अशोक मिश्र
गणेशोत्सव शुरू हो चुका है और आज बाजार से लेकर मंदिर और घर-घर में भगवान गणेश विराजमान हो चुके हैं। छोटी-छोटी मनोहारी मूर्तियों से लेकर विशालकाय पंडालों की भव्य प्रतिमाएं तक हर तरफ श्रद्धा और उत्साह का वातावरण बना रही हैं। 25 सितंबर को अनंत चतुर्दशी पर इन मूर्तियों का बड़ी श्रद्धा और उत्साह के साथ विसर्जन किया जाएगा। तब एक गंभीर पर्यावरणीय चिंता भी सामने आएगी। आज बाजार में बिकने वाली अधिकांश मूर्तियां प्लास्टर ऑफ पेरिस यानी पीओपी से बनती हैं।पीओपी कैल्शियम सल्फेट हेमीहाइड्रेट है, यह नदी या तालाब के पानी में महीनों तक नहीं घुलता। यह पानी के तल पर बैठकर उसे उथला कर देता है, पानी के बहाव को रोकता है और जलीय जीवों के प्राकृतिक आवास को नष्ट कर देता है। इससे भी अधिक खतरनाक है इन मूर्तियों पर किया गया सजावट का काम। इन्हें चमकदार और आकर्षक बनाने के लिए सीसा, पारा, क्रोमियम, कैडमियम और आर्सेनिक जैसे भारी धातुओं वाले रासायनिक रंगों का उपयोग किया जाता है।
जब ये मूर्तियां पानी में डुबोई जाती हैं, तो ये रंग पानी में घुल जाते हैं और पानी को जहरीला बना देते हैं। इससे पानी में घुली ऑक्सीजन की मात्रा तेजी से कम हो जाती है, जिसे वैज्ञानिक भाषा में बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड का बढ़ना कहा जाता है। आॅक्सीजन कम होने से मछलियां, कछुए और अन्य जलीय जीव दम घुटने से मरने लगते हैं। उनके प्रजनन चक्र प्रभावित होते हैं तथा वनस्पतियों की जड़ें क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। हालांकि शुद्ध मिट्टी की मूर्तियां घुलकर कुछ हद तक नमी बनाए रखने में मदद कर सकती हैं।
इसका अर्थ यह नहीं है कि आस्था और पर्यावरण में से एक को चुनना पड़ेगा, बल्कि हमें अपनी परंपरा को ही अधिक समझदारी से निभाना होगा। इसका सबसे सुंदर और सीधा समाधान है फिर से अपनी जड़ों की ओर लौटना यानी प्राकृतिक चिकनी मिट्टी से बनी मूर्तियों को अपनाना। ये मूर्तियां पानी में 45 मिनट से कुछ घंटों में पूरी तरह घुल जाती हैं। मिट्टी में मिलकर उसे नुकसान नहीं पहुंचातीं। यदि रंग करना ही है तो हल्दी, गेरू, चंदन, फूलों के रस जैसे प्राकृतिक रंगों का उपयोग किया जा सकता है।
आज कई कलाकार बीज वाली गणेश मूर्तियां भी बना रहे हैं जिनमें तुलसी या अन्य पौधों के बीज होते हैं, विसर्जन के बाद मिट्टी में लगाने पर वह मूर्ति एक पौधे के रूप में विकसित हो जाती है, यह विसर्जन नहीं बल्कि एक नया सृजन बन जाता है। व्यक्तिगत स्तर के साथ-साथ सामुदायिक स्तर पर भी बदलाव जरूरी है। नगर निगमों और प्रशासन द्वारा बनाए गए कृत्रिम तालाबों या टैंकों में विसर्जन करना एक बहुत प्रभावी तरीका है। समुदाय स्तर पर सामूहिक रूप से छोटी और पर्यावरण अनुकूल मूर्तियों का चयन करके तथा घर पर विसर्जन की परंपरा अपनाकर हम आस्था और पर्यावरण दोनों की रक्षा कर सकते हैं। गणेश जी विघ्नहर्ता हैं और अगर हम उनके उत्सव को प्रकृति के अनुकूल मनाएं तो यह उनके आशीर्वाद को और अधिक सार्थक बनाएगा।
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