Monday, February 25, 2013

‘भड़ास’ थी, निकल गई

-अशोक मिश्र
अंदर ‘वे’ परेशान थे और बाहर मीडियाकर्मियों और समर्थकों-चमचों की भीड़। उन्हें हुआ क्या है, इसके कयास लगाए जा रहे थे। परिजनों की भी नाक में सुबह से दम था। हां, बच्चे अपने में जरूर मस्त थे। पत्नी के जी का जंजाल बनी हुई थी उनकी परेशानी। वे बार-बार करवट बदल रहे थे, ‘ऊह...आह...हाय’ कर रहे थे। उनकी पत्नी सांत्वना व्यक्त करने आई पास-पड़ोस की महिलाओं में बैठी नए फैशन की ज्वैलरी पर डिस्कस कर रही थीं। थोड़ी-थोड़ी देर में वह यह कहती हुई उठ लेती थीं, ‘मिसेज खन्ना! आप बैठें जरा, मैं उनसे पूछ आऊं, आराम मिला या नहीं।’ इसके बाद वे उनके पास पहुंचतीं। पत्नी को आता देख वे पंचम सुर में कराहने लगते। पत्नी सहानुभूति दर्शाती हुई कहतीं, ‘क्या थोड़ा-सा भी आराम नहीं मिला? पहले तो ऐसा कभी नहीं हुआ था?’ इतना कहकर पत्नी बाहर निकल गईं, उन्हें अभी मिसेज शकुंतला से नई रेसिपी सीखनी थी। उन्हें डर था कि यदि यहां ज्यादा देर रुकी, तो कहीं मिसेज शकुंतला चली न जाएं।
पत्नी को जाता देखकर वे खीझ उठे। ‘वे’ यानी मटरू लाल औतार, एक राष्ट्रीय पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता। जब भी उनकी पार्टी सत्ता में आई, उन्होंने लूटा कम, खसोटा ज्यादा। परिणाम यह हुआ कि उनका ‘मध्य प्रदेश’ बढ़ता गया। आप तो जानते हैं कि मध्य प्रदेश चाहे औरत का बढ़े या पुरुष का, परेशानी बढ़ जाती है। वे सुबह से शाम तक मीडिया, कार्यकर्ता और प्रशंसक रूपी चमचों से घिरे रहते थे। मटरू लाल औतार अक्सर कहा करते हैं, ‘मुझे सत्ता का कभी मोह नहीं रहा है। विधायक, सांसद और मंत्री-संत्री जिसको बनना हो, वो बने। मैं तो पैदायशी एमएलए हूं, था और रहूंगा।’ एक बार मीडिया के सामने जब वे यह दोहरा रहे थे, तो दैनिक ‘कउवा काटे’ का एक संवाददाता पूछ बैठा, ‘नेताजी, आपको तो सिर्फ एक बार ही टिकट मिला था और उस बार आपको जमानत बचानी भारी पड़ गई थी।’ यह सुनते ही वे आग बबूला हो गए, ‘देखो, कैसा बुड़बक जैसा बात करता है। हमको बोलता है...हमको... जमानत जब्त हो गया था। अरे, एक्कौ दिन वोट मांगे गए रहे फील्ड मा। हमका तो अध्यक्ष जी दिल्ली मा फंसाए रहे चुनाव भर। कहता है...चुनाव हार गए थे। अरे हमरा कै एक्कौ दिन फील्डिया मा जाए का मौका मिलता, तो देखते कतना वोटवा हमरे पक्ष मा गिरता। गिनत-गिनत अंगुरिया पिराई लागत चुनाव आयोगवा कै।’ पार्टी प्रवक्ता को नाराज देखकर कुछ समर्थकों ने उस ‘नादान’ पत्रकार को भगा दिया। दिन भर मीडिया और समर्थकों से घिरे रहने वाले वही प्रवक्ता कम नेता अंदर आलीशान बिस्तर पर पड़े कराह रहे थे।
तभी कमरा समर्थक कार्यकर्ताओं से भर गया। शोर सुनकर उन्होंने दरवाजे की ओर मुंह किया। एक कार्यकर्ता ने हाथ में पकड़ी कटोरी आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘नेता जी! बस एक चम्मच यह अजवाइन का काढ़ा पी लीजिए। मेरी सास की भतीजी को भी एक बार ऐसी ही दिक्कत हुई थी, मेरी सास ने सिर्फ एक चम्मच ही पिलाई थी। अब आपसे क्या कहें, इधर दो घूंट काढ़ा अंदर गया, उधर भतीजी अपना बस्ता उठाकर स्कूल चली गई थी।’ समर्थकों ने समवेत स्वर में कहा, ‘नेता जी! पी लीजिए दो घूंट...क्या पता फायदा हो ही जाए।’ नेता जी कराहते हुए उठे, दो घूंट काढ़ा पिया और बोले, ‘बहुत कड़वा है।’
तब तक एक दूसरा व्यक्ति अंदर आया और उसने कहा, ‘दद्दा! यह काढ़ा-फाड़ा छोड़िए, यह ‘सर्वभस्मक चूर्ण’ लीजिए। मेरे पूजनीय गुरु स्वामी चुतरानंद मतिमंद जी को हिमालय पर तपस्यारत उनके गुरु जी ने प्रदान किया था। इसे फांकते ही आप भी उठकर पार्टी कार्यालय चल देंगे।’ नेता जी ने एक चम्मच चूर्ण भी फांक लिया। तभी ‘हटो..हटो..रास्ता दो’ की आवाज गूंजी। कमरे में कुछ कैमरामैन और पत्रकार घुसे। पत्रकारों ने उनसे पूछा, ‘एमएलए जी, सत्ताधारी दल द्वारा किए गए मुर्गी घोटाले के बारे में आपकी पार्टी की क्या प्रतिक्रिया है? आपकी पार्टी इस घोटाले को लेकर क्या करने जा रही है?’ तभी कमरे में ‘भर्रर्र... र्रर्र...’ की आवाज गंूजी, मानो किसी कपड़ा व्यापारी ने कपड़े का थान पकड़कर फाड़ा हो। चारों तरफ बदबू-सी फैल गई। नेता जी उछलकर बिस्तर पर बैठ गए, बोले, ‘हमारी पार्टी इसके खिलाफ राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन करेगी, प्रधानमंत्री को नैतिकता के आधार पर तुरंत इस्तीफा दे देना चाहिए। इस बार हमारी पार्टी अपने सहयोगियों के साथ संसद का बहिष्कार करेगी।’ तभी एक पत्रकार ने पूछा, ‘नेता जी, सुना है कल से आपकी तबीयत खराब थी?’ नेताजी कैमरे के सामने मुस्कुराए, ‘कल से एक भड़ास अटकी हुई थी, अभी निकली है। अब मैं ठीक हूं।’ इतना कहकर नेताजी बाहर आए और कार्यकर्ताओं को संबोधित करने लगे।

Thursday, February 14, 2013

‎...गुड़ गोबर हो गया


-अशोक मिश्र
वेलेंटाइंस डे नजदीक आ रहा था। काफी ऊहापोह में था कि वेलेंटाइंस डे क्या करूं? किसको प्रपोज करूं? जिसको प्रपोज करूं, वह मानेगी भी या नहीं? कहीं रोज डे के दिन बड़े प्रेमभाव से लाया गया गुलाब मेरे ही मुंह पर तो नहीं फेंक दिया जाएगा? हग डे के दिन पिट तो नहीं जाऊंगा? कई बार हिंदूवादी संगठनों की तोड़फोड़ का भी खयाल आया। संभावनाओं और आशंकाओं पर काफी विचार-विमर्श किया। पहले सोचा कि ज्यादा पचड़े में कौन पड़े, पत्नी को ही ह्यरोज-सोजह्ण देकर और ह्यजफ्फिया-पप्पियांह्ण पाकर शगुन के तौर पर वेलेंटाइंस डे मना लिया जाए। इसमें पिटने का भी कोई चांस नहीं था, लेकिन फिर खयाल आया कि जब साठ-पैंसठ साल के बुड्ढे भी इस दिन नया गिटार बजाने की जुगत में रहते हैं, तो मैं ही पुराना गिटार क्यों बजाऊं? मैं तो अभी जवान हूं।
काफी सोच विचार के बाद मैंने अपने ज्योतिषी मित्र मुसद्दीलाल से सलाह लेने की सोची। एक दिन पहुंच गया सुबह-सुबह उनकी दुकान पर। वे मुझे देखते ही लपककर उठे और गले लगा लिया। बोले, ह्यजिस दिन तुम आ जाते हो, उस दिन तुम्हारे जैसे कई ह्यआंख के अंधे, गांठ के पूरेह्ण फंस जाते हैं।ह्ण मैंने आंखें तरेरी, ह्यक्या मतलब है तुम्हारा?ह्ण मुसद्दीलाल ने बात संभाली, ह्यअरे यार! मैं तो मजाक कर रहा था। तुम न आंख के अंधे हो और न तुम्हारी गांठ में पैसा है, जो तुम मुझे दोगे। हां...यह बताओ, किसी खास काम से आए हो?ह्ण मैंने कहा, ह्ययार! मैं इस बार वेलेंटाइंस डे धमाकेदार अंदाज में मनाना चाहता हूं। कोई धांसू आइडिया हो, तो अपने ज्योतिष के पिटारे से निकालो और पुडिया बनाकर दे दो।ह्ण मुसद्दीलाल मेरी बात सुनकर मूंछों में मुस्कुराए और बोले, ह्यअपनी कुंडली लाए हो?ह्ण मैंने जेब से अपने भाग्य की ही तरह मुड़ी-तुड़ी कुंडली निकाली और उन्हें थमा दी। वे काफी देर तक मेरी कुंडली को गौर से देखते रहे और फिर गहरी सांस लेकर बोले, ह्यतुम्हारे वेलेंटाइंस डे पर इस वर्ष ह्यउल्कापातह्ण योग भारी पड़ रहा है। हो सके, तो इस बार वेलेंटाइंस डे को बख्श दो। दूर रहो वेलेंटाइंस डे के झमेले से, इसी में तुम्हारी भलाई है।ह्ण मुसद्दीलाल की बात सुनकर मुझे ताव आ गया। मैंने झट से अपनी कुंडली उठाई और बिना कोई दक्षिणा दिए घर चला आया। मन खिन्न हो रहा था। सो, पेट में दर्द होने और आफिस न आ पाने की असमर्थता जताकर अपने संपादक से एक दिन की छुट्टी ली और फेसबुक पर वेलेंटाइन ढूंढने लगा।
मैंने अपने कई फेसबुकिया गर्ल फ्रेंड से चैट करके पूछा, ह्यक्या वे मेरी वेलेंटाइन बनेंगी?ह्ण सत्तर फीसदी लड़कियों ने तो घास नहीं डाली, बाइस फीसदी लड़कियों ने कहा कि वे शहर से बाहर हैं, वरना वे मुझे निराश नहीं करतीं। सिर्फ आठ फीसदी लड़कियां ही प्रपोज डे के दिन मिलने को राजी हुईं, लेकिन इन आठ फीसदी में से ज्यादातर लड़कियां फाइव स्टार होटल में ही मिलने को तैयार थीं। फाइव स्टार होटल में उन्हें ले जाने मेरे बूते की बात नहीं थी। सो, ऐसे प्रस्ताव पर मैंने धूल डाली और बाकियों के इरादे जानने में जुट गया। एकाध ने लांग ड्राइव पर जाने प्रस्ताव रखा, तो मैंने उन्हें बताया कि मेरे पास कार तो है नहीं। हां, अगर साइकिल पर वे लांग ड्राइव पर जाना चाहें, तो उनका स्वागत है। मेरी यह दशा जानते ही उनमें से एक को छोड़कर बाकी सभी लड़कियां तुरंत साइन आउट (फेसबुक बंद करना) हो गईं। अकेली बची लड़की की प्रोफाइल पर नजर डाली, तो दिल गार्डेन-गार्डेन हो गया। क्या, लल्लन टॉप जवान लड़की थी। फोटो देखते ही दिल पसली में धाड़-धाड़ करके धड़कने लगा। उससे गांधी पार्क में सुबह दस बजे मिलने का प्रोग्राम तय करके सो गया। दिन-रात सोने के बाद जब अगली सुबह उठा, तो काफी उल्लास में था। गाते-गुनगुनाते नहाया-धोया, खाना खाया और सज-धजकर तैयार हुआ। घर से निकलते समय घरैतिन ने तंज कसा, ह्यसज-धज तो ऐसे रहे हो, जैसे ससुराल जा रहे हो?ह्ण मैंने मुंह बिचकाते हुए कहा, ह्यऐसा ही समझ लो।ह्ण
गांधी पार्क पहुंचा, तो फेसबुक पर नियत किए गए स्थान पर गुलाब की टहनी लेकर खड़ा हो गया। काफी देर बाद बुर्के में लिपटी एक महिला आई और भर्राई हुई आवाज में बोली, ह्यदेर तो नहीं हुई?ह्ण मैंने वाणी में मिठास घोलते हुए कहा, ह्यनहीं जी...।ह्ण इतना कहकर मैंने एक घुटने को मोड़कर जमीन से टेकने के बाद गुलाब की टहनी पेश करते हुए कहा, ह्यजिस तरह यह गुलाब का फूल कांटों के बीच रहकर भी मुस्कुरा रहा है, उसी तरह कांटे रूपी पत्नी के होते हुए भी मेरा दिल सिर्फ आपके लिए धड़क रहा है। इसे स्वीकार कीजिए।ह्ण बुर्के में से आवाज आई, ह्यस्वीकार किया...।ह्ण आवाज सुनकर मैं चौंका, यह आवाज तो मेरी घरैतिन जैसी है। उसने बुर्का उतारते हुए कहा, ह्यमियां मंजनू..वेलेंटाइंस डे मुबारक।ह्ण और मैं बीवी का चेहरा देखकर होश खो बैठा। बाद में पता चला कि फेसबुक वाली लड़की मेरे मोहल्ले में रहती है और मेरी घरैतिन से अच्छी जान पहचान है। उसी ने मेरी कामनाओं पर उल्कापात करने की योजना बनाई थी। बुर्का भी उसी ने अरेंज किया था।

Thursday, February 7, 2013

उपन्यास ‘चिरकुट’ का एक अंश


मित्रो! पिछले काफी दिनों से एक उपन्यास पर काम कर रहा हूं। काफी समय हो गया है, इस पर काम करते हुए। पिछले एक साल से सुस्त सा हो गया था, लेकिन इधर फिर से उसमें जुट गया हूं। उम्मीद है कि तीन-चार महीने में इसे पूरा करने में सफल हो जाऊंगा। क्या करूं, पापी पेट की आग बुझाने के लिए नौकरी भी करनी पड़ती है। ज्यादातर समय आफिस में ही निकल जाता है, फिर बाकी बचा समय खाने-पकाने में। सोने से बचे समय में अब मैं अपने उपन्यास को पूरा करने का भरपूर प्रयास करूंगा। पत्रकारिता पर आधारित इस उपन्यास का नाम रखा है ‘चिरकुट’। बानगी के तौर पर पेश है उपन्यास ‘चिरकुट’ का एक अंश। 
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चिरकुट
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दिन भर की भाग दौड़ के बाद शिवाकांत आफिस पहुंचा। उसने साथियों का बेमन से अभिवादन किया और बैठकर अपना काम निपटाने लगा। आशीष ने शिवाकांत की आंखों में उदासी और निराशा की झलक देख ली थी, लेकिन उसने कुछ कहना उचित नहींसमझा। चिकित्सा और शिक्षा मामलों की बीट देखने वाले अरविंद चौधरी ने शिवाकांत के पास जाकर कहा, ‘क्या बात है, सर! आज कुछ ज्यादा ही गंभीर लग रहे हैं। आते ही काम में जुट गये। रोज की तरह न कोई हंसी, न मजाक, न कोई चुटकुला। घर-परिवार में सब खैरियत तो है?’
अपनी खबरें कंपोज करती मंजरी अग्रवाल बोल पड़ी, ‘बस दो मिनट...शिवाकांत सर...सोलह-सत्रह लाइन की खबर है, उसे पूरी कर लूं। फिर मैं भी आपका चुटकुला सुनूंगी। प्लीज सर...अभी मत सुनाइएगा।’
शिवाकांत ने अपनी खबरों की सूची तैयार करते हुए कहा, ‘नहीं... कोई खास बात नहीं है। यह सब तो मीडिया जगत में होता रहता है।’
शिवाकांत की बात सुनकर आशीष चौकन्ना हो गया। वह समझ गया कि आज कोई ऐसी घटना जरूर घटित हुई है जिसने शिवाकांत को भीतर तक आहत किया है। सच और सनक की खातिर किसी से भी भिड़ जाने वाला शिवाकांत अगर गंभीर है, तो जरूर कोई बड़ी बात है। पिछले दस-बारह साल से अपराध बीट देखने वाले शिवाकांत का मन भीतर से बहुत कोमल था...बिल्कुल किसी गौरेया के नन्हे बच्चे की तरह। मानवीय मूल्यों के ह्रास और रिश्तों को कलंकित करने वाली खबरों को लिखते समय अपनी भावनाएं भी उड़ेल देता था। मुख्य खबर के साथ साइड स्टोरियां इतने मार्मिक ढंग से लिखता कि लोग उसकी लेखनी के कायल हो जाते। आशीष ने अपना काम बंद कर दिया और शिवाकांत के पास खाली पड़ी कुर्सी पर बैठते हुए पूछा, ‘क्या बात है? कुछ तो बताओ। दस-पंद्रह दिन पहले बता रहे थे कि बाबू जी की तबीयत खराब है। क्या उन्हें कुछ हुआ है? भाभी जी या बच्चों को कोई तकलीफ तो नहींहै?’
शिवाकांत ‘की बोर्ड’ पर अंगुलियां रखे कंप्यूटर स्क्रीन को घूर रहा था। उसने कहा, ‘आशीष भाई! मुझसे आज पाप हो गया।’
‘क्याऽऽऽ...?’ आशीष के मुंह से सिर्फ यही निकला। शिवाकांत के कथन ने कमरे में धमाका कर दिया था। स्थआनीय डेस्क पर काम कर रहे सभी लोगों की अंगुलियां ‘की बोर्ड’ पर पहले स्थिर हुईं और फिर सबके चेहरे शिवाकांत की ओर घूम गये।
शिवानी भटनागर की आश्चर्य की अधिकता के कारण कांपती आवाज गूंजी, ‘यह आप क्या कह रहे हैं? कैसा पाप हो गया है?’
सबके चेहरे पर उत्सुकता मिश्रित आश्चर्य था। सभी जानना चाह रहे थे कि आखिर शिवाकांत से ऐसा कौन-सा पाप हो गया है जिसने उसे इस कदर उद्वेलित कर दिया है कि उसे सबके सामने स्वीकार करना पड़ रहा है। कमरे में क्षणभर को निस्तब्धता छा गयी थी। किसी को सूझ नहीं रहा था। सब मौन शिवाकांत के बोलने की प्रतीक्षा में थे।
शिवाकांत ने शांति भंग की, ‘हां...मुझसे पाप हो गया। मुधे प्रत्युष त्रिपाठी को सीओ हजरतगंज से कहकर गिरफ्तार करवाना पड़ा।’
शिवाकांत के इतना कहते ही कमरे में दूसरा धमाका हुआ। इस बार आशीष के मुंह से तो कोई बोल नहीं फूटा, लेकिन मंजरी, शिवानी सहित कई लोगों ने लगभग एक साथ कहा,‘क्याऽऽऽ...’
‘शिवाकांत...यह तुमने क्या किया...।’ आशीष ने दुख भरे स्वर में उलाहना दिया। बाकी सभी सकते की सी हालत में अपने स्थान पर बैठे रहे।
‘हां..मुझे यह पाप करना पड़ा क्योंकि मैं इस अखबार में नौकरी करता हूं। इस अखबार के मालिक राय साहब चाहते थे कि मैं प्रत्युष त्रिपाठी को गिरफ्तार करवाऊं।’ शिवाकांत रुआंसा हो गया।
कमरे में उपस्थित सभी रिपोर्टर और संपादकीय डेस्क के साथी आश्चर्य से अब तक मुक्त हो चुके थे। परिमल जोशी ने कहा, ‘लेकिन प्रत्युष जी ने भी कोई अच्छा तो किया नहीं था। संस्थान का डेढ़ लाख रुपये डकार गये थे। विज्ञापनदाताओं से फर्रुखाबाद में रुपये वसूलते रहे और संस्थान को देने की बजाय अपनी जेब भरते रहे। संस्थान ने जब मांगा, तो ठेंगा दिखा दिया।’
प्रशिक्षु संवाददाता राजेंद्र शर्मा ने प्रतिवाद किया, ‘लेकिन संस्थान ने भी तो उनके साथ कौन-सा भला व्यवहार किया था। इस मामले में थोड़ी बहुत सुनगुन मुझे भी है। सुना है कि त्रिपाठी जी को अट्ठारह हजार रुपये मासिक वेतन, तीन हजार रुपये आवास, डेढ़ हजार रुपये फोन के मद में देने का आश्वासन देकर संस्थान में लाया गया था। दो महीने तक तो इन आश्वासनों को पूरा किया गया, लेकिन तीसरे महीने आवास और फोन के मद में दिया जाने वाला पैसा न केवल बंद कर दिया गया, बल्कि मासिक वेतन भी बारह हजार रुपये कर दिया गया। नियुक्ति पत्र में भी धांधली की गयी। मुख्य संवाददाता की बजाय वरिष्ठ संवाददाता का पद दिया गया। यह तो सरासर बेईमानी है।’
काफी देर से चुप बैठे डॉ. दुर्गेश पांडेय ने चश्मे को नाक पर समायोजित करते हुए कहा, ‘यह बेईमानी नहीं थी। दरअसल, संस्थान ने जिन अपेक्षाओं के चलते यह पैकेज देने का फैसला किया था, उन पर वे खरे नहीं उतरे। यहां सवाल बेईमानी का नहीं,   उपयोगिता का है। प्रत्युष अपनी उपयोगिता  नहीं सिद्ध कर पाये। उनके साथ जो कुछ हुआ, कम से कम मैं गलत नहीं मानता।’
‘आपके मानने या न मानने से क्या होता है। आप तो प्रबंधकों की भाषा बोलने लगे। जित तरह का व्यवहार प्रत्युष त्रिपाठी के साथ किया गया था, अगर खुदा न करे...कल आपके साथ वही हो, तब भी आप कहेंगे कि प्रबंधकों और मालिकों ने जो किया, सही किया। कोई कुछ भी कहे, आज शिवाकांत ने जो किया, वह बहुत गलत हुआ।’ आशीष ने तल्ख स्वर में डॉ. दुर्गेश से कहा।
शिवाकांत ने भीगे स्वर में कहा, ‘पिछले बीस दिन से मुझ पर लगातार दबाव डाला जा रहा था कि प्रत्युष जी को गिरफ्तार करवाकर जेल भिजवा दूं। मैंने चिंतामणि राय जी को समझाने की पूरी कोशिश की, लेकिन वे नहीं माने। उनकी बस एक ही जिद थी कि वे डेढ़ लाख रुपये हजम कर जाने वाले को जेल भिजवा कर रहेंगे। भले ही इसके लिए तीन-चार लाख रुपये खर्च करने पड़ें। वे चार-पांच लाख रुपये और खर्च करने को तैयार थे, लेकिन वे डेढ़ लाख रुपये को भूलने को तैयार नहीं थे। प्रकारांतर से मुझे भी धमकाया गया कि अगर मैंने यह सब कुछ नहीं किया, तो मैं इस संस्थान में नौकरी नहीं कर पाऊंगा। मैं बेहतर है कि अभी से कोई दूसरा दरवाजा देख लूं।’
‘मतलब यह कि आपने अपनी नौकरी बचाने के लिए त्रिपाठी जी को गिरफ्तार करवा दिया।’ मंजरी अग्रवाल की घूरती निगाहों को शिवाकांत अपने चेहरे पर महसूस कर रहा था। तीन साल पहले एक दैनिक अखबार में प्रत्युष त्रिपाठी के साथ काम कर चुकी मंजरी इस घटना से आहत थी।
वैसे एकाध लोगों को छोड़कर कमरे में मौजूद सभी इस घटना से दुखी थे। प्रत्युष त्रिपाठी का नाम मीडिया जगत में बड़े सम्मान के साथ लिया जाता था। पचपन वर्षीय प्रत्युष जी पिछले बत्तीस साल से पत्रकारिता जगत में सक्रिय थे। एक दैनिक अखबार में प्रशिक्षु रिपोर्टर के रूप में कैरियर की शुरुआत करने वाले प्रत्युष जी ने कभी पैसे और कैरियर की परवाह नहींकी।  नौकरी उनकी आजीविका की साधन जरूर थी, लेकिन साध्य नहीं। मान-सम्मान को उन्होंने हमेशा ऊपर रखा। कई बार तो वे चपरासियों के लिए मालिक या संपादक से भिड़ जाते थे। उन्हें अखबार में होने वाली राजनीति से कोई सरोकार नहीं था। वे अपने से कनिष्ठ संवाददाताओं और उप संपादकों को सिखाने-समझाने ेसे पीछे नहीं हटते थे। जो भी उनके पास अपनी समस्याओं को लेकर गया और कहा, ‘दद्दा जी, इस खबर को देख लें। इसका एंगल सही है या नहीं।’ तो दद्दा न केवल उसे गंभीरता से पढ़ते, बल्कि उसमें आवश्क सुधार करवाते। कई बार तो अपने कनिष्ठ साथियों की कापियां देखकर झुंझलाते, उससे कई बार लिखवाते। इस पर भी अपेक्षित सुधार नहीं होता, तो वे खीझ उठते, ‘अबे गधे! तेरी मोटी बुद्धि में कुछ घुसता भी है या नहीं।’ यह उनका तकिया कलाम था। जिससे यह बात कही जाती, वह या तो दांत निपोर देता या सिर खुजाने लगता। इन सबके बावजूद उनके मन में किसी के प्रति दुराग्रह नहीं पैदा होता। वे यह मानने वाले जीव थे कि ‘न जानना कोई अपराध नहीं, लेकिन न जानते हुए भी जानने का ढोंग करना, अक्षम्य है।’ उनके साथ  काम कर चुके अपराध संवाददाताओं की एक लंबी फेहरिश्त थी जो विभिन्न अखबारों में काम कर रहे थे। उनके सिखाये कई अपराध संवाददाता अपने संस्थान में महत्वपूर्ण पदों पर थे। शिवाकांत ने भी कई साल तक प्रत्युष त्रिपाठी की शार्गिदी की थी।
‘मैं पिछले बीस दिन से किन तनावों में जी रहा था, आप लोगों को नहीं बता सकता। कई बार सोचा कि नौकरी छोड़ दंूं। लेकिन विकल्पहीनता के चलते मुझे यह पाप करना पड़ा। हजरतगंज कोतवाली इंचार्ज उन्हें गिरफ्तार करने को ही तैयार नहीं था। वह तो कह रहा था कि त्रिपाठी जी का रसूख कोई कम तो है नहीं। आज भले ही फर्रुखाबाद में रह रहे हों, लेकिन कल को फिर लखनऊ रहने आ गये, तब...? कल को तुम्हींलोग मुझे बुरा कहोगे। तुम्हारे कहने से त्रिपाठी जी को गिरफ्तार करके शहीदों में अपना नाम क्यों लिखाऊं। इधर मैं उन्हें गिरफ्तार करूंगा, उधर उन्हें बीस पत्रकार छुड़ाने पहुंच जायेंगे। फिर कल के अखबारों में मैं विलेन की तरह पेश किया जाऊंगा। मैं जान-बूझकर आग से क्यों खेलूं।’ शिवाकांत साथियों के सामने सफाई पेश करने की कोशिश कर रहा था। इसके पीछे उसका अपराधबोध था या साथियों के सामने अपने कृत्य को सही साबित करने की मंशा, यह आशीष गुप्ता सहित अन्य साथी नहीं समझ पा रहे थे।
मंजरी अग्रवाल कहने से नहीं चूकी, ‘लेकिन भाई जी, आप चाहे जो कहें। आपके हाथों हुआ बिल्कुल गलत। एकदम गुरु द्रोणाचार्य के वध जैसा। अगर आपने नौकरी के दबाव में यह सब किया है, जैसा कि आप कह रहे हैं, तो भी न्यायपूर्ण नहीं है। यह सब कहने से न तो आपका अपराध कम हो सकता है, न ही कलंक धुल सकता है।’
मंजरी की बात पूरी होने से पहले ही कमरे में सुप्रतिम ने प्रवेश किया। उसने सब पर एक निगाह डालते हुए कहा, ‘शाबाश शिवाकांत! तुमने तो इतिहास रच दिया। देखना, इस बार तुम्हारा प्रमोशन और बंपर इंक्रीमेंट पक्का है। वाकई मजा आ गया।’
सुप्रतिम की बात सुनकर परिमल और दुर्गेश पांडेय के चेहरे पर कुटिल मुस्कान दौड़ गयी। वे समझ गये कि सुप्रतिम का मंतव्य क्या है। सब कुछ जानते हुए भी परिमल ने पूछा, ‘सर, कुछ हमें भी बताएंगे या खुद मन ही मन लड्डू फोड़ते जायेंगे।’
‘हाय मेरे भोले बलम...मैं मर जांवा...अब भी नहीं समझ पाये। अरे मैं उसी साले बुड्ढे प्रत्युष त्रिपाठी की बात कर रहा हूं जिसकी गिरफ्तारी का तुम लोग पिछले दस-पंद्रह मिनट से रोना रो रहे हो। रुदाली की तरह छाती पीट रहे हो।’ सुप्रतिम का स्वर तेज और तल्ख हो उठा, ‘दस मिनट से तो मैं दरवाजे पर खड़ा रुदाली विलाप सुन रहा हूं। चला था हरामखोर दैनिक प्रहरी का डेढ़ लाख   रुपये मारने। आज साले की अच्छी छीछालेदर हुई।’
शिवाकांत यह सुनकर भी चुप रहा। शिवानी भटनागर से रहा नहीं गया। वह बोल उठी, ‘अगर आप अच्छे इनसान नहीं बन सके, तो कम से कम अच्छे पत्रकार तो बन गये होते। संपादक और मालिक की चमचागिरी करते-करते आप इंसानियत का तकाजा भी भूल गये। आपको क्या हो गया है।’
‘मेरी प्रतिबद्धता अपने अखबार और उसके मालिक के प्रति है। एक बात मेरी समझ में नहीं आता कि आप लोग उस ‘न्यूरोसिस्टो सरकोसिस’ से इतनी सहानुभूति क्यों रखते हैं?’
‘भाई साहब...यह न्यूरोसिस्टो सरकोसिस क्या बला है? यह किस भाषा की गाली है?’
‘यह विशुद्ध अंग्रेजी गाली है। इसका मतलब है सुअर के गू का कीड़ा। अमानत में खयानत करने वाला व्यक्ति सुअर की विष्ठा में पड़े कीड़े से भी बदतर होता है। संस्थान आप पर विश्वास करता है, आपको जिम्मेदारी सौंपता है, तो आप संस्थान को यह सिला देंगे। उसका पैसा मार लेंगे। ऐसे नमकहरामों के साथ यह सुलूक होना चाहिए।’ सुप्रतिम ने भद्दे ढंगे से मुंह को फैलाकर काफी देर से रखे गये पान को चबाते हुए कहा।
‘संस्थान के पैसे को वसूलने के बाद जमा नहीं करने को मैं भी गलत मानती हूं। यह कोई अच्छी बात नहीं है। लेकिन इसे आपको भी मानना पड़ेगा कि आज जैसी स्थिति से प्रत्युष त्रिपाठी जी जूझ रहे हैं, कल मेरे सामने आ सकती है। परसों आपको भी यह सब कुछ झेलना पड़ सकता है।’ शिवानी अब भी मुखर थी। उसे आश्चर्य हो रहा था कि ऐसे मौके पर शिवाकांत और आशीष जैसे वरिष्ठ साथी चुप क्यों हैं? उसने एक बार सबकी ओर देखा भी, लेकिन उन सबके सिर झुके हुए थे। शिवाकांत ने तो आंखें भी बंद कर रखी थी।

Tuesday, February 5, 2013

डीएनए में भ्रष्टाचार

-अशोक मिश्र
दिल्ली के सर्वसुखानंद स्टेडियम में ‘अखिल भारतीय लूटखसोट पार्टी’ का चिंतन शिविर चल रहा था। पार्टी अध्यक्ष पद पर युवा नेता ‘नादान बालक’ की ताजपोशी हो चुकी थी। पार्टी के वरिष्ठ और गरिष्ठ नेता अपने नव मनोनीत अध्यक्ष ‘नादान बालक’ के मुखारबिंद से कुछ सुनने को बेताब हो रहे थे। मौके की नजाकत भांपकर पूर्व अध्यक्ष ने ‘नादान बालक’ जी को शिविर को संबोधित करने का इशारा किया। ‘नादान बालक’ जी ने अपना चश्मा एक बार व्यवस्थित किया और बोले, ‘इस चिंतन शिविर में आने से पहले मैं बहुत चिंतित था। मेरी चिंता पार्टी के कार्यकर्ताओं, नेताओं को लेकर थी। मुझे बार-बार अपने नेताओं, कार्यकर्ताओं के दयनीय चेहरे याद आ रहे थे, लेकिन अब, जब चिंतन शिविर धीरे-धीरे अपने समापन की ओर बढ़ रहा है, मैं आश्वस्त हूं। मैं जानता हूं कि आप सबकी चिंता भविष्य को लेकर है। आप इस चिंता में दुबले हुए जा रहे हैं कि आगामी लोकसभा चुनाव के बाद पता नहीं ‘खाने-कमाने’ को मिलेगा या नहीं। एक बात मैं आपको बता दूं। यह बात इसी चिंतन शिविर रूपी मंथन से निकलकर सामने आया है। इस देश क्या, पूरी दुनिया में जब तक पूंजीपतियों को मुनाफा कमाने और निजी संपत्ति को बरकरार रखने की छूट रहेगी, हमारे ‘ख्राने-कमाने’ की व्यवस्था बनी रहेगी। जिस भ्रष्टाचार को लेकर आज लोग इतना हो-हल्ला मचा रहे हैं, वह भ्रष्टाचार तो हमारे डीएनए में है, देश की जनता के खून में है। जीवन से भ्रष्टाचार और मुनाफे पर आधारित बिकाऊ माल की अर्थव्यवस्था को खत्म कर देने का मतलब पूंजीवादी व्यवस्था का खात्मा...। आप किसी कांग्रेसी से पूछ कर देखें, भाजपाई से पूछें, संघियों को टटोलें, यहां तक कि मजदूरों, किसानों और शोषितों के नाम पर चांदी काटने वाले वामपंथियों से पूछें कि क्या वे मुनाफे पर आधारित इस व्यवस्था को मिटाना चाहते हैं? ये सभी पार्टियां एक स्वर में चिल्लाकर कहेंगी, नहीं...नहीं...नहीं..।’
इतना कहकर नादान बालक जी ने चारों ओर बैठे प्रतिनिधियों पर निगाह डाली, ‘भविष्य में खाने-कमाने की चिंता में मरे जा रहे आप लोग बुद्धू हैं। आपको बताऊं, जब भी मैं इस देश के गरीबों को देखता हूं, किसानों को देखता हूं, बेरोजगारों को देखता हूं, तो इनमें मुझे अपना और अपनी पार्टी का उज्जवल भविष्य दिखता है। मैं इन्हें एक शिकार के रूप में देखता हूं। जब भी मुझे सड़कों पर आते-जाते कोई बच्चा दिखता है, तो वह मुझे भावी शिकार नजर आता है। मेरी पार्टी के सभी नेताओं और कार्यकर्ताओं से बस यही अपील है कि आप सभी जितनी जल्दी हो सके, झुनझुना बजाने की कला सीख लें। देशवासियों के सामने जोर-जोर से झुनझुना बजाएं, उन्हें परियोजनाओं की लालीपॉप दें, आर्थिक उदारीकरण का झांसा देना, तो आपको सबसे पहले आना चाहिए। जो नेता-कार्यकर्ता आर्थिक उदारीकरण पर घंटे-दो घंटे भाषण नहीं दे सकता हो, उसे तत्काल बाहर कर दें। हमें ऐसा नेता-कार्यकर्ता नहीं चाहिए, जो लूट, खसोट, झपटमारी, ठगी और चोरी जैसी प्राचीन और महत्वपूर्ण कला में माहिर न हो। अगर जरूरत पड़ी, तो हम जिला स्तर पर इन कलाओं में प्रवीणता के लिए ट्रेनिंग कैंप लगाएंगे। हमें हर राज्य से कम से कम पचास-पचास ठग, जेबकतरे और चालबाज लोग चाहिए, जो अपने प्रदेश को अच्छी तरह से बेच सकें, सरकारी खजाने को चूना लगा सकें। आप सभी वरिष्ठ, गरिष्ठ, कच्चे, पक्के नेताओं और कार्यकर्ताओं को दो महीने का समय दिया जाता है, आप अपने भीतर इन कलाओं का विकास कर लें।’
नादान बालक की बात सुनकर शिविर में उपस्थित युवा प्रतिनिधियों ने करतल ध्वनि की, तो नव मनोनीत अध्यक्ष खुश हो उठे। उन्होंने कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा, ‘आप लोग एक बात का ध्यान और रखें। आगामी चुनाव में लोकसभा या विधानसभा का टिकट अपनी ही पार्टी के कार्यकर्ता को दिया जाएगा। दूसरी पार्टियों से आने वाले ठगों, लुटेरों और बटमारों को प्राथमिकता नहीं दी जाएगी। आप लोग एक बात अच्छी तरह से जान लें कि जब तक देश में एक भी भूखा, गरीब, बेरोजगार, किसान, मजदूर रहेगा, तब तक खाने-कमाने की संभावनाएं बनी रहेंगी। जो लोग भ्रष्टाचार का विरोध और राजनीति में स्वच्छता के हिमायती हैं, उनकी बातों पर कान धरने की जरूरत नहीं है। आप अपना काम करें, वे अपना काम करें। आप अपने काम में प्रवीण हों, इसी आकांक्षा के साथ यह शिविर समाप्त होता है। आप लोग अपने-अपने इलाकों में जाकर प्राणपण से अपने लक्ष्य में जुट जाएं।’ इतना कहकर अध्यक्ष नादान बालक जी ने अपना संबोधन खत्म किया और शिविर से चले गए।

Thursday, January 24, 2013

गधों का कायांतरण

अशोक मिश्र
दिल्ली के संसद मार्ग पर गधों का सम्मेलन हो रहा था। एक स्वामी टाइप के बुजुर्ग गधे गदर्भानंद को सम्मेलन का सभापति बनाया गया था। सभापति के आसन ग्रहण करते ही सभी गधों ने ‘ढेंचू-ढेंचू’ की आवाज से उनका स्वागत किया। एक युवा गधे ने सम्मेलन का संचालन करते हुए कहा, ‘मित्रों, आज दिल्ली में आप सभी गधों का स्वागत करते हुए मुझे अपार प्रसन्नता हो रही है। पहले आपको यह बता दें कि यह सम्मेलन बुलाने की आवश्यकता क्यों पड़ी? आप जानते हैं कि सदियों से हम गधों के आश्रयदाता धोबी रहे हैं। उनके रहते हमें कभी भोजन की समस्या नहीं रही। वे हमें खिलाते थे और जमकर काम लेते थे। इससे हमें उज्र भी नहीं था। अब जब उनके लिए हम अनुपयोगी हो गए हैं, तो हमारे सामने भोजन की समस्या आ खड़ी हुई है, इसलिए इंसानों की परंपरा के विपरीत मैं सबसे पहले सभापति महोदय से अनुरोध करता हूं कि वे विषय प्रवर्तन के लिए आगे आएं।’ इतना कहकर युवा गधा एक तरफ खड़ा हो गया।
सभापति स्वामी गदर्भानंद ने आसन के सामने रखे हरे चारे को मुंह में भरा और चबाते हुए माइक के सामने आ खड़े हुए। बोले, ‘देश भर से आये प्यारे गर्दभ भाइयो! पिछले कई दिनों से हरे चारे को देखने को तरस गईं आंखों को आज कितना सुकून मिल रहा है, यह मैं आपको नहीं बता सकता। इस सम्मेलन के आयोजकों को सबसे पहले तो मैं धन्यवाद देना चाहता हूं कि उन्होंने पद और गरिमा के हिसाब से हम सभी गधों को हरा चारा उपलब्ध कराया। कितने अफसोस की बात है कि कभी सावन-भादों में जिधर नजर दौड़ाइए, हम सबको हरा ही हरा दिखता था, लेकिन आज हरियाली या तो कोठियों में कैद है या फिर घिरे हुए फार्म हाउसों में। बाकी तो हरियाली कहीं दिखती नहीं है।’
इतना कहकर सभापति महोदय सांस लेने के लिए रुके और बोले, ‘आज सुबह मैं दिल्ली की सड़कों पर घूम रहा था, तो पाया कि हमारे कई भाई कायांतरण कर इंसानी वेश धारण किए कारों में घूम रहे हैं। कोई कोट-पैंट पहने है, तो कोई धोती कुरते में है। कुछ कायांतरित गधे तो देश के राजनीतिक दलों में भी अपनी जगह बना चुके हैं। उनकी स्थिति देखने में मुझे काफी अच्छी लगी। कई तो केंद्र और राज्य सरकारों में सरकारी अफसर बने बैठे हैं। सरकार और जनता को चरे जा रहे हैं। इससे मुझे लगा कि इस देश में चारागाह की समस्या कतई नहीं है। बस थोड़ी सी अकल दौड़ाने की जरूरत है। अगर हम लोग पूरे देश को चारागाह समझ ले, तो फिर हमारे सामने चारे की समस्या कहां रहेगी। इसलिए सबसे पहला काम यह करें कि आप लोग अपना कायांतरण करें और इंसान का रूप धारण कर जहां मौका मिले, घुस जाएं। संसद, विधानसभाओं, बड़ी-बड़ी देशी-विदेशी कंपनियों में जब, जहां और जैसे भी मौका मिले, बड़े-बड़े पद हथियाएं। अपने भाइयों को प्रमोट करें। खुद जी भर कर चरें और बाकी साथियों को भी चरने का मौका दें।’
सभापति महोदय के इतना कहते ही सारे गधे एक बार फिर ‘ढेंचू-ढेंचू’ कहकर चिल्लाए और लयात्मक ढंग से दुलत्ती झाड़ने लगे। सभापति ने उन्हें शांत रहने का इशारा करते हुए थोड़ी-सी घास उठाई और चबाने लगे। खूब चबाकर खाने के बाद उन्होंने फिर कहना शुरू किया, ‘लेकिन भाइयों, आप लोगों को मैं अभी से आगाह कर दूं। कायांतरण के बाद आपमें कुछ इंसानी बुराइयां भी आ सकती हैं। जिस थाली में खाता है, इंसान उसी थाली में छेद करता है। उसके लिए बहन, बेटी, बीवी जैसे शब्द अब कोई मायने नहीं रखते। वह उनकी बेकद्री करता रहता है, हमें इंसानों की इसी प्रवृत्ति से बचकर रहना है। हम देश को चारागाह तो समझें, लेकिन उसे बेच खाने की कभी न सोचें।’ सभापति के इतना कहते ही सारे गधे ‘ढेंचू-ढेंचू’ कहकर लयात्मक ढंग से दुलत्तियां झाड़ने लगे। सभापति ने उन्हें शांत होने का इशारा किया, लेकिन उनकी दुलत्तियां जारी रहीं। नतीजा यह हुआ कि कई गधों को दिल्ली के अस्पतालों में भर्ती कराना पड़ा। वैसे उनका यह सम्मेलन अभी जारी है। सम्मेलन के निष्कर्ष का इंतजार मुझे भी है और आपको भी होगा ही।


Tuesday, January 15, 2013

काव्य का नया सौंदर्यशास्त्र


-अशोक मिश्र

उस्ताद मुजरिम घर पर पधारे, तब मैं कविता का नया सौंदर्यशास्त्र लिख रहा था। उस्ताद मुजरिम ने चरणस्पर्श करने पर एक लंबा आशीर्वाद देने के बाद पूछा, ‘क्या लिख रहे हो, बरखुरदार!’ मैंने उत्साहित होकर बताया, ‘उस्ताद! काव्य का नया सौंदर्यशास्त्र रच रहा हूं। सदियों पुराना सौंदर्यशास्त्र पढ़-सुनकर लोग पक चुके हैं। वही नवोढ़ा नायिका, वही स्वकीया...परकीया का चक्कर। अरे भाई, कब तक हजारों साल पुराने प्रतिमान, बिंब-प्रतिबिंब को रोते रहोगे। अब जमाना बदल चुका है, फेसबुक और मोबाइल के जमाने में उत्कठिंता, अभिसारिका, मुग्धा, प्रगल्भा, ऊढ़ा, अनूढ़ा, रक्ता, विरक्ता नायिकाएं खोजते-फिरोगे, तो कौन पढ़ेगा या सुनेगा तुम्हारी कविताएं। यही वजह है कि आजकल कवि और प्रकाशक सिर पर हाथ रखकर जार-जार रो रहे हैं, माथा पीट रहे हैं, ‘कविताओं के अब पाठक नहीं रहे।’ अरे भाई! आज जब न्यूनतम वस्त्रों वाली नायिकाएं सौंदर्य के नए-नए प्रतिमान गढ़ रही हों, सौंदर्य का आधार ‘सब कुछ छिपाना नहीं, सब कुछ दिखाना’ रह गया हो, उस जमाने में नख से शिख तक सौलह गजी साड़ी में गुंठित-अवगुंठित नायिका को काव्य का आधार बनाओगे, तो किस रस की निष्पत्ति होगी? विरक्ति का भाव ही न उपजेगा मन में!’
मेरी बात सुनकर उस्ताद मुजरिम खिलखिलाकर काफी देर तक हंसते रहे। फिर गंभीर होकर उन्होंने नाक से ‘हूंऊ...’ की गहरी आवाज निकाली और बोले, ‘तो तुम नया नायिका भेद रच रहे हो?’ मैंने तपाक से उत्तर दिया, ‘हां उस्ताद! जिस दिन मैं अपने इस दुरूह कार्य को संपादित कर लूंगा, उस दिन कविता के क्षेत्र में क्रांति हो जाएगी। भरतमुनि, रुद्रभट्ट जैसे आचार्यों की तरह मैं भी आचार्य कहा जाऊंगा। आधुनिक काव्य में मेरी अमरता तो सुनिश्चित है। मेरा नायिका भेद स्कूल, कॉलेजों और महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाएगा। आप देखना एक दिन...।’ मेरी बात सुनकर उस्ताद एक बार फिर हंस पड़े। बोले, ‘कुछ मुझे भी सुनाओ तुमने क्या लिखा है।’ मैंने अपने चारों ओर बिखरे कागज-पत्रों को समेटने के बाद उन्हें बताया। मैंने चार तरह के नायिकाओं को ही मान्यता दी है। मेरी पहली नायिका है, फेसबुकिया। इसके भी दो उपभेद हैं, स्वकीया और परकीया। ‘स्वकीया फेसबुकिया’ नायिका वह है, जो अपने फ्रेंड सर्किल की होती है। यह नायक की गर्लफ्रेंड भी हो सकती है, वाइफ भी। इन पर नायक (यानि ब्वायफ्रेंड) का पूर्ण अधिकार होता है। वह जो कुछ भी ‘पोस्ट’ करता है, नायिका उसे ‘लाइक’ करने को मजबूर होती है। गर्लफ्रेंड की सहेली, उसकी भाभी, उसकी सिस्टर या फिर किसी फ्रेंड की गर्लफ्रेंड और उसके अन्य रिश्तेदारिनें ‘परकीया फेसबुकिया’ नायिका की कोटि में आती हैं। परकीया फेसबुकिया नायिका के दो उपभेद हैं, ‘शंका नायिका’, ‘आशंका नायिका’। ‘शंका नायिका’ वह है जिसे नायक की पत्नी, बच्चे, मां-बाप और भाई-बहनें प्रेमिका होने की शंका के चलते उसके फेसबुक एकाउंट को ‘स्पैम’ करने का दबाव डालते हैं। प्रेमिका होने का प्रमाण मिल जाने पर नायक के परिजन जिस नायिका के फेसबुक एकाउंट को नायक के फेसबुक एकाउंट से डिलीट करा देते हैं, वह आशंका नायिका कहलाती है।’
इतना कहकर मैंने उस्ताद मुजरिम की ओर देखा। वह बड़े गौर से मेरी बात को सुन रहे थे। उन्होंने मुझे अपनी बात जारी रखने का संकेत किया। मैंने आगे कहा, ‘उस्ताद! फेसबुकिया नायिका की चार कोटियां (किस्में) होती हैं। पोस्टा, शेयरा, कमेंटा और लाइका।’ ऐसी नायिकाएं, जो आए दिन कोई न कोई सामग्री पोस्ट करती रहती हैं, वे पोस्टा कहलाती हैं। ये स्वकीया और परकीया दोनों हो सकती हैं। कुछ स्वकीया और परकीया नायिकाएं अपनी प्रतिनायिकाओं (ब्वायफ्रेंड की अन्य सहेलियों/प्रेमिकाओं) को जलाने के लिए नायक की पोस्ट की गई सामग्री को शेयर कर लेती हैं, तो वे शेयरा नायिका में तब्दील हो जाती हैं। ठीक इसी तरह कमेंटा नायिकाएं होती हैं। शेयरा और कमेंटा नायिका में मामूली-सा फर्क होता है। ऐसी कोटि की नायिका नायक की पोस्ट पर कमेंट करके सारी दुनिया को यह जताने की कोशिश करती है कि फिलहाल उसके ही अपर चैंबर में दिमाग है, बाकी सबके खाली हैं। प्राचीनकाल के काव्य सौंदर्यशास्त्र में दूतिका, परिचारिका (नौकरानी) और नर्म सचिव (बचपन की सहेली) को काफी महत्व दिया गया है। हिंदी और संस्कृत साहित्य में ये नायक-नायिकाओं का दिल बहलाने का काम करते पाए जाते हैं। आधुनिक सौंदर्यशास्त्र में दूतिकाओं, परिचारिकाओं और नर्म सचिवों का काम करने वाली नायिकाओं को लाइका नायिका की श्रेणी में रखा जा सकता है। ये नायक या नायिका की पोस्ट को ‘लाइक’ करके उन्हें संदेश देते हैं, ‘लगे रहो मुन्नाभाई/लगी रहो मुन्नीबाई, हम तुम्हारे साथ हैं।’ इतना कहकर मैंने अपना कागज एकतरफ रखकर उस्ताद मुजरिम की ओर देखा। वे मुस्कुरा रहे थे। उन्होंने मेरे सिर पर आशीर्वाद भरा हाथ फेरते हुए कहा, ‘तुम धन्य हो, तुम्हारी प्रतिभा धन्य है।’ इतना कहकर वे अपने घर चले गए।

वन डे क्रिकेट मैच और ग्रामीण दर्शक


-अशोक मिश्र

भारत-पाकिस्तान के बीच वनडे क्रिकेट मैच चल रहा था। पाकिस्तान की टीम ढाई सौ रन बनाकर आउट हो चुकी थी। पाकिस्तान अपनी फील्डिंग सजा चुका था, तभी पवेलियन छोर से ओपनर बल्लेबाज गौतम गंभीर और वीरेंद्र सहवाग आते दिखाई दिए। गुलरिहा गांव में सत्तन पांडेय के आंगन में मैच देखने को जमा हुए लोगों ने ‘होओ...’ की आवाज करके दोनों खिलाड़ियों का स्वागत किया। इस पर सत्तन पांडेय ने युवाओं को डांटते हुए कहा, ‘तनि चुप्पै बैठो। मैचवा शुरू तौ होय देओ।’ सारे लोग चुप हो गए।
साठ वर्षीय अमेरिका तिवारी से रहा नहीं गया, ‘आई गए भारत के आल्हा-ऊदल। अब्बै देखो, चउवा-छक्का मार कै पाकिस्तानियन का धुन कै रख देइहैं।’ अमेरिका की बात सुनकर लड़के मुंह दबाकर खिखियाए, तो सत्तन पांडेय गरज उठे, ‘सभै आपन-आपन चोंच बंद रक्खो, नाहिं तो टीविया बंद कर देबौ। तब का घंटा मैचवा देखबौ।’ तभी खेल शुरू हो गया, सारे लोग शांत होकर मैच देखने लगे। पाकिस्तानी बॉलर और फील्डर भारतीय बल्लेबाजों पर कहर बरपा रहे थे। पांच ओवर तक पहुंचते-पहुंचते सिर्फ सत्रह रन ही बन पाए थे। तभी सहवाग ने मोहम्मद हफीज की बॉल को थर्ड मैन की दिशा में ढकेला और रन लेने के लिए दौड़े, गंभीर ने उन्हें रुकने का इशारा किया। राम बरन से रहा नहीं गया, ‘ई ससुरे! ठुठुर-ठुकुर करि रहे हैं पौन घंटा से। अबहीं तक कुल सतरह रन बनाय कै अपने को योद्धा समझि रहे हैं। अरे, इनसे अच्छा तौ रमेसवा कै लड़किवा खेलत है। ऊ तौ एक्कै बॉल मा सात-आठ रन बनाए बिना मनतै नाही है।’
तभी सुखमनी पांडेय बोल उठे, ‘राम बरन भइया! सठियाय गए हौ का। एक बॉल मा सात-आठ रन कैइसै बनि जाई।’ राम बरन ने ‘रन अर्थशास्त्र’ समझाया, ‘तू हमका बुड़बक समझे हो का? जौने बॉल पर वह छक्का मारत है, उस बॉल को इंपायर ‘वाइट’ बॉल बताइ देत है। होइ गवा न, सात रन...। अब एक बॉल मां का लड़िका कै जान लेबौ? ई सहबागवा और गंभीरवा से तौ अच्छा खेलत है रमेसवा कै लड़िका।’ दोनों के बात करने से सत्तन पांडेय फिर नाराज हो उठे, ‘अगर तू सबै इतनै गियानी हौ, तो काहे नाहीं चले जात हौ इंपायरी करने। हिंया काहे घास खोदत हौ। चुप्पै रहो, नाहीं तौ टीविया बंद कैइके हम चद्दर तानि कै सोइ जाब। तब बैठि कै घुंइया छीलेओ।’ तभी गंभीर ने जुनैद खान की गेंद पर चौका लगाया, स्टेडियम और सत्तन पांडेय के घर में जमा दर्शकों ने जोर की हर्ष ध्वनि की। सत्तन सहित सबका ध्यान खेल पर चला गया। मैच आगे बढ़ता रहा। सत्तर रन पर भारतीय टीम के तीन पुरोधा पवैलियन लौट चुके थे। इस बीच सत्तन पांडेय के आंगन में जमा ज्यादातर दर्शक खैनी बनाकर मुंह में दबा चुके थे।
भूखन ने कहा, ‘सुखमनी भाई! ई बताओ। ई महेंद्र सिंघवा अपने नाम के साथ धोनी काहे लगावत है?’ इस पर श्याम बोल उठा, ‘जब महेंद्र सिंघवा खेलब सुरू किहिस रहा, तबै उसने पाकिस्तानी टीम को ऐसै धोय दिहिस रहा, जैसन कउनौ धोबी कपड़ा धोवत है, तबही से वोहकर नाम धोनी पड़ि गवा रहै। ऊ साल तौ धोनिया आसटरैलिया, कनाडा, अमेरिका, रूस और इंगलैंड की टीमन का बखिया उधेड़ दिहिस रहा। बड़ा जबर खिलाड़ी है महेंद्र सिंघवा।’ तब तक मैच आगे बढ़ चुका था। एक सौ बाइस रन पर भारत के छह खिलाड़ी आउट होकर जा चुके थे। धोनी और आर. अश्विन जमे हुए थे। दोनों खिलाड़ी एक-एक रन लेकर दबाव कम करने की कोशिश कर रहे थे। सिर्फ पंद्रह ओवर ही बचे थे। एक बॉल पर धोनी ने बल्ला अड़ाया और रन लेने को दौड़े, लेकिन फिर लौट आए। सत्तन पांडेय के आंगन में बैठे ‘छोटो बिलऊ’ चीख पड़े, ‘भाग धोनिया..भाग..कम से कम एक रन तौ लैइले..।’ ‘कैइसे लैइलें...अकमलवा बिकेटवै पर ही खड़ा है। झट से चांप नहीं देगा। बिकेट कै गुल्लियै उड़ि जाई। रन लैइहैं का घंटा? अकमलवा तौ पूरा ससुर कै नाती हइ। एक्कौ मौका नाहिं छोड़त है आउट करै कै।’ तभी सुरेश रैना ने शोएब मलिक की बॉल पर चौका लगाया। उधर बिजली गुल। सबके दिल धक्क से रह गए। सत्तन पांडेय मन मसोस कर रह गए। दर्शक वापस जाने लगे। जाते-जाते भूखन ने कहा, ‘ई बिजुरी विभाग वालेन का सम्मै माता (समय माता, एक स्थानीय देवी) उठाय लइ जाय, यही बखत बिजुरी काटै का रहा। तनिक देर अऊर नहीं रुकि सकत रहै।’ सारे दर्शक उठकर अपने-अपने घर चले गए।

Tuesday, December 25, 2012

आ रही है 'योजना'


अशोक मिश्र
मैं लखनऊ  के प्रसिद्ध ‘सर चिरकुटानंद प्रतिभावल्लभ स्मृति पुस्तकालय’ में दैनिक समाचारपत्र ‘अधिंयारे में प्रकाश’ की पुरानी प्रतियां उलट-पलट रहा था। उसी दौरान सन् 1952 में प्रकाशित एक व्यंग्य पर मेरी निगाह गई, जिसे किसी ऐसे शख्स ने लिखा था, जिसका तखल्लुस ‘खुरपेंची’ था। दरअसल, उस पुरानी और रखे-रखे धूमिल पड़ गई प्रति में व्यंग्यकार का सिर्फ तखल्लुस ही पढ़ने में आ रहा था। वह व्यंग्य मुझे आज आजादी के साढ़े छह दशक बाद भी प्रासंगिक लगा, तो आपके सामने यथावत पेश करने का दुस्साहस कर रहा हूं। कुकुरभुकवा गांव के बाहर की पगडंडी पर पूरा गांव जमा था। स्त्री-पुरुष, बच्चे, जवान और बूढ़े सबकी निगाहें सड़क से निकलकर गांव तक आने वाली पगडंडी पर लगी हुई थीं। बच्चे जहां पगडंडी के किनारे के खेतों में खेलने में मशगूल थे, तो घूंघट में छिपी औरतें झुंड बनाकर अपनी दुनिया में मस्त थीं। उस भीड़ में शामिल साठ वर्षीय भुलुई प्रसाद ने तंबाकू को चूने से रगड़ने के बाद होंठों के बीच दबाते हुए कहा, ‘देखो! वह आए, तो सबसे पहले बच्चे लपककर उसके पैर छुएंगे। उसके बाद अपनी उम्र और पद के हिसाब से गांव की बहुएं पांव छुएंगी।’ यह सुनते ही भुलुई की भौजाई ने ठिठोली की, ‘और तुम क्या करोगे, भुलुई?’ गांव की जवान भौजाइयों से रस लेकर बतियाने वाले भुलुई इस मौके पर कहां चूकने वाले थे, ‘जैसे ही वह आएगी, सब उसकी ओर निहारने लगेंगे। सबकी और भइया की निगाह बचाकर मैं तुम्हें निहारने लगूंगा। निहारने दोगी न भौजाई?’ द्विअर्थी संवाद में माहिर भुलुई ने झट से नहले पर दहला जड़ दिया। भुलुई की बात सुनकर भौजाई के दूसरे देवर ठहाका लगाकर हंस पड़े। भौजाई भी कहां चूकने वाली थीं! उन्होंने तपाक से कहा, ‘भुलुई, तुम मुझे नहीं, बचना (भुलुई के बेटे) की महतारी को निहारना। कहीं ऐसा न हो कि तुम भौजाइयों के फेर में पड़ो और बचना की महतारी को उसका कोई देवर ले उड़े। बचना की महतारी के देवर कम छबीले नहीं हैं। भौजाई तो हाथ आने वाली नहीं है, लुगाई से भी हाथ धो बैठो।’
खिसियाए भुलुई दूसरी ओर सरक गए। भुलुई की बुआ, काकी, बहन या ताई लगने वाली औरतें खिलखिलाकर हंस पड़ी। कुछ बुजुर्ग औरतों ने भुलुई की भौजाई को मीठी झिड़की भी दी। काफी देर से कुछ बोलने को कुनमुना रहे कंधई से आखिर रहा नहीं गया, ‘बप्पा! वह कैसी है? उसको आपने कभी देखा है? तिक्कर काका बता रहे थे कि अभी कमसिन उमर है उसकी?’ पिछले चार-पांच घंटे से इंतजार में बैठे-बैठे ऊब चुके गोबरधन (गोवर्धन) ने झुंझलाते हुए कहा, ‘तुम्हारी छोटकी मौसी जैसी है वह। जा भाग ससुर के नाती! नहीं तो दूंगा कान के नीचे एक कंटाप, मुंह झांवर हो जाएगा। जवाहिरा भी न जाने किस मुसीबत में फंसा दिया हम सबको। अरे! भेजना ही था, तो भेज देता। यह क्या कि पूरी दुनिया में ढिंढोरा पीट दिया।’ उस भीड़ में शामिल कुछ और लोग भी अब इंतजार करते-करते थक चुके थे, उन्होंने भी गोबरधन की बात पर ‘हां में हां’ मिलाना अपना पुनीत कर्तव्य समझा। कुछ लोग इंतजार करते-करते थक चुके थे और वे घर वापसी की सोच ही रहे थे कि तभी उन्हें दूर पगडंडी पर सुर्ख लाल कपड़ों में लिपटी एक महिला और उसके आगे-आगे एक पुरुष आता दिखाई पड़ा, तो उत्साहित होकर चिल्ला पड़े। एक बुजुर्ग ने गौर से देखते हुए कहा, ‘लगता है, जवाहिरा खुद लेकर आ रहा है।’ लोग टकटकी लगाए देखते रहे। उस जोड़े के नजदीक आते ही छबीली की माई चिल्ला पड़ी, ‘अरे यह तो खुरपेंचिया और उसकी मेहरिया है। अपनी ससुराल वह कल अपनी मेहरिया को विदा कराने गया था।’
गांव के बाहर भीड़ देखकर मैं (पाठक ध्यान दें, यह मुझे नहीं, बल्कि खुरपेंची समझकर पढ़ें) भौंचक्का रह गया। मैंने गांव के बुजुर्गों को प्रणाम करते हुए कहा, ‘अरे! आप लोग यहां...?’  गोबरधन ने झुंझलाते हुए कहा, ‘कल रेडियो पर जवाहिरा बोला था कि लोगों की गरीबी और भुखमरी मिटाने के लिए गांव-गांव योजना भेजी जा रही है। तो हम लोग सुबह से ही यहां पगडंडी पर योजना का इंतजार कर रहे हैं।’ गोवरधन काका की बात सुनते ही मेरी हंसी छूट गई। मैं पेट पकड़कर ठहाका लगाकर हंस पड़ा, ‘आप लोग भी कितने भोले हैं। अरे, ऐसी योजना को आते-आते अभी कई साल लगेंगे। और फिर योजना कोई मर्द या औरत तो है नहीं कि उसका आप लोग यहां खड़े होकर इंतजार करें। आप लोग घर जाइए, जब योजना आएगी, तो आपको पता लग जाएगा।’ तब से आज  तक उस गांव के लोगों को योजना का इंतजार है।

Sunday, December 16, 2012

समधन का अचार

अशोक मिश्र 


सुबह उठकर श्रीवास्तव जी ने अंगड़ाई ली, तो मैंने चुटकी लेते हुए कहा, ‘भाई साहब! आपकी अंगड़ाई लेने की अदा देखकर मुझे एक शेर याद आ रहा है, अगर इजाजत हो, तो पेश करूं।’ श्रीवास्तव जी ने मुझे पहले तो घूरकर देखा। उनके घूरते ही मैं सकपका गया। मुझे सकपकाते देखकर उन्होंने दरियादिली दिखाई और किसी शहंशाह की तरह बोले, ‘अब जब दिमाग में आ ही गया है, तो सुना भी डालो।’ उनकी इस दरियादिली पर मैं खुश हो गया। मैंने अर्ज किया, ‘उनसे छींके से कोई चीज उतरवाई है/काम का काम है, अंगड़ाई की अंगड़ाई है।’ मेरे इतना कहते ही वे कविवर बिहारी लाल के किसी परकीया नायक की तरह शर्मा गए और बोले, ‘मैं एक बात बताऊं। जब मैं गोरखपुर यूनिवर्सिटी में पढ़ता था, तो मैं कई लड़कियों को अपनी अंगड़ाई से बेहोश कर चुका हूं। मेरी अंगड़ाइयों के बारे में लड़कियां शेर कहा करती थीं, ‘कहां पे बर्क (बिजली) चमकती है ऐ सानिया देख!\कोई मरदूद हॉस्टल के आस-पास अंगड़ाइयां लेता है।’ और यह कहते-कहते श्रीवास्तव जी खिलखिलाकर हंस पड़े। तभी रामभूल ने किचन से निकल कर कहा, ‘सर जी! भोजन तैयार हो गया है, तैयार हो जाइए।’
रामभूल की बात सुनकर हम दोनों अपने दैनिक कार्यों में संलग्न हो गए। मेरे बाथरूम से निकलते ही श्रीवास्तव जी ने सर्दी भगाने के लिए हाथ-पैरों को इधर-उधर फेंकते हुए बाबा रामदेव जैसी मुद्रा अख्तियार की और लगे नृत्यासन करने। इस पर भी ठंड से जकड़े हाथ-पैरों में गर्मी नहीं आई, तो उन्होंने ठुमका लगाते हुए द्रुत गति के विलंबित ताल में आलाप भरा, ‘समधन तेरी घोड़ी चने के खेत में...।’ और लगे नृत्य करने। मैंने कहा, ‘भाई साहब, जरा ध्यान से हिलोरें लें, कहीं बुढ़ापे में कमर लचक गई, तो मुश्किल होगी।’ श्रीवास्तव जी ने फिर मुझे घूरा, लेकिन मैं तब तक भागकर दूसरे कमरे में चला गया था। बाथरूम से श्रीवास्तव जी के गाने की अब आवाज आ रही थी, ‘ठंडे-ठंडे पानी में नहाना चाहिए...।’पूजा-पाठ का संक्षिप्त कार्यक्रम निबटाने के बाद जब श्रीवास्तव जी खाने को बैठे, तो उन्होंने रामभूल को हुक्म दिया, ‘सुनो! वह अचार का डिब्बा उठाकर लाना। बहुत दिन हुए अचार नहीं खाया है। आज अचार खाने का मन हो रहा है।’ रामभूल ने अचार का डिब्बा उठाया, लेकिन इसे संयोग कहें या दुर्योग, वह डिब्बा हाथ से छूटा और ‘पट्ट’ की आवाज करता हुआ जमीन पर आ गिरा। गटापारचे (प्लास्टिक) के डिब्बे का ढक्कन संयोग से नहीं खुला था, इसलिए अचार जमीन पर गिरने से बच गया था। अचार के डिब्बे को जमीन पर गिरा देखकर श्रीवास्तव जी कलप उठे, ‘हाय! यह तूने क्या कर डाला। नामुराद! तेरी आंखें क्या घास चरने चली गई हैं, तेरे हाथों में जान नहीं है क्या? ठीक से नहीं पकड़ सकता था अचार का डिब्बा।
तेरे हाथ से सब्जी से भरी कड़ाही गिर जाती, तो मुझे इतना दुख नहीं होता। कमअक्ल तूने अचार का डिब्बा गिरा दिया।’ श्रीवास्तव जी की बात सुनकर मैं भी भौंचक रह गया। बात-बात पर हंसने-खिलखिलाने और अपनी विनोदप्रियता के लिए विख्यात श्रीवास्तव जी का यह रूप अप्रत्याशित था। डिब्बे के गिरने और डांट खाने से रुंआसा रामभूल चुपचाप आकर खाना खाने लगा। उससे ज्यादा खाया नहीं गया और वह थोड़ा बहुत खाकर उठ गया। थोड़ी देर बाद श्रीवास्तव जी किसी काम से घर से निकल गए, तो रामभूल ने मुझसे पूछा, ‘भाई जी! मान लीजिए, अचार का डिब्बा हाथ से छूट ही गया था, तो श्रीवास्तव जी इस मामूली बात पर इतने नाराज क्यों हो उठे थे?’ मैंने मुस्कुराते हुए कहा, ‘तुम नहीं समझोगे। दरअसल, अचार का जो डिब्बा तुम्हारे हाथ से छूटकर गिरा था, वह अचार उनकी समधन ने भिजवाया था। जब यह अचार लाए थे, तो वे इस डिब्बे को मुझे भी नहीं छूने देते थे। बहुत थोड़ा-सा अचार निकालकर दो भागों में बांटकर एक अपने लिए रखकर दूसरा मुझे दे देते थे। एक दिन मैंने थोड़ा बड़ा टुकड़ा ले लिया, तो वे बिगड़ पड़े थे, ‘सारा एक ही दिन में खा जाओगे। जानते हो, इसे मेरी समधन ने कितने प्यार से बनाकर भेजा है। इसमें समाए समधन के प्यार की नमकीनियत तुम जैसा हृदयहीन व्यक्ति क्या समझ सकता है। यह तो मुझसे पूछो, जो उस चुलबुली समधन को दिन में चार बार याद करता है।’
जानते हो, दिन में कई बार किचन में जाकर अपने तौलिये या रुमाल से अचार के डिब्बे पर जमी धूल को बड़े प्यार से झाड़ते हैं। उस डिब्बे को बड़े प्यार से सहलाते हैं। एक मजेदार बात बताऊं। सवा साल पहले भूल से श्रीवास्तव जी की बेल्ट उनकी साली के पर्स में और उनकी साली का टैल्क पाउडर उनके बैग में रह गया। दिल्ली आने पर उन्हें इस बात का पता चला। तब से वे उस पॉवडर के डिब्बे को अपने बैग में छिपाकर रखते हैं और उनकी बेल्ट उनकी साली जी लगा रही हैं। यह बुढ़ापे का प्रेम ऐसा ही होता है। तुम उनकी बात का बुरा मत मानना।’ मेरी बात सुनकर रामभूल चुपचाप अपने काम में लग गया।

Thursday, December 6, 2012

कौन है ‘आम’ आदमी?

अशोक मिश्र 

कल आफिस में बैठा खबरों की कतरब्योंत कर रहा था कि संपादक जी का बुलावा आया। उनके पास पहुंचा, तो उन्होंने तालिबानी फरमान सुनाते हुए कहा, ‘केजरीवाल की आम आदमी पार्टी पर एक राइटअप जा रहा है। मुझे चार ‘आम’ आदमियों की बाइट्स चाहिए। फटाफट यहां से फूटो और शाम तक अपना काम पूरा करके वैसे ही हवा पर सवार होकर वापस आओ, जैसे हनुमान जी किष्किंधा पर्वत से संजीवनी बूटी लेकर वापस आए थे। और सुनो! ये चारों आम ही होने चाहिए, खास नहीं।ह्ण संपादक जी का आदेश सिर माथे पर रखकर मैं ‘आम आदमी’ खोजने निकला। कई लोगों से पूछा, सबने बस एक ही बात कही, ‘देश की सवा सौ करोड़ आबादी में से सिर्फ पांच फीसदी खास आदमी हैं, बाकी तो सब आम ही हैं। आम आदमी तो सब जगह पाए जाते हैं।’ मैंने उस आदमी से पूछा, ‘तो क्या तुम भी आम आदमी हो?’ उसने कहा, ‘नहीं, मैं तो ‘फ्राड एंड फ्राड संस’ में सीनियर क्लर्क हूं। मैं आम आदमी कैसे हो सकता हूं?’ उस सीनियर क्लर्क से मैंने पूछा, ‘यह कमबख्त आम आदमी मुझे मिलेगा कहां? उसकी कोई पहचान तो होगी, उसका कोई रंग-रूप, कद-काठी...कुछ तो होगा यार...।’ वह सीनियर क्लर्क मेरी बात सुनकर पहले तो खूब हंसा और फिर यह कहते हुए अपनी राह चला गया, ‘भगवान का ही दूसरा रूप है आम आदमी। जिस तरह भगवान सब जगह हैं, सबमें हैं, वे घर में भी हैं, श्मशान में भी। वह हिंदू में हैं, मुसलमान में भी...ठीक उसी तरह आम आदमी है। सब जगह है, लेकिन कहीं नहीं है।’ मैंने उस आदमी को सनकी समझकर अपने कंधे उचकाए और आम आदमी की तलाश में आगे बढ़ गया।

आम आदमी को खोजते-खोजते शाम हो गई, लेकिन वह नामाकूल कहीं नहीं मिला। थकहार कर मैंने घर का रास्ता पकड़ा, रास्ते में छबीली अपने दरवाजे पर खड़ी मिल गई। मैंने उससे पूछा, ‘तुम आम आदमी हो?’ उसने अपनी चोटी को पकड़कर सीने की ओर लहराते हुए इठलाकर कहा, ‘तुममें सामान्य ज्ञान की बहुत कमी है। मैं आम या खास किसी भी तरह की आदमी नहीं हो सकती हूं। हां, मैं ‘आम महिला’ हो सकती हूं।’ मैं हड़बड़ा गया, ‘अरे...उस अर्थ में मैंने नहीं पूछा था। मेरा मतलब है कि तुम कॉमन मैन हो?’ वह इस बार भी मुस्कुराई और बोली, ‘अर्ज किया है कि मैं कॉमन वीमेन हो सकती हूं, कॉमन मैन नहीं।’ बार-बार उपहास उड़ाए जाने और कार्य में असफल रहने से खिन्न होकर मैंने कहा, ‘मुझे माफ करो, मैंने गलत दरवाजा खटखटा लिया है।’ इतना कहकर मैं जैसे ही आगे बढ़ा, छबीली ने कहा, ‘सुनिए, मैं आपकी ‘वो’ हूं, अपने बच्चों की मां हूं, लेकिन आम आदमी नहीं हूं।’ घर पहुंचा, तो काफी निराश था। मेरी दशा-दुर्दशा देखकर बीवी घबरा गई। उसने मुझसे परेशानी पूछी, तो मैंने झल्लाते हुए कहा, ‘यार! सारे देश में हल्ला हो रहा है आम आदमी का और दोपहर से ढूंढ रहा हूं इस नासपीटे ‘आम’ आदमी को। पता नहीं किस गली-कूंचे में रहता है यह मुआ।’ मेरी बीवी ने चाय का प्याला पकड़ाते हुए कहा, ‘बस..इतनी सी बात है? कल सुबह आपको एक आम आदमी से जरूर मिलवा दूंगी। निश्चिंत होकर बैठिए।’

अगले दिन सुबह जब बेटी तैयार होकर स्कूल जाने लगी, तो मेरी पत्नी ने जगाते हुए कहा, ‘एक आम आदमी आने वाला है। बाहर जाकर मिल लो।’ दरवाजे पर मेरी बेटी को स्कूल पहुंचाने वाला रिक्शाचालक खड़ा था। मैंने उससे पूछा, ‘तुम आम आदमी हो?’ मेरे पूछने पर वह घबड़ा गया, ‘ना बाबू! हम कइसे आम आदमी होय सकित है। हमार ऐसन भाग कहां? हम तौ कमरुद्दीन हूं, बच्चन (बच्चों) का इस्कूल पहुंचाइत हय। हमका आम आदमी से का लेना-देना है।’ मैंने बीवी की ओर सवालिया निगाहों से घूरा और कहा, ‘यही है तुम्हारा आम आदमी? कल से अब तक जो समझ पाया हूं, इस देश में हिंदू बसते हैं, मुसलमान, ईसाई, यहूदी, सिख बसते हैं। अधिकारी-कर्मचारी, बेरोजगार-बारोजगार, अच्छे-बुरे रहते हैं, लेकिन आम आदमी कहीं नहीं पाया जाता है। खामुख्वाह, लोग आम आदमी के पीछे पड़े रहते हैं।’ दस बजे जब आफिस पहुंचा, तो संपादक जी के पास जाकर मैंने कहा, ‘सर! इस देश में आम आदमी नहीं पाया जाता। हां, अगर पाकिस्तान से घुसपैठ करके आया हो, मैं नहीं कह सकता। सीबीआई, आईबी, रॉ या आप जहां कहें, वहां आम आदमी के संबंध में आरटीआई लगा दूं। सरकार खोजकर बता देगी, यह कमबख्त आम आदमी कहां पाया जाता है।’ इतना कहकर मैं उनके चैंबर से बाहर आ गया। सुना है, मेरी बात सुनकर वे काफी देर तक अपना सिर पकड़कर बैठे रहे।