाया है? यह गंदा खेल है, इसे मत खेलो।’ उन बच्चों में से एक ने कहा, ‘अंकल! कल टीवी पर लिखा था ‘सीडी का खेल।’ अब यह खेल तो समझ में आया नहीं कि कैसे खेलते हैं, सो हम लोग आज ‘सिकड़ी’ खेल को ही बदल कर ‘सीडी-सीडी’ खेलने लगे। आप ये जो बारह खाने देख रहे हैं, इनमें से हर खाने का एक नाम है, जैसे मम्मी, पापा, भइया, दीदी, मौसी आदि। जिस खाने में यह सीडी गिरती है, तो हम कहते हैं कि मम्मी की सीडी, पापा की सीडी। हर खाने का एक स्कोर है। इसके साथ ही खेलने वाले को एक टांग पर बिना कोई खाना छलांग लगाए या इन लकीरों पर पैर रखे, उस सीडी को उठाना होता है और फिर एक टांग पर ही उसे लौटना भी होता है। इस तरह जो ज्यादा स्कोर हासिल करता है, वह जीतता है।’ तभी एक लड़का चिल्लाया, ‘अबे सुरेश! चल तू अपनी चाल चल। अंकल तो पागल हो गए हैं। खेल भी कहीं गंदा होता है।’ मैं चुपचाप बैठा रहा और बच्चे खेलते रहे।

कामरेड! पहले खुद तो पढ़ें मार्क्सवाद

देश में वामपंथी आंदोलन की अगुवा मानी जाने वाली मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी, फारवर्ड ब्लॉक से लेकर गली-कूचे में अपने को मार्क्सवादी, लेनिनवादी, माओवादी, ट्राटस्कीवादी, स्टालिनवादी कहने वाली पार्टियों ने आज तक ‘निजी संपत्ति तेरा नाश हो’ की बात कही हो, तो बताइए?
अशोक मिश्र
पिछले कुछ दिनों से प. बंगाल में द्वंद्वात्मक भौतिकवादी दर्शन के प्रणेता और मानववादी दार्शनिक कार्ल्स मार्क्स और उनके सहयोगी फ्रेडरिक एंगेल्स की जीवनी को ग्यारहवीं और बारहवीं कक्षा के पाठ्यक्रम से हटाने को लेकर तृणमूल कांग्रेस सरकार की आलोचना हो रही है। वामपंथी नेता और पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि मैं नहीं समझ पा रहा हूं कि आखिर ऐसी ऐतिहासिक घटनाओं और इतिहास के प्रमुख पात्रों को पाठ्यक्रम से क्यों हटाया जा रहा है? यह अनावश्यक और दुर्भाग्यपूर्ण है। छात्रों के मार्क्स और एंगेल्स या रूसी क्रांति का इतिहास पढ़ने का यह मतलब नहीं है कि वे वामपंथी बन जाएंगे। सच भी यही है कि सिर्फ कार्ल मार्क्स, फ्रेडरिक एंगेल्स या ब्लादिमीर इल्यीच लेनिन की जीवनी पढ़ने से कोई मार्क्सवादी-लेनिनवादी हो जाता, तो सबसे पहले हिंदुस्तान के वामपंथी नेता और उनके कार्यकर्ता सही मायने में मार्क्सवादी-लेनिनवादी हो गए होते।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के इस फैसले की अपनी-अपनी रुचि और रुझान के आधार पर निंदा या स्वागत किया जा सकता है। जब केंद्र में एनडीए सरकार थी, तो उसने भी शिक्षा में कुछ मूलभूत सुधार की कोशिश की थी। तब एनडीए की केंद्र सरकार पर शिक्षा के भगवाकरण का आरोप लगाया गया था। आज भी जिन प्रदेशों में भाजपा या भाजपा गठबंधन की सरकारें हैं, वह अगर शिक्षा के मामले में कोई परिवर्तन होता है या भाजपाई दर्शन के अनुसार बदलाव किया जाता है, तो वामपंथी विचारधारा से जुड़े लोग उसका विरोध करते हैं। जब पश्चिम बंगाल में वामपंथी सरकार थी, तब भी शिक्षा के वामपंथीकरण का आरोप तत्कालीन वामपंथी सरकार पर लगता रहता था। आज सत्ता में आकर तृणमूल कांग्रेस शिक्षा के ढांचे में परिवर्तन कर रही है, कल अगर वामपंथी सरकार को मौका मिलता है, तो वह अपनी रुचि और दार्शनिक सोच के मुताबिक नौनिहालों को शिक्षा देने का प्रयास करेगी। पिछले तीस-बत्तीस साल से पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकारें यही तो करती रही हैं। यह इस पूंजीवादी व्यवस्था के संचालकों की नूरा-कुश्ती है। मुख्य सवाल यह है कि जिस मानवतावादी कार्ल मार्क्स, फ्रेडरिक एंगेल्स या लेनिन का नाम लेकर या रामनामी लबादे की तरह मार्क्सवादी-लेनिनवादी लबादा ओढ़कर हिंदुस्तान की ये वामपंथी पार्टियां देश की श्रमिक-शोषित जनता को गुमराह करती रही हैं, अब भी कर रही हैं, वे खुद मार्क्सवादी-लेनिनवादी दर्शन को कितना आत्मसात कर सकी हैं। आइए, हम आपको ले चलते हैं सन् 1871 के पेरिस कम्यून के इतिहास की ओर। मार्क्सवादी साहित्य से जरा भी रुचि रखने वाले जानते हैं कि पेरिस कम्यून वह पहला अवसर था, जब मजदूर वर्ग ने अपनी संगठित शक्ति के साथ पूंजीवादी ताकतों के खिलाफ ‘हल्ला’ बोला था। 18 मार्च 1871 को मजदूर नेताओं के नेतृत्व में पूंजीवादी सरकार को हटाकर पेरिस में मजदूरों का आधिपत्य कायम हुआ था। यह कम्यून 64 दिन तक कायम रहा और बाद में पूंजीवादी शक्तियों ने पेरिस कम्यून को छिन्न-भिन्न कर दिया। हिंदुस्तान के वामपंथी नेताओं को शायद याद हो कि पेरिस कम्यून की स्थापना से पहले द्वंद्वात्मक भौतिकवादी दर्शन के प्रणेता कार्ल मार्क्स ने ‘कम्युनिस्ट घोषणा पत्र’ (जिसे हिंदुस्तान के कम्युनिस्टों ने कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र बना दिया है) में लिखा कि यद्यपि अभी क्रांति की परिस्थितियां परिपक्व नहीं हैं, लेकिन जब मजदूरों ने अपने स्वर्ग पर धावा बोल दिया है, ऐसे में दुनिया भर के क्रांतिकारियों का यह नैतिक कर्तव्य है कि वे इस क्रांति को अपनी पूरी ताकत से सफल बनाएं।  संयोग देखिए, मात्र 64 दिनों बाद पेरिस कम्यून विफल हुआ और तब कार्ल मार्क्स ने कम्युनिस्ट घोषणापत्र में संशोधन करते हुए कहा कि इस पेरिस कम्यून की विफलता ने एक बात सिद्ध कर दी है कि मजदूर वर्ग इस पूंजीवादी व्यवस्था की बनी-बनाई मशीनरी पर कब्जा करके मजदूर राज कायम नहीं कर सकता है। मजदूर वर्ग को साम्यवादी व्यवस्था कायम करने के लिए सबसे पहले पूंजीवादी व्यवस्था का ध्वंस और उन्मूलन करना होगा और उस पर एक नई समाज शास्त्रीय व्यवस्था कायम करनी होगी। इसके लिए मजदूरों को सबसे पहले निजी संपत्ति का खात्मा करना होगा। (फ्रांस और गृहयुद्ध : कार्ल मार्क्स) तब मार्क्स ने कम्युनिस्ट घोषणापत्र में दुनिया भर के मजदूरों को संबोधित करते हुए कहा, ‘दुनिया के मजदूरो! एक हो। निजी संपत्ति तेरा नाश हो।’ लेकिन जरा इस मार्क्सवादी शिक्षा के आलोक में हिंदुस्तान की तमाम वामपंथी पार्टियों के नेताओं से लेकर कार्यकर्ताओं तक का आचरण परख कर देखिए कि वे कितने मार्क्सवादी हैं। देश में वामपंथी आंदोलन की अगुवा मानी जाने वाली मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी, फारवर्ड ब्लाक से लेकर गली-कूचे में अपने को मार्क्सवादी, लेनिनवादी, माओवादी, ट्राटस्कीवादी, स्टालिनवादी कहने वाली पार्टियों ने आज तक ‘निजी संपत्ति तेरा नाश हो’ की बात कही हो, तो बताइए। दरअसल, ये पार्टियां न तो निजी संपत्ति का नाश चाहती हैं और न ही इस पूंजीवादी व्यवस्था का ध्वंस और उन्मूलन। अपने को वामपंथी कहने वाली पार्टियां दरअसल कांग्रेस, भाजपा, सपा, तृणमूल कांग्रेस जैसी पार्टियों की ही तरह सुधारवादी आंदोलन चलाकर मजदूर आंदोलन की धार को कुंद करने का प्रयास कर रही हैं। इन पार्टियों का आचरण मौलिक रूप से कांग्रेस या भाजपा से भिन्न नहीं है। वामपंथी पार्टियां देश के मजदूरों, किसानों और खेतिहर मजदूरों को सुधारवादी आंदोलन में उलझाकर पूंजीवादी व्यवस्था का संचालक यानी मंत्री, सांसद, विधायक आदि बनकर अपना हित साध रहे हैं। कौन नहीं जानता है कि केरल और पश्चिम बंगाल में पिछले कई दशक से शासन करने वाले वामपंथी नेताओं ने कितनी अकूत संपत्ति कमाई है। इसलिए अगर देश के मजदूर आंदोलन की अगुवाई करके मार्क्सवादी दर्शन और सिद्धांत के मुताबिक क्रांति करनी है, तो कामरेड! सबसे पहले आपको अपनी निजी संपत्ति का त्यागकर एक उदाहरण प्रस्तुत करना होगा। वरना...।

Tuesday, April 24, 2012

कब बनेंगे ‘बाबा’ से ‘भगवान’?

-अशोक मिश्र
बीरबल से लगभग आठ साल बाद मुलाकात हुई। पहले तो मैं उन्हें पहचान नहीं पाया। पहचानता भी कैसे? जिन दिनों मैं बीरबल को जानता था, तब वे साधारण-सी टुटही साइकिल पर पूरे शहर का चक्कर लगाते फिरते थे। अगर कहीं से उन्हें दस रुपये भी मिलने की संभावना दिखती, तो वह बिना दिन देखे या रात, दौड़ लगा देते। पतले-दुबले शरीर के मालिक बीरबल बातूनी बहुत थे। महिलाओं से बात करने का तो जैसे उन्हें नशा था। उनमें पता नहीं क्या खूबी थी कि महिलाएं उनसे बातें भी खूब करती थीं। उसी बीरबल को कल फेरारी कार से थुलथुल शरीर लिए उतरते देखा, तो मैं दंग रह गया। पहले तो मुझे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ। उन्होंने शरीर पर भगवा धारण कर रखा था और इलाके के धनाढ्य और नवधनाढ्य पुरुष और महिलाएं उन्हें घेरे हुए थे। कोई उनके चरण छू रहा था, तो कोई याचक की मुद्रा में हाथ जोड़े खड़ा था। मैं लपककर उनके पास पहुंचा, ‘अरे बीरबल! पहचाना तुमने...मैं तुम्हारा पड़ोसी...। तुम बाबा कब से हो गए?’
मुझे देखकर बीरबल अकबका गए। पलभर तो उन्होंने मुझे अपनी भावभंगिमा से नकारने का प्रयास किया, फिर बोले, ‘ऐसा करो शाम को आश्रम पर आओ। पांच दिनों के लिए मैंने ‘लाओ दे जाओ’ होटल में आश्रम खोल रखा है।’ इतना कहकर बीरबल अपने भक्तों के साथ चलते बने। मैं वहीं ठगा-सा खड़ा रहा। शाम को होटल पहुंचा। बीरबल ने मुझे देखते ही साइड में बने कमरे में आने का इशारा किया। कमरे में मिलते समय न जाने क्यों पहले जैसी गर्मजोशी नहीं थी। पहले बीरबल मुझे देखते ही लपककर गले लगा लेते थे। मैंने सुबह वाला अपना सवाल दोहराया, ‘अरे बीरबल! तुम बाबा कब से हो गए?’
बाबा ने परमहंसी मुस्कान बिखेरते हुए कहा, ‘यह सब ग्रहों का खेल है। जब मेरी कुंडली के पांचवें घर में बैठा चंद्रमा पहले घर में बैठे राहु से टांका भिड़ा रहा था, तो मैं टुटही पनहिया पहने जर्जर साइकिल पर रद्दी खरीदता-बेचता था। चवन्नी-अठन्नी के लिए ग्राहकों से घंटे-घंटे तक बहस करता था। लेकिन समय का फेर देखो। ग्रहों की चाल बदली तो अपनी भी चाल बदल गई। अब तो एक घंटे का प्रवचन भी दस-बारह लाख रुपये दे जाता है। टीवी चैनल वाले कैमरा लिए आगे-पीछे डोलते हैं कि दस-बारह सेकेंड की ही बाइट मिल जाए, ताकि टीआरपी बढ़ जाए। इन दिनों तो अपनी पांचों अंगुलियां घी में और सिर कड़ाही में है। सब ग्रहों का फेर है। ग्रहों के फेर से कोई नहीं बच सका है। ग्रह अच्छे थे, तो राजा दशरथ के घर में राम पैदा हुए। ग्रहों की चाल क्या बिगड़ी, उन्हें अपनी पत्नी और भाई के साथ वन-वन भटकना पड़ा।’
मैंने मजाक करते हुए कहा, ‘बीरबल जी! आपकी शानोशौकत देखकर विश्वास नहीं होता कि आज से आठ-दस साल पहले आप घर-घर घूमकर रद्दी खरीदते-बेचते थे।’ मेरी बात सुनकर बीरबल तल्ख लहजे में बोले, ‘देखो, पहली बात तो यह है कि तुम मुझे बीरबल नहीं, बीरबल बाबा बोलो। अब मैं तुम्हारा पड़ोसी रद्दी खरीदकर गुजारा करने वाला बीरबल नहीं हूं। लाखों-करोड़ों रुपये की लागत से देश भर में मेरे चार-पांच आश्रम चलते हैं। बड़े-बड़े घरों की महिलाएं और पुरुष पांव छूते हैं, आशीर्वाद मांगते हैं।’
‘अच्छा बाबा जी, आपके ग्रहों की चाल अब कब बदलेगी?’ न चाहते हुए भी मेरे मुंह से यह निकल ही गया। मेरी बात सुनकर बाबा जी चौंके, ‘क्या मतलब? तुम कहना क्या चाहते हो?’ मैंने हकलाते हुए कहा, ‘मेरा मतलब है कि अब आप ‘बाबा’ से ‘भगवान’ कब बनने वाले हैं। मेरा कहने का मतलब है कि ज्यादातर बाबा ऐसा ही करते...।’ मैं अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया था कि बीरबल बाबा गुर्रा पड़े, ‘मेरे ग्रहों की चाल अब कभी नहीं बदलेगी। मैं इसी तरह आने वाले दो दशकों तक बाबा बना रहूंगा। तब तक मैं इतना कमा चुका होऊंगा कि आने वाली पांच पुश्तों को कमाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।’ इसके बाद बाबा ने मुझसे कहा, ‘अब तुम जाओ। चेलियों को प्रवचन देने का समय हो गया है। और हां, फिर कभी मेरे आश्रम में मत आना। आना तो बाकायदा फीस चुकता करके आना।’ इतना कहकर बीरबल बाबा उठे और चले गए। मैं भी घर लौट आया। सुबह अखबार से मुझे पता चला कि रात को पुलिस ने कथित आश्रम पर छापा मारकर बीरबल बाबा को धोखाधड़ी के आरोप में गिरफ्तार कर लिया है। अब अपने ग्रहों की चाल न बदलने का दावा करने वाले बीरबल के ग्रहों की चाल एक बार फिर बदल गई थी।

Wednesday, April 18, 2012

..तो बेटा समझो गए काम से

-अशोक मिश्र

रविवार की सुबह अखबार पढ़ते हुए चाय पी रहा था कि दरवाजे पर उस्ताद मुजरिम की आवाज सुनाई दी। मैं उसी तरह सतर्क हो गया, जैसे किसी बिलौटे को देखकर चूहे सतर्क हो जाते हैं। कप टेबल पर रखते हुए उनके स्वागत के लिए मैं दरवाजे की ओर लपका। तब तक मुजरिम घरैतिन और बच्चों को आशीर्वाद का टोकरा थमाकर कमरे में घुस चुके थे। मैंने उन्हें प्रणाम किया। उन्होंने सामने रखे सोफे पर पसरते हुए कहा, ‘और सुनाओ बरखुरदार! क्या चल रहा है?’

‘आपका आशीर्वाद है’ कहकर मैंने घरैतिन को चाय-पानी लाने को कहा। इसके बाद मैंने अपना कप उठाया और चाय पीने लगा। तभी मुजरिम की नजर मेरे कप पर पड़ी। उसे देखते ही वे चीखे, ‘अरे! तुम ऐसे कप में चाय पीते हो। तब तो समझो बेटा, तुम गए काम से। अभी पिछले हफ्ते होनोलूलू यूनिवर्सिटी की एक रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि ऐसे कपों में चाय या पानी पीने से ‘डेंटाफर्टा मेथोडिस’ हो जाता है।’

उस्ताद की बात सुनकर मैं डर गया। पूछा, ‘डेंटाफर्टा मेथोडिस क्या बला है, उस्ताद?’ उस्ताद मुजरिम गंभीर हो गए, ‘यह एक वायरस है। यह वायरस खास तौर पर ऐसे ही बर्तनों में पलता है। इस वायरस के संपर्क में आने के बाद आदमी के दांत झड़ जाते हैं, आंखें सिकुड़ जाती हैं। वह कहता है ‘फ’ और मुंह से निकलता है ‘द’। पैर थोड़े छोटे हो जाते हैं। कहने का लब्बोलुबाब यह है कि आदमी अपनी स्वाभाविक उम्र से पहले ही अल्लाह को प्यारा हो जाता है।’ मैंने तत्काल चाय सहित कप उठाकर बाहर फेंक दिया। घरैतिन को आवाज लगाई, ‘अरी बेगम! पानी दो। हाथ धोना है।’ मेरी आवाज सुनकर घरैतिन एक जग पानी लेकर कमरे में नमूदार हुईं। मैंने उनसे हाथ धुलाने को कहा। घरैतिन हाथ पर पानी डालतीं, उससे पहले मुजरिम बोल पड़े, ‘अरी बहू, रुको। यह क्या कर रही हो। मुझे तो पानी प्रदूषित लग रहा है। पानी की जांच करा ली है कि नहीं? कहीं इसमें ‘फ्लोरोसिस आॅफ कंचाखेल’ बैक्टीरिया तो नहीं हैं। जानते हो, येल यूनिवर्सिटी के कुछ प्रोफेसर्स ने अभी दो महीने पहले भारत की नदियों और तालाबों के पानी की जांच की थी। देश की ज्यादातर नदियों और तालाबों में ‘फ्लोरोसिस आॅफ कंचाखेल’ के बैक्टीरिया खतरनाक स्तर तक पाए गए हैं। इस बैक्टीरिया के चलते इंसान के मस्तिष्क में अजीब-अजीब तरह के विचार पैदा होने लगते हैं। प्रोफेसरों ने सात सौ भारतीयों पर इस बैक्टीरिया के प्रभाव का परीक्षण किया था। जिसको ‘फ्लोरोसिस आॅफ कंचाखेल’ बैक्टीरिया युक्त पानी पीने को दिया गया, उसमें से ज्यादातर लोगों ने या तो अपनी बीवी या पति से झगड़ा किया। दो तिहाई लोगों ने तो उत्तेजना में अपने साथी को ‘कंटाप’ भी मारा।

घरैतिन बोलीं, ‘दादा! हम दोनों अकसर पगहा तुड़ाए बैल की तरह भिड़ते रहते हैं। कहीं उस बैक्टीरिया के कारण तो नहीं?’ मैंने तपाक से कहा, ‘क्या बकवास करती हो? बैक्टीरिया को हमारे लड़ाई-झगड़े से क्या लेना-देना है? अब कल को तुम कहोगी कि ज्यादा सांस लेने से दिल कमजोर हो जाता है, ज्यादा दौड़ने से किडनी पतली हो जाती है।’ ‘लेना-देना क्यों नहीं है, जी। आप मानें या न मानें, लेकिन मुझे लगता है कि दादा ठीक कह रहे हैं। जब से यहां का पानी पीना शुरू किया है, तब से इनका दिमाग खराब रहने लगा है। इससे पहले तो ये ऐसे न थे।’ घरैतिन ने घूंघट को संभालते हुए कहा।

घरैतिन की बात सुनते ही मैं उखड़ गया, ‘क्या बकती हो? मेरा दिमाग खराब हो गया है? तुम तुरंत मेरी नजरों से दूर जाओ, वरना पागलपन में कहीं तुम्हारा सिर न फोड़ दूं।’ मेरी बात सुनते ही घरैतिन तो वहां से रफूचक्कर हो गईं। बच गए उस्ताद मुजरिम। मैंने नाराजगी भरे स्वर में कहा, ‘क्या उस्ताद आप भी न! हमेशा बेसिर-पैर की बातें करते रहते हैं। लगता है कि आप भी सठिया गए हैं। बुढ़ापे में फालतू बातें कुछ ज्यादा ही सूझती हैं। आप फालतू के समाचार पढ़ने बंद कीजिए।’ इतना कहकर मैं उठा और घरैतिन द्वारा लाया गया पानी गटागट पीने लगा। उस्ताद मुजरिम भौंचक-से बैठे मुझे देखते रहे और फिर उठकर घरैतिन के पास जाकर उसे उपदेश देने लगे। मैंने घरैतिन को चाय को कहा और अखबार बढ़ने में तल्लीन हो गया।

Monday, April 16, 2012

बिकने दीजिए चश्मा-चरखा

-अशोक मिश्र
मैं सूनसान रास्ते से लंबे डग भरता चला जा रहा था कि पीछे से आवाज आई, ‘बेटा! सुनो तो।’ मैंने घूमकर देखा, अपनी पारंपरिक वेशभूषा में बापू खड़े थे। बापू बोले तो अपने राष्ट्रपिता मोहनदास करमचंद गांधी। मैं भौंचक रह गया। मुझे लगा कि कहीं मेरे दिमाग में भी कोई केमिकल लोचा तो नहीं पैदा हो गया है। फिल्म ‘लगे रहो मुन्ना भाई’ में संजय दत्त को भी केमिकल लोचा के चलते बापू दिखाई देने लगते हैं। और फिर, एक गुंडे का हृदय परिवर्तन होता है और वह गांधीगीरी करने लगता है। मैंने अपनी आंखें झपकाई, सिर को झटका, लेकिन बापू फिर भी दिखते रहे। बापू थोड़ा आगे बढ़े और मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए क्षीण स्वर में बोले, ‘बेटा! सुनो तो, मैं तुमसे ही बात कर रहा हूं।’ मैंने सोचा, चलो बापू से बात कर ही लेते हैं। अगर वाकई बापू हुए, तो कोई बात नहीं। अगर दिमाग में केमिकल लोचा हुआ, तो कल ही किसी हास्पिटल में जाकर चेकअप कराऊंगा।
मैंने बापू से कहा, ‘हां बताइए। मैं आपके किस काम आ सकता हूं।’ उन्होंने दीन स्वर में कहा, ‘बेटा! मेरा चश्मा और चरखा बिक रहा है। किसी तरह उसे बिकने से बचा लो। उसे बिकने न दो।’ मैं उनकी बात सुनकर भौंचक रह गया, ‘बापू! इस देश का मैं एक अदना-सा आम आदमी हूं। मैं भला आपके चश्मे और चरखे को बिकने से कैसे बचा सकता हंू? इसके लिए आपको सत्ता के गलियारे में गुहार लगानी चाहिए। उनकी मर्जी न हो, तो आपका चश्मा और चरखा क्या, देश का एक तिनका भी नहीं बिक सकता। खरीद-फरोख्त का धंधा भी तो वही करते हैं।’
बापू बोले, ‘मैं गया था सबके पास गुहार लगाने, लेकिन मेरी कोई सुनता ही नहीं है। कई नेताओं के तो दरबान ने ही झिड़ककर भगा दिया। मंत्रियों से मिलने की कोशिश की, तो पता चला कि पहले से टाइम लिए बिना कोई उनसे मिल ही नहीं सकता। अब इस लोकतंत्र में आम आदमियों से ही उम्मीद बची है।’
बापू की बात सुनते ही पता नहीं क्यों, इस लोकतांत्रिक व्यवस्था का कथित भाग्य विधाता किंतु हकीकत में सबसे निरीह आम आदमी का गुस्सा मुझमें आ समाया। मैंने रोष भरे शब्दों में कहा, ‘बापू! इसके लिए भी आप ही दोषी हैं। आपकी भौतिक मृत्यु भले ही बाद में हुई हो, लेकिन दार्शनिक मौत तो आपके जीवित रहते ही हो गई थी। आपके जिंदा रहते जब आपके चेले गांधीवादी दर्शन को बेचकर कमाने-खाने का जरिया बना रहे थे, तब आपने कोई प्रतिरोध नहीं किया। इधर आपकी मौत हुई, उधर आपके अपनों ने ही गांधीवादी दर्शन का क्रिया-कर्म कर डाला। खादी और चरखे का हुंडी की तरह भुनाकर अपनी तिजोरी भरने लगे। पहले ईमान बेचा, फिर देश बेचने लगे। जब ईमान की कीमत दो कौड़ी की रह गई, तो अब वे आपका चश्मा, घड़ी, लाठी और आपकी लंगोट बेचने पर तुले हुए हैं।’
मैं धारा प्रवाह बोलता जा रहा था और बापू चुपचाप खड़े सुन रहे थे, ‘बापू! शायद आपको पता न हो, आपकी इन चारों वस्तुओं का अब तक। आपकी घड़ी पर शुरू से ही पूंजीपतियों की निगाह थी, सो वे ले गए। लाठी नेताओं के हाथ आई, जिसके सहारे वे अपनी लड़खड़ाती राजनीति को सहारा देने लगे। जरूरत पड़ती थी, तो आपके ‘वैष्णव जन’ यानी आम जनता की पीठ पर बरसा लेते थे। गरीबी, बेकारी, भुखमरी और अपमान से बेजार जनता इन राजनीतिज्ञों के खिलाफ बगावत न कर दे, इसीलिए सन सैंतालिस से ही आपके चहेतों ने ‘गांधीवादी चश्मा’ देश की जनता को पहना दिया था। बापू! अगर आप गौर करें, तो लंगोट भी आपकी नहीं रह गई थी। लंगोट तो इस देश के लंपटों ने पहन रखी थी। आपके दर्शन को यदा-कदा फिल्मी दुनिया वाले बिकाऊ माल की तरह जनता में बेच रहे हैं। अब अगर नेता आम जनता की आंखों पर चढ़ा चश्मा और इस औद्योगिक युग में बेकार हो चुके चरखे को बेच देना चाहते हैं, तो उसे बेच देने दीजिए। इन भौतिक वस्तुओं को बचाकर आप करेंगे भी क्या?’
मैं बोलता जा रहा था, बोलता जा रहा था। पीछे-पीछे चले आ रहे बापू मेरी बात गौर से सुन रहे हैं या नहीं, यह जानने के लिए मुड़कर देखा, तो पता चला कि कोई है ही नहीं। मैं अकेला ही बड़बड़ाता चला जा रहा हूं। मुझे लगा कि मेरे दिमाग में कोई केमिकल लोचा पैदा हो गया है। मैं कहीं पागल तो नहीं हो गया हूं। आपका क्या ख्याल है!

Thursday, April 5, 2012

केंद्र सरकार माने गरीब की जोरू

-अशोक मिश्र

जो लोग मुझे जानते हैं, वे इस बात को बड़ी शिद्दत से मानते हैं। लेकिन अफसोस है कि मैं पिछले डेढ़ दशक से घरैतिन को यह विश्वास दिलाने में असफल रहा हूं कि मैं मूलत: रसिक हूं, अय्याश नहीं। और रसिक होना कोई ऐब नहीं है। इस बात को लेकर आए दिन गृहस्थी के बरतन आपस में टकरा जाते हैं। कुछ बर्तन टूटते भी हैं, लेकिन टूट-फूट सिर्फ मेरे हिस्से ही आती है। आप सब मतलब तो समझ ही गए होंगे। अब कल का ही वाकया लें। शाम को आम पतियों की तरह सब्जियों का थैला हाथ में लटकाए हांफता-कांपता बाजार से आ रहा था। अपने घर के दरवाजे पर खड़ी छबीली से मुलाकात हो गई। दुआ-सलाम के बाद शुरू हुई बातचीत गरीबी की नई परिभाषा पर बहस में कब तब्दील हो गई, मुझे पता ही नहीं चला। हम दोनों अपने-अपने तरकश से तर्कों के तीर चलाकर एक दूसरे को निशस्त्र करने की कोशिश में जूझ ही रहे थे कि तभी मेरी घरैतिन घर से बाहर निकल आईं।

मुझे छबीली से बतियाता देखकर ‘अगिया बैताल’ हो गई। घर आने पर मैंने उसे लाख समझाया कि मैं छबीली से सिर्फ बातचीत कर रहा था, नैन मटक्का नहीं। लेकिन घरैतिन हैं कि मानती ही नहीं। कई बार सफाई देने पर भी जब उसका मुंह फूला ही रहा, तो मुझे भी गुस्सा आ गया। मैंने रोष भरे स्वर में कहा, ‘क्या तुम मुझे ‘गरीब की जोरू’ समझती हो?’ मेरे दस वर्षीय सुपुत्र चिंटू प्रसाद अपनी किताब लिए पास में ही बैठे पढ़ने का ढोंग कर रहे थे। उनका ध्यान पढ़ाई को ओर कम, हम दोनों की तकरार की ओर ज्यादा था। उन्होंने ऊंट की तरह किताब के पीछे छिपा अपना सिर उठाया और बोले, ‘पापा! आपका मतलब ‘नीबर कै जोय, सब कै सरहज’ से है न।’

मैंने अपने क्रोध को काबू में करते हुए कहा, ‘हां बेटा।’ मेरी बात सुनकर उसके चेहरे पर बेचारगी भरी मुस्कान बिखर गई। उसने कहा, ‘पापा! मैं इस कहावत का माने-मतलब तो समझ रहा हूं, लेकिन एकाध उदाहरण नहीं सूझ रहा है। अगर आप उदाहरण सहित व्याख्या कर दें, तो हिंदी के एक्जाम में दूसरों से बाजी मार सकता हूं।’ अब आप सब लोग जानते ही होंगे कि भारत में अपने पिता को पढ़ाई के नाम पर ब्लैकमेल करने का अधिकार हर पुत्र को जन्मजात मिला हुआ है। घरैतिन से हुई ‘तू-तू, मैं-मैं’ भूलकर मैं बेटे को कहावत का उदाहरण सहित अर्थ समझाने लगा। मैंने बेटे से कहा, ‘तुम्हें मैं दो उदाहरणों से समझाने की कोशिश करता हूं। पहला, तो यह कि हर परिवार का मुखिया यानी पिता और पति अपने परिवार के सदस्यों के सामने गरीब की जोरू की तरह रहता है। परिवार के हर सदस्य को जन्मत: यह हक होता है कि वह जब चाहे, जैसे चाहे, अपने पिता या पति को मंदिर के घंटे की तरह बजाए। उससे हंसी-ठिठोली करे। उसका आर्थिक दोहन करे।’

मेरे इतना कहते ही बेटा उछल पड़ा। उसने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा, ‘अच्छा! आपके कहने का मतलब यह है कि आप मेरे, मेरी मम्मी और दीदी के लिए ‘गरीब की जोरू’ के समान हैं।’ मैंने कहा, ‘इस देश का शायद ही कोई पिता या पति मेरी तरह डंके की चोट पर इस बात को स्वीकार कर सके, लेकिन हकीकत सौ फीसदी यही है।’
‘और दूसरा उदाहरण?’ सुपुत्र चिंटू प्रसाद ने सवाल दागा। मैंने कहा, ‘वर्तमान सरकार... इसकी दशा तो गरीब की जोरू से भी बदतर है। उसके पति की भूमिका में ‘दीदी’ हैं, ‘बहन’ जी हैं, ‘नेताजी’ हैं, अभी कुछ साल पहले तक ‘अम्मा जी’ भी थीं। एकदम द्रौपदी बनकर रह गई है केंद्र सरकार। जो जैसे चाहता है, वैसे नचाता है। और बेचारी केंद्र सरकार है कि तलाक के डर से गठबंधन धर्म निभाए जा रही है। कभी दीदी कहती हैं कि तुमने घाटे में चल रहे रेल विभाग को दुरुस्त करने के लिए यात्री किराया बढ़ाकर गलती की है, कान पकड़ो। और सरकार के बेचारे मुखिया जी डर कर दोनों हाथों से कान पकड़कर खड़े हो जाते हैं। लो दीदी! मान ली आपकी बात, अब कोई गलती नहीं करूंगा। बस, आप सरकार को गिरने मत देना।’ इतना कहकर मैं दूसरे कमरे में गया। टीवी चालू करके एक चैनल पर प्रसारित हो रहे ‘माई नेम इज शीला, शीला की जवानी’ गाने पर कैटरीना का डांस देखने में मशगूल हो गया।