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Saturday, August 30, 2025

राजेंद्र प्रसाद से प्रिंसिपल ने मांगी क्षमा

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

आजाद भारत के पहले राष्ट्रपति थे डॉ. राजेंद्र प्रसाद। लोग उन्हें बड़े आदर और सम्मान के साथ राजेंद्र बाबू कहकर पुकारते थे। वह स्वतंत्रता संग्राम सेनानी होने के साथ-साथ राजनीतिज्ञ, वकील और पत्रकार भी थे। राजेंद्र बाबू का जन्म 3 दिसंबर 1884 को वर्तमान बिहार के जीरादेई गांव में एक संपन्न कायस्थ परिवार में हुआ था। उनके पिता महादेव सहाय काफी विद्वान थे। 

जब वह छोटे थे, तभी उनकी मां कमलेश्वरी देवी का निधन हो गया था। उनका पालन पोषण उनकी बड़ी बहन ने किया था। जून 1896 में बारह वर्ष की आयु में राजेंद्र प्रसाद का विवाह राजवंशी देवी से कर दिया गया। इनकी प्रारंभिक पढ़ाई-लिखाई छपरा के एक स्कूल में हुई थी। बात तभी की है। उनकी कक्षा का उस दिन आखिरी दिन था। प्रिंसिपल थोड़ी देर में परीक्षाफल सुनाने वाले थे। 

उनकी कक्षा के सभी बच्चे स्कूल प्रांगण में लाइन लगाकर खड़े थे। प्रिंसिपल ने सभी छात्रों का परीक्षाफल घोषित किया,जो बच्चा पास हो जाता था, उसे वह शाबाशी देते थे और जो फेल हो जाता था, उसे आगे अधिक मेहनत से पढ़ाई करने का उपदेश देते थे। प्रिंसिपल ने राजेंद्र प्रसाद को अनुत्तीर्ण बताया था। जब परीक्षाफल घोषित करके प्रिंसिपल जाने लगे, तो राजेंद्र प्रसाद उनके पास पहुंचे और कहा कि मुझे आपने फेल बताया है, लेकिन मैं फेल नहीं हो सकता हूं। 

प्रिंसिपल ने कहा कि तुमने पढ़ाई की नहीं और अब बहाना बना रहे हो। तभी उस स्कूल के वाइस प्रिंसिपल हड़बड़ाए से वहां पहुंचे और कहा कि अभी जो परिणाम घोषित किए गए हैं, उसमें गड़बड़ी है। प्रिंसिपल ने नया परीक्षाफल देखा, तो राजेंद्र बाबू न केवल पास थे, बल्कि कक्षा में प्रथम आए थे। यह देखकर प्रिंसिपल ने उनसे क्षमा मांगी।