Thursday, April 16, 2026

गर्मी बढ़ने के साथ अस्पतालों में बढ़ने लगे उल्टी-दस्त के मरीज


अशोक मिश्र

हरियाणा में गर्मी का असर अब दिखाई देने लगा है। बच्चे और बुजुर्ग गर्मी से होने वाली बीमारियों से पीड़ित होकर अस्पतालों में पहुंचने लगे हैं। अस्पताल में पहुंचने वालों में ज्यादातर लोग उल्टी और दस्त से पीड़ित पाए गए हैं। डायरिया, वायरल फीवर और अन्य मौसमी बीमारियां भी प्रदेश में फैलने लगी हैं। दिन और रात के तापमान में लगभग बीस से तेईस डिग्री सेल्सियस का अंतर होने से लोगों में संक्रमण तेजी से फैल रहा है।  

आंखों में खुजली, पानी आना, पलकों का सूजना जैसी समस्याएं भी लोगों में देखने को मिल रही है। लोगों के बीमार पड़ने के और भी कई कारण सामने आ रहे हैं। दूषित पानी पीना, ज्यादा देर से कटे-फटे फल खाना, खुले में बिकने वाले पदार्थ का सेवन करना, साफ सफाई का ध्यान न रखना भी लोगों के बीमार होने का कारण है। छोटे बच्चे ऐसी परिस्थिति में जल्दी बीमारी की चपेट में आ रहे हैं। 

 गर्मियों में रोग प्रतिरोधक क्षमता काफी कम हो जाती है। ऐसी स्थिति में हर आदमी को सावधानी बरतनी चाहिए। अप्रैल का महीना आधा बीत चुका है। हरियाणा का औसत तापमान 36 डिग्री के आसपास है। कुछ ही दिनों में राज्य में औसत तापमान चालीस डिग्री के आसपास पहुंचने की संभावना है। मध्य प्रदेश के नर्मदापुरम में तो आज ही तापमान 42 डिग्री पहुंच चुका है। 

राजस्थान में भी कुछ इलाकों में तापमान 41 डिग्री है। ऐसी स्थिति में लोगों को चाहिए कि वह बहुत आवश्यक होने पर ही धूप में घर से बाहर निकलें। बाहर निकलते समय भी छाता जरूर साथ रखें। बदन का ढककर ही बाहर निकलें। इसके साथ ही साथ पानी जरूर साथ में रखना चाहिए ताकि गर्मी की वजह से पसीने के रूप में शरीर से निकलने वाले पानी की कमी को पूरा किया जा सके। बदलते मौसम में अपना ख्याल रखना बहुत जरूरी है। अभी मई और जून महीने की प्रचंड गर्मी आनी बाकी है। 

वैसे तो अप्रैल से लेकर जून-जुलाई तक हमेशा प्रचंड गर्मी पड़ती रही है। लेकिन आज से चार-पांच दशक पहले हरियाणा सहित उत्तर भारत में वन क्षेत्र का क्षेत्रफल अधिक हुआ करता था। इस वजह से हर थोड़ी-थोड़ी दूर पर लोगों को राहत देने के लिए कोई न कोई पेड़ अवश्य हुआ करता था। सड़कों के किनारे किनारे फल और छाया देने वाले पेड़ लगाए जाते थे ताकि हवा में मौजूद ग्रीन हाउस गैसों को पेड़-पौधे अवशोषित करते रहें और आक्सीजन को मुक्त करते रहें। 

उन दिनों प्रचंड गर्मी होते हुए भी लोगों को इतनी परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता था। कस्बों  और गांवों में ज्यादातर लोगों के मकान घासफूस और मिट्टी के बने होते थे। इसकी वजह से ऊष्मा परावर्तित होकर लौट जाती थी। अब सीमेंट और शीशे के बने मकान ऊष्मा को अवशोषित कर लेते हैं। इसकी वजह से पृथ्वी का तापमान बढ़ता जा रहा है। प्रदेश में वन क्षेत्र भी काफी हद तक घट गया है।

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