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Thursday, April 10, 2025

बुद्ध बोले, कांटों पर भी आ जाती है नींद

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध पूरी दुनिया में शायद पहले दार्शनिक थे जिन्होंने दुख का कारण खोजने का प्रयास किया था। उन्होंने इस बात का पता तो लगा लिया था कि सांसारिक दुखों का कारण निजी संपत्ति है, तभी तो उन्होंने अपने बनाए संघ में निजी संपत्ति के नाम पर एक भिक्षा पात्र और दो जोड़ी कपड़ों को ही मान्यता दी। महात्मा बुद्ध ने लोगों को पाखंड और तमाम तरह के कर्मकांड से दूर रहने की सलाह दी। अहिंसा उनके उपदेशों का मूल आधार हुआ करता था। एक बार की बात है। वे अपना चातुर्याम मास जेतवन में बिता रहे थे।

एक दिन जब वे पर्णशय्या पर लेटे हुए थे, तो उनके एक शिष्य ने कहा कि प्रभु! आज आपको अच्छी नींद आई? बुद्ध ने शांत भाव से कहा कि हां, आज मुझे अच्छी नींद आई। तब शिष्य ने कहा कि लेकिन प्रभु! कल रात तो ठंडा बहुत था, बर्फ भी गिर रही थी। आपकी पर्णशय्या भी बहुत पतली थी। फिर आपको किस तरह अच्छी नींद आई? महात्मा बुद्ध मुस्कुराते हुए कहा कि यदि किसी धनिक के पुत्र को एक अच्छे कमरे में सोने दिया जाए जिसमें खूब मुलायम बिस्तर हो। सुख-सुविधा के सारे साधन मौजूद हों। कमरे में इत्र छिड़का गया हो, तो क्या उसे अच्छी नींद आएगी? शिष्य ने तत्काल उत्तर दिया कि यकीनन अच्छी नींद आएगी।

महात्मा बुद्ध ने अगला सवाल किया कि यदि उस धनिक पुत्र को कोई गंभीर बीमारी हो जाए, तब? शिष्य ने कहा कि तब वह अच्छी नींद या सुकून की नींद नहीं सो सकेगा। महात्मा बुद्ध ने फिर अगला सवाल किया, यदि उस धनिक पुत्र को कोई मानसिक रोग हो जाए, तब? शिष्य ने फिर वहीं जवाब दिया, जो दूसरे प्रश्न के समय दिया था। 

तब  बुद्ध बोले कि महत्वपूर्ण शैय्या नहीं है, जरूरी है मन की शांति। यदि चित्त शांत हो, तो पर्णशय्या पर भी नींद आ जाएगी। नींद तो कहते हैं कि कांटों पर भी आ जाती है। यह सुनकर शिष्य की जिज्ञासा शांत हो गई।

Thursday, March 20, 2025

तुम्हारी सिद्धि की औकात दो पैसे भी नहीं

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

सभी धर्मों की एकता पर बल देने वाले रामकृष्ण परमहंस भारत के महान संत, आध्यात्मिक गुरु और दार्शनिक थे। वह मानवीय मूल्यों के प्रबल समर्थक थे। उनका जन्म 18 फरवरी 1836 को बंगाल के कामारपुर गांव में हुआ था। बचपन में इनका नाम गदाधर था। इनके जन्म के बारे में कई प्रकार कहानियां कही जाती हैं। 

आध्यात्मिक संत होने के बाद भी इन्हें तनिक भी अहंकार नहीं था। परमहंस के सबसे प्रिय शिष्य स्वामी विवेकानंद थे। एक बार विवेकानंद ने हिमालय पर जाकर तपस्या करने की अनुमति मांगी, तो उन्होंने कहा कि देश में इतने सारे लोग भूख से पीड़ित हैं, उनकी सहायता करने की जगह तपस्या करके कौन सी सिद्धि पाना चाहते हो। परमहंस के बारे में एक बड़ी रोचक कथा कही जाती है। 

जब स्वामी रामकृष्ण परमहंस दक्षिणेश्वर मंदिर के पुजारी थे, तो लोग उनकी लोकप्रियता देखकर ईर्ष्या करने लगे। एक दिन एक संन्यासी उनके पास आया और बोला कि यदि तुम सचमुच परमहंस हो तो चमत्कार दिखाओ। परमहंस ने बड़ी विनम्रता से कहा कि मैं तो एक साधारण आदमी हूं। चमत्कार कैसे दिखा सकता हूं। उस संन्यासी ने गर्व से कहा कि मैंने 18 साल तक हिमालय पर कठोर तपस्या की है। इस तपस्या के परिणाम स्वरूप मैं गंगा नदी के पानी पर चल सकता हूं। तुमने तो कोई भी सिद्धि हासिल नहीं की। 

तब रामकृष्ण ने विनीत भाव से कहा कि मुझे तो जब भी नदी के उस पार जाना चाहता हूं, नाविक को आवाज देता हूं। वह दो पैसे में मुझे उस पार उतार देता है। तुम्हारी सिद्धि की औकात तो दो पैसे भी नहीं है। तुमने 18 साल इसे हासिल करने में लगा दिए। यदि इन वर्षों का उपयोग लोगों की भलाई में करते, तो जीवन सफल हो गया होता। यह सुनकर संन्यासी चला गया।