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Wednesday, June 11, 2025

लाखों साल पुरानी सभ्यता का गवाह रहा है अरावली क्षेत्र

अशोक मिश्र

दिल्ली के पास से शुरू होकर दक्षिणी हरियाणा और राजस्थान से होते हुए गुजरात के अहमदाबाद में समाप्त होने वाली 692 किमी लंबी अरावली पर्वत शृंखला दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत शृंखलाओं में से एक है। अरावली पर्वत शृंखला पृथ्वी के इतिहास की चार भूगर्भिक युगों में से तीसरी प्रोटेरोजोइक काल की मानी जाती है। प्रोटेरोजोइक युग आज से 2500 से 538.8 लाख साल पहले का माना गया है। अभी हाल में ग्रीनवॉल प्रोजेक्ट के तहत पुरातत्व विरासत अनुसंधान और प्रशिक्षण अकादमी ने सर्वे करके कुछ ऐसे सबूत इकट्ठे किए हैं जिससे यह साबित होता है कि लाखों साल पहले अरावली क्षेत्र में मानव जीवन था। 

अरावली क्षेत्र के 420 एकड़ क्षेत्र में किए गए सर्वे के दौरान दमदमा क्षेत्र में कुल्हाड़ी और खुरचने वाले औजार मिले हैं। यह सब पुरापाषाणकाल की कलाकृतियां बताई जाती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि कुल्हाड़ी और खुरचने वाला औजार छह से आठ लाख साल पुराना है। लाखों साल पहले अरावली क्षेत्र में मानव सभ्यता का विकास हो रहा था। यह भी माना जाता है कि दिल्ली से लेकर गुजरात तक फैले अरावली क्षेत्र में भील जनजाति निवास करती रही है। भील जनजाति की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा अरावली क्षेत्र है। 

पुरातत्व विभाग को अरावली क्षेत्र में मानव सभ्यता के विकास के प्रमाण मिले हैं, जो पाषाण युग से लेकर तांबे और लौह युग तक फैले हुए हैं। अरावली क्षेत्र में पहले भी मानव जीवन के प्रमाण मिलते रहे हैं। आनंदपुर गांव में भी कुछ साल पहले मानव सभ्यता के प्रमाण मिले थे। अब मांगर और कोट गांव में भी ऐसे प्रमाण मिले हैं जिससे यह साबित होता है कि लाखों साल पहले मानव सभ्यता यहां निवास करती थी। राजस्थान के जयपुर से लेकर अहमदाबाद तक जगह-जगह पर मानव सभ्यता के प्रमाण मिल चुके हैं। 

अरावली क्षेत्र में पत्थरों पर उकेरी गई कुछ कलाकृतियां भी मिली हैं जिससे अनुमान लगाया जाता है कि इस क्षेत्र में आदिमानवों का समूह रहता रहा होगा। एक चट्टान पर तो मानव समूह के निशान भी पाए गए हैं। अरावली क्षेत्र को गणेश्वर सुनारी सांस्कृतिक समूह का हिस्सा माना जाता है जो ईसा से तीसरी शताब्दी पूर्व निवास करने वाली तांबा उत्पादक सभ्यता थी। इतना ही नहीं, पुरातत्व विज्ञानियों को लौह सभ्यता के भी प्रमाण समय समय पर मिलते रहे हैं। 

विभिन्न काल में अरावली क्षेत्र में निवास करने वाली सभ्यताओं के बारे में विस्तृत अध्ययन की आवश्यकता है। भारत की प्राकृतिक हरित दीवार कही जाने वाली अरावली पर्वत शृंखला को अब बचाने की बहुत जरूरत है। पहले से ही खनन माफियाओं ने इसको काफी नुकसान पहुंचाया है।

Sunday, April 20, 2025

गुजराती संत सरयू दास की उदारता

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

सहनशील व्यक्ति अपने जीवन में न केवल सुखी रहता है, बल्कि वह दूसरे प्राणियों के प्रति उदार भी रहता है। सहनशीलता उसे दूसरों की पीड़ा को जानने और लोगों की मदद करने के लिए भी प्रेरित करती है। सहनशाल व्यक्ति को कभी किसी प्रकार की परेशानी का सामना भी नहीं करना पड़ता है। यदि दुनिया का हर आदमी सहनशील हो जाए, तो पूरे विश्व में लड़ाई झगड़ों को खत्त्म किया जा सकता है। 

ऐसे ही एक सहनशील और दया की प्रतिमूर्ति थे संत सरयू दास। उनका जन्म गुजरात के किसी गांव में हुआ था। इनकी पढ़ाई लिखाई बहुत कम हो पाई थी। वह बचपन से ही अपने मामा के यहां रहते थे। जब थोड़े समझदार हुए, तो यह अपने मामा के ही कारोबार में मदद करते थे। इनका बचपन से ही अध्यात्म की ओर झुकाव होने लगा था। युवा होने पर इनके मामा-मामी ने इनका विवाह करा दिया। 

लेकिन संयोग की बात है कि इनकी पत्नी बहुत ज्यादा दिन जीवित नहीं रहीं। पत्नी की मृत्यु के बाद तो इनका झुकाव पूरी तरह अध्यात्म की ओर हो गया। सरयू दास ने संन्यास ग्रहण कर लिया। एक बार की बात है, यह कहीं जा रहे थे। रेलगाड़ी में इन्हें कहीं बैठने की जगह नहीं मिली। किसी तरह इन्होंने जगह बनाई और डिब्बे में ही फर्श पर बैठ गए। इनके सामने खड़ा एक व्यक्ति बार-बार अपना पैर इनके पैर पर मारता और हटा लेता। 

कई बार ऐसा होने पर संत सरयू दास ने उस आदमी से कहा कि भैया, मुझे लगता है कि आपके पैर में किसी किस्म की तकलीफ है। इसलिए आप मेरा ध्यान उस खींचना चाहते हैं। इसके बाद उन्होंने उस व्यक्ति का पैर अपनी गोद में रख लिया और उसे सहलाने लगे। यह देखकर उस व्यक्ति ने सरयूदास से क्षमा मांगते हुए कहा कि मुझे माफ कर दीजिए। मैं ही नीच आदमी हूं।


Friday, April 11, 2025

बिना संगठन के कैसे न्याय पथ पर चलेगी कांग्रेस?

अशोक मिश्र

अहमदाबाद में साबरमती के तट पर कांग्रेस का दो दिवसीय अधिवेशन खत्म हो गया। गुजरात की धरती पर कांग्रेस का अधिवेशन 64 साल बाद हुआ है। इन दो दिनों का निचोड़ यह है कि कांग्रेस अब न्याय पथ पर चलेगी। वैसे तो कांग्रेस अधिवेशन में जितने भी वक्ताओं ने अपने विचार रखे, उनमें नवीनता नजर नहीं आई। वही, मोदी सरकार पर हमला, मोदी सरकार देश बेच देगी, अडानी-अंबानी से लेकर जातिगत जनगणना और संविधान बचाने का आह्वान, यह सब तो पिछले एक-डेढ़ साल से देश की जनता सुनती आ रही है। इस अधिवेशन में ऐसा नया क्या था जिससे देश की जनता को लगे कि कांग्रेस ने नया रूप धारण किया है। कांग्रेस नेताओं ने अधिवेशन में संकल्प लिया है कि न्याय पथ पर चलते हुए सबसे पहले गुजरात को जीतना है, उसके बाद पूरा देश।
सवाल यह है कि गुजरात विधानसभा चुनाव से पहले देश में लगभग आठ-नौ राज्यों में चुनाव होने हैं। इन राज्यों का क्या होगा? क्या कांग्रेस इन राज्यों में चुनाव नहीं लड़ेगी और अपनी पूरी ताकत गुजरात में ही झोंक देगी? कुछ महीनों के बाद बिहार में विधानसभा चुनाव है। कांग्रेस नेता कन्हैया कुमार इन दिनों बिहार में ‘पलायन रोको, नौकरी दो’ पदयात्रा कर रहे हैं। कुछ दिन पहले एकाध किमी की पदयात्रा कन्हैया कुमार के साथ लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने भी की थी। भीड़ भी काफी जुटी थी। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि यह भीड़ कांग्रेस के पक्ष में वोट में कितनी तब्दील होगी? जिस तरह कन्हैया कुमार या राहुल गांधी की सभाओं, कार्यक्रमों में भीड़ उमड़ रही है, वह पोलिंग बूथ तक कांग्रेस के पक्ष में जा पाएगी? भीड़ जुटना और कांग्रेस के पक्ष में मतदान होना, दोनों अलग-अलग बाते हैं।
सभी जानते हैं कि कांग्रेस का मुख्य मुकाबला भाजपा से है। कांग्रेस नेता जब भी हमला करते हैं, तो वह भाजपा के साथ-साथ आरएसएस को अपने लपेटे में लेते हैं। चलिए मान लिया कि भाजपा और आरएसएस के साथ कांग्रेस की विचारधारा की लड़ाई है। लेकिन कांग्रेस की विचारधारा तो सबके सामने साफ होनी चाहिए। कांग्रेस पिछले दो-तीन दशक से एक सीध में चलती हुई नजर नहीं आ रही है। राहुल गांधी की दादी के जिंदा रहते तक कांग्रेस अपने को सेक्युलर कहती थी और सेक्युलरिज्म पर विश्वास भी करती थी। लेकिन राजीव गांधी ने रामजन्म भूमि का ताला खुलवाकर अपने को हिंदुओं का पक्षधर होने की कोशिश की। शाहबानो मुद्दे पर बुरी तरह मात खाए राजीव गांधी ने अरुण नेहरू की सलाह पर राममंदिर जन्मभूमि का ताला खुलवाकर अपने को हिंदू हितैषी साबित करने की कोशिश की। एक योजना के तहत अयोध्या कोर्ट में मुकदमा दायर किया गया और सिर्फ 40 मिनट में अयोध्या की कोर्ट ने फैसला देकर रामजन्म भूमि का ताला खुलवा दिया। बस, कांग्रेस का वैचारिक भटकाव यहीं से शुरू हुआ। वह भाजपा और आरएसएस के मुकाबले में वह न हिंदुत्व का झंडाबरदार बन पाई और न ही अपना धर्म निरपेक्ष चरित्र ही बरकार रख पाई।
नतीजा हुआ कि कांग्रेस से वह जनता दूर होती चली गई जो अपने को धर्म निरपेक्ष मानती थी। कार्यकर्ता दूर नहीं हुए, दूर कर दिए गए। ऊपर बैठे नेताओं ने जनता और कार्यकर्ता की उपेक्षा शुरू कर दी। इसका परिणाम यह हुआ कि पूरे देश में एक मजबूत जनाधार वाली पार्टी धीरे-धीरे खोखली होती चली गई और कार्यकर्ता विहीन हो गई। आज जब कांग्रेस के नेता पूरे देश को जीतने की बात करते हैं, तो हंसी आती है। बिना किसी संगठन के कोई चुनाव जीत सकता है, इसका कोई उदाहरण शायद ही लोकतांत्रिक व्यवस्था में मिले। कांग्रेस को अगर देश में मजबूती से खड़ा होना है, तो उसे सबसे पहले अपना संगठन खड़ा करना होगा। बूढ़े और अकड़ में चूर नेताओं को बेमुरौव्वत होकर विदा करना होगा। युवा, उत्साही और निष्ठावान कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी सौंपनी होगी। गुटबाजों को तो कान पकड़कर बाहर करना होगा।