Wednesday, September 16, 2026

हरियाणा के लिए काफी लाभदायक है किशाऊ बांध परियोजना


अशोक मिश्र

हरियाणा के लिए किशाऊ बांध परियोजना अत्यंत लाभदायक मानी जा रही है। इससे हरियाणा की एक बड़ी आबादी का जल संकट दूर हो सकेगा। राज्य गंभीर जल संकट से जूझ रहा है। किशाऊ बांध परियोजना का इतिहास लगभग 85 साल पुराना है। इसका मुख्य विवाद हमेशा लागत और हिस्सेदारी को लेकर रहा है। 1940 में पहली बार बांध परियोजना का विचार आया था। 1944-45 में पंजाब सरकार ने सर्वे शुरू किया और 1965 में इसकी शुरुआती रिपोर्ट पंचवर्षीय योजना में शामिल हुई, लेकिन बार-बार साइट को लेकर तकनीकी आपत्तियां आती रहीं। पहले किशाऊ गांव के पास साइट प्रस्तावित थी, जिसे केंद्रीय जल आयोग ने खारिज कर दिया था। 

बाद में संबरखेड़ा साइट को 236 मीटर ऊंचे बांध के लिए सही माना गया। असली विवाद पिछले आठ सालों में पैदा हुआ, जब हिमाचल प्रदेश ने कहा कि वह बिजली घटक की लागत का वित्तीय बोझ नहीं उठाएगा। अंतत: जून 2026 में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में हुई बैठकों के बाद सहमति बनी कि परियोजना की लागत का नब्बे प्रतिशत केंद्र सरकार वहन करेगी तथा शेष दस प्रतिशत छह भागीदार राज्यों द्वारा साझा किया जाएगा। इसी 10 प्रतिशत हिस्से में हरियाणा की नई हिस्सेदारी करीब 579 करोड़ रुपये तय की गई है। 

पहले के समझौतों में हरियाणा की हिस्सेदारी 478.85 करोड़, उत्तर प्रदेश की 298.76 करोड़, राजस्थान की 93.51 करोड़, दिल्ली की 60.50 करोड़, उत्तराखंड की 38.19 करोड़ और हिमाचल की 31.58 करोड़ बताई गई थी। लेकिन नई व्यवस्था में हिमाचल की बिजली लागत को अन्य राज्यों ने उठाया है। इस 579 करोड़ रुपये के बदले में हरियाणा को सिंचाई के लिए 836.39 क्यूसेक पानी मिलेगा। यह पानी यमुना प्रणाली के माध्यम से हरियाणा की नहरों में आएगा। किशाऊ बांध से मिलने वाला 836.39 क्यूसेक अतिरिक्त पानी हरियाणा की पश्चिमी यमुना नहर और जवाहरलाल नेहरू लिफ्ट नहर प्रणाली में जाएगा। 

इससे दक्षिण हरियाणा के अंतिम छोर तक सिंचाई पानी पहुंचेगा, भूजल पर दबाव कम होगा और पीने के पानी की किल्लत, खासकर गुरुग्राम और फरीदाबाद जैसे एनसीआर शहरों में कम होगी। हरियाणा के लिए यह परियोजना काफी लाभदायक साबित हो सकती है क्योंकि राज्य कृषि प्रधान होने के साथ-साथ पेयजल और सिंचाई के लिए यमुना बेसिन पर काफी निर्भर है। अतिरिक्त और नियमित जल आपूर्ति से सिंचाई क्षमता बढ़ेगी, सूखे या कम पानी वाले मौसम में राहत मिलेगी तथा दक्षिणी जिलों सहित उन क्षेत्रों को पानी पहुंचाया जा सकेगा जहां उपलब्धता कम है। कुल मिलाकर यह परियोजना अंतरराज्यीय सहयोग का उदाहरण बनते हुए यमुना बेसिन के राज्यों की जल संबंधी जरूरतों को संतुलित तरीके से पूरा करने का प्रयास है।

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