Wednesday, April 15, 2026

मजदूरों को मशीन की जगह इंसान समझे सरकार और पूंजीपति


अशोक मिश्र

पिछले कुछ दिनों से वेतन बढ़ोतरी न होने से मजदूरों में असंतोष फैलता जा रहा है। नोएडा में सोमवार को मजदूरों ने साढ़े तीन सौ से अधिक फैक्ट्रियों में तोड़फोड़ की, डेढ़ सौ से अधिक गाड़ियों में आग लगा दी, पुलिस पर पथराव किया। पुलिस को गाड़ियों को पलट दिया गया। इससे एक दिन पहले गुरुग्राम के मानेसर में भी मजदूरों ने हिंसक प्रदर्शन किया था। नोएडा और मानेसर मामले में पुलिस ने काफी संख्या में मजदूरों को गिरफ्तार किया है। 

यह भी जानकारी सामने आ रही है कि कुछ अराजक तत्व मजदूरों की आड़ में फैक्ट्री में आग लगाकर और मैनेजर की हत्या करके माहौल को बिगाड़ना चाहते थे। यह खुलासा ह्वाट्सएप चैट से हुआ है। स्वाभाविक है कि पुलिस ऐसे अराजक लोगों के खिलाफ कार्रवाई कर रही है। सोमवार को फरीदाबाद और पलवल में भी मजदूरों ने प्रदर्शन किया और नेशनल हाईवे को जाम कर दिया। 

दोनों जिलों में संतोषजनक बात यह रही कि मजदूरों ने न तो उत्तेजना फैलाने वाली बात की और न ही माहौल को बिगड़ने दिया। उन्होंने शांतिपूर्वक प्रदर्शन किया और बाद में अधिकारियों के समझाने पर वह प्रदर्शन स्थगित करने के लिए मान भी गए। हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश में होने वाले इन प्रदर्शनों में एक बाद कामन है और वह है मजदूरों की वेतन बढ़ोतरी की मांग। कुछ दिन पहले ही हरियाणा सरकार ने अकुशल, अर्ध कुशल और कुशल मजदूरों  की मजदूरी में 35 प्रतिशत तक बढ़ोतरी की घोषणा की है। 

इसके बाद भी अगर असंगठित क्षेत्र के मजदूरों का असंतोष बढ़ता जा रहा है तो इसका कारण यह है कि सरकार द्वारा घोषित की गई वेतन बढ़ोतरी सरकारी विभागों में तो लागू हो जाती है, लेकिन निजी कंपनियों और फैक्ट्रियों के मालिक उसे लागू नहीं करते हैं। मजदूरों का कहना है कि उन्हें दस-ग्यारह हजार रुपये वेतन दिया जाता है। उनसे बारह घंटे तक काम कराए जाते हैं। ओवरटाइम का पैसा भी नहीं दिया जाता है। महिला कर्मचारियों की सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं होती है, उनके लिए अलग से शौचालय की व्यवस्था नहीं की जाती है। ज्यादातर कंपनियों और फैक्ट्रियों में पीने के पानी की व्यवस्था नहीं होती है। 

असंगठित क्षेत्र के प्रदर्शनकारी मजदूरों को भले ही अभी तात्कालिक रूप से मना लिया गया हो। उग्र प्रदर्शन करने वाले कर्मियों को गिरफ्तार कर लिया गया हो, लेकिन यह आग फिर भड़क सकती है, इसकी पूरी आशंका बनी हुई है। अच्छा तो यह होगा कि कंपनी और फैक्ट्री मालिक अपने यहां काम करने वाले मजदूरों को एक इंसान समझकर व्यवहार करें। उन्हें कम से कम इतना वेतन तो अवश्य दें जिससे उनके परिवार का गुजारा सम्मानजनक ढंग से हो सके। कार्यस्थल पर भी उन्हें वह आवश्यक सुविधाएं मुहैया कराई जाएं जो उनके लिए बहुत जरूरी है। मजदूरों को मशीन की जगह इंसान समझा जाए।

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