अशोक मिश्र
बहुत सारे व्यक्ति ऐसे भी होते हैं जो लक्ष्य तो तय कर लेते हैं, लेकिन उन्हें यह नहीं मालूम होता है कि वह लक्ष्य कैसे हासिल किया जा सकता है। इसके लिए जरूरी होता है कि किसी योग्य व्यक्ति का मार्ग दर्शन मिले। फिर उस व्यक्ति में अपने लक्ष्य के प्रति संकल्प और समर्पण हो, तो वह अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है।यही बात एक संत ने अपने शिष्यों को समझाया था। बात कुछ ऐसी है कि एक दिन एक संत अपने शिष्यों को लक्ष्य के बारे में बता रहे थे। संत के एक शिष्य ने पूछा, गुरुदेव! लक्ष्य को हासिल करने के लिए क्या करना चाहिए। संत ने जवाब दिया कि जिस प्रकार पक्षियों को उड़ने के लिए दो पंख चाहिए. ठीक उसी प्रकार अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए व्यक्ति को संकल्प और समर्पण चाहिए।
शिष्य ने पूछा कि संकल्प या समर्पण में से किसी एक से काम नहीं चल सकता है क्या? तब संत ने कहा कि कल हम इस बात का जवाब देंगे। अगले दिन संत अपने शिष्यों को एक नाव पर बैठ गए। जब पतवार चलाने की बारी आई, तो संत ने कहा कि आज मैं नाव खेता हूं।
उन्हें एक पतवार ली और नाव चलाने लगे। इसका नतीजा यह हुआ कि एक ही पतवार की वजह से नाव वहीं चक्कर काटने लगी। संत के ऐसा करते हुए आधा घंटा बीता, एक घंटा बीता, फिर भी नाव वहीं चक्कर काटती रही। तब एक शिष्य ने कहा कि गुरु जी, एक पतवार से कहीं नाव चलती है? संत ने मुस्कुराते हुए कहा कि तो फिर केवल संकल्प या समर्पण में से किसी एक से लक्ष्य हासिल किया जा सकता है?
शिष्यों की समझ में अब बात आ गई थी कि अगर किसी लक्ष्य को हासिल करना हो, तो उसके लिए संकल्प के साथ-साथ समर्पण की आवश्यकता होती है।

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