संजय मग्गूदो दिन से हंगरी में जश्न का माहौल है। हंगरी की सत्ता पर पिछले सोलह साल से काबिज विक्टर आॅर्बन चुनाव हार गए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, इजरायली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू और रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन के प्रिय विक्टर आॅर्बन को उनके ही पुराने साथी पीटर मग्यार ने हरा दिया। अप्रैल में हंगरी में होने वाले चुनाव से पांच दिन पहले अमेरिका के उप राष्ट्रपति जेडी वेंस तो विक्टर आर्बन के चुनाव प्रचार में भी गए थे और विक्टर को जिताने का आह्वान किया था।
जैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्रंप के पक्ष में कहा था, अबकी बार ट्रंप सरकार। विक्टर आर्बन की पराजय बताती है कि जब जनता बदलाव का मूड बना लेती है, तो वह कोई न कोई रास्ता निकाल ही लेती है। पिछले 16 वर्षों में विक्टर ने न्यायपालिका से लेकर मीडिया तक अपने कब्जे में ले लिया था। हंगरी की न्यायपालिका वही बोलती थी जो विक्टर कहते थे या विक्टर के फायदे में होता था। मामला कुछ भी हो विक्टर की पार्टी फिदेस के ही पक्ष में न्यायालय का फैसला होता था।
हंगरी के पीएम विक्टर ने पूरे सिस्टम पर कब्जा कर लिया था। देश की अस्सी फीसदी मीडिया पर विक्टर का कब्जा था। विक्टर के खिलाफ न कोई खबर छपती थी और न ही दिखाई जाती थी। दिन रात मीडिया पर विक्टर वंदना ही गाई जाती थी। उनकी साफ सुथरी छवि बनाने और दिखाने में मीडिया संस्थान एक दूसरे से होड़ लगाते थे। चुनाव आयोग को मजबूर कर दिया था कि वह ऐसे-ऐसे नियम बनाएं जिससे विक्टर और उनकी पार्टी फिदेस को ही फायदा हो। जनता के लिए फिदेस उम्मीदवारों को ही चुनने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं छोड़ा गया था। इस बार छद्म मिश्रित सदस्यीय बहुमत प्रणाली (सूडो मिक्स्ड मेंबर मेजोरिटी सिस्टम) से हुए चुनाव में भी तिस्जा पार्टी को दो तिहाई बहुमत हासिल हुआ है।
विक्टर ने विपक्षी पार्टी तिस्जा के सदस्यों पर मुकदमे दर्ज कराए, उन्हें जेल भेजा। विरोधियों के प्रति अपनी घृणा को व्यक्त करने में उसे तनिक भी संकोच नहीं होता था। हंगरी की जनता में धार्मिक उन्माद पैदा करने के लिए यहां तक कहा गया कि ईसाई धर्म खतरे में है। लेकिन जब जनता बदलाव का मन बना लेती है, तो सारी तरकीबें धरी रह जाती हैं। अपने देश हंगरी को महान बनाने का दावा करने वाले विक्टर को अपनी कुटिलता और कब्जा किए गए पूरे सिस्टम पर बहुत अधिक भरोसा था।
लेकिन जैसे ही हंगरी में बदलाव की आंधी चली और उनका सारा सिस्टम तिनके की तरह उड़ गया। विक्टर की करारी हार ट्रंप, नेतन्याहू और पुतिन जैसे तानाशाह प्रवृत्ति वाले शासकों के गाल पर एक करारे तमाचे के समान है। यह लोग भी अपने देश में अपने आपको सर्वशक्तिमान समझते हैं। इनकी इजाजत के बिना पत्ता तक नहीं हिलता है, लेकिन इन्हें यह याद रखना होगा कि जिस दिन जनता का मूड बदला, इन्हें इतिहास के कूड़ेदान में फेंकने में जनता तनिक भी देर नहीं लगाएगी।

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