Wednesday, April 22, 2026

संभलिए, मुट्ठी में फंसी रेत की तरह फिसल रहा समय

संजय मग्गू

अक्सर बातचीत के दौरान लोग यह बात दोहराते हैं कि पुरुष बली नहिं होत है, समय होत बलवान। सचमुच समय बलवान भी है और कीमती भी। समय अगर एक बार अतीत बन गया, तो फिर वह कभी वर्तमान नहीं बन सकता है। जो बीत गया, सो बीत गया। अक्सर जब लोग अपने चौथेपन की अवस्था में पहुंचते हैं, तो उन्हें इस बात का अफसोस होता है कि उनके पास वैसे तो बहुत कुछ है, लेकिन समय नहीं है। समय की कमी है। पछतावा भी होता है कि समय उनके ही हाथ से यों फिसल गया, जैसे मुट्ठी में दबी रेत धीरे-धीरे फिसल जाती है और पता ही नहीं चलता है कि कब रेत फिसल कर गिर चुकी है और मुट्ठी खाली है। 

अगर हम अपने आसपास नजर दौड़ाएं तो पाएंगे कि लोगों के पास समय बहुत है। लोग ऐसी-ऐसी बातों पर घंटों बहस करते हुए मिल जाएंगे जिससे उनका कोई लेना देना नहीं है। युद्ध में ईरान जीतेगा या अमेरिका, इसी बात को लेकर घंटों बहस करते हुए बिता देंगे,जबकि सच तो यह है कि कोई भी युद्ध जीते, उनका कोई लेना-देना न ईरान से है, न ही अमेरिका या इजरायल से। यह आदत गांव और शहर सब जगह समान रूप से पाई जाती है। गांवों में तो निरर्थक बातों पर बहस के दौरान लाठी-डंडे तक चल जाते हैं। 

भाई से भाई की, पड़ोसी से पड़ोसी की दुश्मनी तक हो जाती है, कारण वही बेकार की बहस। चौथेपन में समय की कमी का रोना रोने वाला इंसान नहीं जानता है कि प्रकृति ने उसे खूब समय दिया था। हम इंसानों को जीने लायक प्रकृति द्वारा दिया गया समय कम नहीं था। केवल कुछ ही जीवों को प्रकृति ने हमसे ज्यादा समय जीने के लिए दिया है, लेकिन हमने उसे व्यर्थ गंवा दिया। समय की चिंता इंसान इसलिए नहीं करता है क्योंकि वह अदृश्य है। मूर्तिमान नहीं है। दिखाई नहीं पड़ता है। 

धन, संपत्ति, महल-अट्टालिकाएं, रुतबा, पद दृश्यमान हैं, इसलिए इंसान सबसे ज्यादा कदर इनकी करता है, लेकिन चूंकि समय दिखाई नहीं देता है, इसलिए उसकी कोई कदर ही नहीं होती है। यही समय की खूबी है। गुजर गए समय को वापस धन, दौलत देकर भी वापस नहीं लाया जा सकता है। अगर इंसान समय को  कंजूसी से खर्च करता, तो शायद उसके पास करने के लिए बहुत सा समय बच गया होता। कहने का मतलब यह है कि समय को तो बीतना ही है। 

लेकिन हमने जो समय व्यर्थ में गंवा दिया, अगर उस समय में हमने कोई सार्थक काम कर लिया होता, तो अफसोस नहीं होता। अपना, अपने परिवार, देश और समाज के लिए अपना समय खर्च कर सकते थे। लेकिन नहीं। यह बात तब समझ में नहीं आती है, जब खूब समय होता है। इंसान को चिंता तब होती है, जब समय का अभाव होता है। ऐसे ही लोगों के लिए कहा गया है कि अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत। अब तो बैठकर बस बिसूरना ही है।

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