Monday, April 14, 2025

यह राजमहल नहीं, सराय है, राजन!

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

प्रकृति में कुछ भी स्थिर नहीं है। हर पल दुनिया में बदलाव आता रहता है। ऐसी स्थिति में यही कहा जा सकता है कि प्रकृति में जो भी पदार्थ या जीवित प्राणी है, वह हमेशा प्रकृति में मौजूद नहीं रहेगा। कुछ न कुछ बदलाव जरूर होगा। जो पैदा होगा, उसकी मृत्यु निश्चित है। इस बात को बहुत सारे लोग भूल जाते हैं और यदि वह सत्ता पा जाएं या धनिक हो जाएं, तो उन्हें अपने पद और धन का अहंकार हो जाता है। 

किसी राज्य में ऐसा ही एक राजा हुआ है। उसे अपने धन का बहुत अहंकार था। वह किसी की बात नहीं सुनता था, किसी की इज्जत नहीं करता था। उसके राज्य के पड़ोसी राजओं से भी उसके संबंध ठीक नहीं थे। जब किसी पड़ोसी राजा के यहां कोई आयोजन होता, तो वह बेमन से उस राजा को निमंत्रण देते थे। प्रजा भी उस राजा से बहुत परेशान रहती थी। जब चाहता था, कोई न कोई नया फरमान जारी कर देता था। 

कहते हैं कि एक बार उस राज्य से होकर एक संत जा रहा था। उसने राजा के व्यवहार और घमंड के बारे में बहुत कुछ सुन रखा था। वह सीधा राजमहल की ओर आया और दरबान से कुछ कहे बिना राजमहल में घुसता चला गया। वह सीधा जाकर उस कक्ष में पहुंचा जहां राजा बैठा हुआ था। उसने राजा को देखते ही कहा कि हटो, हटो, मैं कुछ दिन इस सराय में रहना है। 

राजा ने कहा कि यह सराय नहीं मेरा राजमहल है। संत ने कहा कि यह सराय है, राज महल नहीं। राजा नाराज हो उठा और बोला,कैसी बात करते हैं आप। यह मेरा राजमहल है। संत ने कहा कि अच्छा बताओ, इस राज महल में तुमसे पहले कौन रहता था। राजा ने कहा कि मेरे पिता जी। संत ने पूछा, उनसे पहले। राजा ने कहा कि मेरे दादाजी। संत ने कहा कि फिर तो यह सराय ही हुई न। आज तुम यहां रह रहे हो, कल कोई दूसरा रहेगा। यह सुनकर राजा पर मानो गाज गिर पड़ी। वह संत की बात समझकर उसके पैरों पर गिर पड़ा।



Sunday, April 13, 2025

हुजूर! किसी को झूठा आश्वासान न दें

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

किसी को मदद करने का आश्वासन देकर भूल जाना, बहुत बड़ा गुनाह है। जब किसी को मदद का आश्वासन दिया जाता है, तो वह आदमी उस विश्वास पर दूसरी जगह से मदद हासिल करना का प्रयास करना छोड़ देता है। ऐसी स्थिति में जब आश्वासन देने वाला अपना वायदा पूरा न करे, तो उस व्यक्ति को बहुत परेशानी का सामना करना पड़ता है जिससे मदद का वायदा किया गया हो। इस संदर्भ में एक कथा कही जाती है। 

किसी राज्य का बादशाह कहीं अपने महल की ओर आ रहा था। मुख्य द्वार पर उसने देखा कि एक बूढ़ा दरबान अपनी फटी-पुरानी वर्दी में सर्दी में भी मुस्तैद खड़ा है। बादशाह ने उसके पास अपनी सवारी रुकवाई और उस बुुजुर्ग से पूछा कि क्या तुम्हें सर्दी नहीं लग रही है? तुमने गरम कपड़े क्यों नहीं पहने हैं? उस दरबान ने बादशाह का अभिवादन करते हुए कहा कि हुजूर, सर्दी तो लग रही है, लेकिन क्या करूं? 

मेरे पास पहनने को कोई गर्म कपड़ा नहीं है। बादशाह को उस बुजुर्ग दरबान पर दया आई। उन्होंने उससे कहा कि अच्छा, कुछ देर इंतजार करो। मैं अपने महल में जाकर देखता हूं, कोई पुराना गरम कपड़ा मिलता है, तो वह तुम्हारे लिए भिजवाता हूं। चिंता मत करो, जल्दी ही तुम्हें कपड़ा मिल जाएगा। इसके बाद बादशाह अंदर गए और अपनी पत्नी और बच्चों के चक्कर में गरम कपड़ा भिजवाना भूल गए। 

सुबह जब बादशाह दरवाजे पर पहुंचा, तो वहां एक अलग ही नजारा देखने को मिला। वह दरबान मरा हुआ पड़ा था और कच्ची मिट्टी पर अंगुली से लिखा गया था कि हुजूर, मैं कई साल से इस फटी वर्दी में सर्दियों में पहरा देता आ रहा हूं। मुझे कोई दिक्कत नहीं हुई। आपके आश्वासन के बाद मुझे तेज सर्दी लगी और मैं मर रहा हूं। आपसे गुजारिश है कि भविष्य में आप किसी से झूठा वायदा न करें। यह देखकर बादशाह बहुत पछताया।

Saturday, April 12, 2025

सम्राट पीटर का दूर हुआ भ्रम

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

भ्रम एक ऐसी स्थिति है जिसमें फंसे व्यक्ति को सच्चाई का ज्ञान नहीं रहता है। वह व्यक्ति अपने और संसार के बारे में सोचता कुछ है और वास्तविकता कुछ और ही होती है। ऐसे ही एक सम्राट थे पीटर। वे रूस जैसे विशाल  देश के सम्राट थे। वैसे तो सम्राट उदार हृदय, प्रजावत्सल और धर्म निष्ठ थे।

वे अपनी प्रजा के कल्याण के लिए भी प्रयासरत रहते थे। प्रजा में उनका बड़ा सम्मान था, लेकिन कई बार वे कुछ बातों को लेकर भ्रम में रहते थे। एक बार उन्होंने अपनी प्रजा के लिए एक विशालकाय चर्च का निर्माण करवाया। वह रोज उस चर्च में प्रार्थना करने जाते थे। सम्राट को चर्च आता देखकर भारी भीड़ जमा होती थी।

एक दिन उन्होंने पादरी से कहा कि हमारे देश की प्रजा बड़ी धार्मिक है। पादरी ने उस समय तो कुछ नहीं कहा, लेकिन शाम को उसने कुछ लोगों को संदेश भिजवा दिया कि कल सम्राट चर्च नहीं आएंगे। दूसरे दिन सम्राट निश्चित समय पर चर्च पहुंचे, तो देखा कि कुछ लोग वहां मौजूद हैं। सम्राट ने पादरी से इसकी वजह पूछी, तो पादरी ने कहा कि यहीं की जनता धर्मभीरु नहीं, सम्राट भीरु है।

आपने कल जो भीड़ देखी थी, वह आपके कारण थी। कल मैंने संदेश भिजवा दिया था कि आज सम्राट नहीं आएंगे। आपकी वजह से चर्च आने वाले लोग नहीं आए। सच्चे धार्मिक तो कुछ ही लोग हैं जिनको इस बात से फर्क नहीं पड़ता है कि सम्राट आने वाले हैं या नहीं। यह सुनकर सम्राट पीटर आश्चर्यचकित रह गए। वे मानते थे कि उनके देश की प्रजा धार्मिक है। वह प्रभु की आराधना के लिए चर्च आती है। इसके बाद पीटर की आंख खुल गई। कई बातों में उनका भ्रम दूर हो गया।





सरोद रानी के नाम से विख्यात थीं गुरु शरण रानी

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

गुरु शरण रानी माथुर को भारत की पहली महिला सरोद वादक होने का गौरव प्राप्त है। सरोद रानी के नाम से विख्यात गुरु शरण रानी का जन्म 9 अप्रैल 1929 में दिल्ली के जाने-माने व्यवसायी के घर में हुआ था। इस जमाने में संभ्रांत परिवार की लड़कियां नृत्य, वाद्य यंत्र और संगीत सीखकर मंचों पर प्रदर्शन नहीं किया करती थीं। इसको अच्छा नहीं माना जाता था। 

रूढ़ीवादी परिवार में जन्म लेने के बाद भी शरण रानी ने हार नहीं मानी और मैहर सेनिया घराने के प्रसिद्ध सरोदवादक अलाउद्दीन खान और उनके बेटे अली अकबर खान से सरोद वादन सीखा। उन्होंने एमए करने के बाद अच्छन महाराज से जहां कथक सीखा, वहीं नाभा कुमार सिन्हा से मणिपुरी शास्त्रीय नृत्य में महारथ हासिल की। सन 1960 में उन्होंने दिगंबर जैन व्यवसायी परिवार से संबंध रखने वाले सुल्तान सिंह बैकलीवाल से विवाह किया। बाबा अलाउद्दीन से सरोद सीखने के बाद उन्होंने मंचों पर प्रस्तुति देना शुरू किया। 

इसके बाद लगातार सरोद वादक शरण रानी की ख्याति दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती गई। उन्होंने देश-विदेश में अपने कार्यक्रम प्रस्तुत किए। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने जब उनका सरोदवादन सुना, तो वह बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने शरण रानी को भारत का सांस्कृतिक राजदूत कहकर संबोधित किया। प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता पृथ्वीराज कपूर ने उनका सरोदवादन सुनकर कहा था कि शरण रानी के वादन को सुनकर ऐसा लगा मानो मां सरस्वती ने उन्हें अपनी गोद में ले लिया है। 

पद्म भूषण से सम्मानित शरण रानी ने अपनी कला को सिखाने के लिए अपने घर पर स्कूल खोला और अपने शिष्यों से कभी फीस नहीं ली। कुछ शिष्य तो उनके घर में रहकर खाते-पीते थे और सरोद वादन सीखते थे। उन्होंने वाद्य यंत्रों के बारे में कई पुस्तकें और अखबारों में लेख भी लिखे हैं। कुछ वर्षों तक कैंसर से जूझने के बाद  8 अप्रैल 2008 को अपने 79वें जन्मदिन से एक दिन पहले उनकी मृत्यु हो गई।


Friday, April 11, 2025

चंदेल सम्राट के अधीन थे राजा भोज

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

राजा भोज परमार वंश के शासक थे। उनकी राजधानी का नाम धारानगरी था। कहा जाता है कि उनका राज्य उत्तर में चितौड़ से लेकर दक्षिण में उत्तरी कोंकण और पूर्व में विदिशा से लेकर पश्चिम में साबरमती नदी तक फैला हुआ था। राजा भोज ने अपने आसपास के राजाओं से अलग-अलग युद्ध में विजय प्राप्त की थी, लेकिन वह चंदेल सम्राट विद्याधर वर्मन से युद्ध में पराजित हो गए थे। 

वह चंदेल सम्राट के आधीन राजा होकर रह गए थे। राजा भोज के शासनकाल के बारे में एक किंवदंती है कि उनके राज्य में सभी लोग पढ़े लिखे थे। कोई भी अनपढ़ नहीं था। यह बात कितनी सही है, यह तो इतिहासकार ही बता सकते हैं।  उन्होंने अपने शासनकाल में प्रजा के हित में काफी कार्य किए थे। राजा भोज बहुत बड़े वीर और प्रतापी होने के साथ-साथ प्रकाण्ड पंडित और गुणग्राही भी थे। 

इन्होंने कई विषयों के अनेक ग्रंथों का निर्माण किया था।  इन ग्रंथों की चर्चा आज भी की जाती है। राजा भोज बहुत अच्छे कवि, दार्शनिक और ज्योतिषी थे। कहा जाता है कि सरस्वतीकंठाभरण, शृंगारमंजरी, चंपूरामायण, चारुचर्या, तत्वप्रकाश, व्यवहारसमुच्चय आदि अनेक ग्रंथ इन्होंने ही लिखे थे। इनके राज्य में विद्वानों का जमघट लगा रहता था। यह विद्वानों का बड़ा आदर करते थे। इनकी पत्नी का नाम लीलावती था जो बहुत बड़ी विदुषी थी। धर्मशास्त्र पर भोजदेव कृत ‘पूर्तमार्तण्ड' नामक ग्रंथ है। 

इसके अतिरिक्त उन्होंने धर्मशास्त्र सम्बन्धी और ग्रंथ भी लिखे थे, क्योंकि इसका उल्लेख अनेक सुप्रसिद्ध धर्मशास्त्र ग्रंथकारों ने अपने ग्रंथों में किया है। दक्षिण कल्याणपुर के चालुक्यवंशी प्रसिद्ध राजा विक्रमांकदेव के मंत्री भट्टविज्ञानेश्वर ने याज्ञवल्लक्य स्मृति पर मिताक्षरी व्याख्या की है। भोजदेव ने 'चाणक्य राजनीतिशास्त्र' नामक ग्रंथ भी लिखा। राजा भोज आज भी अपने ग्रंथों और विद्वता के लिए प्रसिद्ध हैं।

बिना संगठन के कैसे न्याय पथ पर चलेगी कांग्रेस?

अशोक मिश्र

अहमदाबाद में साबरमती के तट पर कांग्रेस का दो दिवसीय अधिवेशन खत्म हो गया। गुजरात की धरती पर कांग्रेस का अधिवेशन 64 साल बाद हुआ है। इन दो दिनों का निचोड़ यह है कि कांग्रेस अब न्याय पथ पर चलेगी। वैसे तो कांग्रेस अधिवेशन में जितने भी वक्ताओं ने अपने विचार रखे, उनमें नवीनता नजर नहीं आई। वही, मोदी सरकार पर हमला, मोदी सरकार देश बेच देगी, अडानी-अंबानी से लेकर जातिगत जनगणना और संविधान बचाने का आह्वान, यह सब तो पिछले एक-डेढ़ साल से देश की जनता सुनती आ रही है। इस अधिवेशन में ऐसा नया क्या था जिससे देश की जनता को लगे कि कांग्रेस ने नया रूप धारण किया है। कांग्रेस नेताओं ने अधिवेशन में संकल्प लिया है कि न्याय पथ पर चलते हुए सबसे पहले गुजरात को जीतना है, उसके बाद पूरा देश।
सवाल यह है कि गुजरात विधानसभा चुनाव से पहले देश में लगभग आठ-नौ राज्यों में चुनाव होने हैं। इन राज्यों का क्या होगा? क्या कांग्रेस इन राज्यों में चुनाव नहीं लड़ेगी और अपनी पूरी ताकत गुजरात में ही झोंक देगी? कुछ महीनों के बाद बिहार में विधानसभा चुनाव है। कांग्रेस नेता कन्हैया कुमार इन दिनों बिहार में ‘पलायन रोको, नौकरी दो’ पदयात्रा कर रहे हैं। कुछ दिन पहले एकाध किमी की पदयात्रा कन्हैया कुमार के साथ लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने भी की थी। भीड़ भी काफी जुटी थी। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि यह भीड़ कांग्रेस के पक्ष में वोट में कितनी तब्दील होगी? जिस तरह कन्हैया कुमार या राहुल गांधी की सभाओं, कार्यक्रमों में भीड़ उमड़ रही है, वह पोलिंग बूथ तक कांग्रेस के पक्ष में जा पाएगी? भीड़ जुटना और कांग्रेस के पक्ष में मतदान होना, दोनों अलग-अलग बाते हैं।
सभी जानते हैं कि कांग्रेस का मुख्य मुकाबला भाजपा से है। कांग्रेस नेता जब भी हमला करते हैं, तो वह भाजपा के साथ-साथ आरएसएस को अपने लपेटे में लेते हैं। चलिए मान लिया कि भाजपा और आरएसएस के साथ कांग्रेस की विचारधारा की लड़ाई है। लेकिन कांग्रेस की विचारधारा तो सबके सामने साफ होनी चाहिए। कांग्रेस पिछले दो-तीन दशक से एक सीध में चलती हुई नजर नहीं आ रही है। राहुल गांधी की दादी के जिंदा रहते तक कांग्रेस अपने को सेक्युलर कहती थी और सेक्युलरिज्म पर विश्वास भी करती थी। लेकिन राजीव गांधी ने रामजन्म भूमि का ताला खुलवाकर अपने को हिंदुओं का पक्षधर होने की कोशिश की। शाहबानो मुद्दे पर बुरी तरह मात खाए राजीव गांधी ने अरुण नेहरू की सलाह पर राममंदिर जन्मभूमि का ताला खुलवाकर अपने को हिंदू हितैषी साबित करने की कोशिश की। एक योजना के तहत अयोध्या कोर्ट में मुकदमा दायर किया गया और सिर्फ 40 मिनट में अयोध्या की कोर्ट ने फैसला देकर रामजन्म भूमि का ताला खुलवा दिया। बस, कांग्रेस का वैचारिक भटकाव यहीं से शुरू हुआ। वह भाजपा और आरएसएस के मुकाबले में वह न हिंदुत्व का झंडाबरदार बन पाई और न ही अपना धर्म निरपेक्ष चरित्र ही बरकार रख पाई।
नतीजा हुआ कि कांग्रेस से वह जनता दूर होती चली गई जो अपने को धर्म निरपेक्ष मानती थी। कार्यकर्ता दूर नहीं हुए, दूर कर दिए गए। ऊपर बैठे नेताओं ने जनता और कार्यकर्ता की उपेक्षा शुरू कर दी। इसका परिणाम यह हुआ कि पूरे देश में एक मजबूत जनाधार वाली पार्टी धीरे-धीरे खोखली होती चली गई और कार्यकर्ता विहीन हो गई। आज जब कांग्रेस के नेता पूरे देश को जीतने की बात करते हैं, तो हंसी आती है। बिना किसी संगठन के कोई चुनाव जीत सकता है, इसका कोई उदाहरण शायद ही लोकतांत्रिक व्यवस्था में मिले। कांग्रेस को अगर देश में मजबूती से खड़ा होना है, तो उसे सबसे पहले अपना संगठन खड़ा करना होगा। बूढ़े और अकड़ में चूर नेताओं को बेमुरौव्वत होकर विदा करना होगा। युवा, उत्साही और निष्ठावान कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी सौंपनी होगी। गुटबाजों को तो कान पकड़कर बाहर करना होगा।


Thursday, April 10, 2025

बुद्ध बोले, कांटों पर भी आ जाती है नींद

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध पूरी दुनिया में शायद पहले दार्शनिक थे जिन्होंने दुख का कारण खोजने का प्रयास किया था। उन्होंने इस बात का पता तो लगा लिया था कि सांसारिक दुखों का कारण निजी संपत्ति है, तभी तो उन्होंने अपने बनाए संघ में निजी संपत्ति के नाम पर एक भिक्षा पात्र और दो जोड़ी कपड़ों को ही मान्यता दी। महात्मा बुद्ध ने लोगों को पाखंड और तमाम तरह के कर्मकांड से दूर रहने की सलाह दी। अहिंसा उनके उपदेशों का मूल आधार हुआ करता था। एक बार की बात है। वे अपना चातुर्याम मास जेतवन में बिता रहे थे।

एक दिन जब वे पर्णशय्या पर लेटे हुए थे, तो उनके एक शिष्य ने कहा कि प्रभु! आज आपको अच्छी नींद आई? बुद्ध ने शांत भाव से कहा कि हां, आज मुझे अच्छी नींद आई। तब शिष्य ने कहा कि लेकिन प्रभु! कल रात तो ठंडा बहुत था, बर्फ भी गिर रही थी। आपकी पर्णशय्या भी बहुत पतली थी। फिर आपको किस तरह अच्छी नींद आई? महात्मा बुद्ध मुस्कुराते हुए कहा कि यदि किसी धनिक के पुत्र को एक अच्छे कमरे में सोने दिया जाए जिसमें खूब मुलायम बिस्तर हो। सुख-सुविधा के सारे साधन मौजूद हों। कमरे में इत्र छिड़का गया हो, तो क्या उसे अच्छी नींद आएगी? शिष्य ने तत्काल उत्तर दिया कि यकीनन अच्छी नींद आएगी।

महात्मा बुद्ध ने अगला सवाल किया कि यदि उस धनिक पुत्र को कोई गंभीर बीमारी हो जाए, तब? शिष्य ने कहा कि तब वह अच्छी नींद या सुकून की नींद नहीं सो सकेगा। महात्मा बुद्ध ने फिर अगला सवाल किया, यदि उस धनिक पुत्र को कोई मानसिक रोग हो जाए, तब? शिष्य ने फिर वहीं जवाब दिया, जो दूसरे प्रश्न के समय दिया था। 

तब  बुद्ध बोले कि महत्वपूर्ण शैय्या नहीं है, जरूरी है मन की शांति। यदि चित्त शांत हो, तो पर्णशय्या पर भी नींद आ जाएगी। नींद तो कहते हैं कि कांटों पर भी आ जाती है। यह सुनकर शिष्य की जिज्ञासा शांत हो गई।

जिंदगी भर घुमक्कड़ ही रहे राहुल सांकृत्यायन

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महापंडित राहुल सांकृत्यायन का जन्म 9 अप्रैल 1893 को उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में हुआ था। राहुल सांकृत्यायन का बचपन अपने नाना के गांव पदहा में बीता था।तीसरी कक्षा की उर्दू पुस्तक में राहुल ने एक शे’र पढ़ा था-सैर कर दुनियाँ की गाफिल जिंदगानी फिर कहाँ, जिंदगी गर कुछ रही तो नौजवानी फिर कहाँ। इस शे’र ने इनकी पूरी जिंदगी बदल दी। ग्यारह-बारह साल की उम्र में घर से 22 रुपये लेकर राहुल भाग खड़े हुए दुनिया की सैर करने को। वैसे उनका नाम केदारनाथ पांडेय था। 

बाद में उन्हें लोगों ने दामोदर स्वामी कहना शुरू किया। सन 1930 में जब उन्होंने श्रीलंका में बौद्ध धर्म स्वीकार किया, तो अपना नाम महात्मा बुद्ध के बेटे राहुल के नाम पर रख लिया। राहुल के साथ अपने सांकृत्य गोत्र को भी जोड़कर राहुल सांकृत्यायन बन गए। राहुल सांकृत्यायन आजीवन घुमक्कड़ ही रहे। विभिन्न देशों की यात्राएं की। राहुल ने भारत के प्राचीन इतिहास पर बहुत काम किया। 

उन्होंने विश्व प्रसिद्ध पुस्तक ‘वोल्गा से गंगा’ लिखी, जो आज भी बडे़ चाव से पढ़ी जाती है। इसके अलावा भागो नहीं, दुनिया को बदलो, तुम्हारी क्षय हो, मानव समाज जैसी न जाने कितनी पुस्तकों की रचना की। वह जब भी मास्को, लंदन, कोरिया, तिब्बत, चीन, लद्दाख, मास्को, यूरोप की यात्रा की, वहां से कुछ न कुछ ज्ञान लेकर लौटे। कहा जाता है कि उन्होंने डेढ़ सौ से अधिक पुस्तकों की रचना की, लेकिन प्रकाशित केवल 129 पुस्तकें ही हुई हैं। 

राहुल जी ने हिंदी साहित्य के अतिरिक्त धर्म, दर्शन, लोक साहित्य, यात्रा साहित्य, जीवनी, राजनीति, इतिहास, संस्कृत ग्रंथों की टीका और अनुवाद, कोश, तिब्बती भाषा आदि विषयों पर अधिकार के साथ लिखा है। हिंदी भाषा और साहित्य के क्षेत्र में राहुल जी ने 'अपभ्रंश काव्य साहित्य', 'दक्खिनी हिंदी साहित्य', 'आदि हिंदी की कहानियाँ' प्रस्तुत कर लुप्तप्राय निधि का उद्धार किया है।


Wednesday, April 9, 2025

ईर्ष्यालु व्यक्ति राज्य में रहने लायक नहीं

 बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र
ईर्ष्या कभी सुखद नहीं होती है। ईर्ष्यालु व्यक्ति अपने जीवन में हमेशा परेशान रहता है। ऐसे व्यक्ति से दूसरे लोग खुश नहीं रहते हैं। इसकी वजह से वह किसी का प्रिय भी नहीं बन पाता है। ईर्ष्या और चुगलखोरी व्यक्तित्व के विकास में बाधक होती है। कई बार तो यह मनुष्य के सामने इतना बड़ा संकट पैदा कर देती है कि ईर्ष्यालु व्यक्ति का अपनी जान बचाना मुश्किल हो जाता है। इस बारे में एक किस्सा सुनाया जाता है। 
कहते हैं कि किसी राज्य का राजा बहुत दयालु था। वह अपनी प्रजा का बहुत ख्याल रखता था। उसके राज्य में प्रजा बहुत सुखी थी। दूर-दूर से व्यापार करने दूसरे राज्य के व्यापारी भी आया करते थे। एक दिन किसी बात पर राजा दूसरे देश के एक विदेशी व्यापारी से नाराज हो गया। राजा ने गुस्से में आकर व्यापारी को फांसी पर चढ़ाने की सजा दे दी। फांसी की सजा सुनने के बाद व्यापारी ने अपनी भाषा में राजा को खूब गालियां देनी शुरू कर दीं। राजा उस व्यापारी की भाषा को समझ नहीं पा रहा था। उसने अपने दरबारियों से पूछा कि यह क्या कह रहा है? 
एक मंत्री ने खड़े होकर बताया कि महाराज, यह आपको दुआएं दे रहा है। आप का राज्य हमेशा फलता फूलता रहे। आप चिरंजीवी हों। तभी दूसरे मंत्री ने खड़े होकर कहा कि नहीं महाराज, यह आपको गालियां दे रहा है।  राजा ने पहले मंत्री की ओर देखा, तो उसने कहा, हां महाराज, यह आपको गालियां दे रहा है। 
यह सुनकर राजा ने व्यापारी को सजा मुक्त करते हुए कहा कि तुम निर्दोष थे, इस वजह से तुम्हें गुस्सा आया। पहले मंत्री ने व्यापारी को निर्दोष जानकर उसे बचाने का प्रयास किया और इसलिए झूठ बोला। दूसरे मंत्री ने ईर्ष्यावश पहले मंत्री की पोल खोली। ऐसा ईर्ष्यालु व्यक्ति मेरे राज्य में रहने लायक नहीं है।

स्वामी विवेकानंद की पढ़ने की ललक

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

भारत में स्वामी विवेकानंद की जयंती को युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। स्वामी विवेकानंद की मात्र 39 साल की उम्र में ही मौत हो गई थी। उनका जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता में हुआ था। स्वामी जी के बचपन का नाम नरेंद्रनाथ था। जब उन्होंने बंगाल के प्रसिद्ध संत स्वामी रामकृष्ण परमहंस से संन्यास की दीक्षा ली, तो उनका नाम स्वामी विवेकानंद रखा गया। 

उन्हें पढ़ने का बहुत शौक था। कहा जाता है कि 25 साल की उम्र में ही विवेकानंद ने वेद पुराण, बाइबल, कुरआन, धम्मपद, दास कैपिटल, गुरु ग्रंथ साहिब सहित राजनीति शास्त्र, अर्थशास्त्र, संगीत, साहित्य और दर्शन की किताबों का बहुत ही गहराई से अध्ययन कर लिया था। एक बार वह भ्रमण पर निकले हुए थे। गुरुभाई स्वामी ब्रह्मानंद और स्वामी तुयार्नंद में से कोई एक उनके साथ  था। 

वह उनकी पढ़ने के प्रति आसक्ति को जानते थे। उन्होंने एक जगह अच्छी लाइब्रेरी देखी, तो वहीं कुछ दिन रुकने का फैसला किया। उनका गुरु भाई लाइब्रेरी जाता और किसी न किसी विषय की दो पुस्तकें ले आता। मौका मिलने पर विवेकानंद पढ़ते और उसे लौटा देते। जब कई दिन ऐसा ही हुआ, तो लाइब्रेरियन ने कहा कि तुम यदि इन पुस्तकों को देखने के लिए ले जाते हो, तो मैं आपको यहीं दिखा देता हूं। 

इनको ढोकर ले जाने की क्या जरूरत है। गुरुभाई ने कहा कि इन पुस्तकों को मेरे गुरुभाई स्वामी विवेकानंद पढ़ते हैं। एक दिन लाइब्रेरियन स्वामी विवेकानंद से मिला तो स्वामी जी ने कहा कि मैं वास्तव में इन पुस्तकों को गंभीरता से पढ़ता हूं। मैं जो पढ़ता हूं, वह मुझे याद हो जाता है। उन्होंने पुस्तकों के कुछ अंश भी सुनाए। यह सुनकर लाइब्रेरियन चकित रह गया। विवेकानंद ने कहा कि यदि एकाग्रचित्त होकर पढ़ा जाए तो याद रह जाना कोई बड़ी बात नहीं है।