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Friday, April 11, 2025

चंदेल सम्राट के अधीन थे राजा भोज

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

राजा भोज परमार वंश के शासक थे। उनकी राजधानी का नाम धारानगरी था। कहा जाता है कि उनका राज्य उत्तर में चितौड़ से लेकर दक्षिण में उत्तरी कोंकण और पूर्व में विदिशा से लेकर पश्चिम में साबरमती नदी तक फैला हुआ था। राजा भोज ने अपने आसपास के राजाओं से अलग-अलग युद्ध में विजय प्राप्त की थी, लेकिन वह चंदेल सम्राट विद्याधर वर्मन से युद्ध में पराजित हो गए थे। 

वह चंदेल सम्राट के आधीन राजा होकर रह गए थे। राजा भोज के शासनकाल के बारे में एक किंवदंती है कि उनके राज्य में सभी लोग पढ़े लिखे थे। कोई भी अनपढ़ नहीं था। यह बात कितनी सही है, यह तो इतिहासकार ही बता सकते हैं।  उन्होंने अपने शासनकाल में प्रजा के हित में काफी कार्य किए थे। राजा भोज बहुत बड़े वीर और प्रतापी होने के साथ-साथ प्रकाण्ड पंडित और गुणग्राही भी थे। 

इन्होंने कई विषयों के अनेक ग्रंथों का निर्माण किया था।  इन ग्रंथों की चर्चा आज भी की जाती है। राजा भोज बहुत अच्छे कवि, दार्शनिक और ज्योतिषी थे। कहा जाता है कि सरस्वतीकंठाभरण, शृंगारमंजरी, चंपूरामायण, चारुचर्या, तत्वप्रकाश, व्यवहारसमुच्चय आदि अनेक ग्रंथ इन्होंने ही लिखे थे। इनके राज्य में विद्वानों का जमघट लगा रहता था। यह विद्वानों का बड़ा आदर करते थे। इनकी पत्नी का नाम लीलावती था जो बहुत बड़ी विदुषी थी। धर्मशास्त्र पर भोजदेव कृत ‘पूर्तमार्तण्ड' नामक ग्रंथ है। 

इसके अतिरिक्त उन्होंने धर्मशास्त्र सम्बन्धी और ग्रंथ भी लिखे थे, क्योंकि इसका उल्लेख अनेक सुप्रसिद्ध धर्मशास्त्र ग्रंथकारों ने अपने ग्रंथों में किया है। दक्षिण कल्याणपुर के चालुक्यवंशी प्रसिद्ध राजा विक्रमांकदेव के मंत्री भट्टविज्ञानेश्वर ने याज्ञवल्लक्य स्मृति पर मिताक्षरी व्याख्या की है। भोजदेव ने 'चाणक्य राजनीतिशास्त्र' नामक ग्रंथ भी लिखा। राजा भोज आज भी अपने ग्रंथों और विद्वता के लिए प्रसिद्ध हैं।

बिना संगठन के कैसे न्याय पथ पर चलेगी कांग्रेस?

अशोक मिश्र

अहमदाबाद में साबरमती के तट पर कांग्रेस का दो दिवसीय अधिवेशन खत्म हो गया। गुजरात की धरती पर कांग्रेस का अधिवेशन 64 साल बाद हुआ है। इन दो दिनों का निचोड़ यह है कि कांग्रेस अब न्याय पथ पर चलेगी। वैसे तो कांग्रेस अधिवेशन में जितने भी वक्ताओं ने अपने विचार रखे, उनमें नवीनता नजर नहीं आई। वही, मोदी सरकार पर हमला, मोदी सरकार देश बेच देगी, अडानी-अंबानी से लेकर जातिगत जनगणना और संविधान बचाने का आह्वान, यह सब तो पिछले एक-डेढ़ साल से देश की जनता सुनती आ रही है। इस अधिवेशन में ऐसा नया क्या था जिससे देश की जनता को लगे कि कांग्रेस ने नया रूप धारण किया है। कांग्रेस नेताओं ने अधिवेशन में संकल्प लिया है कि न्याय पथ पर चलते हुए सबसे पहले गुजरात को जीतना है, उसके बाद पूरा देश।
सवाल यह है कि गुजरात विधानसभा चुनाव से पहले देश में लगभग आठ-नौ राज्यों में चुनाव होने हैं। इन राज्यों का क्या होगा? क्या कांग्रेस इन राज्यों में चुनाव नहीं लड़ेगी और अपनी पूरी ताकत गुजरात में ही झोंक देगी? कुछ महीनों के बाद बिहार में विधानसभा चुनाव है। कांग्रेस नेता कन्हैया कुमार इन दिनों बिहार में ‘पलायन रोको, नौकरी दो’ पदयात्रा कर रहे हैं। कुछ दिन पहले एकाध किमी की पदयात्रा कन्हैया कुमार के साथ लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने भी की थी। भीड़ भी काफी जुटी थी। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि यह भीड़ कांग्रेस के पक्ष में वोट में कितनी तब्दील होगी? जिस तरह कन्हैया कुमार या राहुल गांधी की सभाओं, कार्यक्रमों में भीड़ उमड़ रही है, वह पोलिंग बूथ तक कांग्रेस के पक्ष में जा पाएगी? भीड़ जुटना और कांग्रेस के पक्ष में मतदान होना, दोनों अलग-अलग बाते हैं।
सभी जानते हैं कि कांग्रेस का मुख्य मुकाबला भाजपा से है। कांग्रेस नेता जब भी हमला करते हैं, तो वह भाजपा के साथ-साथ आरएसएस को अपने लपेटे में लेते हैं। चलिए मान लिया कि भाजपा और आरएसएस के साथ कांग्रेस की विचारधारा की लड़ाई है। लेकिन कांग्रेस की विचारधारा तो सबके सामने साफ होनी चाहिए। कांग्रेस पिछले दो-तीन दशक से एक सीध में चलती हुई नजर नहीं आ रही है। राहुल गांधी की दादी के जिंदा रहते तक कांग्रेस अपने को सेक्युलर कहती थी और सेक्युलरिज्म पर विश्वास भी करती थी। लेकिन राजीव गांधी ने रामजन्म भूमि का ताला खुलवाकर अपने को हिंदुओं का पक्षधर होने की कोशिश की। शाहबानो मुद्दे पर बुरी तरह मात खाए राजीव गांधी ने अरुण नेहरू की सलाह पर राममंदिर जन्मभूमि का ताला खुलवाकर अपने को हिंदू हितैषी साबित करने की कोशिश की। एक योजना के तहत अयोध्या कोर्ट में मुकदमा दायर किया गया और सिर्फ 40 मिनट में अयोध्या की कोर्ट ने फैसला देकर रामजन्म भूमि का ताला खुलवा दिया। बस, कांग्रेस का वैचारिक भटकाव यहीं से शुरू हुआ। वह भाजपा और आरएसएस के मुकाबले में वह न हिंदुत्व का झंडाबरदार बन पाई और न ही अपना धर्म निरपेक्ष चरित्र ही बरकार रख पाई।
नतीजा हुआ कि कांग्रेस से वह जनता दूर होती चली गई जो अपने को धर्म निरपेक्ष मानती थी। कार्यकर्ता दूर नहीं हुए, दूर कर दिए गए। ऊपर बैठे नेताओं ने जनता और कार्यकर्ता की उपेक्षा शुरू कर दी। इसका परिणाम यह हुआ कि पूरे देश में एक मजबूत जनाधार वाली पार्टी धीरे-धीरे खोखली होती चली गई और कार्यकर्ता विहीन हो गई। आज जब कांग्रेस के नेता पूरे देश को जीतने की बात करते हैं, तो हंसी आती है। बिना किसी संगठन के कोई चुनाव जीत सकता है, इसका कोई उदाहरण शायद ही लोकतांत्रिक व्यवस्था में मिले। कांग्रेस को अगर देश में मजबूती से खड़ा होना है, तो उसे सबसे पहले अपना संगठन खड़ा करना होगा। बूढ़े और अकड़ में चूर नेताओं को बेमुरौव्वत होकर विदा करना होगा। युवा, उत्साही और निष्ठावान कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी सौंपनी होगी। गुटबाजों को तो कान पकड़कर बाहर करना होगा।