बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
महात्मा बुद्ध खुद तो वर्ष के आठ-नौ महीने सतत यात्रा पर रहते थे, लेकिन वह अपने शिष्यों को भी जगह-जगह भेजकर लोगों को आत्म कल्याण का मार्ग सुझाने के लिए भेजते रहते थे। तथागत का एक प्रिय शिष्य था कलभ्भन। वह हमेशा महात्मा बुद्ध के आदेशों का पालन करने को तत्पर रहता था। एक दिन महात्मा बुद्ध ने उसे बुलाया और कहा कि वत्स! यह संसार दुखियों से भरा पड़ा है।लोग अज्ञानवश कुरीतियों से जकड़े हुए हैं। अशिक्षा की वजह से वह अपना सुधार नहीं कर पा रहे हैं। तुम जाकर इन लोगों को जागृति का पाठ पढ़ाओ। लोगों के कल्याण का मार्ग इन्हें समझाओ। अपने गुरु की आज्ञा पाकर कलभ्भन चल पड़े। वह चलते-चलते एक गांव में पहुंचे। वहां उन्होंने देखा कि चारों ओर गरीबी का साम्राज्य है। स्त्रियां पुरुषों के काम कर रही हैं। लोग अशिक्षित और कुरीतियों से ग्रसित थे।
बच्चे बीमार और भुखमरी का शिकार लग रहे थे। बच्चे अध्ययन करने भी नहीं जाते थे। कलभ्भन ने कहा कि उन्हें सेवा का स्थान मिल गया। उन्होंने एक पेड़ के नीचे अपना सारा सामान रखा। लोगों को यह खबर मिलते ही कि महात्मा बुद्ध के शिष्य कलभ्भन उनका दुख दूर करने आए हैं, वह उनके पास जमा हो गए। उन्होंने कलभ्भन के रहने की व्यवस्था की।
अगले दिन सुबह कलभ्भन ने उपदेश देना शुरू किया। कुछ दिन बाद तो लोगों ने उनके पास आना ही बंद कर दिया। कलभ्भन लौटकर बुद्ध के पास पहुंचे और सारा हाल कह सुनाया। सब कुछ जानकर उन्होंने अपने दो अन्य शिष्यों को बुलाया और कहा कि अमुक गांव में जाकर लोगों के खाने-पीने और चिकित्सा की व्यवस्था करो। बच्चों के लिए पाठशाला खुलवाओ। उसके बाद जब वह निरोगी हो जाएं, तो उन्हें कर्म का रास्ता दिखाओ। इसके बाद उन्हें आत्म कल्याण का मार्ग बताना। अब कलभ्भन समझ गए कि उन्होंने क्या गलती की थी।