अशोक मिश्र
लंदन में 16 अप्रैल 1889 को पैदा हुए चार्ली चैपलिन ने अपने दर्द को ही ताकत बनाकर दुनिया को हंसाया। फिल्मी परदे पर बिना कुछ कहे केवल अपनी भावभंगिमाओं से उन्होंने लोगों को न केवल हंसाया बल्कि रुलाया भी खूब। चैपलिन का जीवन बड़ी गरीबी में संघर्ष करते हुए बीता।
उनके पिता शराबी थे और घर की जिम्मेदारी उठाने की जगह हमेशा शराब के नशे में धुत रहते थे। चैपलिन की माता और पिता दोनों संगीत क्षेत्र से जुड़े हुए थे। जब चैपलिन किशोरावस्था में पहुंचे तब तक उनके पिता की अत्यधिक शराब पीने की वजह से मौत हो गई। उनकी मां मानसिक रोगी हो गई थीं क्योंकि कंठनली में विकार आ जाने की वजह से गायिका और अभिनेत्री का करियर खत्म हो गया था।
इसलिए उनकी मां का ज्यादातर समय अस्पताल में रहना पड़ता था। अभिनय से उनको बचपन से ही प्यार था। वह कम उम्र में ही थिएटर करने लगे। उससे जो आय होती थी, उसी से उनका खर्चा चलता था। जैसे-जैसे चैपलिन बड़े होते गए, उनके अभिनय में निखार आता गया।
अंतत: फिल्मों में काम करने की नीयत से चैपलिन अमेरिका पहुंचे। जब उन्हें फिल्मों में काम करने मौका मिला, तो उन्होंने दुनिया को खूब हंसाया। उन दिनों मूक फिल्मों का दौर था। चैपलिन का मशहूर किरदार द ट्रैंप छोटी मूंछ, ढीली ढाली पैंट, टोपी और छड़ी ही उनकी पहचान हो गई।
उन्होंने अपने जीवन में जो कुछ भोगा था, जिया था, उसको द माडर्न टाइम्स और द किड जैसी फिल्मों में अच्छी तरह व्यक्त किया। उनका एक वाक्य पूरी दुनिया में मशहूर था कि जिस दिन आप हंसे नहीं, वह दिन व्यर्थ गया। इस महान कलाकार की स्विट्जरलैंड के वेवे में 25 दिसम्बर 1977 को नींद में मृत्यु हो गई।
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