बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
अगर मन में सच्ची लगन हो और दूसरों की निराशाजनक बातों पर ध्यान न देने की प्रवृत्ति हो, तो कठिन से कठिन काम किए जा सकते हैं। एक बार की बात है। एक जगह पहाड़ पर चढ़ने की प्रतियोगिता हो रही थी। पहाड़ ऊंचा औ सीधी चढ़ाई वाला था। प्रतियोगिता में भाग लेने वाले लोग काफी संख्या में थे।जब प्रतियोगिता शुरू हुई, तब तक प्रतियोगिता को देखने वालों की बहुत बड़ी भीड़ इकट्ठा हो गई। प्रतियोगिता शुरू होने से पहले ही कुछ लोगों ने कहना शुरू कर दिया कि इस पहाड़ पर चढ़ना, कठिन ही नहीं असंभव है। तभी प्रतियोगिता शुरू हुई। प्रतिभागियों ने पहाड़ पर चढ़ना शुरू किया। कई प्रतिभागी थोड़ी ही देर में पस्त हो गए। वह पहाड़ का चौथाई हिस्सा भी नहीं चढ़ पाए थे।
कुछ लोग आधे रास्ते में ही फिसलकर नीचे आ गए। उन्होंने दोबारा चढ़ना शुरू किया, लेकिन सफलता नहीं मिली। कुछ प्रतिभागी तो ऐसे भी थे, जो लगभग पहाड़ चढ़ चुके थे, लेकिन वह फिर फिसलकर नीचे आ गए। उधर, भीड़ बड़ी जोर-जोर से चिल्लाकर कह रही थी कि प्रयास करना बेकार है। इस सीधी पहाड़ी पर चढ़ना कठिन ही नहीं असंभव है। प्रयास ही मत करो।
लेकिन एक युवक था कि तीन-चार बार विफल होने के बाद भी उसने प्रयास करना बंद नहीं किया था। अंतत: वह पहाड़ चढ़ने में सफल हो गया। लोगों ने उससे पूछा कि तुम कैसे ऊपर चढ़ गए। तभी एक आदमी ने कहा कि उससे क्या पूछते हो, यह तो बहरा है।
उस युवक ने पलटकर जवाब देते हुए कहा कि नकारात्मक बातों को न सुनने के लिए मैं बहरा था, बहरा हूं और बहरा रहूंगा। यदि आप लोगों की बातों को मैंने सुना होता, शायद पहाड़ पर चढ़ नहीं सकता था। यह सुनकर सब चुप रह गए।

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