बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
अभिमान और प्रशंसा दो ऐसे शब्द हैं जो व्यक्ति की प्रगति को बाधित कर देते हैं। बहुत अधिक प्रशंसा होने से व्यक्ति में अभिमान आ जाना स्वाभाविक है। यही वजह है कि महापुरुषों ने हर व्यक्ति को प्रशंसा से दूर रहने की बात कही है। इस संदर्भ में एक मूर्तिकार की बड़ी रोचक कथा है। किसी नगर में एक मूर्तिकार रहता था। वह अपने समय में बहुत अच्छी मूर्तियां बनाया करता था। लोग जब उसकी प्रशंसा करते तो वह विनम्रता से सिर झुकाकर रह जाता था। कुछ दिनों बाद उसके बेटे ने भी मूर्तियं बनाना सीखना शुरू कर दिया। पिता अपने पुत्र की मूर्तियों में हमेशा कोई न कोई कमी निकाल देता और उसे दूसरी मूर्ति बनाने को कहता था। इस तरह कई साल बीत गए।अब उसका पुत्र भी बहुत अच्छी मूर्तियां बनाने लगा था। लेकिन मूर्तिकार पिता अपने पुत्र के कार्यों से संतुष्ट नहीं होता था। वह अपने हिसाब से कुछ न कुछ कमियां निकाल ही देता था। धीरे-धीरे पुत्र के मन में क्रोध की भावना पैदा होने लगी। उसे लगने लगा कि पिता में ही कोई खोट है, जो उनकी इतनी अच्छी मूर्तियों से भी संतुष्ट नहीं हैं। एक दिन उसने अपनी एक मूर्ति को अपने मित्र के हाथ से पिता के पास भिजवाया। वह अपने घर में एक जगह पर छिप गया।
पिता ने उस मूर्ति को देखा, तो बरबस मुंह से निकल गया कि जिसने यह मूर्ति बनाई है, वह महान मूर्तिकार है। तभी बेटा बाहर आया और बोला, यह मूर्ति मैंने बनाई है, लेकिन कभी आपने मेरी प्रशंसा नहीं की। थोड़ी देर पहले इस मूर्ति को बनाने वाले को महान मूर्तिकार कह रहे थे। तब पिता ने कहा कि यदि मैं तुम्हारी प्रशंसा कर देता, तो तुममें और अच्छा करने की ललक नहीं पैदा होती। तुम्हें अपनी कला पर अभिमान हो जाता और तुम्हारी प्रगति रुक जाती। यह सुनकर पुत्र को अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने पिता से क्षमा मांगी।

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