Tuesday, August 12, 2014

पति की जासूसी

-अशोक मिश्र 
जैसे ही मैं घर में घुसा, बेटा मुझे देखकर मुस्कुराया। उसकी मुस्कान से ही मैं समझ गया कि कुछ न कुछ गड़बड़ तो है , लेकिन क्या? इसका अंदाजा लगा ही रहा था कि घरैतिन ने गुर्राते हुए कहा, 'मिल आये कलमुँही से? करवा आये शॉपिंग? ऑफिस में काम ज्यादा बताकर गुलछर्रे उड़ाया जा रहा है।' पत्नी की बात सुनते ही मैं किसी बम की तरह फट पड़ा, 'क्या बकती हो? अपने पति पर ऐसे घटिया आरोप लगाते शर्म नहीं आती है। मैं तुम्हारा पति हूँ, नेता नहीं कि जिसका चरित्र ही कहीं गुम हो गया हो। मैंने जब एक बार तुमसे गठबंधन कर लिया तो कर लिया। यह नहीं कि आज इनसे और कल उनसे कुर्सी हथियाने के लिए गठबंधन करता फिरूँ। तुम चाहो तो अपनी सखी-सहेलियों में इस बात की सगर्व घोषणा कर सकती हो कि मैं इस दुनिया का अकेला एक पत्नीव्रतधारी पति हूँ।' 
मेरे इतना कहते ही घरैतिन चिल्लाईं, 'आप फालतू बातें करके मुझे बरगलाने की कोशिश मत कीजिये। पिछले तीन साल में आपने मेरे लिए लोहे का एक छल्ला तक नहीं ख़रीदा और उस कलमुंही को साठ हजार का नेकलेस खरीदकर दिया जा रहा है। उसको मॉल्स में घुमाया जा रहा है। उसके बच्चों को शॉपिंग कराई जा रही है। मेरे साथ सब्जी मंडी तक जाने में आपको शर्म आती है।' इतना कहकर घरैतिन बुक्का फाड़कर रोने लगीं। उन्हें रोता देखकर मैं हक्का-बक्का रह गया। मैंने चीखते हुए कहा, 'तुम यह आरोप कैसे लगा सकती हो? है तुम्हारे पास कोई सुबूत? जरूर तुम किसी के बहकावे में आकर यह सब कह रही हो। मैंने पहले भी कहा, अब भी कह रहा हूँ, मैंने ऐसा कुछ नहीं किया है। अब मेरा पिंड छोडो और आराम करने दो।' इतना सुनते ही पत्नी विपक्षी दल के नेताओं की तरह हल्ला मचाने लगी। इसमें बेटे ने भी साथ दिया। एकदम संसद जैसा दृश्य मेरे घर में  उपस्थित हो गया।  मैं 'शांत हो जाइए...शांत हो जाइए' चिल्लाता रहा। बेटा और पत्नी वेल में घुस आये सांसदों की तरह चीखते-चिल्लाते रहे। जब शोर बर्दाश्त से बाहर हो गया तो मैंने कहा, 'आप लोगों को सिर्फ़ हंगामा करना है या फिर मेरी बात भी सुननी है ?' 
इतना कहकर मई जैसे ही कमरे में जाने लगा, मेरे बेटे ने मुस्कुराते हुए कहा, 'पापा! झूठ बोलने से कोई फायदा नहीं है। आपकी शर्ट का ऊपरी बटन दरअसल बटन नहीं, माइक्रोफोन है। पिछले तीन दिन से आपकी सारी बातें घर बैठे मम्मी सुन रही हैं।' यह सुनते अब भड़कने की बारी मेरी थी, 'तुम लोगों ने मुझे गडकरी, चिदंबरम या कोई मंत्री समझ रखा है क्या, जो  जासूसी कराई जा रही है।' मेरी बीवी यह सुनते ही हंसने लगी और बोली, 'पतिदेव जी, नाराज मत होइए। आप पिछले कुछ दिनों से ऑफिस का काम बता कर घर से गायब हो रहे थे। मुझे लगा, जरूर कोई गड़बड़ है, पता लगाने के लिए पड़ोसन से माइक्रोफोन मांग लाई। शुक्र है कि आप वैसे नहीं निकले,जैसा मैंने सोचा था। जब प्रधानमंत्री अपने मंत्रियों की कारगुजारी जानने के लिए उनकी जासूसी करा सकते हैं , तो एक बीवी अपने पति की जासूसी क्यों नहीं करा सकती है। मैं तो कहती हूँ कि हर पत्नी को अपने पति की जासूसी करने का संवैधानिक अधिकार है। उसे हर हालत में यह मालुम होना चाहिए कि घर के बाहर उसका पति क्या-क्या करता फिर रहा है। जब देश चलाने वाले को अपने मंत्रियों पर विश्वास नहीं है, तो फिर मुझे अपने दिलफेंक पति पर विश्वास कैसे हो सकता है। ' इतना कहकर पत्नी चाय बनाने के लिए किचन में घुस गईं। मैं किसी भकुए की तरह उन्हें जाता देखता रहा। 
(12 अगस्त 2014 को चर्चित समाचार पत्र कल्पतरु एक्सप्रेस में प्रकाशित व्यंग्य। 

Wednesday, August 6, 2014

सड़े टमाटर और उस्ताद गुनहगार

 -अशोक मिश्र 
मैं जैसे ही थैला लेकर गली के मोड़ पर पहुंचा, उस्ताद गुनहगार खड़े नजर आये। मैंने प्रणाम करते हुए कहा, 'उस्ताद ! आज आपके हाथ में थैले की जगह बोरी है। क्या आज भंडारा करने जा रहे हैं ? लगता है आज पूरी मंडी में कोई भी सब्जी नहीं बचेगी।' गुनहगार ने मुझे घूरते हुए कहा , 'बरखुरदार अपनी चोंच बंद रखो और चुपचाप मेरे साथ चलते रहो।' मैं गुनहगार के साथ किसी बच्चे की तरह पीछे-पीछे चलता रहा। बीच में एकाध बार मुंह खोलने की सोची लेकिन फिर चुप्पी साध गया।   
बाजार में पहुँचते ही उस्ताद गुनहगार टमाटर खोजने में व्यस्त हो गए। घर से चलते समय घरैतिन ने बीस-पच्चीस ग्राम टमाटर लाने को कहा था, सो मैंने सोचा जब उस्ताद ले ही रहे हैं, तो उन्ही से एक टमाटर मांग लूंगा। एक सब्जी दुकान पर पहुंचकर गृहनगर ने कहा, 'भैया...सड़े टमाटर हैं क्या ?' गुनहगार की बात सुनते ही पता नहीं मुझे क्या मज़ाक सूझी, मैंने भी दुकानदार से पूछ लिया, 'भैया ...मीठे वाले देवा पहाड़ी आलू है क्या?' मेरे इतना पूछते ही बगल में खड़े होकर आलू छांट रही महिला के हाथ रुक गए। तभी दुकानदार ने हँसते हुए कहा, ' भाई साहब! ले लीजिये बहुत मीठे हैं आलू।' यह सुनते ही आलू छांट रही महिला ने पाली बैग में छांट कर रखा गया आलू ढेर में उलट दिया और चलती बनी। दुकानदार लाख चिल्लाता रहा, 'बहन जी ..अरे सुनिए। साहब तो मज़ाक कर रहे थे।  आलू मीठे नहीं हैं।' लेकिन उस महिला ने पलट कर भी नहीं देखा। सब्जी वाले ने मुझे इस तरह घूरकर देखा मानो कच्चा ही चबाकर खा जायेगा। मैंने भी सिटपिटा कर निगाहें फेर ली। उस्ताद गुनहगार ने पहले तो मुझे घूरा और फिर बेतहाशा हंस पड़े। बोले, 'बेटा ...नक़ल के लिए भी अकल की जरुरत होती है। तुम्हें जो सब्जी चाहिए खरीद लो, तब तक मैं भी अपनी जररूत के हिसाब से मार्केटिंग करता हूँ। ' 
मैंने उस्ताद से कहा, 'आप चिंता न करें। पहले आप खरीददारी कर लें, मैं उसमें आपकी सहायता करता हूँ। फिर मैं भी कुछ ख़रीद लूंगा। मुझे कुछ ज्यादा नहीं खरीदना है।' गुनहगार ने सकारात्मक भाव से अपनी मुंडी हिलाई बोले, 'तो चलो सबसे पहले टमाटर खरीदते हैं। मुझे किलो-दो किलो टमाटर नहीं खरीदना है। मुझे लगभग आधा क्विंटल टमाटर खरीदना है। इसमें थोड़ा समय लग सकता है क्योँकि मुझे अच्छे नहीं, सड़े टमाटर चाहिए।' गुनहगार की बात सुनकर मैं भौंचक्का रह गया। मैंने आश्चर्य व्यक्त  कहा, 'उस्ताद जब सारी दुनिया सड़े टमाटर या अंडे खरीदने से परहेज करती है, तब आपको सड़े टमाटर खरीदने की यह खब्त क्योँ सवार है। मामला क्या है आखिर मैं भी जानूँ।' मेरी सुनकर गुनहगार मुस्कुराये और सिर्फ इतना ही कहा, 'समय आने पर तुम्हें सब कुछ पता चल जाएगा। फिलहाल मुझे खरीददारी करने दो।' इतना कह कर उस्ताद अपने काम में जुट गए। करीब ढाई घंटे के अथक परिश्रम के बाद पच्चास किलो सड़ा टमाटर, आधा किलो आलू, पाव भर प्याज, दस ग्राम लहसुन खरीदकर गाते-गुनगुनाते उस्ताद गुनहगार घर लौट आए। मैंने कुछ नहीं ख़रीदा। रास्ते में मैंने लाख पूछा, लेकिन गुनहगार ने नहीं बताया। 
शाम को जब पेट में गुड़गुड़ ज्यादा हुई तो गुनहगार की नजर बचाकर भाभी से मिला और माजरा पूछा। भाभी ने बड़बड़ाते हुए कहा, 'पता नहीं क्यों, पिछले कुछ दिनों से अच्छे दिन और रैली-रैली बड़बड़ा रहे हैं।' भाभी की बातों से जो मैं समझ पाया, वह यह है कि अच्छे दिन न आने से निराश गुनहगार को नेताओं की रैलियों का इंतजार है। वे तब तक सड़े टमाटरों में से अच्छे छांट-बीन कर सलाद खा रहे हैं और बाकि बचे हुए को सहेजकर रैलियों के लिए रखे हुए हैं।  
(6 अगस्त 2914 को कल्पतरु एक्सप्रेस में प्रकाशित )

Thursday, July 31, 2014

स्कूल बैग में हथियार

-अशोक मिश्र
मैं भागा-भागा अपने सपूत के स्कूल में पहुंचा और हांफते हुए प्रिंसिपल से मैंने कहा, जी, मैं ही सोनू का पापा हूं। आपने मुझे तुरंत स्कूल आने को कहा था। फरमाइए, क्या कोई खास बात है? प्रिंसिपल ने मुझे ऐसे घूरा, जैसे मैंने उनकी भैंस खोल ली हो। फिर वह बोले, आप अपने बच्चे के साथ कल से एक गार्ड भेजिए। अगर बच्चे के साथ कुछ ऊंच-नीच हो गई, तो स्कूल प्रशासन कतई जिम्मेदार नहीं होगा। मैंने उनसे पूछा, स्कूल पर कोई आतंकी हमला होने वाला है? क्या किसी आतंकी या नक्सली संगठन ने रंगदारी मांगी है? अगर ऐसा है, तो भी लख्ते जिगर के साथ सुरक्षाकर्मी भेज पाने की हैसियत मेरी नहीं है।
इतना कहकर मैं उन्हें प्रश्नसूचक निगाहों से घूरने लगा। इस पर वह थोड़ा अचकचाए, फिर संभलते हुए बोले, देखिए, आजकल जिस तरह हादसे होने लगे हैं, उसमें जरूरी हो गया है कि छात्र-छात्राओं की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। स्कूल में कुछ हुआ नहीं कि मां-बाप दौड़ते हुए चले आते हैं। ऐसे में हम क्या करें? अगर आप अपने बच्चे के साथ गार्ड नहीं भेज सकते, तो उसके बैग में कोई हथियार ही रख दें, ताकि झगड़ा-फसाद के वक्त बच्चा अपना बचाव कर पाए। इतनी तो औकात आपकी है ही या इसमें भी आप असमर्थ हैं?
प्रिंसिपल की बात सुन मेरे होश उड़ गए। मैं घबराए स्वर में कहा, क्या कह रहे हैं आप? मैं अपने बच्चे को सभ्य और जिम्मेदार नागरिक बनने के लिए स्कूल भेजता हूं या गुंडा बनाने के लिए? आप कैसी शिक्षा देना चाहते हैं बच्चों को, यह मेरी समझ से बाहर है।
प्रिंसिपल ने जैसे फैसला सुनाते हुए कहा, ऐसे में तो यही विकल्प बचता है कि आप अपने नौनिहाल को स्कूल से निकाल लें या फिर स्कूल प्रशासन को लिखकर दें कि भविष्य में बच्चे के साथ कोई दुर्घटना होती है, तो उसकी जिम्मेदारी स्कूल की नहीं होगी।

मैंने बेटे को उस स्कूल से निकाल लिया है और एक ऐसे स्कूल की तलाश में हूं, जहां शिक्षा के साथ सुरक्षा की भी गारंटी हो। आपकी नजर में ऐसा कोई स्कूल हो, तो बताएं।  

(31 जुलाई 2014 को अमर उजाला के सम्पादकीय पेज पर प्रकाशित)

Saturday, July 26, 2014

बगदादी से मुलाकात

अशोक मिश्र

Meet with Bagdadi

उस्ताद गुनहगार घबराए हुए से मेरे घर में घुसे और मेरे प्रणाम को नजरंदाज करते हुए बोले, यह बताओ, सीआईए वाले जब किसी को पकड़ते हैं, तो क्या बहुत मारते हैं? पहले टॉर्चर करते हैं, उसके बाद गोली मारते हैं या फिर सीधे गोली मार देते हैं? मारने से पहले कुछ खिलाते-पिलाते हैं या खाली पेट ही इस दुनिया-ए-फानी से विदा कर देते हैं?

मैंने कहा, उस्ताद! सीआईए वाले मारते कम और घसीटते ज्यादा हैं। वैसे बात क्या है? दुआ न सलाम, आते ही बंदूक तान दी।
उस्ताद गुनहगार ने इधर-उधर देखते हुए कहा, क्या बताएं, मेरी मति ही मारी गई थी, जो दुनिया के मोस्ट वांटेड अबू बकर अल बगदादी से यों ही टहलते हुए मुलाकात करने जा पहुंचा। खुदा झूठ न बुलवाए, उसने खातिरदारी भी बहुत की। उसके एक चेले ने तो बड़े अदब से हम दोनों की एक तस्वीर भी खींची। लेकिन जब से मालूम हुआ है कि उसे अमेरिका वाले खोज रहे हैं, तब से मुझे दस्त आ रहे हैं। कई तरह की आशंकाएं घेरे हुए हैं। मेरी पत्नी तो अपनी सहेलियों और मोहल्ले की औरतों को भी मुलाकात गाथा सुना आई हैं। अब समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करूं? जब सीआईए पूरी दुनिया में बगदादी को खोजते घूम रहे हैं, तो फिर वे मुझे भी खोज सकते हैं।


उस्ताद की बात सुनते ही मेरे दिमाग का एंटीना खड़ा हो गया। मैंने तुरंत कहा, उस्ताद! आप भी न, बैठे-बिठाए मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डाल देते हैं। आपको क्या पड़ी थी बगदादी से मिलने की? अब जो किया है, भुगतिए। मैं आपको कोई सलाह नहीं दे सकता, बल्कि आपसे अपना रिश्ता अभी से खत्म करने की घोषणा करता हूं। मुझे अपने बाल-बच्चों को अनाथ नहीं करना है।
इतना कहकर मैं बाहर आया और मोहल्ले वालों को सुनाकर उन्हें जोर से कहने लगा, मैं आपको जब जानता नहीं, पहचानता नहीं, तो आप क्यों खामख्वाह बेटा-बेटा कहकर घर में घुसे आ रहे हैं?

मेरे इतना कहने पर उस्ताद पहले तो अकबकाए, फिर लड़खड़ाते कदमों से अपने घर की ओर चले गए

Wednesday, July 23, 2014

संतुलन साधना ही शिवत्व

मित्रो ! दैनिक जागरण के सप्तरंग परिशिष्ट में आज 23 जुलाई 2014 को प्रकाशित शिवत्व को पारिभाषित करने का प्रयास करता मेरा एक लेख। आपकी स्नेहिल प्रतिक्रिया की अपेक्षा है। विवेक भाई को आभार
http://epaper.jagran.com/ePaperArticle/23-jul-2014-edition-Delhi-City-page_24-189-4190-4.html

Tuesday, July 22, 2014

पुलिसवालों के "अच्छे दिन"

-अशोक मिश्र
चौराहे के एक किनारे खड़े सिपाही राम मूर्ति ने तम्बाकू रगड़ने के बाद "फट्ट...फट्ट" की आवाज करते हुए चूना झाड़ा। इसके बाद उसने संतुष्टि के भाव से तम्बाकू को निहारा और जैसे ही मुंह में डालने को हथेली उठाई, तभी पता नहीं किस ओर से हवलदार भदौरिया प्रकट हो गया। उसने मुस्कुराते हुए राम मूर्ति से कहा, ''क्यों राम मूर्ति ? मेरा हिस्सा भूल गए थे क्या ?' हवलदार की बात सुनते ही राम मूर्ति की फैली हुई बायीं हथेली मुट्ठी में तब्दील हुई और दायां हाथ  सैल्यूट की मुद्रा में माथे पर गया।  उसने हड़बड़ाए हुए स्वर में कहा, ''जय हिन्द साब! आपने तो डरवा ही दिया था अचानक सामने आकर।  मैंने समझा सीओ साहब आ गए हैं। भदौरिया साब ! आप भी हिस्से की क्या बात करते है। आपका हिस्सा कभी मारा है ? आप ही बताइए, कभी आपको हिस्सा देने से चूका होऊं, तो ? यह तो मुई तम्बाकू है, जब हज़ारों-लाखों की बात थी, तब भी आप मेरी नज़रों से ओझल नहीं हुए। आपको याद है, जब तीन महीने पहले  एसपी साहब के साथ '' संस एंड संस'' ज्वैलर्स की दुकान पर छापा मारने गया था। साहब ! तस्करी करके लाया गया सवा पांच किलो सोना बरामद हुआ था। जानते हैं साब, अगले दिन अख़बारों में सिर्फ चार किलो सोना बरामद होने की खबर छपी। सवा किलो सोना साहब और बड़का साहब डकार गए और किसी को भनक तक नहीं लगने दी। वो तो साब सोने के बिस्कुट गिनते समय मौका पाकर 50 ग्राम के सोने का एक बिस्कुट मैंने पार कर दिया था जूते में छिपाकर। उसमें से एक तोला सोना मैंने आपको दिया था या नहीं ? इतना ही नही, दिन भर में जितनी भी कमाई होती है, उसमें से आपका हिस्सा आपको मिलता है या नहीं ?''
भदौरिया ने तम्बाकू होठों के बीच दबाने के बाद जमीन पर पिच्च से थूक दिया। उसने उचटती सी निगाह पूरे चौराहे पर डाली और राम मूर्ति से कहा, 'छोड़ यार, दो पैसे की तम्बाकू खिलाकर चौराहे पर क्यों पैंट उतरने पर तुला हुआ है ? तुम अपनी कमाई में हिस्सा देकर कोई एहसान नहीं करते हो। मैं भी अपनी कमाई में से बड़े साहब को हिस्सा देता हूँ। पुलिस महकमे में तो हर कोई हिस्सा लेता है और देता है। ठीक दूसरे महकमे की तरह। अब अगर मैं तुम्हारी पोल-पट्टी खोलने लगूं, तो पूरा पोथन्ना भर जाए, फिर भी तुम्हारी करतूत पूरी नहीं लिखी जा सकेगी।'
भदौरिया के पलटवार करने से खिसियाए राम मूर्ति ने 'हें.……हें'  करते हुए दांत निपोर दिया और कहा, ' अरे साब ! आप तो नाराज हो गए। छोड़िये यह सब और यह बताइये, हम लोगों के अच्छे दिन कब आएंगे? इस बार तो बजट में भी तीन हज़ार करोड़ रुपये सरकार ने दिए हैं हम पुलिस वालों के अच्छे दिन लाने को। साब मैं तो जब भी तीन हज़ार करोड़ रुपये के बारे में सोचता हूँ, मेरे रोयें खड़े हो जाते हैं। मन तो बादलों के ठेंगा दिखने के बाद भी मयूर की तरह नाच उठता है। 'आय-हाय' कब आएंगे मुए तीन हज़ार करोड़ रुपये। हवलदार साहब, लगता है मैं इन रुपयों के बारे में सोच-सोच कर पागल हो जाऊंगा। मैंने तो यहाँ तक जोड़-घटा लिया है साब कि मेरे हिस्से में कितने आएंगे। मेरी घरवाली तो मोहल्ले के सुनार की दुकान पर जाकर 'लेटेस्ट डिज़ाइन' का नेकलेस तक पसंद कर आई है।  वह तो रात में भी कई बार जगाकर पूछती है कि कब मिलेंगे पैसे? सोते समय भी कुछ ना कुछ बड़बड़ाती रहती है। बेटा तो बहुत दिनों से पिकनिक मानाने के लिए गोवा जाने की जिद कर रहा है। सोचता हूँ इस बार बेटे की यह इच्छा पूरी ही कर दूँ। बेटा जवान-जहान अभी घूमे-फिरेगा नहीं तो क्या बुढ़ापे में गोवा जाएगा। चार-पांच महीने पहले एक तगड़ा हाथ मारा था तो बेटी को उसकी सहेलियों के साथ सिंगापुर पांच दिन के टूर पर भेज दिया था। बेटी जब लौट कर आई थी, तो मोहल्ले भर में उसकी धाक जम गई थी। बेटा तभी से मुंह फुलाये घूम रहा है। साब ! बच्चों की इच्छाएं पूरी न हों तो वे जीवन भर एहसास-ऐ-कमतरी (माइनॉरिटी काम्प्लेक्स) के शिकार रहते हैं।'
राम मूर्ति की बात सुनकर हवलदार भदौरिया ठहाका लगाकर हंस पड़ा। उसने हँसते हुए कहा, 'धत्त बुड़बक! उस पैसे के बारे में तो सोचना भी मत। तीन हज़ार करोड़ रुपये सरकार ने तुम्हारी घरवाली के नेकलेस और बेटे के गोवा जाने के लिए नहीं दे रही है। इस पैसे से पुलिसवालों की दशा और दिशा बदली जाएगी।' भदौरिया ने एक बार फिर पिच्च से तम्बाकू की पीच थूक दी, मानो पूरे पुलिस तंत्र पर ही थूक दिया हो। फिर पता नहीं क्या हुआ कि भदौरिया एकाएक गंभीर हो गया।  उसने आकाश की ओर देखते हुए कहा, 'कहते हैं कि इस पैसे से पुलिस तंत्र को मजबूत किया जायेगा, लेकिन इस तंत्र का कौन सा हिस्सा मजबूत होगा कोई मुझसे पूछे। तुमने भी अच्छे दिनों की बात खूब चलाईे। सुना है, बड़का ने अपना हिस्सा बढ़ा दिया है। बड़का साहब के भी बड़के साहब ने अपना हिस्सा जो बढ़ा दिया है। इन साहबों के अच्छे दिन तो आने वाले हैं। रह गए हम लोग तो पहले जिस तरह से जीते थे , वैसे ही अब भी जिएंगे। इस महंगाई के ज़माने में हम मामूली पुलिसवाले कैसे जीते हैं, इसके बारे में ना तो सरकार सोचती है और ना ही आम आदमी।'  
राम मूर्ति ने रुआंसे स्वर में कहा, 'तो क्या हमारे अच्छे दिन कभी नहीं आएंगे?' इस बीच राम मूर्ति ने दोबारा तम्बाकू निकालकर बनाने लगा था।  वह अभी चूना निकल  था कि चौराहे से क्रॉस करने वाली एक कार ने एक बाइक सवार को इतनी जोर की टक्कर मारी कि बाइक सवार काफी दूर तक घिसटता चला गया। इस घटना को देखकर भदौरिया के साथ-साथ राम मूर्ति की आँखें चमक उठीं। भदौरिया मुंह में रखी तम्बाकू को थूकने के साथ यह कहते हुए घटनास्थल की ओर बढ़ गया, 'राम मूर्ति! जिस अच्छे दिन का रोना अभी तुम रो रहे थे, वह आ गया।  तुम बाइक सवार को सम्भालो।  मैं कार वाले को पकड़ता हूँ।  अगर बाइक वाले को ज्यादा चोट न आई हो, उसे भी हलाल किए बिना जाने मत देना। ' और दोनों अपने अच्छे दिन लेन को बड़ी शिद्दत के साथ जुट गए। 

Tuesday, March 11, 2014

राखी सावंत से एक हसीन मुलाकात

-अशोक मिश्र
अखबारों के ये संपादक भी न... एकदम खड़ूस होते हैं। हिटलरी मानसिकता के प्रतीक, अपने अधीनस्थ कर्मचारियों के साथ दादागीरी करने वाले। अब आज का ही किस्सा लीजिए। मैं जैसे ही ऑफिस पहुंचा, संपादक जी का बुलावा आ गया। मैंने उनके दरबार में पहुंचकर कोर्निश बजाई, तो उन्होंने जिल्ले सुभहानी मुगल शहंशाह जलालुद्दीन अकबर की तरह फरमान जारी कर दिया, 'सुनो! आज शाम तक सनी लियोनी, मल्लिका सहरावत, राखी सावंत, पूनम पांडेय आदि...आदि... में से किसी एक का इंटरव्यू चाहिए। इंटरव्यू ऐसा होना चाहिए जिसको पढ़कर फागुनी बयार में बौराये महारे पाठकों का दिल फड़क उठे, धड़क उठे। शाम तक इंटरव्यू मेरी टेबल तक नहीं पहुंचा, तो समझो खल्लास। नौकरी से खल्लास। इसलिए अपने हाथ-पांव हिलाओ, अपनी नौकरी बचाओ।Ó मैं कुछ कहता, इससे पहले उन्होने चपरासी को बुलाने के लिए घंटी बजाते हुए कहा, 'अभी तक तुम सिर पर सवार हो, दफा हो जाओ मेरे सामने से।Ó
अब संपादक जी को कौन समझाए। आप इंग्लैण्ड की महारानी से जब चाहें, मुलाकात कर सकते हैं। बराक ओबामा, मनमोहन सिंह, नरेंद्र मोदी से मिलकर उनका हालचाल पूछ सकते हैं, लेकिन इन हीरोइनों का इंटरव्यू....असंभव मैं मन ही मन अपनी किस्मत को कोसता अपनी सीट पर आकर बैठ गया। थोड़ी देर बाद नौकरी बजाने के लिए हाथ-पैर सचमुच हिलाना पड़ा। ऐसे में जा पहुंचा भारतीयता की प्रतीक, इक्कीसवीं सदी की लड़कियों की रोल मॉडल राखी सावंत के घर। वहां एक अलग ही नजारा था। फिल्म जगत की महान खलनायक हस्तियां और बोल्ड आइटम गल्र्स होली के हुड़दंग में डूबी हुई थीं। शक्ति कपूर, आशुतोष राणा, परेश रावल जैसी शख्सियतें मल्लिका सहरावत, सनी लियोनी से हंसी-ठिठोली कर रही थीं। सनी लिओनी के साथ 'पप्पियां-झप्पियांÓ देने और लेने की होड़ लगी हुई थी। सबके सब बस लियोनी के साथ झप्पियां लेने को बेताब नजर आ रहे थे। एमएमएस बनवाने और लीक करने में माहिर पूनम पांडेय, 'कामसूत्रÓ की साकार प्रतिमूर्ति शर्लिन चोपड़ा एक ओर खड़ी अपनी उपेक्षा पर टसुए बहा रही थीं। हेराफेरी मास्टर परेश रावल सबको समझा रहे थे, 'देवा रे देवा...यहां तो अंधेर मची हुई है। सारे के सारे सनी लियोनी बेबी से लिपटने-चिपटने को मरे जा रहे हैं। नहीं...नहीं... यह गलत है। सनी लियोनी की एक पप्पी शक्ति कपूर लेगा, तो एक पप्पी का हकदार आशुतोष राणा भी होगा। गाल पर एक चुटकी मैं काटूंगा, तो दूसरे गाल पर गुलशन ग्रोवर का चुटकी काटना बनता है। और फिर... अंत में हम सब मिलकर होली के इस मौके पर सनी लियोनी की बैंड बजाएंगे।Ó
राखी सावंत किसी क्रोधित शेरनी की तरह कमरे में गोल-गोल चक्कर काट रही थीं। अचानक वे वाहर निकलीं, तो मैं झट से उनके सामने नमूदार हो गया। मैंने खींसे निपोरते हुए कहा, 'मैं दैनिक झमाझम टाइम्स का टुटपुंजिया टाइप का पत्रकार और चिरकुट किस्म का व्यंग्यकार हूं। मेरे संपादक का कहना है कि मेरा अपर चैंबर (दिमाग) बिल्कुल खाली है। मैं उसे आपके इंटरव्यू से भरना चाहता हूं।Ó अपने ही घर में उपेक्षित-सी राखी सावंत इंटरव्यू की बात सुनकर प्रसन्न हो गई, 'नॉटी ब्वाय! तुम कोई ऐसी-वैसी बात तो नहीं पूछोगे?Ó मैंने एक बार फिर खींसे निपोरी, 'नो...नो नॉटी गर्ल! ऐसे-वैसे तो नहीं, लेकिन 'वैसे-ऐसेÓ सवाल जरूर पूछूंगा। एक बात बताइए, आप फाल्गुन के बारे में कितना जानती हैं? मेरा मतलब है... आपको फाल्गुन कैसा लगता है? मेरी बात सुनकर राखी सावंत ने शरमाने का अभिनय किया, 'फाल्गुन के बारे में सब कुछ जानती हूं। बहुत अच्छा ड्रेस डिजाइनर है फाल्गुन... फाल्गुन आहूजा। उसके द्वारा डिजाइन की गई ड्रेस किशोरों युवाओं अधेर और वृद्धों को बहुत पसंद आती हैं। वह क्या है कि फिल्मी दुनिया की ज्यादातर हीरोइनों, आइटम गल्र्स और डांसर गल्र्स की ड्रेस वही डिजाइन करता है। उसके द्वारा डिजाइन किए  गए कपड़ों को पहनने के बाद यही नहीं पता चलता है कि क्या छिप रहा है और क्या दिख रहा है। कपड़े पहनने के बावजूद न पहनने का एहसास होता है। वैसे एक बात बताऊं, फाल्गुन आहूजा दो साल पहले आयोजित 'राखी का स्वयंवरÓ का प्रतिभागी भी था। बेचारा... स्वयंवर नहीं रचा पाया, तो डिजाइनर बन गया।Ó
'अरे नहीं...राखी जी! मैं उस फाल्गुन की बात नहीं कर रहा हूं। मैं फाल्गुन महीने की बात कर रहा हूं। इस महीने में हर युवा का दिल जोर-शोर से धड़कता है, अंगड़ाइंयां लेने का मन करता है। एक अजीब सी मस्ती छा जाती है। लड़कियों के आंचल लहराने लगते हैं। इस मौसम में 'आमÓ ही नहीं, खास भी बौरा जाते हैं।Ó मैंने समझाने का प्रयास किया, तो राखी सावंत बोल उठीं, 'ओह...अच्छा वो...फाल्गुन। आप तो जानते ही हैं कि हम फिल्म वालों को पढ़ऩे का मौका कम ही मिलता है, फिर भी मैंने कहीं पढ़ा था कि फाल्गुन में ब्लड प्रेशर के रोगी बढ़ जाते हैं। एक सर्वे में बताया गया था कि पुरुषों में हाई ब्लड प्रेशर का कारण खूबसूरत और जवान लड़कियां होती हैं। लड़कियों को देखकर आहें भरने वाले लो ब्लड प्रेशर के रोगी तो ठीक हो जाते हैं, लेकिन नॉर्मल ब्लड प्रेशर बालों का ब्लड प्रेशर बिगड़ जाता है। ऐसा सबसे ज्यादा फाल्गुन महीने में होता है। जहां तक फाल्गुन में आहें भरने...सिसकियां भरने की बात है, तो यह फिल्मी दुनिया में बारहों महीने होता रहता है। अब देखो न! करीना दीदी ने 'अंगड़ाइयां लेती हूं जब जोर-शोर से... ऊह, आह की आवाज है आती हर ओर सेÓ आइटम सांग शूट करवाया था, तब भयंकर सर्दी पड़ रही थी। लेकिन लोग थे कि उस भयंकर सर्दी में भी बौराये जा रहे थे।Ó
राखी सावंत की बात सुनकर मैं चौंक गया, 'करीना दीदी... करीना आपकी दीदी कब से हो गईं?Ó मेरे चौंकने पर राखी मुस्कुराई, 'यह एक टॉप सिक्रेट है। लिखना नहीं... फिल्म इंडस्ट्री की हर एक्ट्रेस, आइटम और डांसर गल्र्स एक दूसरे की बहनें हैं। शार्लिन चोपड़ा, ऐश्वर्या राय बच्चन, पूनम पांडेय... कहने का मतलब यह है कि हम सब आपस में बहनाये की डोर से बंधी हैं, या फिर जीजू है। हां, अगर उनमें कोई जन्मत: संबंध नहीं है तो। ईशा और सनी देओल भाई-बहन थे, भाई-बहन हैं और भाई-बहन रहेंगे।Óं
'अच्छा छोडि़ए इस बात को। यह बताइए कि फाल्गुन में बाबा देवर क्यों लगने लगते हैं?Ó मेरी बात सुनकर उनके चेहरे पर एक टीस उभर आई। गुमसुम सी आवाज में उन्होंने जवाब दिया, 'फाल्गुन में बाबा देवर नहीं, स्वामी लगने लगते हैं। तुम तो जानते ही हो, इस देश में एक बाबा हैं, एक स्वामी हैं, गुरु हैं, भले ही योग के हों। मैंने तो उनके सामने शादी का प्रस्ताव भी रखा था। इस दुनिया में तो बस वही एक मर्द है, बाकी सब...। तुम समझ सकते हो, मैं क्या कहना चाहती हूं। सबके लिए वह मर्द पुरुष बाबा है, योग गुरु है, आध्यात्मिक संत है, लेकिन मेरे लिए स्वामी है। जब कोई महिला उन्हें स्वामी कहकर संबोधित करती है, तो मन होता है उस नासपीटी का मुंह नोच लूं। वे सिर्फ मेरे स्वामी हैं। इस जन्म में भी, अगले सौ जन्मों में भी।Ó
'हां...आपकी बात से याद आया। एक केन्द्रीय मंत्री ने इस देश के भावी प्रधानमंत्री को नपुंसक कहा है। आप इस बारे में कुछ कहना चाहेंगी?Ó राखी सावंत इस सवाल पर थोड़ी देर चुप रहीं, फिर बोली, 'मैं इस बारे में सिर्फ इतना कहना चाहूंगी कि हो सकता है, यह उस मंत्री का कोई निजी अनुभव हो। जहां तक मर्द होने की बात है, तो मेरी नजर में सिर्फ और सिर्फ एक ही मर्द है। और वह हैं सबके बाबा, मेरे स्वामी।
'चौरासी-पच्चासी साल की उम्र में तिवारी जी पिता बन गए। इस पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है? आप इस बारे में क्या सोचती हैं?Ó मैंने इंटरव्यू को थोड़ा राजनीतिक बनाने की कोशिश की। राखी सावंत ने तपाक से जवाब दिया, 'हमारा देश महान है। इस देश की महान सभ्यता और संस्कृति के पुरोधा हैं तिवारी जी। उनकी उम्र पर मत जाइए। हमारे यहां 'साठा, तब पाठाÓ  की कहावत बहुत पुरानी है। बयासी-तिरासी साल की उम्र में रासलीला रचाने वाला बूढ़ा हो सकता है? इसी देश में कभी कान (कर्ण) से बच्चे पैदा होते थे। सूर्य, पवन, चंद्र, धर्मराज, यमराज का आह्वान करके स्त्रियां पुत्र रत्न प्राप्त करती रही हैं। बहुत महान है, इस देश की संस्कृति।Ó तभी अंदर से शोर उभरा। मैंने देखा कि पहले से ही न्यूनतम पहने गए वस्त्रों को संभालती बदहवास सी सनी लियोनी भागी चली आ रही हैं। उनके पीछे खलनायकों की टोली अबीर, गुलाल, काला पेंट लिए, दौड़ी आ रही है। सनी लियोनी ने मुझसे गुहार लगाई, 'इन मुस्टंडों से मुझे बचा लो। मैं पॉर्न फिल्म इंडस्ट्री की हीरोइन भले ही रही हूं, लेकिन ऐसा तो वहां भी नहीं होता। मुझे बचा लो। नहीं खेलनी मुझे इनके साथ होली। ये तो होली के बहाने चीर हरण पर उतारू हैं।Ó सनी लियोनी... मेरी स्वप्न सुंदरी...उसकी यह दशा। मुुझे ताव आ गया। मैंने आव देखा, न ताव। एक भरपूर लात भागे आ रहे एक फिल्मी कम वास्तविक विलेन के पेट पर मारी। मगर यह क्या? किसी स्त्री की बड़ी तेज चीख उभरी, 'हाय दइया..मार डाला इस नासपीटे ने...हाय राम... मर गई।Ó मैं समझ नहीं पाया, लात मारी विलेन को कैसे लग गई सनी लियोनी को। मैंने आंखे मली, तो पाया कि मैं राखी सावंत के घर नहीं, बल्कि अपने घर के बेड पर हूं। घरैतिन पेट पकड़ कर 'हाय-हायÓ कर रही है और मैं हवन्नकों की तरह उन्हें देख रहा हूं। दरअसल, मैं सपना देख रहा था। सच्चाई समझ में आते ही मैं घरैतिन के चरणों में लोट गया, 'देवी! माफ करो। मैंने जान बूझकर यह अपराध नहीं किया है।Ó इसके बाद क्या हुआ होगा, यह बताने की जरुरत है क्या?

Saturday, February 15, 2014

भ्रष्ट मीडिया का कच्चा-चिट्ठा

-सुभाष चंद्र
लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है मीडिया। चमक-दमक से भरपूर। मीडिया से बाहर रहने वालों को बहुत लुभाता है यह पेशा। मीडिया में एक ऊर्जा हमेशा प्रवाहमान रहती है। पत्रकारिता मिशन है या व्यवसाय? इस पर पिछले कुछ दशक से बहस तेज हो गई है। आज हालात यह है कि पत्रकारिता न विशुद्ध रूप से मिशन रह गया है, न व्यवसाय। एक अजीब सा घालमेल मीडिया में पैदा हो गया है। कुछ लोग मीडिया को मिशन मानकर आते हैं, कुछ साल मिशनरी जज्बे से काम भी करते हैं, लेकिन अंतत: व्यावसायिक हितों के आगे हथियार रख देते हैं। वे न पूरी तरह से विशुद्ध मिशनरी रह पाते हैं, न व्यवसायी। एक पत्रकार की जीजीविषा, उसके मानवीय और सामाजिक सरोकार, घुटन, मजबूरी और उससे उत्पन्न कुंठा आदि को शब्द प्रदान करता है उपन्यास ‘सच अभी जिंदा है’। उपन्यास का मुख्य किरदार है शिवाकांत।  मिशनरी जज्बे से लैस होकर जब इस पेशे में आता है, तो उसे कदम-दर-कदम ऐसे लोगों से जूझना पड़ता है, जो पत्रकारिता को सिर्फ व्यवसाय समझकर आए हैं। दैनिक प्रहरी में वह महसूस करता है कि संपादक से लेकर संवाददाता और उप संपादक तक एक दूसरे की टांग खींचने, चुगली करने, डग्गा वसूलने और अखबार मालिक की नजर में बने रहने के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं। वह इन स्थितियों के खिलाफ उठकर खड़ा होता है, तो उस पर एक रिसॉर्ट मालिक से वसूली का झूठा आरोप लगाया जाता है। वह मजबूरन इस्तीफा देकर चला आता है।
नौकरी की तलाश उसे लखनऊ से दिल्ली लेकर आती है। एक दिन वह आठ वर्षीय सोनिया से हुए सामूहिक बलात्कार खबर कवर करने क्या जाता है मानो मुसीबत ही मोल ले लेता है। अस्पताल में सोनिया की मौत हो जाती है। वह अखबार में मुख्य खबर के साथ-साथ कई साइड स्टोरियां भेजता है, लेकिन अगले दिन जब वह अखबार देखता है, तो वह आश्चर्यचकित रह जाता है। उसकी खबरें तोड़-मरोड़कर छापी गई थीं। साइड स्टोरियों के तथ्य बदल दिए गए थे। विरोध करने पर उसे टाल दिया जाता है। बात में छानबीन करने पर उसे पता चलता है कि दिल्ली के एक बहुत बड़े बिल्डर ने सभी अखबारों को मैनेज कर लिया था। सात दिन में उसके अखबार को ही पैंतीस लाख रुपये का विज्ञापन दिया गया था। वह इसके विरोध में अपने समाचार संपादक के सामने विरोध प्रकट करता है, तो उसे पत्रकारिता और व्यवसाय की मजबूरियां बताकर चुप करने का प्रयास किया जाता है। उधर, अस्पताल में दम तोड़ती हुई सोनिया की सुनी गई चीखें उसे मजबूरन इस स्थिति के खिलाफ खड़ा होने को बाध्य करती हैं। वह अपने एक मित्र के साथ लिव इन रिलेशन में रह रही पत्रकार शालिनी की मदद से दिल्ली के कुछ स्वयंसेवी संगठनों को इसके खिलाफ खड़ा करता है। शिवाकांत के अखबार का संपादक और समाचार संपादक सोनिया के साथ हुए गैंगरेप की घटना के विरोध में जंतर-मंतर पर होने वाले प्रदर्शन में भाग लेने पर नौकरी से निकालने की धमकी देता है, तो वह नौकरी छोड़ना बेहतर समझता है। प्रदर्शन के दौरान कुछ अराजक तत्वों के पथराव करने पर शालिनी और शिवाकांत घायल हो जाते हैं। तीन दिन बाद शालिनी की मौत हो जाती है। एक बार फिर शिवाकांत बेरोजगारी का दंश झेलने के लिए मजबूर हो जाता है।
डेढ़ महीने की बेरोजगारी के बाद उसके लिए आगरा की एक चिटफंड कंपनी के निकलने जा रहे अखबार पृथ्वी एक्सप्रेस में नौकरी प्रस्ताव मिलता है। वह नौकरी ज्वाइन करता है। चिटफंड कंपनी में नौकरी के दौरान उसे महसूस होता है कि यह एक अलग ही दुनिया है। चिटफंड कंपनी पत्रकारों और पत्रकारिता से जुड़े लोगों को अपने ही हिसाब से हांकती है। कंपनी का सीएमडी आश्वासन किसी को देता है, नियुक्त किसी और को करता है। पृथ्वी एक्सप्रेस में कई गुट सक्रिय हैं। प्रधान संपादक का एक गुट अलग, संपादक का गुट अलग। इन दोनों गुटों में पिसता शिवाकांत और उसके जैसे कई पत्रकार। स्वार्थ और गुटबाजी का बोलबाला इस कदर व्याप्त है पृथ्वी एक्सप्रेस में कि शिवाकांत की आत्मा कराह उठती है। एक दिन शराब पार्टी में वह संपादक को उसकी कुछ गलतियों की ओर इशारा करके शिवाकांत मानो सांप के बिल में हाथ डाल बैठता है। चिटफंड कंपनी का अपना चरित्र, उस पर पत्रकारिता के मूल्यों का होता ह्रास, जनता से वसूले गए पैसों की बंदरबाट, संस्थान में चल रही गुटीय राजनीति एक दिन शिवाकांत को इतना उत्तेजित कर देती है कि वह संपादक और प्रधान संपादक से बहस कर बैठता है। काफी दिनों से उसे निकालने की फिराक में लगे दोनों गुटों को मौका भी मिलता है, चिटफंड कंपनी द्वारा खरीदे गए एक होटल के उद्घाटन समारोह में। चिटफंड कंपनी का एक टीवी चैनल भी चलता है। वह उद्घाटन समारोह के दौरान थोड़ी देर सीएमडी के पास खड़ा रह जाता है और इसी बात को प्रधान संपादक और संपादक आपसी वैरभाव भूलकर इतना तूल देते हैं कि मजबूरन एक बार फिर शिवाकांत को इस्तीफा देना पड़ता है। पत्रकारिता जगत में व्याप्त विसंगतियों, आपसी खींचतान, उठापटक के साथ-साथ देश में चल रही चिटफंड कंपनियों का चरित्र भी इस उपन्यास में उभर कर सामने आया है।

उपन्यास : सच अभी जिंदा है
उपन्यासकार : अशोक मिश्र
प्रकाशक : भावना प्रकाशन,
            108 ए, पटपड़गंज,   दिल्ली
मूल्य : 650 रुपये     पृष्ठ : 346

Friday, February 14, 2014

उल्लू की दुम होता है व्यंग्यकार

-अशोक मिश्र
जी हां! मैंने यही कहा था, ‘उल्लू की दुम होता है व्यंग्यकार।’ बात यह हुई थी कि मैं सुबह उठकर अखबार पढ़ते हुए एक कप चाय का इंतजार कर रहा था। घरैतिन किचन में पता नहीं क्या कर रही थीं। चाय की तलब  काफी तेज लगी हुई थी कि तभी घरैतिन ने चाय का कप थमाते हुए पूछ लिया, ‘सुनो जी! यह व्यंग्यकार क्या होता है?’ काफी देर से चाय के इंतजार में भीतर ही भीतर उबल रहा मैं सचमुच उबल पड़ा, ‘उल्लू की दुम होता है व्यंग्यकार। खब्तुलहवास होता है व्यंग्यकार। उस पर चौबीस घंटे एक अजीब सी खब्त सवार होती है। माघ-पूस में वह फाल्गुनी मादकता से ओतप्रोत रहता है, तो जेठ की दुपहरिया में वह कंबल ओढ़कर वर्षागीत गाता है। कहने का मतलब यह है कि व्यंग्यकार वह जीव होता है, जो उल्टा सोचता है, उल्टा चलता है, बेचैन आत्मा होता है।’ मेरी बात सुनते ही घरैतिन घबरा उठीं। चाय रखकर अपना पिटा सा मुंह लेकर वह दोबारा किचन रूपी कोपभवन में जाने लगीं, तो मुझे लगा कि मैंने कुछ ज्यादा ही व्याख्या कर दी है। अगर घरैतिन को मनाकर डैमेज कंट्रोल नहीं किया गया, तो अपनी बैंड बजनी तय है। सो, लपककर बड़े प्रेम से घरैतिन का हाथ पकड़कर अपने पास बिठाते हुए कहा, ‘ओह प्रियतमे! तुम कहीं मेरी बात का बुरा तो नहीं मान गईं? मेरे अंतस्थल के मरुथल में अपनी संपूर्ण मादकता और प्रीत के साथ बहने वाली बासंती बयार! तुम अगर रूठ गईं, तो मेरे जीवन की पुष्पित-पल्लवित बगिया में असमय पतझड़ का समावेश हो जाएगा।’ मेरी बात सुनते ही घरैतिन ने हाथ झटकते हुए कहा, ‘मैंने आपसे सीधा-सा सवाल किया था, आपने टेढ़ा मेढ़ा जवाब दिया। अब लंतरानी हांकने की बजाय सीधे-सीधे बताइए कि आप कहना क्या चाहते हैं?’
घरैतिन के कर्कश शब्दों को सुनकर मुझे लग गया कि डैमेज कंट्रोल का मेरा प्रयास निरर्थक ही जाएगा। मैंने घरैतिन को पुचकारने वाले अंदाज में कहा, ‘तुमने कोई गलत सवाल नहीं किया था। मैंने भी गलत जवाब नहीं दिया था। बात दरअसल यह है कि सचमुच उल्लू की दुम होते हैं हम। तुम कह सकती हो कि रात में जलाए गए अलाव को दो दिन बाद कुरेद-कुरेदकर क्रांति की चिंगारियां तलाशते हैं। जब सारी दुनिया चैन से सोती है, हम पूरी दुनिया की चिंता में दुबले होते रहते हैं। जब सारी दुनिया किसी नेता, अधिकारी, सांसद या विधायक की प्रशंसा में कसीदे काढ़ती है, तो व्यंग्यकार उसकी धोती खोलने के जुगाड़ में लगा होता है। व्यंग्यकार की रडार पर आया हुआ व्यक्ति उसका दुश्मन ही हो, ऐसा कोई जरूरी नहीं है। जाति, धर्म, संप्रदाय, राष्ट्र की सीमा से परे होता है व्यंग्यकार। तुम यों समझो कि दुधारी तलवार की तरह होता है वह। जो तलवार चलाता है, वह भी घायल होता है, जिस पर चलती है, वह भी घायल होता है।’ इतना कहकर मैंने घरैतिन को अनुराग पूर्ण नेत्रों से देखा और कहा, ‘जानती हो, जब-जब तुम कोई लजीज व्यंजन पकाती हो या मेरा ध्यान रखने लगती हो, तो मैं सतर्क हो जाता हूं। मुझे लगता है कि जरूर इसमें तुम्हारा कोई न कोई स्वार्थ है। इसमें मेरा कोई दोष नहीं है, दरअसल यह व्यंग्यकारों की प्रवृत्ति का ही दोष है। अगर वह सीधा सोचने-समझने लगे, तो व्यंग्य लिख ही नहीं सकता।’
घरैतिन ने टालने  वाले अंदाज में कहा, ‘तुमने अभी बेचैन आत्मा की बात की थी। उसका क्या मतलब है?’ मैंने उसे समझाने वाले लहजे में कहा, ‘बात दरअसल यह है कि इस दुनिया में सारी आत्माएं या तो पुण्यात्मा होती हैं या फिर पापात्मा। कुछ आत्माएं ऐसी भी होती हैं, जो न तो पुण्यात्मा होती हैं, न ही पापात्मा। ये बेचैन आत्माएं होती हैं। हालांकि इस पूरी दुनिया में ऐसी बेचैन आत्माएं रेयरेस्ट आॅफ द रेयरेस्ट ही होती हैं, लेकिन होती तो हैं। इन बेचैन आत्माओं को जब देह धारण करने का मौका मिलता है, तो ऐसी आत्माएं पैदा होने के बाद बड़ी होकर व्यंग्यकार हो जाती हैं। इन आत्माओं को जीवन भर चैन नहीं मिलता। ये बेचैन आत्माएं यानी व्यंग्यकार हर काम, हर भावना, हर बात में कोई न कोई नुक्स जरूर ढूंढता है। व्यंग्यकार कभी सीधा चल ही नहीं सकता है। अगर चला, तो बेमौत मारा जाएगा। मरने पर उसे मोझ नहीं मिलने वाला। वह फिर बेचैन आत्मा हो जाएगा। ‘जो कुछ था, सोई भया’ की तरह। लेकिन एक बात बताऊं। सच्चा व्यंग्यकार अपना भला भले ही न कर पाए, लेकिन पूरी दुनिया का बहुत भला करता है। वह जिस पर व्यंग्य लिखता है, वह तो तिलमिलाता ही है, पढ़ने वाले भी मुंह बना देते हैं। वह व्यक्तिपरक नहीं लिखता, सीधा प्रवृत्ति या व्यवस्था पर चोट करता है। इस दुनिया में बहुत सारे लोग सीधे रास्ते चलते और गलत रास्ते पर पहुंच जाते हैं, लेकिन व्यंग्यकार गलत रास्ते से शुरुआत करके सीधे रास्ते पर आ जाता है। नकार (नकारात्मक) से चलकर सकार (सकारात्मक) तक आने वाला सिर्फ व्यंग्यकार ही होता है।’ मेरी बात सुनकर घरैतिन ने असमंजस पूर्ण ढंग से ऐसे सिर हिलाया, मानो आधी बात समझ में आई हो, आधी नहीं। वह उठते हुए बोलीं, ‘आपकी बाकी व्याख्या बाद में सुनुंगी, चलूं चुन्नू को नाश्ता दे दूं।’ मैं भी अखबार पढ़ने के साथ-साथ ठंडी हो चुकी चाय पीने में लग गया।

Wednesday, February 12, 2014

तोहार कवन बान राजा...

अशोक मिश्र 
संपादक जी मुझे हौंक रहे थे, ‘यार! कभी तो कोई अच्छी स्टोरी कर लिया करो। हर बार तुम अपनी स्टोरी में कोई न कोई ऐसा नुक्स छोड़ ही देते हैं जिसके चलते अगली सुबह मुझे मालिक की सुननी पड़ती है। सुनो! कल वेलेंटाइन डे पर अगर कोई अच्छी स्टोरी नहीं मिली, तो तुम्हारा भगवान ही मालिक है। अच्छी स्टोरी मतलब...कोई धड़कती सी, फड़कती सी, कड़कती सी स्टोरी। और अब..दफा हो जाओ मेरी नजरों के सामने से। जिस दिन तुम्हारा सुबह-सुबह मुंह देख लेता हूं, उस दिन जरूर अखबार में कोई ब्लंडर छप जाता है।’ हौंके जाने पर किसी नाक बहाते, थूक चुवाते बच्चे की तरह रिरियाता हुआ उनकी केबिन से बाहर आया। अगर कुछ बोलता, तो नौकरी जाने का भी खतरा था। सोचने लगा, वेलेंटाइन डे पर कौन सी स्टोरी करूं कि धमाका हो जाए? कि जिसको पढ़कर संपादक जी धड़क जाएं, फड़क जाएं और भड़क जाएं। काफी देर तक मगजमारी करने के बाद भी कुछ नहीं सूझा, तो अपने साथियों से भी कोई नया आइडिया सुझाने की विनती की। कुछ ने तो मौके का फायदा उठाते हुए चाय-समोसे के साथ-साथ चौदह रुपये वाला गुटखा भी गटक लिया और यह कहते हुए सरक लिए कि सोचता हूं तुम्हारे लिए कोई धांसू आइडिया। मैं हवन्नकों की तरह टुकुर-टुकुर उन्हें जाता हुआ देखता रहा।
जब कुछ नहीं सूझा, तो शहर घूमने निकल पड़ा। घूमता-घामता दिल्ली के बाहरी इलाके में पहुंच गया। सड़क से थोड़ा हटकर स्थित एक खेत में के किनारे वाले हिस्से में लगे ट्यूबवेल से पानी निकलता देख प्यास लग गई, तो सोचा दो चुल्लू पानी ही पी लूं। थोड़ी देर यहीं बैठूंगा और अगर कोई अच्छी स्टोरी का आइडिया नहीं सूझा, तो चुल्लू भर पानी में डूब मरूंगा। पानी पीकर खेत की हरियाली को निहार ही रहा था कि मुझे आवाज सुनाई दी। कोई कह रहा था,‘आज तो एकदम पटाखा लग रही हो, मितवा की अम्मा!’ मैं दबे पांव खेत की दूसरी ओर बढ़ा, तो खेत की मेड़ पर एक युगल बैठा दिखाई दिया। दोनों शायद पति-पत्नी थे। पति ने पत्नी को छेड़ते हुए कहा, ‘सुबह छोटा भाई कह रहा था कि आज वेलेंनटाइन डे है। जानती हो, वेलेंनटाइन क्या होता है? चलो, हम लोग भी वेलेंनटाइन डे मनाएं।’ पत्नी ने घास का तिनका तोड़ते हुए कहा, ‘हमें क्या मालूम कि वेलेंनटाइन डे क्या होता है? यह कोई नया त्योहार है क्या?’ पति ने अपनी बायीं कोहनी से टोहका मारते हुए कहा, ‘धत बुड़बक! यह त्योहार नहीं है। इस दिन प्रेमी-प्रेमिका, पति-पत्नी एक दूसरे को उपहार देते हैं, अपने प्यार का इजहार करते हैं। एक बात बताएं। तुम्हारी चमक-दमक देखकर लगता है कि आज तुम वेलेंनटाइन डे के चक्कर में ही दशहरे की हाथी की तरह सज-धजकर आई हो। वैसे, आज तुम बहुत अच्छी लग रही हो।’ पत्नी ने अपनी प्रशंसा सुनकर थोड़ा शरमाते हुए कहा, ‘चापलूसी तो आप कीजिए ही नहीं। इतनी ही अच्छी लगती हूं, तो कल बुधिया को आंख फाड़-फाड़ क्यों देख रहे थे।’ पत्नी की बात सुनकर पति ठहाका लगाकर हंस पड़ा। उसने पत्नी को बाहों में भरते हुए कहा, ‘अच्छा..तो तुम कल से इसी वजह से नाराज हो। अरे बुधिया..एक तो मेरी भौजी लगती है, दूसरी तरफ, वह तुम्हारी बहिन भी लगती है। दोनों तरफ से हमारा मजाक का रिश्ता है। अब अगर बुधिया भौजी से मैंने थोड़ा सा मजाक कर ही लिया, तो कोई पाप नहीं कर दिया है। ’‘अच्छा..यह सब छोड़ो। मुझको यह बताओ कि तुमने आज अपने बालों में महकऊवा तेल क्यों नहीं लगाया? जब सुबह मैं घर से खेत आने लगा था, तो तुमसे कहा भी था कि खेत में रोटी लेकर अते समय थोड़ा-सा सज-धजकर आना।’ पति ने पत्नी को एक बार फिर छेड़ते हुए कहा। पत्नी ने कहा, ‘वह तेल तो कब का खत्म हो गया है। आपसे कई बार कहा भी कि बाजार जाइएगा, तो लेते आइएगा। लेकिन आप कहां लाए आज तक।’ पति ने गहरी सांस लेते हुए कहा, ‘क्या करें। जब भी बाजार में महकउवा तेल लेने के बारे में सोचा, तब पैसा पास नहीं रहा। मुझको तो लगता है कि इस संसार में गरीबों के प्यार करने पर बंदिश लगी है। गरीब नहीं होते, तो मेरी बीवी भला गरीबी का ताना देती। वैसे भी वेलेंनटाइन डे उन्हीं के लिए है जिनके पेट भरे हैं। खाली पेट वालों के लिए वेलेंनटाइन-फेलेंनटाइन का क्या मतलब है?’ पति की बात सुनकर पत्नी भड़क उठी, ‘अरे गरीबी है, तो सिर्फ हमारे लिए है? चार दिन पहले सुमित्रा दीदी ने कहा, तो उनके लिए उसी दिन काजल, टिकुली, बिंदी लाकर दे दिया था। उस मुंहझौसी से पैसा भी नहीं लिया आपने। हमारी खातिर तेल लेते समय पैसा खत्म हो जाता है।’ इस बार तुनकने की बारी पति की थी। उसने तीखे स्वर में कहा, ‘वेलेंनटाइन डे के दिन झगड़ा करना हो, तो ऐसा बताओ। सुमित्रा भौजी से मैं कभी पैसा नहीं मांगूंगा। चाहे जो हो जएा।’ इतना कहकर पति झटके से उठा और मुंह उठाकर एक ओर चल दिया। पत्नी ने लपककर पति की हाथ पकड़ते हुए कहा, ‘तोहार कवन बान (आदत) राजा..रोज रिसियाला।’ पत्नी की बात सुनते ही पति हंस पड़ा। मैं सड़क पर आ गया और सोचने लगा। संपादक जी मुझसे रोज खफा रहते हैं। संपादक जी से अखबार के मालिक किसी न किसी बात को लेकर रोज नाराजगी जाहिर करते हैं। बरबस ही मेरे मुंह से निकल गया, ‘तोहार कवन बान राजा...रोज रिसियाला।’