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Monday, October 12, 2026

प्रदर्शन मामले में सरकार सफल रही, कीमत आम जनता ने चुकाई


अशोक मिश्र

दस अक्टूबर को दिल्ली की तस्वीर देखकर ऐसा लगा कि जैसे राजधानी किसी युद्ध के मोर्चे में तब्दील हो गई हो। हर चौराहे पर बैरिकेड, हर सीमा पर पुलिस और अर्धसैनिक बलों की भारी तैनाती, जगह-जगह कंटीले तार और बख्तरबंद वाहन, मानो दुश्मन देश के सैनिक हमला करने आ रहे हों। सरकार ने अपनी पूरी ताकत इस बात में झोंक दी कि प्रदर्शनकारी किसी भी सूरत में जंतर-मंतर तक न पहुंच पाएं। इसमें वह पूरी तरह सफल भी रही। एक परिंदा तक जंतर-मंतर तक नहीं फटक सका। 

सवाल यह है कि क्या अपने ही नागरिकों को रोकने के लिए राजधानी को इस हद तक छावनी में बदलने की सचमुच जरूरत थी? लोकतंत्र में शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार कोई भीख नहीं, बल्कि संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकार है। जंतर-मंतर तो दशकों से इसी अधिकार के प्रतीक के रूप में जाना जाता रहा है। जब सरकार ही तय करने लगे कि कौन प्रदर्शन करेगा, कहाँ करेगा और कैसे करेगा, तो फिर लोकतांत्रिक व्यवस्था का अर्थ क्या रह जाता है? असहमति को रोकना व्यवस्था की मजबूती नहीं, बल्कि उसके डर को दिखाता है। सरकार का तर्क था कि सीजेपी ने प्रदर्शन के लिए पर्याप्त नोटिस और गाइडलाइन का पालन नहीं किया, इसलिए अनुमति नहीं दी गई। तो फिर अनुमति न देने की कीमत क्या आम जनता को चुकानी चाहिए? सात हजार से अधिक प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिए जाने की खबरें हैं। 

कई विपक्षी दलों ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला बताया। वाम दलों ने कहा कि सरकार ने अपने चारों ओर घेरा डालकर दिल्ली को एक विशाल पुलिस शिविर में बदल दिया है। इस पूरी कवायद की सबसे बड़ी कीमत आम जनता ने चुकाई। दिल्ली आने-जाने वाले लाखों लोगों के लिए शनिवार का दिन किसी सजा से कम नहीं था। मेट्रो के कई स्टेशनों को बंद कर दिया गया, कई ट्रेनें दिल्ली के स्टेशनों पर रुकी ही नहीं। हरियाणा और उत्तर प्रदेश से आने वाली सड़कों पर घंटों लंबा जाम लगा रहा। 

दफ्तर जाने वाले, अस्पताल जाने वाले, परीक्षा देने वाले छात्र, मजदूर और व्यापारी, सभी इस नाकाबंदी में फंसे रहे। सरकार चाहती तो प्रदर्शन के लिए एक व्यवस्थित जगह देकर, बातचीत का रास्ता खोलकर इस अराजकता से बचा जा सकता था। शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को जगह देना प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक परिपक्वता का संकेत होता। लेकिन सरकार की मंशा प्रदर्शन को व्यवस्थित करने की नहीं, बल्कि उसे विफल करने की अधिक दिखी। और इस विफल करने के चक्कर में उसने पूरे एनसीआर की जनजीवन व्यवस्था को ही विफल कर दिया। जब सरकार जनता की सुविधा के बजाय अपनी सुविधा को प्राथमिकता देने लगती है, तब लोकतंत्र के लिए इससे बड़ी चिंता की बात और क्या हो सकती है।