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Saturday, April 26, 2025

शाबाश बेटा! तुम ऐसे ही बने रहना

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

ज्ञान हमें विनम्र होना सिखाता है, लोगों का कल्याण करना सिखाता है। वह हमें प्रेरित करता है कि अपनी भलाई सोचते हुए भी दूसरे लोगों का भला कैसे किया जा सकता है। उस ज्ञान का कोई मूल्य नहीं है जिससे समाज को कोई फायदा न हो। किसी राज्य में एक गुरुकुल था। 

उस गुरुकुल में सैकड़ों बच्चे शिक्षा हासिल कर रहे थे। कई राज्यों से गरीब और धनवान परिवारों के बच्चे समान रूप से शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। गुरुकुल में कुछ राज्यों के राजकुमार तक वहां पढ़ रहे थे। जब किसी शिष्य की पढ़ाई पूरी हो जाती थी तो गुरु जी कई तरह की परीक्षाएं लिया करते थे। एक बार तीन शिष्यों की एक साथ शिक्षा पूरी हो गई। गुरु जी ने कई तरह की परीक्षाएं लीं और उन तीनों शिष्यों को बुलाकर कहा कि अभी तुम लोग अपनी कुटिया में जाओ। कल सुबह आना, तुम लोगों की अंतिम परीक्षा होगी। 

यह सुनकर तीनों शिष्य अपनी-अपनी कुटिया में चले गए। आधी रात को गुरु जी ने तीनों कुटिया से लेकर अपनी कुटिया तक ढेर सारे कांटे बिखेर दिए। सुबह हुई। तीनों शिष्य अपनी-अपनी कुटिया से बाहर निकले। एक शिष्य तो कांटों की परवाह किए बिना चलता हुआ गुरु जी की कुटिया के पास पहुंचा और बैठकर कांटे निकालने लगा। दूसरे शिष्य ने पहले वाले को कांटों पर चलते देखा, तो वह सतर्क हो गया। वह कांटों से बचकर चलने लगा और गुरु जी की कुटिया के बाहर बैठ गया। 

वहीं तीसरे शिष्य ने कांटों को देखा, तो उसने पास के पेड़ की कुछ टहनियां तोड़ी और उन्हें झाड़ू की तरह बांधकर रास्ते से सारे कांटे इकट्ठा किया और उसे कूड़ा फेंकने वाली जगह पर डाल आया। गुरु जी की कुटिया तक आकर उसने गुरु जी को प्रणाम किया और एक किनारे बैठ गये। गुरु जी ने उससे कहा कि शाबाश बेटा! तुम जीवन भर ऐसे ही बने रहना।

चित्र-साभार गूगल

Saturday, April 12, 2025

सम्राट पीटर का दूर हुआ भ्रम

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

भ्रम एक ऐसी स्थिति है जिसमें फंसे व्यक्ति को सच्चाई का ज्ञान नहीं रहता है। वह व्यक्ति अपने और संसार के बारे में सोचता कुछ है और वास्तविकता कुछ और ही होती है। ऐसे ही एक सम्राट थे पीटर। वे रूस जैसे विशाल  देश के सम्राट थे। वैसे तो सम्राट उदार हृदय, प्रजावत्सल और धर्म निष्ठ थे।

वे अपनी प्रजा के कल्याण के लिए भी प्रयासरत रहते थे। प्रजा में उनका बड़ा सम्मान था, लेकिन कई बार वे कुछ बातों को लेकर भ्रम में रहते थे। एक बार उन्होंने अपनी प्रजा के लिए एक विशालकाय चर्च का निर्माण करवाया। वह रोज उस चर्च में प्रार्थना करने जाते थे। सम्राट को चर्च आता देखकर भारी भीड़ जमा होती थी।

एक दिन उन्होंने पादरी से कहा कि हमारे देश की प्रजा बड़ी धार्मिक है। पादरी ने उस समय तो कुछ नहीं कहा, लेकिन शाम को उसने कुछ लोगों को संदेश भिजवा दिया कि कल सम्राट चर्च नहीं आएंगे। दूसरे दिन सम्राट निश्चित समय पर चर्च पहुंचे, तो देखा कि कुछ लोग वहां मौजूद हैं। सम्राट ने पादरी से इसकी वजह पूछी, तो पादरी ने कहा कि यहीं की जनता धर्मभीरु नहीं, सम्राट भीरु है।

आपने कल जो भीड़ देखी थी, वह आपके कारण थी। कल मैंने संदेश भिजवा दिया था कि आज सम्राट नहीं आएंगे। आपकी वजह से चर्च आने वाले लोग नहीं आए। सच्चे धार्मिक तो कुछ ही लोग हैं जिनको इस बात से फर्क नहीं पड़ता है कि सम्राट आने वाले हैं या नहीं। यह सुनकर सम्राट पीटर आश्चर्यचकित रह गए। वे मानते थे कि उनके देश की प्रजा धार्मिक है। वह प्रभु की आराधना के लिए चर्च आती है। इसके बाद पीटर की आंख खुल गई। कई बातों में उनका भ्रम दूर हो गया।