Showing posts with label प्रजा. Show all posts
Showing posts with label प्रजा. Show all posts

Monday, May 19, 2025

मेहनत करने से क्यों कतराऊं

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

प्राचीनकाल में जब हमारा देश छोटे-छोटे राज्यों में बंटा हुआ था, तो उन दिनों राजा-महाराजा अपनी प्रजा का बहुत ख्याल रखते थे। प्रजा को राजा अपने पुत्र के समान मानता था और उसी हर जरूरतों को पूरा किया करता था। वह टैक्स भी वसूलता था, लेकिन वह टैक्स इतना कम होता था कि किसी को इससे कोई परेशानी नहीं होती थी। 

कुछ राजा-महाराजा अपने राज्य की प्रजा को सुखी बनाने के लिए हर संभव प्रयास करते थे। टैक्स के रूप में जमा हुए धन को भी वह अपने ऊपर बहुत कम खर्च किया करते थे। एक राज्य का राजा आए दिन वेष बदलकर प्रजा का हालचाल जाना करता था। एक बार उसने सोचा कि सीमावर्ती इलाकों में गांव वालों को क्या समस्याएं होती हैं, इसके बारे में पता किया जाए। 

अपने एक सहायक को लेकर वह निकल पड़ा। सीमावर्ती गांवों की समस्याओं को जानकर उसने सहायक को तत्काल उन्हें दूर करने का आदेश दिया और फिर आगे बढ़ गया। एक जगह उसने देखा कि एक बुजुर्ग लकड़हारा पेड़ काटने में जुटा हुआ है। उसका शरीर पसीने से भीगा हुआ था। राजा को उस पर दया आ गई। वह लकड़हारे की मदद करने की नीयत से उसके पास पहुंचा। 

अचानक उसने देखा कि जहां लकड़हारा लकड़ी काट रहा है, उसके पास ही कई हीरे पत्थर में दबे  हुए हैं। राजा ने लकड़हारे से कहा कि बाबा! आपके पास ही इतने हीरे पड़े हैं कि आप एक भी हीरा बेच दें, तो आपको कोई काम करने की जरूरत ही नहीं रहेगी। लकड़हारे ने बिना रुके राजा से कहा कि उसे तो मैं कई साल से देख रहा हूं, लेकिन जब अभी  मेरे हाथ-पैर काम कर रहे हैं तो भला मेहनत करने से क्यों कतराऊं। यह सुनकर राजा ने लकड़हारे की कर्मशीलता को प्रणाम किया और आगे बढ़ गया।

Wednesday, April 9, 2025

ईर्ष्यालु व्यक्ति राज्य में रहने लायक नहीं

 बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र
ईर्ष्या कभी सुखद नहीं होती है। ईर्ष्यालु व्यक्ति अपने जीवन में हमेशा परेशान रहता है। ऐसे व्यक्ति से दूसरे लोग खुश नहीं रहते हैं। इसकी वजह से वह किसी का प्रिय भी नहीं बन पाता है। ईर्ष्या और चुगलखोरी व्यक्तित्व के विकास में बाधक होती है। कई बार तो यह मनुष्य के सामने इतना बड़ा संकट पैदा कर देती है कि ईर्ष्यालु व्यक्ति का अपनी जान बचाना मुश्किल हो जाता है। इस बारे में एक किस्सा सुनाया जाता है। 
कहते हैं कि किसी राज्य का राजा बहुत दयालु था। वह अपनी प्रजा का बहुत ख्याल रखता था। उसके राज्य में प्रजा बहुत सुखी थी। दूर-दूर से व्यापार करने दूसरे राज्य के व्यापारी भी आया करते थे। एक दिन किसी बात पर राजा दूसरे देश के एक विदेशी व्यापारी से नाराज हो गया। राजा ने गुस्से में आकर व्यापारी को फांसी पर चढ़ाने की सजा दे दी। फांसी की सजा सुनने के बाद व्यापारी ने अपनी भाषा में राजा को खूब गालियां देनी शुरू कर दीं। राजा उस व्यापारी की भाषा को समझ नहीं पा रहा था। उसने अपने दरबारियों से पूछा कि यह क्या कह रहा है? 
एक मंत्री ने खड़े होकर बताया कि महाराज, यह आपको दुआएं दे रहा है। आप का राज्य हमेशा फलता फूलता रहे। आप चिरंजीवी हों। तभी दूसरे मंत्री ने खड़े होकर कहा कि नहीं महाराज, यह आपको गालियां दे रहा है।  राजा ने पहले मंत्री की ओर देखा, तो उसने कहा, हां महाराज, यह आपको गालियां दे रहा है। 
यह सुनकर राजा ने व्यापारी को सजा मुक्त करते हुए कहा कि तुम निर्दोष थे, इस वजह से तुम्हें गुस्सा आया। पहले मंत्री ने व्यापारी को निर्दोष जानकर उसे बचाने का प्रयास किया और इसलिए झूठ बोला। दूसरे मंत्री ने ईर्ष्यावश पहले मंत्री की पोल खोली। ऐसा ईर्ष्यालु व्यक्ति मेरे राज्य में रहने लायक नहीं है।

Sunday, April 6, 2025

आने वाली पीढ़ियां तो लाभ उठाएंगी

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

बगदाद में एक बादशाह अपनी प्रजा के बारे में जानकारी लेने के लिए वेष बदलकर घूमता रहता था। वैसे दुनिया के कई देशों में राजाओं ने ऐसा किया है। भारत में भी कई राजा हुए हैं जो अपनी प्रजा के कष्टों और अपने बारे में उनके विचार आदि जानने के लिए वेष बदलकर उनके बीच रहा करते थे। इससे राजकीय कर्मचारियों के बारे में भी पता चलता था कि वह प्रजा के साथ कैसा व्यवहार करते हैं। 

यदि कोई कर्मचारी गलत करता हुआ पाया जाता था, तो उसे दंडित किया जाता था। तो बात बगदाद के बादशाह की हो रही थी। वह अक्सर वेष बदलकर घूमता रहता था। अपने महल से कुछ दूरी पर वह देखता था कि एक बुजुर्ग जगह-जगह पर पौधे रोप रहे हैं। पौधे भी ऐसे जिनको वयस्क आयु प्राप्त करने में सौ-पचास साल लगते हों। वह मौसमी फूलों के पौधे कहीं नहीं रोप रहे थे। 

बादशाह बुजुर्ग को अक्सर अपने काम में लगा हुआ पाता। कई बार तो वह अपने काम से थककर बैठ जाता और थोड़ा सुस्ताने के बाद फिर अपने काम में लग जाता। बादशाह से एक दिन रहा नहीं गया। वह उस बुजुर्ग के पास पहुंचा और उससे दुआ सलाम करने के बाद पूछ लिया कि महाशय! आप इन पौधों को क्यों रोप रहे हैं। आपकी अच्छी खासी उम्र हो चुकी है। यह पौधे जब तक बड़े होंगे, तब तक शायद आप इस दुनिया में नहीं होंगे। तो फिर आप इतनी मेहनत क्यों कर रहे हैं।

 बादशाह की बात सुनकर बुजुर्ग मुस्कुराया और बोला, यदि हमारे पूर्वजों ने भी ऐसा ही सोचा होता, तो हम अपने आसपास के इन पुराने पेड़ों को नहीं देख पाते। तरह-तरह के इन पेड़ों की छाया और उनके फल से हम वंचित रह जाते। ठीक है, आज रोपे गए पेड़ों से मिलने वाले लाभ से मैं वंचित रहूंगा, लेकिन आने वाली पीढ़ियां तो लाभ उठाएंगी।