Thursday, September 17, 2026

कब तक खुले मैनहोल करते रहेंगे लोगों की जान से खिलवाड़?


अशोक मिश्र

पलवल की गांधी कॉलोनी में सोमवार को जो हुआ, उसने लोगों के मन को झकझोर कर रख दिया है। चार साल की दीपांशी, जिसने अभी ठीक से बोलना भी नहीं सीखा था, जो अपनी मौत से पहले खेल रही थी, हंस रही थी, एक खुले मैनहोल में समा गई और हमेशा के लिए चली गई। यह कोई दुर्घटना नहीं, यह एक हत्या है, लापरवाही के चलते की गई हत्या। और यह पहली बार नहीं है। फरीदाबाद, गुरुग्राम, पलवल, पानीपत से लेकर पूरे हरियाणा में हर बरसात में, हर सर्दी, हर गरमी के मौसम में ऐसी खबरें आती हैं। 

कोई बच्चा, कोई बुजुर्ग, कोई बाइक सवार इस काले गड्ढे में गिर जाता है और फिर उसकी चीख सड़कों के शोर में दब जाती है। माँ-बाप की गोद खाली हो गई, दादा-दादी की आँखें सूख गईं। जो परिवार  अपनी बच्ची को सुरक्षित खेलने की जगह भी नहीं दे पाया, वह आज सिर्फ यादों और आँसुओं से जूझ रहा है। सड़कों पर बिखरे खुले मैनहोल अब सिर्फ लापरवाही की निशानी नहीं, बल्कि मौत के गड्ढे बन चुके हैं।  बच्चे, बुजुर्ग, आम राहगीर, कोई भी सुरक्षित नहीं। ढक्कन गायब हो जाते हैं, चोरी हो जाते हैं, टूट जाते हैं या काम पूरा होने के बाद ठेकेदार और अधिकारी भूल जाते हैं। 

कभी नगर पालिका या नगर निगम के ठेकेदार काम खत्म होने के बाद ढक्कन लगाना भूल जाते हैं, कभी नाली की सफाई के लिए ढक्कन हटाया जाता है और वापस नहीं रखा जाता। और कई बार तो लोहे के भारी ढक्कन चोरी हो जाते हैं और महीनों तक कोई सुध लेने वाला नहीं होता। कोई रजिस्टर नहीं, कोई निगरानी नहीं, कोई जिम्मेदारी नहीं। ठेकेदार कहता है काम नगर निगम का था, नगर निगम कहता है जल बोर्ड की लापरवाही है, और बीच में एक मासूम की जान चली जाती है। यह लापरवाही नहीं तो क्या है? 

यह सिस्टम की वह क्रूर उदासीनता है जो सड़क पर चलते हर आम आदमी को अनाथ समझती है। कानून साफ कहता है। संविधान का अनुच्छेद 21 हर नागरिक को सुरक्षित जीवन का अधिकार देता है। अदालतें बार-बार फैसला सुना चुकी हैं कि खुले मैनहोल में गिरने से होने वाली मौत या चोट पर नगर निकाय और संबंधित विभाग मुआवजा देने के लिए बाध्य हैं। 

लापरवाही साबित होने पर अधिकारियों पर आपराधिक कार्रवाई भी हो सकती है। कई हाईकोर्ट ने अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से जवाबदेह ठहराया है और मुआवजे की राशि अधिकारियों से वसूलने के निर्देश दिए हैं। फिर भी जमीनी हकीकत नहीं बदलती। हरियाणा में हाल ही में निर्देश जारी हुए कि कहीं भी मैनहोल खुला न रहे। निगरानी समितियाँ बनाई गईं, अधिकारियों को व्यक्तिगत जवाबदेही सौंपी गई। अगर लापरवाही से जान जाती है तो सख्त कार्रवाई की बात कही गई। 

लेकिन निदेर्शों से ज्यादा जरूरत है निरंतर निरीक्षण, तुरंत ढक्कन लगाने की व्यवस्था, चोरी रोकने के उपाय और नागरिकों की शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई की। जिम्मेदारी सिर्फ सरकार की नहीं, हम सबकी है—जागरूक रहें, शिकायत करें, दबाव बनाएँ। क्योंकि एक मासूम की मौत पूरे समाज के लिए शर्मनाक है।

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