भारतीय वन सर्वेक्षण की ताजा द्विवार्षिक रिपोर्ट के अनुसार फरीदाबाद, पलवल और नूंह जिलों में कुल मिलाकर करीब चार फीसदी तक वन क्षेत्र कम हुआ है। यह आंकड़ा किसी भी पर्यावरण प्रेमी के लिए चिंता की बात है। वन क्षेत्र कम होने से अरावली पहाड़ियों के इर्द-गिर्द बसे शहरों का तापमान बढ़ रहा है। रिकार्ड बताते हैं कि फरीदाबाद जिले में कुल 78.43 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र में से 1.08 वर्ग किलोमीटर की कमी आई है। वर्तमान में यहां 25.98 वर्ग किलोमीटर मध्यम घना जंगल और 52.45 वर्ग किलोमीटर खुला जंगल बचा है।
इसी तरह पलवल जिले में भी 0.21 वर्ग किलोमीटर हरियाली कम हुई है। सबसे भयावह स्थिति नूंह जिले की है जहां 108.96 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र में से रिकॉर्ड 4.05 वर्ग किलोमीटर जंगल खत्म हो चुका है। जंगलों के इस तरह सिमटने का सीधा असर शहर की हवा और सेहत पर पड़ना तय है। वन क्षेत्र के घटने का कारण अरावली पहाड़ियों की गोद में बसाए जाने वाले मैरिज होम्स और रिसार्ट भी हैं।
अरावली के जंगलों में काफी बड़े पैमाने पर अवैध निर्माण किया जा रहा है। कुछ महीने पहले सुप्रीमकोर्ट के निर्देश पर स्थानीय निकायों ने अरावली क्षेत्र में अवैध तरीके से बनाए गए रिसॉर्ट और मैरिज होम्स को ढहा दिया गया था। हालांकि इस दौरान भी कुछ रसूखदार लोगों के अवैध निर्माणों को छोड़ देने का आरोप भी लगा था। इसके बावजूद यह सच है कि अरावली क्षेत्र में कंक्रीट का जंगल उगाया जा रहा है।
पर्यावरणविदों का कहना है कि यदि कंक्रीट का जंगल इसी तरह उगता रहा, तो बहुत जल्दी अरावली क्षेत्र का पर्यावरण प्रभावित होगा। यदि वन क्षेत्र इसी तरह घटता रहा तो न केवल तापमान में बेतहाशा वृद्धि होगी बल्कि जैव विविधता और भू-जल स्तर पर भी इसके विनाशकारी परिणाम देखने को मिलेंगे। यह सच है कि अरावली की पहाड़ियां गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली के लिए फेफड़े की तरह काम करती हैं।
यदि अवैध वन कटान और खनन पर रोक नहीं लगाई गई, तो जैव विविधता बुरी तरह प्रभावित होगी। चार राज्यों में तापमान वृद्धि के कारण आम जन जीवन बुरी तरह प्रभावित होगा। यदि अरावली क्षेत्र में वन क्षेत्र बढ़ाना है, तो अवैध निर्माण के साथ-साथ अवैध कटान और खनन को रोकना होगा।

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