Wednesday, October 7, 2026

जीवन का उद्देश्य ज्ञान के मार्ग पर चलना है

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

श्रावस्ती (सावत्थी) के एक अत्यंत धनी व्यापारी थे सुदत्त। उन्हें  अनाथ पिंडक भी कहा जाता था क्योंकि वह श्रावस्ती के आसपास के गरीब और अनाथ बच्चों के भोजन और शिक्षा की व्यवस्था में सदैव आग रहते थे। वह लोगों की भलाई करने में तनिक भी संकोच नहीं करते थे। इसी वजह से उन्हें अनाथपिंडक भी कहा जाता था। उन्होंने प्रसेनजित के पुत्र जेत के वन को बड़ी कीमत देकर खरीदा था और उसे महात्मा बुद्ध को समर्पित कर दिया था।

 उस वन को जेतवन कहा जाता है। श्रावस्ती में यह वन आज भी मौजूद है। एक बार की बात है। जेतवन में महात्मा बुद्ध अपने शिष्यों के साथ प्रवचन दे रहे थे। सभी शिष्य तथागत के एक-एक शब्द को आत्मसात करने का प्रयास कर रहे थे। उसी समय महात्मा बुद्ध को महाकश्यप मौद्गल्यायन, सारिपुत्र, चुंद और देवदत्त आते हुए दिखाई दिए। 

तथागत ने अपने शिष्य अनाथ पिंडक को निर्देश देते हुए कहा कि वत्स! उठो, ब्राह्मण मंडली आ रही है, उसके बैठने के योग्य उचित आसन की व्यवस्था करो। अनाथ पिंडक शिष्य अचकचा गया। उसने कहा कि भगवन! आप शायद इन्हें पहचानते नहीं हैं। इनमें से एक ब्राह्मण है, बाकी क्षत्रिय, वैश्य और अस्पृश्य हैं। 

अनाथ पिंडक की बात सुनकर बुद्ध हंस पड़े और उन्होंने कहा, तात! जाति जन्म से नहीं, गुण, स्वभाव और कर्म से पहचानी जाती है। यह सभी लोग कर्म से ब्राह्मण ही हैं। पास आने पर एक ने अनाथ पिंडक की प्रशंसा की, तो बुद्ध ने कहा कि उसमें बस यही कमी है कि वह जीवन का उद्देश्य नहीं जान सका। जीवन का उद्देश्य स्वार्थी नहीं परमार्थी बनना है, तो वह ऐसा नहीं कहता। ज्ञानी होने से ज्यादा महत्वपूर्ण ज्ञान के मार्ग पर चलना होता है। यह सुनकर अनाथ पिंडक लजा गया और वह बुद्ध का कथन समझ गया।

महिलाओं के साथ होने वाले अपराध को रोकने की समाज की भी जिम्मेदारी

 

अशोक मिश्र

जब किसी महिला या बच्ची के साथ दुराचार या यौन शोषण होता है, तो शरीर पर लगने वाले घाव तो समय के साथ भर जाते हैं, लेकिन उसके मन पर जो दंश लगता है, वह आजीवन उसे सालता रहता है। वह बलात्कार की पीड़ा से जीवन भर मुक्त नहीं हो पाती है। बलात्कारी किसी महिला या बच्ची के शरीर को ही घायल नहीं करता है, बल्कि वह पीड़िता की आत्मा को भी छलनी कर देता है। पिछले एक महीने में दिल्ली की सड़कों से, पार्कों से, बसों से जो खबरें आई हैं, उन्होंने फिर एक बार सबके भीतर कुछ तोड़ दिया है। एक के बाद एक लड़कियों के साथ हुई हैवानियत की घटनाएं मर्माहत करती हैं। 

दिल्ली जैसी शहर, जो कभी सपनों का शहर कहलाता था, अब अपनी ही बेटियों के लिए सबसे असुरक्षित जगह बनता जा रहा है। तभी सुप्रीम कोर्ट की गुस्से और बेबसी दोनों से भरी टिप्पणी सामने आती है। अदालत ने दिल्ली पुलिस से साफ कहा कि अब सिर्फ अपराध होने के बाद आरोपी को पकड़ना काफी नहीं है, अपराध को होने से रोकना भी पुलिस का काम है। अदालत ने कहा कि जब तक असामाजिक तत्वों के मन में यह डर पैदा नहीं होगा कि अब कुछ किया तो मारे जाएंगे, तब तक जघन्य अपराधों पर रोक लगाना संभव नहीं है। 

यह शब्द कानून की किताब से ज्यादा एक पिता के आक्रोश जैसे लगते हैं। लेकिन क्या यही एकमात्र तरीका है। अगर फांसी के डर से ही बलात्कार रुक जाते तो शायद दुनिया में कहीं भी यह अपराध नहीं होता। कानून किताब में लिखा एक शब्द है, पर उसे जमीन पर उतारती है पुलिस व्यवस्था, और हमारी व्यवस्था अक्सर तब जागती है, जब सब कुछ लुट चुका होता है। 

सुप्रीम कोर्ट ने भी इसी पर चोट की है कि केवल कागजों पर योजनाएं बनाने से जमीनी स्तर पर महिलाएं सुरक्षित नहीं होंगी। हमें गश्त बढ़ाने वाली, सर्विलांस बढ़ाने वाली, पहले से रोकने वाली पुलिस चाहिए। एक ऐसी पुलिस जो रात दस बजे सड़क पर अकेली चल रही लड़की को शक की नजर से नहीं, जिम्मेदारी की नजर से देखे। सबसे बड़ा सवाल इस समाज से है। किसी भी समाज में अपराधी अचानक पैदा नहीं होता। यह उसी घर में पनपता है जहां बेटे को सिखाया जाता है कि वह ज्यादा ताकतवर है। 

उसी स्कूल में पनपता है जहां लड़की की हंसी को गलत समझा जाता है। उसी मोहल्ले में पनपता है जहां हम चुप रहना सीख लेते हैं। जब तक हम अपने लड़कों को औरत की इज्जत करना नहीं सिखाएंगे, जब तक हम अपनी भाषा में, अपने मजाक में, अपनी सोच में औरत को वस्तु समझना बंद नहीं करेंगे, तब तक कोई भी कानून, कितना भी कड़ा क्यों न हो, इस जड़ को नहीं काट पाएगा। यह काम सिर्फ अदालत या थाने का नहीं है। यह काम हर घर का है। हमें ऐसी पीढ़ी बनानी होगी जो डर से नहीं, समझ से अपराध से दूर रहे।

Tuesday, October 6, 2026

Death is certain for everyone, Gautami!


bodhi tree

Ashok Mishra

Whoever is born, his death is certain. This is the law of the nature There is no exception to this rule. For millions and crores of years, living beings have been coming into existence and have been leaving this meaningless world after spending their lives. The same sequence will continue in future also. There is not the slightest possibility of any change in this. 

Although man has been trying to make himself immortal for centuries, it has not been possible yet. Once upon a time. The only son of a woman named Gautami died due to some reason. She loved her son very much. Although this is the quality of every mother, she loves her children the most. She became completely insane after her son's death. Gautami heard from someone that Mahatma Buddha had come to his city. 

He had heard that Mahatma Buddha was miraculous. If he wants, he can bring his son back alive. On hearing this, she immediately got up and reached the place where the Tathāgata was present. She went and fell at the feet of Buddha and started crying and requesting that her son be brought back to life. Buddha explained to him that it was not possible to bring his son back to life. 

Even then she did not agree. Then Buddha told Gautami that if she brought a pot of water from such a house, he would bless her and bring her son back to life. Gautami wandered throughout the day in the city and village, but she could not find a single pot of water because there was no house in which death had not occurred. She returned to Buddha in despair. 

Buddha explained that death is certain for everyone, only the timing is different. Gautami was disillusioned. The next day she performed the last rites of her son and remained engaged in public welfare throughout her life.

मृत्यु तो हर किसी की निश्चित है, गौतमी!

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

जिसका जन्म हुआ है, उसकी मृत्यु निश्चित है। यह प्रकृति का नियम है। इस नियम में कोई अपवाद नहीं है। लाखों-करोड़ों साल से जीव-जंतु पैदा होते आ रहे हैं, अपना जीवन बिताकर इस असार संसार से विदा लेते रहे हैं। भविष्य में भी ऐसा ही क्रम चलता रहेगा। इसमें किसी प्रकार के बदलाव की रंचमात्र संभावना नहीं है। 

हालांकि मनुष्य सदियों से अपने को अमर बनाने की कोशिश में लगा हुआ है, लेकिन अभी तक यह संभव नहीं हो पाया है। एक बार की बात है। गौतमी नाम की महिला का इकलौते बेटे की किसी कारणवश मृत्यु हो गई। वह अपने बेटे को बहुत प्यार करती थी। वैसे तो यह हर मां का गुण है, वह अपनी संतान को सबसे ज्यादा प्यार करती है। बेटे की मृत्यु पर वह एकदम विक्षिप्त सी हो गई। किसी से गौतमी ने सुना कि महात्मा बुद्ध उसके नगर में आए हुए हैं। उसने सुन रखा था कि महात्मा बुद्ध चमत्कारी हैं। वह अगर चाहें तो उसके बेटे को जिंदा कर सकते हैं। 

यह सुनते ही वह तत्काल उठी और उस जगह जा पहुंची जहां तथागत मौजूद थे। वह जाकर बुद्ध के चरणों में गिर पड़ी और रो-रोकर विनती करने लगी कि उसके बेटे को फिर से जिंदा कर दें। बुद्ध ने उसे समझाया कि उसके बेटे को अब जिंदा कर पाना संभव नहीं है। तब भी वह नहीं मानी। फिर बुद्ध ने गौतमी से कहा कि वह किसी ऐसे घर से एक लोटा जल ले आए तो वह उसे अभिमंत्रित करके उसके बेटे को जीवित कर देंगे। 

गौतमी नगर और गांव में दिन भर भटकी, लेकिन उसे एक लोटा पानी नहीं मिला क्योंकि कोई घर ऐसा नहीं था जिस घर में मौत न हुई हो। वह हताश निराश बुद्ध के पास लौट आई। बुद्ध ने समझाया कि मृत्यु सबकी निश्चित है, बस समय अलग-अलग है। गौतमी का मोह भंग हुआ। अगले दिन उसने अपने बेटे का अंतिम संस्कार किया और लोक कल्याण में आजीवन लगी रही।

अधूरी कालोनियां, अधबनी इमारतें बन रही अपराधियों की शरणगाह


अशोक मिश्र

शहर चाहे हरियाणा के हों या उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ आदि राज्यों के हों, शहरों की चमक-दमक जितनी लुभावनी लगती है, वहीं शहर के बाहरी हिस्से उतने ही अंधकारमय और डरावने। शहर की चमक-दमक से थोड़ा बाहर निकलते ही एक दूसरी दुनिया शुरू हो जाती है। जहाँ नई-नई काटी गई कॉलोनियां हैं, आधी बनी हुई इमारतें हैं, कई सालों से ताले में बंद पड़े मकान हैं और सुनसान सड़कें हैं। 

अराजक तत्वों के यही शरणगाह बनते हैं। दिन के उजाले में ये जगहें विकास की उम्मीद जगाती हैं, लेकिन शाम ढलते ही यही सुनसान जगहें एक डर में बदल जाती हैं। यही वह जगहें बन जाती हैं जहाँ अंधेरा केवल रोशनी का अभाव नहीं, बल्कि अपराधियों के लिए एक कवच बन जाता है। उधर से गुजरने वाले राहगीर, काम से लौटती महिलाएं, स्कूल से आते-जाते बच्चे, सबके मन में एक अनजाना भय रहता है। लूटपाट, हमले और महिलाओं के साथ होने वाले जघन्य अपराध अक्सर इसी सुनसान का फायदा उठाकर किए जाते हैं। 

ग्रेटर फरीदाबाद में अभी दो-तीन दिन पहले हुई घटना ने जनमानस को झकझोर कर रख दिया है। एक नाबालिग बच्ची और उसके नाबालिग दोस्त के साथ हुई दरिंदगी ने फिर वही सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या हमारी बेटियां अपने ही शहर में, अपने ही घर के आसपास सुरक्षित नहीं हैं। यह केवल एक इलाके की घटना नहीं है। हरियाणा के कई जिलों से गुरुग्राम, सोनीपत, पलवल, हिसार तक से ऐसी खबरें आती रहती हैं जहाँ अवैध रूप से बसी कॉलोनियों, निमार्णाधीन साइटों या वर्षों से खाली पड़े मकानों को अपराधी अपना ठिकाना बना लेते हैं। इन जगहों की जानकारी स्थानीय स्तर पर आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों को ज्यादा होती है। 

वे जानते हैं कि कहाँ रोशनी नहीं है, कहाँ कोई आता-जाता नहीं, कहाँ पुलिस की गाड़ी देर से पहुँचती है। सच तो यह है कि सरकार हर सुनसान गली, हर खाली मकान पर पहरा नहीं बिठा सकती। पुलिस की संख्या सीमित है और शहर रोज फैल रहा है। बस, इसी बात का फायदा उठाते हैं आपराधिक प्रवृत्ति के लोग। वह जानते हैं कि अपराध करके वह इन अंधेरी जगहों पर अपने को छिपा सकते हैं। 

अक्सर लोग सोचते हैं कि खाली पड़ा मकान पड़ोसी की समस्या है, सुनसान कॉलोनी बिल्डर की जिम्मेदारी है। लेकिन जब उसी सुनसान में किसी की जिंदगी तबाह होती है, तो वह पूरे समाज का जख्म बन जाती है। खाली पड़े मकानों की सूची स्थानीय थाने को देना, वहाँ सोलर लाइट लगवाना, सीसीटीवी का एक छोटा सा नेटवर्क बनाना, ये छोटे कदम बहुत बड़ा फर्क ला सकते हैं। बिल्डर और कॉलोनाइजर जो कॉलोनी काटकर चले जाते हैं, उनकी जवाबदेही भी तय होनी चाहिए कि जब तक पूरी बसावट नहीं होती, वहाँ सुरक्षा और रोशनी की व्यवस्था वही देखेंगे।

Monday, October 5, 2026

Desires eat away a man


bodhi tree

Ashok Mishra

Shrenik was the most glorious and very famous king of the Magadha Empire. In Buddhist literature he is known as Bimbisara. A lot has been written about him in Buddhist and Jain literature. It is said that he was a follower of Jainism, but he also had faith in Buddhism. Raja Shrenik was a contemporary of Mahatma Buddha and Swami Mahavir. 

Their capital was Rajgriha i.e. Rajgir. His wife's name was Chelna, who was the daughter of King Chetak of Vaishali kingdom. It is said that the famous sons of Queen Chelna included Abhaykumar and Kunik i.e. Ajatashutra. 

Once upon a time. King Shrenik's mind was disturbed. He was neither able to sleep properly at night nor did he find food interesting. The mind was like an alien mind. He was not interested in any work. Many types of apprehensions surrounded him. He could not understand why this was happening. Coincidentally, Mahatma Buddha had visited Rajgriha in those days. 

King Shrenik, restless at heart, thought of meeting the Tathagat and asking for a solution to the problem. He reached the ashram. At that time the sermon of Mahatma Buddha was going on. All the people present there were very happy listening to Buddha's sermon. 

King Shrenik also went and sat in a corner without creating any disturbance. Buddha sensed his mood. During the sermon itself he said that desires distract a person. If a man gets freedom from desires, be he a king or a pauper, everyone can live a happy life. Man loses his desires. On hearing this, King Shrenik got the solution to his problems. He returned to the palace happy.

मनुष्य को खा जाती हैं तृष्णाएं


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

श्रेणिक मगध साम्राज्य के परम प्रतापी और अति प्रसिद्ध राजा थे। बौद्ध  साहित्य में इन्हें ही बिंबिसार के नाम से जाना जाता है। बौद्ध और जैन साहित्य में इनके बारे में बहुत कुछ लिखा गया है। कहते हैं कि यह जैन धर्म को मानने वाले थे, लेकिन इनकी आस्था बौद्ध धर्म पर भी थी। 

महात्मा बुद्ध और स्वामी महावीर के राजा श्रेणिक समकालीन थे। इनकी राजधानी राजगृह यानी राजगीर थी। इतनी पत्नी का नाम चेलना था जो वैशाली राज्य के राजा चेटक की पुत्री थीं। कहा जाता है कि रानी चेलना के प्रसिद्ध पुत्रों में अभयकुमार और कूणिक यानी अजातशुत्र शामिल थे। एक बार की बात है। राजा श्रेणिक का मन अशांत था। वह रात को न तो ठीक से सो पाते थे और न ही उन्हें भोजन रुचिकर लगता था। 

मन अन्यमनस्क सा था। किसी काम में उनका मन नहीं लगता था। कई तरह की आशंकाएं उन्हें घेरे हुए थे। वह समझ नहीं पा रहे थे कि ऐसा क्यों हो रहा है। संयोगवश उन दिनों महात्मा बुद्ध राजगृह पधारे हुए थे। मन से बेचैन राजा श्रेणिक ने सोचा कि तथागत से मिलकर समस्या का समाधान पूछा जाए। वह आश्रम पहुंच गए। उस समय महात्मा बुद्ध का प्रवचन चल रहा था। वहां उपस्थित सारे लोग अत्यंत प्रसन्न होकर बुद्ध का प्रवचन सुन रहे थे। 

राजा श्रेणिक भी बिना व्यवधान पैदा किए एक कोने में जाकर बैठ गए। बुद्ध ने उनकी मनोदशा भांप ली। प्रवचन के दौरान ही उन्होंने कहा कि मनुष्य को तृष्णाएं विचलित कर देती हैं। यदि मनुष्य तृष्णाओं से मुक्ति पा ले, तो राजा हो या रंक, सभी सुखी जीवन गुजार सकते हैं। तृष्णाएं मनुष्य का खो जाती हैं। यह सुनते ही राजा श्रेणिक को अपनी समस्याओं का समाधान मिल गया। वह प्रसन्न चित्त राज महल लौट गए।

चमक-दमक में खत्म तो नहीं होती जा रही रामलीलाओं की परंपरा

अशोक मिश्र

हरियाणा में दशहरा पर्व की आहट सुनाई देने लगी है। राज्य में रामलीला कमेटियां मंचन की तैयारियों में जुट गई हैं। पिछले कई दशकों में रामलीला के मंचन का तरीका बदल गया है। फरीदाबाद स्मार्ट सिटी से लेकर गुरुग्राम के जैकबपुरा तक नौ अक्टूबर से लीलाओं के मंचन शुरू होने की बात कही जा रही है। मंचों पर कपड़े के पर्दों की जगह थ्री-डी इफेक्ट, एलईडी वॉल और सिनेमा हॉल जैसी लाइट-साउंड की भी चर्चा है। इतिहास के झरोखे में झांक कर देखें तो हरियाणा में रामलीला का इतिहास बहुत प्राचीन और सामाजिक प्रभाव बहुत गहरा है। 

यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि सामाजिक एकता का सबसे बड़ा साधन रहा है। पटौदी की रामलीला को दक्षिणी हरियाणा की सबसे पुरानी रामलीलाओं में गिना जाता है। इसके बारे में कहा जाता है कि नवाब मुजफ्फर अली खान ने मन्नत पूरी होने पर रामलीला का मंचन शुरू करवाया था। वहां आज भी दिन में रामलीला होती है। जींद के एक गांव में 250 साल से अधिक समय से दिन में रामलीला होने की परंपरा है। इसका कारण यह है कि पहले यात्रा सुविधाएं सीमित थीं। 

दर्शक सूर्यास्त से पहले घर लौटना चाहते थे। उनकी सुरक्षा और सुविधा को देखते हुए दिन का समय तय किया गया था। हिसार की कटला रामलीला 127 वर्ष पुरानी है, तो हिसार के ही लोहारी राघो में 1948-49 से लगातार मंचन हो रहा है। इसके संस्थापक कलाकार विभाजन से पहले 1933 से 1947 तक पाकिस्तान में रामलीला करते थे। अंबाला के नारायणगढ़ में अंग्रेजों के जमाने की रामलीला मशाल की रोशनी में होती थी। दर्शक मीलों पैदल, बैलगाड़ियों और ट्रैक्टर-ट्रालियों से आते थे और पूरी रामलीला को ही वर्ष भर का एकमात्र मनोरंजन मानते थे।

 संवाद कविता शैली में, ब्रज-अवधी मिश्रित शुद्ध हिंदी में होते थे और अभिनय में भक्ति भाव प्रधान होता था। पहले वाली रामलीलाएं तकनीकी रूप से साधारण होते हुए भी अधिक मनोरंजक और प्रभावी मानी जाती थीं। तब मनोरंजन का कोई विकल्प नहीं था। पूरा गांव एक साथ बैठता था। धार्मिक उत्सुकता और सामाजिक जुड़ाव गहरा था। आज तकनीक ने रामलीला को दृश्य रूप से अधिक आकर्षक, भव्य और सिनेमाई बना दिया है। 

दर्शक को तात्कालिक रोमांच तो अधिक मिलता है, पर भाव के केंद्र में पात्र की जगह प्रभाव और प्रकाश ने ले ली है। शहरों में टीवी, ओटीटी, सोशल मीडिया और दशहरे पर बड़े मेलों के कारण पारंपरिक रामलीला देखने वालों की संख्या घटी है, कमेटियों को चंदा जुटाने और कलाकार ढूंढने में कठिनाई हो रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में और डिजिटल प्रचार से जुड़ी हाईटेक लीलाओं में भीड़ अभी भी अच्छी है, लाइव प्रसारण के कारण दर्शक बढ़े भी हैं। फिर भी कुल मिलाकर रामलीलाओं की संख्या कम होती जा रही है।

Sunday, October 4, 2026

Varna, Caste, and Gotra Are Like a Snake's Slough


Bodhivriksha

Ashok Mishra

It is said that during the era when Mahatma Buddha was born, the systems of caste, *gotra*, and *varna* were deeply entrenched and rigid. Individuals belonging to higher *varnas* and *gotras* were consumed by arrogance; they looked down upon those from lower *varnas* with disdain. After attaining enlightenment, the Tathagata’s first endeavor was to liberate people from the arrogance associated with caste, *varna*, and *gotra*. 

He established a rule that anyone joining the *Sangha* (monastic community) to become a monk had to change their name—a name that would be determined by the officials of the *Sangha* themselves. One day, some disciples were sitting in the ashram, engaged in a discussion. The topic of their conversation was precisely *gotra*, *varna*, and the like. One disciple remarked that upon entering the *Sangha*, one retains the same physical body; so, how could one truly shed the identity of *varna*, *gotra*, and caste? 

Eventually, word of this discussion reached Buddha. He summoned all his disciples to a religious assembly and asked if they had ever seen a snake. They all answered in the affirmative. Buddha then asked, "Have you ever seen a snake shedding its slough (outer skin)?" Most of the disciples replied positively. Buddha asked what the snake becomes like when it sheds its slough. One disciple replied that the snake becomes blind; it is only after the slough is shed that it regains its sight. 

Buddha then explained that caste, *varna*, and *gotra* are like a human being's slough. As long as a person clings to them, they remain blinded by arrogance. Once these are cast off, they gain a new vision. In such a state, everyone living in the *Sangha* becomes equal, and no trace of arrogance remains within them.

केंचुल सरीखे हैं वर्ण, जाति और गोत्र


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

ऐसा कहा जाता है कि जिस कालखंड में महात्मा बुद्ध पैदा हुए थे, उन दिनों जाति, गोत्र और वर्ण व्यवस्था काफी रूढ़ थी। उच्च वर्ण और गोत्र वाले व्यक्तियों का अभिमान आकाश छू रहा था। वह अपने से नीचे वर्ण वाले लोगों को हेय समझते थे। बुद्धत्व प्राप्त करने के बाद तथागत ने लोगों को सबसे पहले जाति, वर्ण और गोत्र के अहंकार से मुक्त करने का प्रयास किया। 

उन्होंने नियम बनाया कि जो भी व्यक्ति संघ में शामिल होगा, भिक्षुक बनेगा उसे अपना नाम बदलना पड़ेगा। नाम भी संघ के अधिकारी निर्धारित करेंगे। एक दिन की बात है। आश्रम में कुछ शिष्य बैठे हुए आपस में चर्चा कर रहे थे। उनकी चर्चा का विषय गोत्र, वर्ण आदि ही थे। एक शिष्य ने कहा कि संघ में आते समय यह शरीर तो पहले वाला ही रहता है, तो फिर वर्ण, गोत्र और जाति कैसे छूट जाएगा। 

कहते हैं कि धीरे-धीरे यह बात बुद्ध के कानों तक पहुंची। उन्होंने अपने सभी शिष्यों को धर्म सभा में बुलाया। उन्होंने अपने शिष्यों से पूछा कि आप लोगों ने सांप को देखा है? सभी शिष्यों ने हां में जवाब दिया। तब महात्मा बुद्ध ने फिर पूछा, आप लोगों ने सांप को केंचुल छोड़ते हुए देखा है? ज्यादातर शिष्यों ने सकारात्मक जवाब दिया। बुद्ध ने पूछा कि जब सांप केंचुल छोड़ता है तो वह कैसा हो जाता है? 

एक शिष्य ने कहा कि सांप अंधा हो जाता है। जब उसका केंचुल छूट जाता है, तो वह फिर देखने लगता है। तब बुद्ध ने कहा कि जाति, वर्ण और गोत्र इंसान के केंचुल हैं। जब तक यह उसके साथ रहते हैं, इंसान अभिमान में अंधा बना रहता है। यह सब छूट जाने पर वह नई दृष्टि पाता है। ऐसी स्थिति में संघ में रहने वाले सभी समान हो जाते हैं। उनमें किसी प्रकार का अभिमान नहीं रह जाता है।